शून्यता सप्तति (Shoonyata Saptati)

शून्यता सप्तति (Shoonyata Saptati)

छंद 1-12
5/5
18 Ratings & 8 Reviews
Gifting available for eBook & Audiobook Add to cart and tap ‘Send as a Gift’
Paperback Details
Hindi Language
264 Print Length
Description
वेदान्त की बात जितनी स्पष्टता से महात्मा बुद्ध के दर्शन में उभरकर आती है, उतनी स्पष्टता से शायद कहीं और नहीं। और बुद्ध की वाणी सबसे ज़्यादा साफ़ होकर सुनाई देती है आचार्य नागार्जुन में।

‘शून्यता सप्तति’ आचार्य नागार्जुन द्वारा रचित ग्रंथ है, जो मानव के मूल दुख को संबोधित करता है। शून्यता पर आधारित यह ग्रंथ हमारी मान्यताओं और मन में उठ रहे कुतर्कों पर सवाल करता है।

आचार्य नागार्जुन की सारी बात शून्यता की थी। और आचार्य नागार्जुन तथ्यों की दुनिया में भी गहरी पैठ रखते थे — वो रसायनविद् थे, खगोलशास्त्री थे और तंत्रविद्या का भी गहरा ज्ञान रखते थे। आचार्य नागार्जुन ने तर्क को बड़ा महत्व दिया है, और तर्क की दुनिया में पूरे विश्व में उनका नाम बहुत-बहुत सम्मान से लिया जाता है।

मूल 'शून्यता सप्तति' ग्रंथ में कुल तिहत्तर छंद हैं। प्रस्तुत पुस्तक में प्रथम बारह छंदों पर आचार्य जी के व्याख्यानों को संकलित किया गया है। आचार्य जी ने एक-एक छंद को आज के परिप्रेक्ष्य में व‌ आपके जीवन से जोड़कर अत्यंत व्यावहारिक रूप से समझाया है, जिससे यह अमूल्य आध्यात्मिक ज्ञान आम जनमानस के लिए भी सहज और बोधगम्य हो जाता है।
Index
CH1
व्यावहारिक सत्य की उपेक्षा करके परमार्थ नहीं हासिल होता
CH2
निर्वाण भी शून्य है
CH3
न आदि न अन्त, मात्र प्रक्रिया
CH4
न उत्पत्ति, न स्थिति, न विनाश
CH5
अनुभव नहीं, बोध
CH6
सत्य की समाप्ति नहीं, असत्य की शुरुआत नहीं
Select Format
Share this book
क्या आपको आचार्य प्रशांत की शिक्षाओं से लाभ हुआ है? आपके योगदान से ही यह मिशन आगे बढ़ेगा।
Reader Reviews
5/5
18 Ratings & 8 Reviews
5 stars 100%
4 stars 0%
3 stars 0%
2 stars 0%
1 stars 0%