पढ़ाई में मज़े कैसे आए?

Acharya Prashant

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पढ़ाई में मज़े कैसे आए?
सही काम आनंद पाने के लिए नहीं, बल्कि इसलिए किया जाता है क्योंकि वही सही है। सही काम करते समय सुख मिले या बोरियत, दोनों को समान रूप से स्वीकार करना ही आनंद है। पढ़ाई, विशेषकर गणित, केवल परीक्षा का विषय नहीं बल्कि प्रकृति और जीवन की भाषा है, जो दुनिया को समझने की क्षमता देती है. गलतियाँ स्वाभाविक हैं और उनसे सीखना चाहिए, लेकिन बेईमानी कभी स्वीकार्य नहीं हो सकती। सच्ची सफलता पूर्णता में नहीं, बल्कि ईमानदारी में है। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: मेरा प्रश्न ये था कि सही काम को, वो करना तो अच्छा, उसको फॉलो करना नहीं पड़ता है। तो हम उसको आनंद से कैसे करें? और आनंद से करना माने क्या?

आचार्य प्रशांत: आनंद मत माँगो। सही काम करो। सही काम में जो हो रहा है, वही आनंद है। सुख आ रहा है, तो सुख आनंद है। दुख आ रहा है, तो दुख आनंद है।

प्रश्नकर्ता: सर पढ़ाई?

आचार्य प्रशांत: पढ़ाई में? हाँ, तो बस पढ़ो। पढ़ना अच्छा लग रहा है, तो उस अच्छाई को बोल दो, "ये आनंद है।" और पढ़ने में बोर हो रहे हो, तो बोल दो, "ये बोरियत ही आनंद है।"

प्रश्नकर्ता: मुझे सिर्फ़ मैथ्स में लगता है।

आचार्य प्रशांत: तो बेटा, आपको जो मैथ्स पढ़ा रहे हैं, वो फिर बता नहीं पा रहे, ना, आपको कि मैथ्स माने क्या होता है। मैथ्स माने ज़िंदगी होता है। मैथ्स ऐसी चीज़ होती है, समझ लो कि प्रकृति भी उस पर चलती है। अभी तुमने माइक पकड़ रखा है, न? प्रकृति को बहुत अच्छे से पता था कि चार ये देने के बाद... अब ये अरिथमैटिक हो गई, न? काउंटिंग, नंबर सिस्टम हो गया न? चार ये (हाथ की उँगलियों को इंगित करते हुए)* देने के बाद अगर एक ये नहीं दिया,

तो क्या नाम है तुम्हारा?

प्रश्नकर्ता: नवांश।

आचार्य प्रशांत: नवांश। तो नवांश माइक नहीं पकड़ पाएगा। अब देखो, अंगूठे को भी इधर कर लो, माइक पकड़ना मुश्किल हो जाएगा। करो ऐसे, अंगूठे को भी उंगली बना लो। ग्रिप गड़बड़ हो गई न?

प्रश्नकर्ता: यस, सर।

आचार्य प्रशांत: मैथ्स माने प्रकृति की भाषा। प्रकृति में जो कुछ भी है, वो हमें एक इंडिविजुअल यूनिट के रूप में दिखाई देता है न? सब कुछ अलग-अलग है, ना?

प्रश्नकर्ता: हाँ, सर।

आचार्य प्रशांत: तो अभी मैं मैथ्स के बाक़ी हिस्सों पर नहीं जा रहा। बस अरिथमैटिक की बात कर रहा हूँ। तो देखो, प्रकृति ने ही ऐसा करा है कि 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8 बना दिया है।

प्रश्नकर्ता: हाँ।

आचार्य प्रशांत: है न? तो जिसके पास मैथ्स नहीं होगी, फिर वो नेचर को कैसे समझेगा? दुनिया को कैसे समझेगा?

प्रश्नकर्ता: टफ़ हो जाएगा।

आचार्य प्रशांत: टफ़ हो जाएगा, न? और बताओ।

प्रश्नकर्ता: सर, जैसे कि अभी मेरे तो थोड़े, एक ही वीक पहले एग्ज़ाम ओवर हुआ था। तो उसके मैथ्स में मुझे ऑलमोस्ट सारे क्वेश्चंस बन गए थे। और डेसिमल फ़्रैक्शंस में एक आया था, 15.000-20। तो मैं उसको डेसिमल्स में बनाना भूल गया, और फिर मैंने ग़लती से उसको ग़लत कर दिया।

आचार्य प्रशांत: अब ठीक है। क्या हो गया? हो गया। प्रकृति भी गलतियाँ करती है। कभी मेरे भी इनके जैसे बाल थे। ये बाल जो हटे हैं, पता है क्या है?

प्रश्नकर्ता: क्या?

आचार्य प्रशांत: जब एक सेल हटती है और उसे अपना सारा मामला गिन करके, जो उसकी डॉटर सेल है, उसको देना होता है तो उसकी गिनती गड़बड़ हो जाती है। तो जो सारी इंफ़ॉर्मेशन है न, वो अगली सेल को नहीं पहुँच पाती, इसलिए हम बूढ़े हो जाते हैं।

प्रश्नकर्ता: अच्छा। और सर, आपकी बात से, आपने बोला था कि ऐसे माथे पर चिपका के मैं नहीं चलता था। तो ऐसे माथे पर चिपका करके, "मैं टॉपर हूँ", तो ये… ।

श्रोता: टॉपर का टैग लगा के नहीं चलता था।

आचार्य प्रशांत: अच्छा, टॉपर नहीं हूँ, हाँ।

प्रश्नकर्ता: सर, जैसे कि मेरा भी इंटर-स्कूल कॉम्पटीशन में गया था, तो मैं वो चिपका कर चलता हूँ, "ये टॉपर।" तो ये वही है क्या?

आचार्य प्रशांत: तुम हो टॉपर?

प्रश्नकर्ता: हाँ।

आचार्य प्रशांत: तुम कैसे टॉपर हो? इसे मैथ्स नहीं आती।

प्रश्नकर्ता: नहीं, बाक़ी सारे सब्जेक्ट्स के।

आचार्य प्रशांत: तो ऐसे थोड़ी टॉपर बन जाते हैं। मैथ्स तो बहुत सेंट्रल सब्जेक्ट है। जिसको मैथ्स नहीं आती, वो क्या टॉपर बनेगा? कितने जूते पहने हैं?

प्रश्नकर्ता: दो।

आचार्य प्रशांत: मैथ्स नहीं आती, तो जूते भी नहीं गिन पाओगे। तीन पहन लोगे, सोचो। मैथ्स को इग्नोर करके कोई टॉपर नहीं बन सकता।

प्रश्नकर्ता: सर, मैथ्स तो आती है। बस एक सिली क्वेश्चन की मिस्टेक हुई थी तब।

आचार्य प्रशांत: सिली मिस्टेक्स, तो बेटा, खूब करो ज़िंदगी में, खूब करो। उसकी कोई समस्या नहीं है। सिलीनेस कोई अपराध नहीं होती। डिशॉनिस्टी अपराध होती है। सिली तो ठीक है, हम हैं ही। हम सिली न होते, तो पैदा क्यों होते? सिली हैं, ठीक है।

सिली होना और सिली एक्ट करना, ये तो एक तरह से हक़ है हमारा, जन्मसिद्ध हक़ है हमारा, पर बेईमानी मत करो।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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