सभी को नमस्ते।
सबसे पहले आभार - आचार्य जी का, मेरी प्यारी संस्था का और मेरे सभी गीता साथियों का।
संस्था में आए मुझे 1 साल हो गया ।
आज आपको अपनी यात्रा के बारे में बताना चाहती हूँ - एक ऐसी यात्रा जिसमें गिरता-पड़ता व्यक्ति चलते-चलते उठकर चलता जा रहा है।
1. यात्रा की शुरुआत - गीता सत्रों से
ढाई साल पहले गीता सत्रों से यह यात्रा शुरू हुई। वो पहला सेशन आज भी याद है, रात को 2:30 बजे तक अटेंड किया था। आँखें नम थीं, पता नहीं क्यों, पर लग रहा था कि शायद यही आना था, बस आते-आते देर हो गई।
फिर हर सेशन के साथ सिलसिला बढ़ता गया। खुद को जैसी थी, वैसी देखना गवारा न हुआ। हर दर्द, हर पीड़ा अंदर से खा रही थी। सब झेला है - मानसिक तनाव, पैनिक अटैक, घरवालों की नफरत, लोगों के बदलते चेहरे, झूठा प्रेम, झूठे रिश्ते।
फिर जीवन में कोई आया, जिसने ज्ञान दिया, बल दिया, रास्ता दिखाया। बस चलने को खुद कहा, ताकत का एहसास करवाया, पर मजबूत और अडिग बने रहकर आगे बढ़ते जाने को कहा। रोशनी दी, पर चलने को खुद कहा।
2. खुद को तलाशना और घर से निकलना
हर बीतते वक्त के साथ मैं पिघल रही थी। उम्र के इतने सालों में कभी माँ-बाप, भाई-बहन, दोस्त - किसी ने यह नहीं कहा था। सोचती थी, यह कैसा प्रेम, कैसा साथ है।
मैं बस आगे बढ़ती गई। बिना घर पर बताए जयपुर आई, जॉब सर्च की। इतने सारे इंटरव्यू दिए। स्किल नहीं थी, पर सीखना था, करना था। क्योंकि किसी ने कहा था - इतना तो कमाओ कि अपनी रोटी खुद खा सको। बस वही बात साथ थी।
रिजेक्ट हुई, फिर भी एक-एक दिन में 4-5 इंटरव्यू दिए। पूरा दिन भागना। पता नहीं इतनी हिम्मत कैसे आई।
वापस घर आई, पापा को बोला जाना चाहती हूँ। उन्होंने कहा - अगर गई तो हमारी तरफ से सब खत्म है। उस रात बहुत रोई, पर भीतर था कि नहीं, अब बस। सुबह 5 बजे की बस से निकल गई। पहली बार ऐसे बाहर रहना था, नहीं जानती थी कैसे करूँगी, पर साहब की शिक्षाएँ साथ रहीं और सब होता गया। वो डर तो सिर्फ मेरी कल्पनाएँ थीं।
सेशन मेरे लिए आज भी पहली प्राथमिकता है। यह जो भीतरी मजबूती है, वहीं से मिली है। सबसे कहूँगी - सेशन को अपने जीवन का हिस्सा बना लीजिए।
3. बुक-स्टॉल और झिझक का टूटना
फिर थोड़ा आगे बढ़ी। बुक-स्टॉल के बारे में सुना तो पहली बार डर लगा, ग्रुप से वापस हट गई। लगा पता नहीं कैसे लोग हैं ये। फिर दोबारा जुड़ी और लगातार 5-6 महीने बुक-स्टॉल लगाया।
वहाँ जब लोगों से बात करती तो एक खुशी होती थी, सबको बताने में कि आचार्य जी हम लोगों के लिए क्या कर रहे हैं। ऐसे ही मेरी झिझक दूर हुई। मेरे और दुनिया के बीच जो दीवार बनाई थी, वो हटी। मैं लोगों के साथ सहज होने लगी।
दिसंबर में पहली बार सेशन लेने आई थी। पहली बार सामने से आचार्य जी को देखा। वो सेशन मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकती। पूरे 6 घंटे कोने में खड़ी रही, क्योंकि आचार्य जी खड़े थे। बस आँखें उनसे नहीं हट रही थीं। कहना चाहती थी - आचार्य जी, आपकी वजह से आज मैं हूँ, पर हिम्मत नहीं जुटा पाई और बस दूर से देखती रही।
4. संस्था तक का सफर
उस सेशन में आचार्य जी ने कहा था - अगर कोई मिला होता ना मेरे जैसा मुझे तो मैं जान दे देता। इस एक लाइन ने मुझे कितनी रातों तक सोने नहीं दिया।
बाहर की जॉब सुकून तो नहीं देती थी, पर सीखना था। फिर संस्था में आउटरीच की ट्रेनिंग के लिए आई। डरी-सहमी सी थी, सिलेक्शन नहीं हुआ। पूरे रास्ते बस में खूब रोते हुए गई। काफी दिनों तक रोई, पर फिर खुद पर काम किया।
और संस्था ने फिर बुला लिया। मैं 22 सितंबर 2025 को नोएडा गई, 23 को मेरा इंडक्शन था और 24 को फाउंडेशन में मेरा पहला दिन था।
सच कहूँ तो मुझमें कोई स्किल नहीं थी, मुझे कुछ ज्यादा आता भी नहीं था। जहाँ से मैं आती हूँ वहाँ लड़कियों की पढ़ाई को प्राथमिकता नहीं दी जाती। अगर पढ़ना है तो घर का सारा काम खत्म करके फिर पढ़ो। पर मैं सीखना चाहती थी। मैं फास्ट लर्नर हूँ - अगर आप मुझे बताओगे तो मैं वो काम कर दूँगी, बस थोड़ा समय लगता है।
मेरे मेंटर और संस्था के लोगों ने मेरी काफी मदद की। मैंने फाउंडेशन में बोलना सीखा, अपनी बात रखना सीखा। मुझे यहाँ से इतना कुछ मिला है जिसके लिए शब्द कम है मेरे पास ।
सही काम ही सही जीवन होता है, यह यहाँ आकर ही जाना। आप मेरी पुरानी तस्वीर में मुझे देख सकते हैं और आज संस्था में आने के बाद जो बोल्डनेस और कॉन्फिडेंस है, वो भी देख सकते हैं। संस्था ने इतना काबिल बना दिया है कि अब कहीं भी कमजोर नहीं पड़ने वाली। अनावश्यक डर अब नहीं रहे एक बेफिक्री आ गयी है और ज़िम्मेदार हो गयी हूं।
5. आज मैं क्या हूँ
कल का नहीं पता, आज सही और बेहतर होना चाहिए। यह पल बर्बाद न हो। मैंने खुद को हर पल बेहतर पाया है और यह सिर्फ कहने के लिए नहीं है, आज मेरा चेहरा ही इसका प्रमाण है।
इन 1 सालों में यहाँ से मुझे क्या कुछ नहीं मिला - सब कुछ जिया है। अपनी कंडीशनिंग पर लगातार काम करना, समय का सही उपयोग, व्यर्थ के लोग जीवन से खुद ही दूर हो गए।
जब पहली बार आचार्य जी से बात की तो कुछ कह नहीं पाई, रोना आ गया था। क्योंकि जो यहाँ से मिला है उसके लिए शब्द नहीं हैं। एक तो इतना सुंदर काम दिया, ऊपर से सैलरी भी देते हैं। और यहाँ आपकी बेहतरी ही पहली प्राथमिकता है।
आचार्य जी, अभी भी बहुत कुछ सिखाना। आपने कहा था - रुक नहीं जाना। मैं नहीं रुक रही। एक्सरसाइज करती हूँ, हेल्थ ठीक कर रही हूँ, नई लैंग्वेज सीख रही हूँ। घर पर हूँ फिर भी समय व्यर्थ नहीं जाने देती, क्योंकि बेचैनी होने लगती है। वो पुरानी सड़ी-गली जिंदगी पसंद नहीं। घरवालों ने भी अब अपना लिया है, क्योंकि वो मजबूती दिखाई दी। यह सिर्फ आपकी शिक्षाओं के कारण हुआ है।
यही है मेरी यात्रा।
गीता प्रतिभागियों, आज आप लोग जो भी मुझे देखते हो, वो सिर्फ साहेब की शिक्षाओं का असर है, बाकी कुछ नहीं, वरना यह सड़ा-गला समाज किसी को कुछ नहीं दे सकता।
आज कोई पुराना दोस्त या पहचान वाला कहता है कि तू बदल गई है, तो भीतर एक मुस्कान आती है। क्योंकि एक कली से मजबूत वृक्ष बनने की यह यात्रा जरूरी थी। यह दुनिया कमजोरों की नहीं है, यहाँ ताकत जरूरी है और वो रीढ़ मुझे आचार्य जी से मिली है।
गीता रिश्ते तोड़ती नहीं, बेहतर करती है... और संवेदनशीलता भी यही से सीखी मैंने।
पहले हर समय अपनी हर बात का दोष दूसरों को देने वाली मैं, कब वो खुद पर आ गई पता ही नहीं चला। अब जानती हूँ अगर कहीं दुख, बेचैनी है तो उसका कारण मैं ही हूँ।
जितना धन्यवाद करूँ कम है। आप सभी जो यहाँ आए हैं, बने रहिए आपको नहीं पता आपको क्या मिल रहा है।
असली लड़ाइयां वो हैं, जो अपने एकांत में लड़ी गई हैं।
जाओ विद्रोह करो अपने एकांतों में, जाओ विद्रोह करो अपने रिश्तों में, अपने उच्चारण, शरीर, सपनों, कपड़ों, आदतों से लड़ो, अपने कुल-कुटुम्ब के दोषों से लड़ो।
समर्पण नहीं मांग रहा, संघर्ष करो। सौंदर्य संघर्ष से आता है।
~ आचार्य जी❤️