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Paperback Details
HindiLanguage
228Print Length
Description
आध्यात्मिक ग्रंथों में अष्टावक्र गीता का स्थान अद्वितीय है। इस अनुपम ग्रंथ को अद्वैत वेदान्त का सबसे शुद्ध ग्रंथ कहा जाता है। यह ग्रंथ मुमुक्षु राजा जनक और युवा ऋषि अष्टावक्र के मध्य हुए आत्मज्ञान विषयक संवाद का संकलन है।
प्रस्तुत पुस्तक में आचार्य प्रशांत द्वारा प्रकरण तीन से छः के श्लोकों पर दिए विस्तृत और सरल व्याख्यानों को संकलित किया गया है।
पुस्तक में तीसरे प्रकरण में अहम् और जगत का सम्बन्ध बताने से हुई शुरुआत छठे प्रकरण तक आत्मा और जगत के सम्बन्ध की गहराई तक ले जाती है।
तीसरे प्रकरण में ऋषि अष्टावक्र कहते हैं कि जिस जगत ने तुमको गंदा किया, उसी जगत में तुम्हें सफ़ाई नहीं मिलने वाली। और छठे प्रकरण में ऋषि कहते हैं, "मैं महासागर के समान हूँ और यह दृश्यमान संसार लहरों के समान। यह ज्ञान है, इसका न त्याग करना है और न ग्रहण, बस इसके साथ एकरूप होना है।"
इस अति शुद्ध ग्रंथ पर आचार्य प्रशांत की व्याख्या ने इसे सब मुमुक्षुओं के लिए सरल और ग्राह्य बना दिया है।
Index
CH1
जिससे बन्धन मिले हों, वो मुक्ति नहीं देगा (श्लोक 3.1)
CH2
जो जैसा है, उसे वैसा ही देखो (श्लोक 3.2)
CH3
तुम जगत से नहीं, जगत तुमसे है (श्लोक 3.3)
CH4
क्यों चुनते हो अंधेरे से और अंधेरे की ओर जाना? (श्लोक 3.4)
अगर आप अध्यात्म और और गहराई से समझना चाहते हैं - तो यह पुस्तक आपके लिए है।
इसे पढ़कर जीवन को और खुद को समझने में आसानी मिल रही है।
धन्यवाद PAF टीम 🙏
RAHUL SINGH
1y
Astavakra geeta
One of the best book i have read so far in my life,Astavakra is pure lit.
GOVIND PAL
1y
संसार से आसक्ति ही दुख है।
अभी मैं इस पुस्तक को पढ़ाना शुरू ही किया है,
मुझे इसमें खास बात यह लगी कि इसमें सीधे तौर पर प्रश्न किया गया है और जवाब भी बिल्कुल सीधे तौर पर ही मिलता है।
जैसे इसमें पहले ही श्लोक है जनक जी बोले -- हे प्रभु ज्ञान प्राप्ति का उपाय क्या है? मेरी मुक्ति किस प्रकार होगी? वैराग्य कैसे प्राप्त होता है?आप कृपा करके मुझे बतलाइए
और जवाब में अष्टावक्र जी ने कहा -- हे तात यदि तुम मुक्ति चाहते हो तो विषय...