
प्रचलित भ्रांतियाँ व उनका निवारण

आध्यात्मिक भ्रांतियाँ पढ़कर मुझे पहली बार समझ आया कि हम आध्यात्मिकता को कितना गलत तरीके से समझते आए हैं। इस किताब में आचार्य प्रशांत ने बहुत सरल भाषा में उन भ्रमों को तोड़ा है, जिन्हें हम सच मानकर जीते रहते हैं। किताब की सबसे खास बात यह लगी कि यह सिर्फ ज्ञान देने की कोशिश नहीं करती, बल्कि सोचने पर मजबूर करती है। कई जगह ऐसा लगा जैसे मेरी अपनी ही धारणाओं और आदतों पर सवाल उठ रहे हों। खासकर धर्म, ध्या...

भारत जैसे परिवेश में अध्यात्म को लेकर कई धारणाएं और कुछ बातें यूंही पीढ़ी दर पीढ़ी चलती आ रही हैं। अध्यात्म कोई जादू टोना और बिल्ली भगाने का मंत्र नहीं है,ये हमारी बेचैनी को हटाने का माध्यम है।मन में समाज की बैठाई कई भ्रांतियां टूटी हैं,अब जीवन से मानो बोझ सा उतर गया है। अंधविश्वास से बचने के लिए ये पुस्तक पढ़ना बहुत जरूरी है।

सत्य की तरफ बढ़ने के लिए पहले असत्य क्या है यह जानना होता है और यही सब हमे इस पुस्तक से माध्यम से समझने मिलता है . आज समाज में धर्म के नाम पर कैसी-कैसी अंधश्रद्धाए, मान्यताएँ ,भ्रम फैलाए जा रहे हैं जो हमें वास्तविक धर्म से कोसो दूर रखते हैं यह हमें इसमे जानने मिलता है. और जब अज्ञान का पर्दा हटता है तब हम ज्ञान की तरफ बढ़ पाते हैं. तो यह पुस्तक जरूर पढ़ें अगर अज्ञान हटाना है .