आचार्य प्रशांत आपके बेहतर भविष्य की लड़ाई लड़ रहे हैं
लेख
पैसे को लेकर मन परेशान

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम! आपके सानिध्य में मन की ताकत तो बढ़ी है लेकिन पिछले एक सप्ताह में पैसे का काफ़ी नुक़सान हो जाने के कारण थोड़ा विचलित हूँ।

आचार्य प्रशांत: विचलित तो हम सब पैदा ही होते हैं। वो जो छोटा बच्चा पैदा होता है वो क्या आपको शांत, अचल, स्थिर, केंद्रित दिखाई देता है? नहीं न। तो विचलित तो हम रहे ही हैं सदा से। देह पकड़ी नहीं कि विचलन पकड़ लिया। तो पहली बात तो ये समझिए कि किसी घटना ने आपको विचलित नहीं कर दिया। विचलित तो आप और सब लोग जन्म से ही हैं।

अब आपने प्रश्न में कहा है कि विचलित हूँ, विचलन का समाधान माँगा है। इसी बात से समझ में आता है कि विचलन आपको अच्छा नहीं लग रहा, है न? विचलित होना किसी को भी अच्छा नहीं लगता। अब इस बात को जोड़िए मेरी पिछली बात से। हम जन्म से विचलित पैदा होते हैं और विचलित रहना— विचलित रहना माने परेशान रहना—और विचलित रहना किसी को भी भाता नहीं, सुहाता नहीं।

तो जन्म के बाद वो जिसे हम जीवन कहते हैं वो कैसे जिया जाना चाहिए? वो ऐसे जिया जाना चाहिए न कि जो विचलन हम लेकर के ही आए हैं दुनिया में उसको कम करें क्योंकि वो हमें अच्छा नहीं लग रहा। यही जीवन का उद्देश्य है फिर, कि वो जो जन्मजात बेचैनी पैदा होती है—उसको मैं ऐसे भी कह सकता था कि वो जो जन्मजात बेचैनी लेकर हम पैदा होते हैं। लेकिन उसको मैं कह रहा हूँ वो जो जन्मजात बेचैनी पैदा होती है उसको शांत करना है। यही जीवन का उद्देश्य है। तो हम जीवन में जो कुछ भी करेंगे इसीलिए करेंगे न, कि हम शांत हो सके, हमें चैन मिल सके।

तो अब आते हैं पैसे पर। पैसे का संबंध कर्म से है। धन को अगर आप समझे सीधे-सीधे तो वो एक तरह का संचित कर्म है। आपने जो काम करे उन सब कामों का अनुवाद कर दिया गया है मुद्रा की भाषा में, करेंसी की भाषा में। भाई आपने कुछ करा, कुछ कर्म करा उसका जो आपको फल मिलना था उसी फल को ट्रांसलेट कर दिया गया। उसका अनुवाद कर दिया गया एक मुद्रा की भाषा में। कि आपने इतना काम करा, उसका मूल्य लगा दिया गया कि इतने रुपए उस काम का मूल्य है।

तो धन क्या है? धन है जमा हुआ कर्म, इकट्ठा किया गया कर्म। इसमें आप और इधर-उधर की बात कर सकते है: भई किसी को विरासत में भी मिल जाता है पैसा, किसी को धोखे से भी मिल जाता है पैसा, किसी को बिना कोई कर्म या श्रम किये भी मिल जाता है पैसा। वो सब इधर-उधर की बातें है। जो मूल बात है वो यह है कि कुछ-न-कुछ तो कर ही रहे हो। अगर आप विरासत में भी पैसा स्वीकार कर रहे हो, तो उसको स्वीकार करना एक तरह का कर्म हो गया। तो धन ले-देकर के कर्म तो है ही।

अब जीवन भर हमें जो कर्म करने हैं हमने कहा इसलिए करने हैं ताकि बेचैनी मिट सके। तो फ़िर धन भी हमें क्यों कमाना है? धन कमाने का भी फिर एक ही उद्देश्य होना चाहिए न, कि बेचैनी उससे मिटती हो।

आपके पास जो धन है आप उसका क्या उपयोग कर रहे हो, या उसको इकट्ठा करने के पीछे इरादा ही क्या है आपका? अगर इरादा यह है कि उस धन से आपकी बेचैनी कम होगी, तब तो उस धन के नुकसान पर आपको अवश्य ही चिंतित हो जाना चाहिए। थोड़ी चिंता है तो और ज़्यादा चिंता कर लीजिए। क्योंकि वो जो धन था उसी के माध्यम से तो आपको चिंता से मुक्ति मिलनी थी।

पर ज़रा साफ-साफ अपने-आपसे पूछिएगा कि क्या आपने धन इसलिए इकट्ठा करा था कि वो अंततः आपकी सारी चिंताओं का शमन कर देगा? क्या आपने पैसा इसलिए जोड़ा था मेहनत करके कि आप उस पैसे के माध्यम से एक दिन वो जो भीतरी वृत्ति बैठी है चिंता की, उससे आज़ाद हो जाएँगे? नहीं, उस लिए तो नहीं था पैसा। पैसा तो इधर-उधर के तमाम और अन्य काम करने के लिए था। तो ऐसे पैसे के जाने पर कितनी चिंता सम्यक है इसका फैसला फिर आप स्वयं ही कर लें।

कोई चीज़ जो वाकई आपके काम की हो वो चीज़ आपसे छूट जाए या छिन जाए तो आप चिंता करें और दुःख मनाएँ, इतना तो समझ में आता है। पर आपने कोई ऐसी चीज़ इकट्ठा कर रखी हो, जो आपके अंततः काम ही नहीं आने वाली। और उस चीज़ के जाने पर आप अफसोस करें तो ये तो दोगुनी व्यर्थ बात हो गई न।

पहली व्यर्थता तो यही थी कि ऐसी चीज़ इतनी जमा ही क्यों करी, जो आपकी मुक्ति में सहायक नहीं हो सकती। जो अंततोगत्वा आपके काम नहीं आ सकती। ऐसी चीज़ इकट्ठा ही क्यों करी बताओ? यूँ ही बस रस्में निभाने के लिए? दुनियादारी चलाने के लिए? दुनियादारी क्या चला रहे हो। मृत्यु नहीं देखी क्या? बहुत दूर की चीज़ लगती है क्या मृत्यु? बरस तो रही है मौत चारों ओर।

ये दुनिया है जो छूट ही जानी है देर-सबेर, इस दुनिया के लिए पैसा जोड़ रहे हो? और फ़िर उस पैसे में ज़रा नुक़सान होने पर इतना अफ़सोस भी कर रहे हो। हाँ, दुनिया की चिंताओं से रिहाई के लिए अगर पैसा जोड़ा होता और उस पैसे का नुक़सान हो गया होता तो मैं बात समझता भी।

दुनिया में जो भी कुछ करिए यही ध्यान में रखकर करिए कि मैं यह कर क्यों रहा हूँ; क्या इससे मुझे वो मिलेगा जो मैं वाकई चाहता हूँ? पैसे से वो मिलता हो जो आप वास्तव में चाहते हैं, जन्म के पहले क्षण से ही चाहते हैं तो आप अनंत पैसा जोड़िए, अरबों-खरबों जोड़िए। अगर अरबों-खरबों जोड़ करके आपकी वो मूल इच्छा पूरी हो जाती हो तो।

और अगर वो मूल इच्छा पूरी नहीं हो रही है तो बहुत पैसा क्या करेंगे? फ़िर उतना ही रखिए जितना कि साधारण गुजारे के लिए चाहिए। और कुछ भी अगर करके आपकी मूल इच्छा पूरी होती हो तो वो सब आप कर लीजिए: पैसा, नहीं तो मान लीजिए ताकत, या पदवी या कुछ और सम्मान दुनिया से या परिवार की वृद्धि और जो भी तमाम तरह की इच्छाएँ हो सकती हैं, उनमें से किसी की पूर्ति से भी आपकी जो मौलिक चिंता है, आपकी जो मौलिक बीमारी है वो ठीक होती हो, तो आपकी जो भी इच्छाएँ हों उन पर आगे बढ़ें। धन का संचय करें, रिश्ते-नाते बढ़ाएँ। और इधर-उधर जितने दुनिया में काम पसारने हों सब बढ़ाएँ।

हम करे तो खूब जाते हैं पर हम ये अपने-आपसे पूछते ही नहीं है कि जो कर रहा है उसको कर-कर के चाहिए क्या। ये बड़ी गड़बड़ हो गई न? जो करने वाला है वो करने में इतना लिप्त हो गया, इतना खो गया कि वो ये पूछना ही भूल गया कि वो रोज़ इतना कुछ करता क्यों है। ये बात कितनी बेहुदी है, साहब खौफनाक है। और ये सब के साथ होता है। क्योंकि आप जो कुछ कर रहे होते हो न, उसका अपना एक गति-वेग होता है, उसका अपना एक नशा होता है। कर्ता एक नशे का ही नाम है। और उस कर्ता के सब कर्म उस नशे की अभिव्यक्ति मात्र हैं।

तो सब कर्म जैसे नशे में है। और आप वो करे जा रहे हैं, करे जा रहे हैं। दौड़े जा रहे हैं। समय का खेल है, चकरी घूम रही है। आप उस चकरी के साथ-साथ दौड़ रहे हैं, दौड़ रहे हैं। उस दौड़ में आपको ये ठहर करके सोचने का वक्त ही नहीं कि मैं दौड़ रहा क्यों हूँ। हाँ, इतना पक्का है कि आप के चक्कर गिने हुए हैं। अनन्त चक्कर आप नहीं लगा सकते। ये पक्का है कि कोई-न-कोई चक्कर आपका आख़री होगा। गिर जाना है, समय सीमित है।

जब तक थमेंगें नहीं तब तक विचार किया नहीं जा सकता कि यह दौड़ क्यों, इतना संचय क्यों। थमोगे नहीं तो विचार नहीं कर सकते। और जब विचार ही नहीं कर रहे तो थमोगे क्यों, फँस गए न?

दौड़ना शायद व्यर्थ जा रहा है, ये बात थम करके देखने पर ही समझ में आनी है। पर जब तक दौड़ रहे हो तब थमें नहीं, तो ये बात समझ नहीं आनी है। तो तुम दौड़ते रह जाओगे जीवन भर, जैसे सब लोग दौड़ते रह जाते है। दौड़ते भी रह जाओगे और उस दौड़ में थोड़ा पिछड़ गए तो अफ़सोस भी होगा जैसे अभी आपको हो रहा है कि पिछले एक हफ्ते में धन का नुकसान हो गया है।

हाँ, धन का तो नुक़सान हो गया है पर उस धन के नुक़सान से आपका क्या नुक़सान हुआ? ये दो अलग-अलग बाते हैं। पूछिए अपने-आपसे: उस धन की आपके लिए वास्तविक उपयोगिता कितनी थी? उस धन से आपको क्या मिल जाता, मान लीजिए वो धन नहीं जाता तो—जो भी हुआ है, चोरी हुआ है, जो भी हुआ है। मान लीजिए वो धन आपसे नहीं जाता या जितना गया है उससे दोगुना वापस आ जाए अभी, आप कर क्या लोगे? जब तक वो धन आपके पास था भी तो आपने क्या कर लिया? आप बहुत बेहतर हालत में थे? और जब आप ये विचार नहीं कर रहे होते हैं कि आपकी आर्थिक हानि हो गई है तो क्या उस वक्त भी आपको कोई तकलीफ़ होती है? तो हानि वास्तव में धन के छिनने में है या आपके विचार में और आपकी धारणा में है?

जब आप सो रहे होते हैं तो आपको रुपए-पैसे को लेकर के ना तो कोई गौरव होता है और ना ही कोई आशंका होती है। जब आप जगे हुए भी होते हैं उस वक्त भी आपको खोए हुए पैसे को, गँवाए हुए पैसे को लेकर के तकलीफ़ सिर्फ़ तब होती है जब आप उसका विचार करते है। जब आप दूसरी चीज़ों में लगे हुए हैं तो पैसा है या नहीं है ये मुद्दा ही आपसे दूर का हो जाता है। आपको तब तो नहीं बुरा लगता न?

तो धन नहीं आपको कष्ट दे रहा है। आपको कष्ट दे रहे हैं आपके झूठे सिद्धांत। कहीं-न-कहीं आपने ये धारणा बना रखी है कि इस पैसे के माध्यम से आपको कोई बहुत ऊँची चीज़ मिल जानी है।

मेरी सलाह होगी कि आप बहुत शांतिपूर्वक और बहुत सत्यता के साथ अपने-आपसे यह पूछें कि इससे आपको मिलना कितना था? और आप अपने-आपको कोई बहुत ऊँचा, बड़ा काल्पनिक उत्तर दे लें, तो ये भी याद रखिएगा कि आज तक आपको पैसे से कितना मिल गया है। मैं ये नहीं कह रहा कि पैसा किसी काम का नहीं है। पर पैसा जितने काम का है उसको उतना ही महत्व दो न। पैसा इसलिए है कि आपकी चिन्ताएँ मिटें या आप इसलिए हैं कि पैसे की चिंता करें? इन दोनों बातों में बहुत अंतर होता है न? आप पैसे के लिए हैं या पैसा आपके लिए है? पैसा एक संसाधन है जो आपकी सेवा में प्रयुक्त होना चाहिए न? पैसा आपका ग़ुलाम होना चाहिए। आपकी चाकरी करें।

आपका लक्ष्य है मुक्ति। पैसा उस मुक्ति में काम आना चाहिए। ये है पैसे का जीवन में सार्थक स्थान। हो उल्टा जाता है। पैसा ग़ुलाम होने की जगह मालिक हो जाता है। हम पैसे की सेवा करना शुरू कर देते हैं। पैसा हमें मुक्ति तो नहीं ही दे पाता, हम पैसे के द्वार पर बंधक बन जाते हैं। ये तो अनर्थ हुआ न? इससे बचिएगा।

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