
Originally published in Navbharat Times on 9 August '26
मनुष्य केवल उस मिट्टी से बँधे रहने के लिए नहीं बना है जहाँ उसका जन्म हुआ। गति प्रकृति है; वह स्वाभाविक है और मानचित्र पर खींची गई किसी भी सीमा से कहीं पुरानी है। किसी प्रवासी पक्षी को महाद्वीप पार करते देखकर हमारे भीतर विस्मय जागता है। लेकिन जब वही प्रवृत्ति दो पैरों पर चलने वाले, कंधे पर झोला लटकाए मनुष्य के रूप में सामने आती है, तो वही भावना संदेह, यहाँ तक कि उपहास में बदल जाती है। ऐसा क्यों?
पक्षियों पर भी प्रतिबंध क्यों न लगा दिया जाए? इस झील या उस खेत में बिना बुलाए आने पर उन्हें डाँटा क्यों न जाए? वे आते हैं क्योंकि प्रकृति इसी तरह गतिशील है। और मनुष्य को भी केवल उसी गाँव तक सीमित रहने के लिए नहीं बनाया गया जहाँ उसका जन्म हुआ। जुलाई के अंत में लगभग साठ हज़ार लोग मोरक्को और स्पेन के छोटे-से एन्क्लेव सेउटा की सीमा पर लगी बाड़ पर टूट पड़े। उसे पार करने की कोशिश में सत्तर से अधिक लोग मारे गए। हर जगह इन दृश्यों को ‘घेराबंदी’ के रूप में देखा गया। ‘घेराबंदी’ कहना आसान है, लेकिन सही नहीं। कुछ ही दिनों में उन साठ हज़ार लोगों में से लगभग सभी लौटकर अपनी इच्छा से मोरक्को चले गए; दो हज़ार से भी कम लोग वहाँ रुके।
उस बाड़ को पार करने वाली न तो कोई सेना थी, न कोई बस्ती। कोई आक्रमणकारी सेना अपने घर वापस नहीं लौटती। वह एक अफ़वाह से पैदा हुई उम्मीद की लहर थी। स्पेन ने पहले से देश में रह रहे प्रवासियों को नियमित करने की एक योजना घोषित की थी। दस लाख से अधिक लोगों ने उसके लिए आवेदन किया था। मानव-तस्करी के नेटवर्क तुरंत सक्रिय हो गए और उन्होंने एक अदालती फैसले को तोड़-मरोड़कर ऐसी कहानी बना दी, मानो कोई दरवाज़ा खुल गया हो। साठ हज़ार इंसान ऐसे वादे के पीछे चल पड़े जिसे किसी ने हताश लोगों को बेचने के लिए गढ़ा था।
तो उस बाड़ पर वास्तव में किसका दबाव पड़ रहा था? एक ऐसी प्रवृत्ति का, जो किसी भी राष्ट्र से पुरानी है, जिसका तस्करों ने लाभ उठाया और जो मनुष्यों द्वारा बनाई गई सबसे नई व्यवस्थाओं में से एक, यानी सीमा, से टकरा रही थी। मानव इतिहास के अधिकांश हिस्से में सीमा पार करने के लिए ऐसी कोई बाधा मौजूद ही नहीं थी। प्रथम विश्व युद्ध से पहले अनेक क्षेत्रों में सीमा पार करने के लिए पासपोर्ट अनिवार्य नहीं था। पासपोर्ट के आज पहचाने जाने वाले रूप का मानकीकरण भी 1920 में लीग ऑफ़ नेशंस के एक सम्मेलन में हुआ। पिरामिड बनाने वाले और एलिस द्वीप से होकर अमेरिका आने वाले लोग बिना पासपोर्ट के आए थे। आधुनिक सीमा-बाड़ मुश्किल से एक सदी पुरानी है, जबकि चलना मनुष्य जितना ही पुराना है।
इस लेख को पढ़ने वाला हर व्यक्ति भी किसी न किसी अर्थ में प्रवासी है। किसी भी समुदाय के इतिहास में पर्याप्त पीछे जाएँ, तो आपको यात्रियों और आगंतुकों की कहानी मिलेगी। संयुक्त राज्य अमेरिका लगभग पूरी तरह बाहर से आए लोगों से बना देश है। भारतीय उपमहाद्वीप को भी हज़ारों वर्षों तक चलने वाले आपसी मेल-जोल की लहरों ने उसका वर्तमान रूप दिया है।
आज पूरी पृथ्वी पर लगभग 30.4 करोड़ अंतरराष्ट्रीय प्रवासी हैं, यानी लगभग हर 27 मनुष्यों में से एक। यह संख्या 1990 के बाद से लगभग दोगुनी हो चुकी है। मनुष्य का गतिशील होना कोई असामान्यता नहीं है। प्रकृति चाहती है कि आप गतिशील रहें, लेकिन समाज आपसे अपनी जन्मभूमि के प्रति जीवनभर निष्ठावान रहने की अपेक्षा करता है। लेकिन ‘ प्रवासन ’ के इस एक शब्द के भीतर दो बहुत अलग-अलग चीज़ें छिपी हैं। पूरा भ्रम इसलिए पैदा होता है क्योंकि हम उन्हें अलग करने से इनकार करते हैं।
एक यात्रा किसी वास्तविक आवश्यकता से शुरू हो सकती है और दूसरी किसी भ्रम से। एक ही व्यक्ति में दोनों तरह की प्रेरणाएँ मौजूद हो सकती हैं। उस छात्र के बारे में सोचिए जो अमेरिका या किसी यूरोपीय देश में डॉक्टरेट करने जाता है, क्योंकि उसके अपने देश में वह शिक्षा अभी संतोषजनक ढंग से उपलब्ध नहीं है। उसका जाना उद्देश्यपूर्ण है। वह सीखना चाहता है और इसलिए जाता है क्योंकि आवश्यक ज्ञान वहाँ मौजूद है। पाँच वर्ष बाद उसकी डॉक्टरेट पूरी हो जाती है। उसके देश में एक ऐसा वास्तविक काम उसका इंतज़ार कर रहा है, जिसमें उसके अर्जित ज्ञान की सख़्त ज़रूरत है। लेकिन अब वह कहता है, “नहीं, यहाँ कारें सस्ती हैं, वेतन अधिक है। मेरी एक ही ज़िंदगी है और मुझे अपनी जीवनशैली का भी ध्यान रखना चाहिए।” लेकिन डॉक्टरेट पूरी होने के बाद भी उसका उसी देश में रुक जाना एक अलग बात है। अब उसे कोई गहरी प्रेरणा आगे नहीं बढ़ा रही; उसके निर्णय पर सुविधा और निजी लाभ हावी हैं। अहंकार ने कमान संभाल ली है और अपनी माँग को विवेक का नाम दे रहा है।
अहंकार दूसरी दिशा में भी उतनी ही आसानी से काम करता है। जाने से पहले ही उसके भीतर की एक दूसरी आवाज़ उससे कह सकती थी: “मुझे यूरोप बिल्कुल नहीं जाना चाहिए; वहाँ जाकर मैं बिगड़ जाऊँगा; शराब और लड़कियां मुझे बर्बाद कर देंगी। इसलिए मैं अपने गाँव के पास के कस्बे के किसी छोटे कॉलेज से एक घटिया डॉक्टरेट कर लूँगा।” यहाँ अहंकार उपभोग के पीछे नहीं भाग रहा; वह उस गति को रोक रहा है जो होनी चाहिए थी। यही बात याद रखने योग्य है: अहंकार सही गति को रोक सकता है और गलत गति को जन्म भी दे सकता है। समस्या जाना या रुकना नहीं है। समस्या यह है कि निर्णय कौन ले रहा है। इसलिए प्रवासन के मामले में असली सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कोई व्यक्ति कहाँ जा रहा है, बल्कि यह कि वह किसलिए जा रहा है। रोज़ी-रोटी की तलाश में जाना हो, तो जाइए; जीवनयापन का कोई साधन मिल सकता है। यदि आपकी मिट्टी बंजर हो गई है और बारिश लौटने वाली नहीं, यदि काम समाप्त हो गया है और आपके बच्चे कुपोषित हो रहे हैं, तो सीमा पार कीजिए, और बिना किसी अपराधबोध के कीजिए। यह कमजोरी नहीं, जीवन द्वारा अपनी रक्षा करना है।
लेकिन यदि आप पूर्णता की तलाश में जाते हैं, यह मानकर कि आपके भीतर जो कमी है वह सीमा के दूसरी ओर आपका इंतज़ार कर रही है, तो आप खाली हाथ लौटेंगे। अहंकार से जुड़ी कोई भी वस्तु आपको पूर्ण नहीं कर सकती। जो व्यक्ति मुंबई में भीतर से खाली महसूस करता था, वह बोस्टन पहुँचकर भी उस खालीपन से मुक्त नहीं होगा; उसने केवल अपनी पृष्ठभूमि बदली है।
भारत इन दोनों गतियों को अपने ही परिवारों में देखता है। यही देश दुनिया में प्रवासियों द्वारा भेजी गई सबसे अधिक रकम प्राप्त करता है। फिर भी इसी देश के युवा जंगलों और कंटेनरों के रास्ते उस मार्ग पर ले जाए जाते हैं जिसे वे स्वयं ‘डंकी रूट’ कहते हैं, उन सीमाओं की ओर, जिन्हें पार कर लेने पर पूर्ण जीवन मिलने का वादा उनसे किया गया है।
प्रवासन के ये भौतिक कारण वास्तविक हैं और बढ़ते जा रहे हैं। 2024 के अंत तक युद्ध और उत्पीड़न के कारण जबरन विस्थापित लोगों की संख्या 12.3 करोड़ से अधिक आँकी गई। उनमें से हर पाँच में से लगभग तीन ने कभी कोई अंतरराष्ट्रीय सीमा पार नहीं की। उन्हें अपने ही देश के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में धकेला गया। इस बीच भूमध्य सागर चुपचाप दुनिया की सबसे घातक सीमाओं में से एक बन गया है। केवल पिछले दशक में डूबने वालों और लापता होने वालों की संख्या दसियों हज़ार रही है। जलवायु परिवर्तन इस विस्थापन को और तेज़ करेगा। विश्व बैंक के अनुमान के अनुसार, 2050 तक 21.6 करोड़ लोग अपने ही देशों के भीतर स्थान बदलने के लिए मजबूर हो सकते हैं। इनमें से चार करोड़ लोग अकेले दक्षिण एशिया में होंगे, इसलिए नहीं कि उन्होंने बेहतर जीवनशैली का सपना देखा था, बल्कि इसलिए कि किसी जगह की बारिश लगातार कम होती गई थी। ऐसी स्थिति में केवल भावनात्मक लगाव के कारण एक मरती हुई भूमि पर टिके रहना जीवन की वास्तविकता से आँखें मूँदना होगा।
यहाँ एक असुविधाजनक दुश्चक्र पर सीधे बात करनी होगी, जिससे सब बचना चाहते हैं। एक ओर जिस जीवनशैली को अहंकार सफलता समझकर अपनाता है, वही दूसरी ओर की भूमि को सुखाने वाली ताक़त बन जाती है। मंज़िल की चमकती समृद्धि की कीमत अक्सर उस जन्मभूमि की सूखती हुई मिट्टी चुकाती है जहाँ से लोग निकलते हैं। अमीर दुनिया की जीवन-शैली उस बेबसी को जन्म देती है जो अंततः उसी के दरवाज़े तक आ पहुँचती है। जब वह बेबसी वहाँ पहुँचती है, तो उसे संकट कहा जाता है; लेकिन उसे जन्म देने वाली व्यवस्था को विकास।
आर्थिक आँकड़े भी इसी वास्तविकता की पुष्टि करते हैं। 2024 में प्रवासियों ने गरीब देशों में अपने परिवारों को लगभग 685 अरब डॉलर भेजे, यह रकम समस्त विदेशी निवेश और विदेशी सहायता को मिलाकर भी उससे अधिक थी। भारत 129 अरब डॉलर के साथ प्रवासियों द्वारा भेजी गई रकम पाने वाला दुनिया का सबसे बड़ा देश था। यह आक्रमणकारियों का जमावड़ा नहीं है। यह घर से दूर कमाई गई रोटी है, जिसे वापस घर भेजा जा रहा है।
तेज़ बारिश हो रही है। एक छोटा-सा पिल्ला, जिसकी माँ खो गई है, पानी से बचने के लिए आपके दरवाज़े पर पंजे मार रहा है और भीतर आने की गुहार लगा रहा है। यह एक प्रकार का आगमन है। लेकिन हर आगमन आश्रय की तलाश में नहीं होता। कोई चोर उसी बारिश में आपके दरवाज़े तक इस इरादे से भी आ सकता है कि घर में घुसकर आपकी चीज़ें चुरा ले। पहले मामले में संरक्षण और निष्पक्ष सुनवाई ज़रूरी है; दूसरे में सुरक्षा-जाँच और कानून के अनुसार कार्रवाई। इन दोनों स्थितियों को एक जैसा नहीं माना जा सकता।
फिर भी हर सीमा पर दो मुखर पक्ष बन जाते हैं और दोनों इस अंतर को स्वीकार करने से इनकार करते हैं। एक कहता है कि यदि पिल्ले को भीतर आने दिया जाए, तो चोर को भी आने देना होगा, सबके लिए दरवाज़े खोल दीजिए और इसे करुणा कहिए। दूसरा कहता है कि चूँकि चोर भी मौजूद है, इसलिए पिल्ले को भी रोकना होगा, सबके लिए दरवाज़े बंद कर दीजिए और इसे सुरक्षा कहिए।
दोनों पक्ष जटिल भेद के धैर्यपूर्ण काम की जगह एक सरल सार्वभौमिक नियम चुनना चाहते हैं। किसी देश को अपराधियों को बिना जाँच के प्रवेश देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। लेकिन जो लोग डूब रहे हों, उत्पीड़न से भाग रहे हों या वास्तविक खतरे में हों, उन्हें बिना सुनवाई वापस धकेलना भी स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। व्यवस्था को छानना और परखना होगा; उसे सामने खड़े व्यक्ति को ध्यान से देखना होगा। यह जाँच-प्रक्रिया हमेशा अपूर्ण रहेगी। ईमानदारी से की गई निष्पक्ष जाँच भी कुछ ऐसे लोगों को भीतर आने देगी जिन्हें रोका जाना चाहिए था और कुछ ऐसे लोगों को रोक देगी जिन्हें भीतर आने देना चाहिए था। फिर भी ऐसी अपूर्ण जाँच किसी सार्वभौमिक नियम से कहीं बेहतर है, क्योंकि सार्वभौमिक नियम अक्सर देखने से ही इनकार करने का दूसरा नाम होता है।
दोनों खेमों में एक और अंधापन समान है। दोनों दरवाज़े को देखते रहते हैं, लेकिन कोई यह नहीं पूछता कि भीड़ को वहाँ भेजा किसने। इस कहानी में एक तीसरी शख्सियत भी है: न पिल्ला, न चोर, बल्कि वह व्यक्ति या सत्ता जो लाभ या दबाव के लिए उस दरवाज़े को खोलती-बंद करती है। वह तस्कर हो सकता है जो अफ़वाह गढ़कर उसे हताश लोगों को बेचता है, जैसा सेउटा में हुआ था। वह राज्य भी हो सकता है जो पड़ोसी से कोई रियायत पाने के लिए अपनी ओर की सीमा पर पहरा ढीला कर देता है। 2021 में एक कूटनीतिक विवाद के दौरान, सीमा-पहरे में ढील दिए जाने के बाद केवल दो दिनों में आठ हज़ार से अधिक लोग इसी एन्क्लेव में प्रवेश कर गए; स्पेन ने इसे ब्लैकमेल कहा था। पिल्ले और चोर, दोनों को कभी-कभी ऐसे हाथ दरवाज़े तक पहुँचाते हैं जो स्वयं न बारिश में खड़े होते हैं, न जोखिम उठाते हैं। कभी-कभी चोर दरवाज़े पर होता ही नहीं। चोर वह भी हो सकता है जिसने इस कतार को दरवाज़े तक भेजा है।
इस सबके नीचे एक और कठिन प्रश्न छिपा है। यह कौन तय करता है कि आने वाला पिल्ला है या चोर? और यह तय करना इतना कठिन क्यों है? कठिनाई सीमा के बाहर नहीं, आपके भीतर है। आप दुनिया में पिल्ले और चोर के बीच अंतर नहीं कर पाते क्योंकि आपने अपने भीतर ऐसा करना कभी सीखा ही नहीं। आपके आंतरिक जीवन में चोर लगातार पिल्ले का वेश धारण करता है, लालच ज़रूरत का चोगा पहन लेता है और उपभोग की इच्छा जीने की इच्छा का मुखौटा लगा लेती है। दूसरी ओर, आपके भीतर का वास्तविक पिल्ला, कोई सरल और निर्मल आकांक्षा, अक्सर चोर समझकर ठुकरा दिया जाता है।
जो व्यक्ति अपने भीतर यह भेद नहीं कर सकता, वह बाहर भी इस भेद को ठीक से लागू नहीं कर पाएगा और निराश होकर किसी सार्वभौमिक नियम का सहारा लेगा। इसलिए आप्रवासन नीति कभी केवल नीति नहीं होती; वह उसे बनाने वाले व्यक्ति के आंतरिक स्वरूप की स्वीकारोक्ति भी होती है। लेकिन अंतर को देख पाना केवल आधा काम है। आप उसे स्पष्ट रूप से देख सकते हैं और फिर भी गलत ढंग से चुनाव कर सकते हैं, क्योंकि जाँच-प्रक्रिया उतनी ही ईमानदार होगी जितना उसे लागू करने वाला व्यक्ति। स्पष्ट दृष्टि को सही कर्म में बदलने वाली चीज़ नीयत है। जहाँ नीयत ईमानदार होगी, वहाँ जाँच-प्रक्रिया भी ईमानदार होगी और जो कुछ उस प्रक्रिया से होकर आएगा, वह किसी देश का भविष्य वास्तव में बदल सकता है।
जब जर्मन यहूदी नाज़ी उत्पीड़न से भागकर दूसरे देशों में पहुँचे, तो वे आक्रमणकारी नहीं, उत्पीड़न से बचकर सुरक्षा की तलाश में आए शरणार्थी थे। 1944 तक 1.33 लाख से अधिक जर्मन यहूदी प्रवासी अमेरिका पहुँच चुके थे। जिन वैज्ञानिक क्षेत्रों में उन्होंने काम किया, वहाँ 1933 के बाद पेटेंट कराने की दर लगभग एक-तिहाई बढ़ गई। उनमें से स्ज़िलार्ड, विग्नर, बेथे और वॉन न्यूमैन उस प्रयास के केंद्र में शामिल थे जिसने युद्ध को समाप्त करने में भूमिका निभाई; और वह आइंस्टीन का पत्र ही था जिसने उस प्रयास को गति दी। जिन देशों ने अपने दरवाज़े खोले, उन्होंने केवल दान-पुण्य नहीं किया। उन्हें ऐसा योगदान मिला जिसका लाभ वे आज भी उठा रहे हैं। सच तो यह है कि अनेक देश उन्हीं प्रवासियों की प्रतिभा और श्रम से समृद्ध हुए हैं जिन्हें उन्होंने आश्रय दिया था। यह पैटर्न आज भी जारी है। अमेरिका की अरबों डॉलर की कंपनियों में से लगभग पाँच में तीन की स्थापना प्रवासियों ने की है या उनमें प्रवासी सह-संस्थापक रहे हैं। इन संस्थापकों में भारत से आने वालों की संख्या सबसे अधिक है।
इसका उलटा भी उतना ही सच है। 1972 में ईदी अमीन ने युगांडा के एशियाई लोगों को देश छोड़ने के लिए 90 दिन का समय दिया और उनके द्वारा बनाई गई संपत्ति ज़ब्त कर ली। दुकानें और मिलें उन लोगों के पास चली गईं जो उन्हें चलाना नहीं जानते थे। एक ऐसी अर्थव्यवस्था, जो एक छोटे-से अल्पसंख्यक समुदाय पर निर्भर थी, धीरे-धीरे बर्बाद हो गई।
निकाले गए लोगों में से लगभग 27 हज़ार लोग एक-एक सूटकेस लेकर ब्रिटेन पहुँचे। लीसेस्टर ने कभी अख़बारों में विज्ञापन देकर उनसे न आने की अपील की थी; आज वही शहर उन्हें अपने निर्माताओं में शामिल करता है। कोई देश अपनी ही अच्छी किस्मत गँवा सकता है और इस कृत्य को देशभक्ति कह सकता है। हर मेज़बान समाज एक सूची रखता है कि दरवाज़े पर किससे डरना चाहिए। और वह सूची बार-बार गलत साबित होती है। खतरे का हमेशा एक चेहरा होता है, और वह चेहरा हमेशा बदलता रहता है: कभी वह आयरिश व्यक्ति होता है जिसके बारे में कहा जाता है कि वह अमेरिका पर हावी हो जाएगा; फिर वह चीनी मज़दूर होता है जिसे 1882 के एक पूरे संघीय कानून के ज़रिए बाहर कर दिया गया।
ब्रिटेन ने इसका उलटा रूप दिखाया। उसने युद्ध के बाद देश के पुनर्निर्माण के लिए कैरेबियाई मज़दूरों को आमंत्रित किया, लेकिन उन्हीं नर्सों और ड्राइवरों के लिए आवास के दरवाज़े बंद कर दिए जिन्होंने उसके अस्पतालों और बसों को चलाया। ऐसे साइनबोर्ड लगाए गए जिन्हें पूरी एक पीढ़ी आज भी याद करती है: “अश्वेत नहीं, आयरिश नहीं, कुत्ते नहीं।” जिन लोगों के आगमन का कभी डर और विरोध के साथ सामना किया गया, वे अक्सर एक पीढ़ी बाद उसी समाज के नागरिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गए। और यदि ईमानदारी से देखें, तो इस डर के पीछे है क्या? जो मेज़बान इस बात से काँपता है कि उसकी संस्कृति घुल जाएगी, वह संस्कृति को उसी तरह पकड़े हुए है जैसे अहंकार हर चीज़ को पकड़ता है: एक संपत्ति के रूप में, ‘मेरी’ के तहत दर्ज एक और वस्तु के रूप में। लेकिन संस्कृति कोई संपत्ति नहीं है। वह एक जीवित चीज़ है। जीवित चीज़ें दूसरे जीवन से मिलकर कमज़ोर नहीं होतीं; वे उससे पोषित भी हो सकती हैं। एक जीवंत संस्कृति अतिथि से नहीं डरती। अतिथि से वही जड़ मानसिकता डरती है जो अपनी रक्षा को संस्कृति का नाम देती है।
भारतीय उपमहाद्वीप इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। यहाँ सदियों से लोगों, भाषाओं, धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक प्रभावों की अनेक लहरें आती रही हैं और स्थानीय जीवन में समाहित होती रही हैं। फिर भी इस सभ्यता ने अपनी विशिष्टता बनाए रखी है। दरवाज़े पर बैठा डर संस्कृति की रक्षा नहीं कर रहा। वह उस अहंकार की रक्षा कर रहा है जिसने संस्कृति को अपना झंडा बना लिया है। जिस पिल्ले को आप बारिश से बचाने के लिए भीतर आने देते हैं, वह बड़ा होकर उस ग्रेहाउंड में बदल सकता है जो किसी दिन आपकी जान बचाए। चोर को रोकिए, निश्चित रूप से। लेकिन पिल्ले को चोर कहने में जल्दबाज़ी मत कीजिए। जिस दिन आप वह दरवाज़ा बंद कर देते हैं, उस दिन आप उन संभावनाओं को भी बाहर कर देते हैं जो वह अपने साथ ला सकता था।
मान लीजिए कि दरवाज़ा सही ढंग से खोल दिया गया और पिल्ले को भीतर ले लिया गया। इसके बाद बहस अब केवल संख्या या अपराध के बारे में नहीं होती; वह संस्कृति के बारे में होने लगती है। तर्क यह दिया जाता है कि नए आने वालों को उस समाज में घुलना-मिलना चाहिए; उन्हें वहाँ की भाषा और तौर-तरीके सीखने चाहिए, या फिर उन्हें भीतर आने ही नहीं देना चाहिए। यहाँ एक वास्तविक बात भी है और एक वास्तविक ख़तरा भी। एक बार फिर, दोनों को अलग करना होगा। व्यावहारिक बात स्पष्ट है। यदि कोई व्यक्ति किसी देश में स्थायी रूप से बसता है, एक महीने के लिए नहीं, बल्कि जीवन भर के लिए, तो वहाँ की भाषा सीखना उसके सामाजिक जुड़ाव और स्वतंत्र जीवन के लिए महत्वपूर्ण है। इसमें आपत्ति की क्या बात है? नई भाषा सीखने से आपका क्या नुकसान होगा? भाषा सीखने से इनकार करना अपने लिए और अपने आसपास के लोगों के लिए कठिनाई पैदा करना है।
किसी भी ऐसी संस्था के बारे में सोचिए जिसका अपना अनुशासन हो। कोई व्यक्ति उसमें शामिल होकर यह घोषणा नहीं कर सकता कि वह बैठकों में भाग नहीं लेगा, सामूहिक काम नहीं करेगा, फिर भी सदस्य के रूप में स्वीकार किए जाने की अपेक्षा रखे। यह उस पर थोपा गया आधिपत्य नहीं, बल्कि उस संस्था का हिस्सा बनने की एक सामान्य शर्त है। यदि कोई कार्यालय अपनी कामकाज की भाषा या कुछ बुनियादी नियम तय करता है, तो उनका पालन करना आपकी हस्ती पर हमला नहीं है। उसी तरह, स्थायी रूप से किसी देश में बसने वाले व्यक्ति से वहाँ की भाषा सीखने और कानूनों का पालन करने की अपेक्षा स्वाभाविक है। लेकिन यह अपेक्षा उसकी पहचान मिटाने का अधिकार नहीं देती। यदि मेज़बान कहता है कि आयोजन की थीम ‘जंगल’ है, तो आप उसके अनुरूप कपड़े पहन सकते हैं या निमंत्रण ठुकरा सकते हैं। लेकिन वहाँ थ्री पीस सूट पहनकर आयोजन के हर नियम को नकारना उचित नहीं होगा। आप निमंत्रण स्वीकार करके पूरे आयोजन को बिगाड़ नहीं सकते।
मेज़बान की भी अतिथि के प्रति एक समान जिम्मेदारी होती है। किसी व्यक्ति का कम साधनों के साथ आना या कमज़ोर स्थिति में होना उसे आपकी संपत्ति नहीं बना देता। यदि आप मुझसे अपने देश में प्रवेश करते समय कहते हैं कि कृपया भाषा सीखिए, तो यह उचित है और मुझे सीखनी चाहिए। लेकिन यदि आप मुझसे अपना नाम या धर्म बदलने को कहते हैं, या अपनी पसंद के अनुसार सिर ढकने के लिए मजबूर करते हैं, तो आप व्यावहारिकता की सीमा पार कर दबंगई के क्षेत्र में प्रवेश कर चुके हैं। भाषा सीखना उचित अपेक्षा है; दबाव में अपना नाम और विश्वास छोड़ देना नहीं। प्रवासी की ओर से भी अतिक्रमण का एक रूप संभव है, जब वह अपनी छोड़ी हुई जगह की हर सांस्कृतिक पहचान को ज़ोर-शोर से और स्थायी रूप से प्रदर्शित करने पर अड़ जाए, मानो वह पहचान उस देश में गाड़ा गया झंडा हो जो अब उसका घर है। लेकिन अपनी भाषा, धर्म या सांस्कृतिक प्रतीकों को बनाए रखना अपने-आप में आक्रमण नहीं है। असली अपेक्षा दोनों तरफ़ से संवेदनशीलता की है।
अतिथि संवेदनशीलता दिखाए और मेज़बान धौंस जमाने से इनकार करे, तभी वास्तविक संबंध संभव हो सकता है। मुझे ‘एकीकरण’ और ‘आत्मसातीकरण’ शब्द कभी पसंद नहीं आए। दोनों में धर्मांतरण की-सी हल्की गंध है, मानो एक पक्ष से अपनी अलग पहचान छोड़कर दूसरे में विलीन हो जाने की अपेक्षा की जा रही हो। वास्तव में ज़रूरत किसी आदर्श या विचारधारा की नहीं, बल्कि ऐसे शांत विवेक की है जो दरवाज़े के दोनों ओर व्यावहारिकता और दबंगई के बीच अंतर कर सके। इस पूरी बहस के नीचे एक ऐसा दावा छिपा है जिसे लोग बिना जाँचे स्वीकार कर लेते हैं, कि हर मनुष्य को अपनी पसंद के किसी भी देश में जाने का अधिकार है; कि दूसरों ने बस अधिक समृद्ध भू-भाग पर कब्ज़ा कर लिया है और बाकी लोगों को उससे बाहर रखा जा रहा है। इसे स्पष्ट रूप से कहना चाहिए: ऐसा कोई सामान्य अधिकार नहीं है।
राष्ट्रों की व्यवस्था सताए हुए और डूबते हुए लोगों के लिए आश्रय का एक सीमित रास्ता खुला रखती है, और वह रास्ता कायम रहना चाहिए। पिल्ले का दावा वास्तविक है; कोई सभ्य व्यवस्था उसे ईंटों से चुनवाकर बंद नहीं कर सकती। लेकिन जीवित रहने का दावा, पसंद का लाइसेंस नहीं है। उस आश्रय से आगे, राष्ट्रों की दुनिया जिस तरह व्यवस्थित है उसमें अवसर का रास्ता आवेदन, योग्यता और कानून के माध्यम से जाता है। वीज़ा से निवास और फिर नागरिकता तक का रास्ता लंबा हो सकता है, लेकिन वही वैध रास्ता है। किसी दूसरे देश में बिना बुलाए चले जाने का कोई अधिकार नहीं है, ठीक वैसे ही जैसे किसी अजनबी की शादी में बिना बुलाए पहुँचकर दावत में बैठ जाने का कोई अधिकार नहीं है। आपको वहाँ से बाहर कर दिया जाएगा।
यदि आप सचमुच चाहते हैं कि प्रवासन एक अधिकार हो, तो उसकी कीमत बिल्कुल स्पष्ट है: आपको राष्ट्रों की व्यवस्था को ही समाप्त करना होगा, मानचित्र से हर सीमा मिटानी होगी और हर व्यक्ति को जहाँ हवा ले जाए वहाँ रहने और जाने देना होगा। यदि आपका आशय सचमुच यही है, तो मैं आपके साथ हूँ। लेकिन तब न राष्ट्रवाद रह सकता है, न देशभक्ति; कहीं कोई ऐसी रेखा नहीं हो सकती जिसकी रक्षा करना आपका दायित्व हो। और यहीं प्रश्न वापस भीतर की ओर मुड़ता है, जहाँ उसे अंततः पहुँचना ही था। मानचित्र से सीमाएँ मिटाने से पहले, क्या आपने उन्हें अपने हृदय से मिटा दिया है? अहंकार सीमाओं में ही रहता और पनपता है। आप अपने भीतर एक बंद दुनिया बनाए रखते हुए बाहर एक खुली दुनिया की माँग नहीं कर सकते। जिस क्षण आप कहते हैं, यह मेरा परिवार है, ये कुछ लोग मेरे हैं और बाकी नहीं, उसी क्षण आपने एक सीमा खींच दी और उस पर एक पहरेदार बैठा दिया।
जो व्यक्ति भीतर से विभाजित है और लगातार दुनिया को ‘मेरा’ और ‘मेरा नहीं’ में बाँटता रहता है, वह मानचित्र से सभी विभाजन मिटा देने की उचित माँग नहीं कर सकता। सेउटा की बाड़ें मानव हृदय की ही बाड़ें हैं, बस उन्हें बड़ा करके और रोशन करके सबके सामने रख दिया गया है। भारतीय उपमहाद्वीप अपनी ही ज़मीन पर इसका प्रमाण लिए हुए है। 1947 में सिरिल रैडक्लिफ़, एक ऐसा बैरिस्टर जिसने पहले कभी भारत में कदम नहीं रखा था, उसे देश की सीमाएँ तय करने वाली रेखा खींचने के लिए पाँच सप्ताह दिए गए। लगभग 1.2 करोड़ से 2 करोड़ लोग उन घरों से उखाड़ दिए गए जिन्हें वे अपना एकमात्र घर जानते थे। यह आधुनिक इतिहास का सबसे बड़ा सामूहिक पलायन था।
मानचित्र पर खींची गई उस रेखा ने केवल वही रेखा स्पष्ट की जो हृदय में पहले से खिंच चुकी थी। कागज़ पर स्याही पड़ने से बहुत पहले लोगों के भीतर ‘मेरा’ और ‘मेरा नहीं’ का भाव कठोर हो चुका था। जब तक भीतर का विभाजन बना रहेगा, बाहर की दुनिया भी उसी के अनुरूप बाड़-दर-बाड़ विभाजित होती रहेगी। जिस निर्णय की मैं बात कर रहा हूँ, उसका इस भूमि पर एक पुराना नाम है: विवेक, असली और नकली, स्थायी और क्षणभंगुर के बीच अंतर करने की क्षमता। जो वृत्ति अपने भीतर सच्ची और चापलूसी करने वाली आवाज़ों के बीच भेद करना सीखती है, वही बाहर पिल्ले और चोर के बीच अंतर कर सकती है। इसलिए दुनिया की सीमाओं पर होने वाली जाँच लगातार विफल होती रहती है, क्योंकि जिस भीतरी विवेक से उसकी शुरुआत होनी चाहिए थी, उसका अभ्यास ही कभी नहीं हुआ। इसलिए कानूनी रास्ते पर चलिए, सिर्फ़ इसलिए नहीं कि वह कानून है, बल्कि इसलिए भी कि जिस सीमा पर आप खड़े हैं, वह आपको उस सीमा की ओर लौटा रही है जिसे आपने कभी पार नहीं किया।
यहाँ किसी व्यवस्थित दुनिया या हल हो चुके संकट का वादा नहीं है। जांच अपूर्ण रहेगी और उसे हर दिन नए सिरे से करना होगा। विवेक कोई ऐसी मंज़िल नहीं है जहाँ पहुँचकर उसे भुला दिया जाए; वह एक दिशा है जिसमें लगातार आगे बढ़ना होता है। सब कुछ हट जाने के बाद, जिस अजनबी से बचने के लिए आप दरवाज़े की रखवाली करते रहते हैं, वह दरवाज़ा आपका अपना ही है। अंततः वह खुलेगा या नहीं, यह केवल नीति का प्रश्न नहीं है। यह इस बात का प्रश्न है कि आप स्वयं को क्या मानते हैं।
Originally published in Navbharat Times on 9 August '26