
सही नौकरी, सही काम, सही ज़िन्दगी

*"Sahi Karm" by Acharya Prashant is an eye-opening masterpiece that completely redefines how we look at our choices and daily actions. It cuts through the deep confusion of 'what to do' and 'what not to do' by directly addressing the root of our intentions. Reading this book has helped me immensely in understanding the difference between actions driven by societal pressure or ego, and actions bor...

बचपन में बिना गीता पढ़े एक बात बहुत प्रचलित तरीके से याद रहती थी कि श्री कृष्ण बोलते हैं कि "कर्म करो फल कि चिंता न करो" इस किताब को पढ़ने के बाद ये भ्रांति ख़त्म हो गई कर्म से पहले कर्ता आता है, अगर कर्ता का केंद्र हि गड़बड़ है तो कर्म कहां से बढ़िया निकलेगा अगर संयोग से बढ़िया कर्म दिख भी रहा है तो वो पाखंड है किसी न किसी रूप में वो निकलेगा उदाहरण के लिए अगर कोई नौकरी सिर्फ़ पैसे के लिए कर...

“सही कर्म” किताब ने मेरे कर्म को देखने का नजरिया पूरी तरह बदल दिया। पहले मैं काम को सिर्फ कमाई, जिम्मेदारी या मजबूरी के रूप में देखता था, लेकिन इस किताब ने समझाया कि कर्म का असली अर्थ इससे कहीं गहरा है। किताब बहुत सरल भाषा में यह स्पष्ट करती है कि हम जो भी करते हैं, उसका आधार हमारी सोच और समझ होती है। अगर भीतर स्पष्टता नहीं है, तो बाहरी कर्म चाहे जितने बड़े क्यों न हों, वे सही नहीं हो सकते। मुझे ख...