आचार्य प्रशांत आपके बेहतर भविष्य की लड़ाई लड़ रहे हैं
लेख
नौकरी और रिश्ते || आचार्य प्रशांत (2019)
Author Acharya Prashant
आचार्य प्रशांत
23 मिनट
129 बार पढ़ा गया

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, कई मानसिक झंझटों से छूटने और पाँच वर्षों से चल रही रिलेशनशिप (सम्बन्ध) के टूटने के बाद मैंनें अपनी ग्यारह वर्षीय पुरानी सरकारी सेवा से त्यागपत्र इसी वर्ष मई में दे दिया। मैंने अपने जुनून को — जो कि पढ़ाना है — समय देना अधिक उचित समझा। अब रोज़गार के अवसरों तथा सच्चे रिश्तों की तलाश में भटक रहा हूँ, कृपया मार्गदर्शन कीजिए?

आचार्य प्रशांत: देखिए, कुछ बातें समझनी होंगी। जीवन में रिश्तों का महत्व क्या है? अभी आपने एक अपने सम्बन्ध विच्छेद की, ब्रेकअप की बात करी और फिर आपने कहा कि‌ अब आप उस रिश्ते को भी छोड़कर और नौकरी भी छोड़कर नये रिश्ते और नयी नौकरी के लिए भटक रहे हैं।

रिश्तों की ज़रूरत क्या है? रिश्ते क्या होते हैं? एक रिश्ता तोड़ा है, अगले रिश्ते की तलाश में हैं, एक नौकरी छोड़ी है, अगली नौकरी की तलाश में हैं। ये रिश्ते चीज़ क्या हैं? सम्बन्धित होना माने क्या? हम सम्बन्धित होते हैं, क्योंकि हम परेशान हैं। हम सम्बन्धित होते हैं, क्योंकि कहीं कुछ कमी रहती है। कुछ अकेलापन, कुछ सूनापन, कोई अपूर्णता हो तो हम सम्बन्ध बनाते हैं।

कई बार वो अकेलापन बिलकुल प्रकट होता है, तो आप साफ़-साफ़ कह देते हैं कि बड़ा लोनली (अकेला) हूँ कोई साथी चाहिए, यही शब्द रहते हैं न? बड़ा प्रकट रहता है। और कई बार रिश्ता बनाने के पीछे जो मंशा है, नीयत है, प्रेरणा है वो इतनी प्रकट नहीं रहती, लेकिन रहती वो यही है।

अवचेतन रूप से रिश्ता बनता ही इसीलिए है, क्योंकि आदमी में कुछ अधूरा है, तो वो पूरेपन के लिए आगे बढ़ता है। जो पूरापन व्यक्ति एक रिश्ते में तलाशता है वो उसे रिश्ते में मिलता नहीं, तो इसीलिए रिश्ते हमारे या तो टूटते हैं या फिर बने भी रहते हैं तो मुर्दा होकर। जिसको रोपा था अपने आँगन में कि सुन्दर वृक्ष बनेगा और खुशबू देगा, वो मर गया।

पर ये मानेंगे नहीं कि वो कब का मर चुका है, तो क्या करेंगे? उसकी लकड़ी को घर का फर्नीचर बना लेंगे और कहेंगे, ‘वो अभी भी है।’ अधिकांश रिश्ते जो बीस-चालीस साल पुराने हैं वो ऐसे ही होते हैं। वो फर्नीचर की तरह होते हैं। एक जीते, हँसते, झूमते, फलित होते, पुष्पित होते पेड़ की तरह नहीं होते। ये खेद की बात है।

कई बार तो सीधे-सीधे वो हो जाता है जो आप कह रहे हैं ब्रेकअप। वहाँ दिख जाता है रिश्ता टूट गया। जहाँ नहीं भी टूटता वहाँ वो मुर्दा हो चुका होता है — बस फर्नीचर बनकर जीवन में मौजूद होता है — तो हमें लगता है कि अभी है, अभी तो है रिश्ता। है नहीं, उसमें कोई प्राण नहीं है, उसका बस आकार है, नाम है, वज़न है।

फिर दूसरा रिश्ता बनता है और उसकी भी यही गति होती है, फिर तीसरा, फिर चौथा। एक तल पर रिश्ता जब दिख जाए कि और ज़्यादा अब बनाने से फ़ायदा नहीं है, तो आदमी कहीं और निकल पड़ता है रिश्ते बनाने। आदमी कहता है, ‘घर के भीतर के जो रिश्ते हैं इनमें तो कुछ रखा नहीं, तो चलो बाहर निकलकर नेटवर्किंग करते हैं।'

ऐसे लोग देखें है न जिन्हें घर पर रहना पसन्द नहीं होता? वो कहते हैं, ‘हम बहुत व्यस्त हैं, हम कामकाज़ी हैं।’ वो विदेशों के दौरे करते रहेंगे, इधर रहेगें, उधर रहेंगे। वो कुछ नहीं कर रहें, वो रिश्ते बना रहे हैं बाहर। वो कर वही रहे हैं जो वो घर में करना चाहते थे, घर में हुआ नहीं तो बाहर कर रहे हैं।

घर के माध्यम से सुख नहीं मिला तो धन के माध्यम से सुख खोज रहे हैं कि बाहर रिश्ते बनायें, रुपया-पैसा इकट्ठा करें, क्या पता उससे अधूरापन दूर हो जाए। कोई जब पाता है कि इंसानों से रिश्ता बनाकर के तृप्त नहीं हो पा रहा तो वो चीज़ों से रिश्ता बनाने लग जाता है, पर रिश्तेबाज़ी हम करते ज़रूर हैं।

कोई शराब से रिश्ता बना लेता है, कोई किसी गाड़ी से रिश्ता बना लेगा कि मैं तो बस घूमता रहता हूँ अपनी गाड़ी लेकर देशभर में। ये तुमने कुछ नहीं करा, एक रिश्ता टूटा था; तुमने दूसरा बना लिया। दूसरा रिश्ता तुमने किससे बना लिया? अपनी कार से। कोई, कोई और शौक पाल लेता है, कहता है ये करूँगा।

आदमी यहाँ जितनी हरक़तें करता है उनका केन्द्र, उनका मूल देखिए! उनका मूल है आदमी का अधूरापन। हम दो बातें कह रहे हैं — पहली, आदमी अधूरा है और दूसरी, चूँकि वो अधूरा है इसीलिए उसकी बुद्धि भी अधूरी है, इसीलिए इस बुद्धि का इस्तेमाल करके, इन अधूरी भावनाओं का इस्तेमाल करके, अपनी अधूरी प्रेरणाओं का इस्तेमाल करके वो जो रिश्ते बनाता है वो सब रिश्ते भी अधूरे हैं।

ये तो फँस गये भाई! कि नहीं? पहले तो हम अधूरे, अधूरे माने पगले। और चूँकि हम पगले हैं, इसीलिए हमारी अक्ल भी पगलों वाली है। इसी अक्ल का इस्तेमाल करके हम क्या करते हैं? अपने अधूरेपन का इलाज। जैसे कि कोई मनोरोगी अपनी मानसिक चिकित्सा ख़ुद ही कर रहा हो, एक विक्षिप्त व्यक्ति ख़ुद अपना इलाज कर रहा हो। क्या होगा उसका?

सब लोग ऐसे ही जीते हैं — अधूरेपन से अधूरेपन का इलाज करने निकलते हैं। ये बात तो मैं कह रहा हूँ बड़ी फँसाने वाली है। इसको सुनकर तो ऐसा लग रहा है कि आदमी के लिए कोई उम्मीद ही नहीं है। अब क्या उम्मीद है? अधूरे हो, चूँकि अधूरे हो इसीलिए जो कुछ भी करोगे उल्टा-पुल्टा करोगे। तो फिर जो कुछ उल्टा-पुल्टा करोगे, उससे अधूरापन मिटेगा भी नहीं।

इसको तोड़े कैसे? तरीक़ा क्या है? ये जो हमारी रिश्ता-दर-रिश्ता की यात्रा है, इसको समाप्त कैसे करें या इसको मंंज़िल पर कैसे पहुँचाएँ? थोड़ा सवाल करना पड़ेगा, कहना पड़ेगा कि एक बार ये यात्रा शुरु हो गयी फिर तो बड़ी गड़बड़ हो जाती है। मैं शुरु करने से पहले ही एक-दो बातें पूछ सकता हूँ, क्या? अपनेआप से कहना पड़ेगा, मैं एक-दो बातें पूछ सकता हूँ, क्या?

इस पूरी यात्रा के केन्द्र में ये भावना बैठी है कि मुझमें कोई कमी है, मुझे कोई चाहिए। कोई इंसान, कोई जगह, रुपया-पैसा, कुछ प्रतिष्ठा, कुछ ज्ञान, मुझे कुछ चाहिए। इस पूरी यात्रा के केन्द्र में ईन्धन के रूप में यही बात बैठी है न समथिंग इज़ राँग (कुछ ग़लत है), समथिंग इज़ अमिस (कुछ छूट रहा है); यही है न? ‘भाई, कहीं कुछ गड़बड़ है!'

और हमने मान ही लिया है कि कुछ गड़बड़ है ज़रूर, अगर इसी पर सवाल करें तो? तो शायद इस पूरी यात्रा से ही हम बच जाएँ। फिर ऊटपटाँग रिश्ते बनाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। क्या पता हम जिस बीमारी का इलाज खोजने निकले हों, वो बीमारी ही मायावी हो। वो बीमारी लगती तो है कि है, पर उसकी छान-बीन करो तो निकले कि वो है ही नहीं। बस वो बीमारी प्रतीत इसीलिए हो रही थी, क्योंकि हम कभी उसकी जाँच नहीं करते थे कि ये बीमारी चीज़ क्या है।

उसकी जाँच करो तो पता चलेगा कि भाई उतने भी अधूरे नहीं हो, जितना अपनेआप को समझ रखा है। उतने भी लाचार नहीं हो, जितना अपनेआप को बना रखा है। और अगर उतने अधूरे और उतने लाचार नहीं हो तुम, तो उस तरह के रिश्ते बनाने की भी ज़रूरत नहीं है, जितने और जैसे बना रखे हैं।

क्यों दर-दर, मारे-मारे ठोकर खा रहे हो? कभी यहाँ भिखारी बनते हो, कभी वहाँ भिखारी बनते हो — ‘साथ दे दो, संगत दे दो, ज्ञान दे दो, पैसा दे दो, नौकरी दे दो।’ जैसे कि दुनिया की सब खोट तुममें ही है और जब तक तुम हाथ नहीं फैलाओगे तब तक जी नहीं पाओगे। जैसे कि किसी ने तुमसे बदला लेने के लिए तुमको पैदा किया है कि जा ज़मीन पर और सड़!

ऐसा होना तो नहीं चाहिए। पर जीते तो हम सब ऐसे ही हैं — चेहरे पर हर समय बारह ही बजे रहते हैं, मुँह उतरा रहता है। नहीं, मैं उदास लोगों की बात नहीं कर रहा, मैं हँसने वालों की बात कर रहा हूँ। जो ये ज़्यादा हँस रहे होते हैं और हैप्पी और जॉली (हँसमुख) होते हैं, ये बेचारे सबसे उदास होते हैं, इनकी दुर्दशा बड़ी भयंकर होती है।

‘तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो, क्या ग़म है जिसको छुपा रहे हो!' ये जो सेल्फ़ी और डीपी और फ़ेसबुक पर हँसते हुए चेहरे हैं, इनकी पीड़ा बड़ी मार्मिक होती है। जो जितना दाँत फाड़कर के फ़ोटो डाल रहा है अपनी, उसको जान लीजिए कि उतना ही दुखी है। वो दुख असली है क्या? उस दुख को छिपाने का ये एक तरीक़ा है कि एक बनावटी और झूठी हँसी ओढ़ लो, या उस दुख से मुक्ति पाने का ये तरीक़ा है कि उस दुख के मूल में चले जाओ?

उस दुख के मूल में जाओगे तो हैरान हो जाओगे। हमें उतना भी दूसरों पर आश्रित रहने की ज़रूरत नहीं, जितना हमने अपनेआप को समझा लिया है। सही में नहीं है। ये मैं कोई बात आपको प्रेरणा देने या मोटिवेट (उत्साहित) करने के लिए नहीं बोल रहा हूँ, मैं बिलकुल यथार्थ बता रहा हूँ। हमें सही में दुनिया से उतनी चीज़ों की ज़रूरत है नहीं जितना हमने अपनेआप को दुनिया पर निर्भर बना लिया है।

अध्यात्म इसी आत्मनिर्भरता को तलाशने का विज्ञान है और इसी का नाम ‘अद्वैत' है। “पूर्ण हैं हम” और ये बात सुनने में बहुत अजीब लगेगी। तो मैं कह भी नहीं रहा कि अपनेआप को आप पूर्ण जान लीजिए। उसकी क़ीमत चुकानी पड़ती है, साधना करनी पड़ती है इतनी आसानी से आप पूर्ण अपनेआप को जानने नहीं लग जाएँगे। लेकिन इतना तो करिए कि पूछिए अपनेआप से कि उतना अपूर्ण हूँ क्या मैं जितना अपनेआप को समझता हूँ। ये तो ठीक है, यह सवाल तो जायज़ है। नहीं है? उतनी भी बेबसी रखनी यार, जितनी हम ढोते फिरते हैं? तो क्या करें, रिश्ते बनायें नहीं? आचार्य जी तो कह रहे हैं कि सब रिश्ते हमारी झूठी अपूर्णता से निकलते हैं, इसीलिए सब रिश्ते झूठे हैं। निन्यानवे प्रतिशत रिश्ते ऐसे ही होते हैं दुनिया में और निन्यानवे प्रतिशत लोग ऐसे हैं, जिनके सौ प्रतिशत रिश्ते ऐसे ही होते हैं।

दो और तरह के रिश्ते सम्भव हैं, पर वो जो रिश्ते हैं, वो शून्य दशमलव एक प्रतिशत मिलते हैं या उससे भी कम मिलते हैं। एक रिश्ता है कि उससे जुड़ जाओ जो तुम्हारी अपूर्णता को पूर्ण करने का भरोसा न देता हो, बल्कि जो तुम्हारी अपूर्णता को झूठ साबित कर देता हो।

दोनों बातों में अन्तर है। हम कहते हैं, ‘हम दो हैं।’ हम दो यूनिट (इकाई) का आकार रखते हैं, होना हमें चार यूनिट का चाहिए था। मान लो चार यूनिट प्रतीक है, सिम्बलाइज़ (प्रतीक होना) करती है पूर्णता को। पूर्णता माने चार यूनिट मान लो, लेट्स से (चलो, कहते हैं)। और हमें क्या लग रहा होता है? हम दो यूनिट हैं, तो हम किसी को पकड़ते हैं और फिर कहते हैं, ‘मैं दो, तू दो, हम दोनों मिलकर हो जाएँगे दो और दो चार।'

तो एक रिश्ता तो ये है कि तुम्हें जो मिला, वो तुमसे कह रहा है, ‘हाँ-हाँ, आओ हम हाथ थाम लेते हैं, दो और दो मिलकर चार हो जाऍंगे।’ इस तरह के रिश्ते को मैंने कहा, निन्यानवे प्रतिशत वाला रिश्ता; सबके ऐसे ही होते हैं — दो और दो मिलकर चार हो जाएँगे।

अध्यात्म में गणित दूसरा चलता है, वहाँ दो और दो मिलकर दो ही रह जाते हैं, और कई बार दो और दो मिलकर एक हो जाते हैं; चार नहीं होने पाते।

दूसरा तरीक़ा ये है कि तुम अपनेआप को दो समझते हो, ऐसे को ढूँढो — जान लगाकर ऐसे को ढूँढो — जो तुमसे कह दे कि तुम दो हो ही नहीं, तुम तो भाई पहले ही चार हो, तुम दो हो ही नहीं, तुम्हें मेरी ज़रूरत ही नहीं।

अब ये बिना ज़रूरत का रिश्ता बनेगा। उसके नज़दीक रहने से तुम दो से चार हो गये। उसको अपनेआप में जोड़कर नहीं, तुमने पाया कि तुम उसके नज़दीक हो, तो तुम ही चार हो। ऐसा नहीं कि तुममें वो जुड़ गया, इसीलिए दो और दो चार हो गया है। बात सूक्ष्म है, अन्तर समझिएगा!

क्योंकि अगर आप कह रहे हैं कि दो और दो जुड़कर चार होंगे, तो दो को भी पता है कि अभी वो दो है और दूसरे दो को भी पता है कि अभी वो दो है। दोनों ही आधे-आधे हिस्सों को पता है कि हैं तो वो अभी आधे-ही-आधे, बस वो बीच से सिल दिये ग‌ए हैं आपस में। ये कोई पूर्णता हुई? ये कोई पूर्णता हुई क्या?

सेब के दो आधे-आधे टुकड़ों को आप एक साथ लगा दें — ये तरीक़ा अच्छा है दुनिया को धोखा देने के लिए। दुनिया को लग जाएगा, ये क्या है? (हाथ से सेब का आकार बनाते हुए) एक साबुत सेब। ये क्या है? (श्रोताओं से पूछते हुए) — पर सेब के दोनों हिस्सों को पता है कि बात वो है नहीं, हम तो आधे ही हैं। बस सतह पर जुड़े हुए हैं, हम तो आधे ही हैं।

जैसे किसी आदमी के दो फाँक कर दिये जाएँ, बिलकुल ऊपर से नीचे तक उसे काट दिया जाए और फिर दोनों हिस्सों को जोड़कर के उसकी फ़ोटो खींची जाए, दुनिया को दिखायी जाए। दुनिया को लग सकता है कि पूर्ण है, लेकिन उसमें प्राण तो होंगे ही नहीं, कि होंगे? अधिकांश रिश्ते ऐसे ही होते हैं।

आधा, आधे से जुड़ा लग तो रहा है कि पूरा; पूरा है नहीं। वो वैसे ही मृतप्राय है, वैसा ही आधा है, वैसा ही अधूरा जैसे सदा से था। बात दूसरी है — रिश्ता उससे बनाना है जो आपसे यह कह दे कि आप दो नहीं चार पहले से ही हो, तो भाई मुझसे जुड़कर क्या करोगे, तुम्हें मेरी ज़रूरत नहीं है!

आप कहेगें, ‘अगर ज़रूरत नहीं है तो रिश्ता काहे को बनेगा?’ वही तो असली रिश्ता है, जहाँ ज़रूरत नहीं है फिर भी साथ हैं। तुम भी चार हो, मैं भी चार हूँ, हमें एक-दूसरे पर निर्भर नहीं रहना है। तुम भी चार, हम भी चार और सब चार एक होते हैं। एक माने? समान। तुम भी पूरे हो और हम भी पूरे हैं। साथ क्यों हैं? बस यूँ ही, कोई वजह नहीं है।

जब भी रिश्ते में वजह होगी, उस रिश्त में नर्क होगा। तो मैंने कहा था, वो निन्यानवे प्रतिशत वालों की जगह दो और तरीक़े के रिश्ते हो सकते हैं। एक तो बता दिया तुम किसी ऐसे के साथ हो जाओ, पर ढूँढना पड़ेगा, मेहनत करनी पड़ेगी, साधना करनी पड़ेगी, शर्तें माननी पड़ेंगी; आसानी से ऐसा नहीं मिलता कोई।

और दूसरे तरीक़े का रिश्ता ये है कि जब तुम जान जाओ कि चार हो तुम तो ऐसे जितने हों जो अपनेआप को एक-दो-ढाई समझे घूम रहे हों, तुम उन्हें भी जनवा आओ।

यही दो सच्चे तरीक़े के रिश्ते होते हैं। झूठे रिश्तों की तो कोई गिनती नहीं। सच्चे रिश्ते बस दो ही तरीक़े के होते हैं और हमें इन दोनों ही सच्चे रिश्तों से बड़ी आपत्ति रहती है। क्योंकि सच्चे रिश्ते में आप निर्भर नहीं हो सकते।

अगर कोई वास्तव में आपसे सही तरीक़े से सम्बन्धित है — और उस सही सम्बन्ध का नाम ही प्रेम होता है — अगर कोई वास्तव में आपसे सही सम्बन्ध रखता है, तो वो आपको अनुमति ही नहीं देगा कि आप उस पर निर्भर हो जाएँ। आप अपनी ओर से बहुत कोशिश करेगें, निर्भर होने की, जिसे कहते हैं चेप होने की; वो आपको अनुमति ही नहीं देगा। वो कहेगा, ‘ये ग़लत कर रहे हो तुम, ये करना है तो फिर जैसे हो वैसे रहो।’

सच्चा सम्बन्ध पारस्परिक मुक्ति का होता है। मैं भी मुक्त, तुम भी मुक्त और जिस हद तक हम अभी मुक्त नहीं हैं, हमारा रिश्ता हमें मुक्त करता है। हम जुड़े ही इसीलिए हैं, ताकि एक-दूसरे को और मुक्त कर सकें। हम इसलिए नहीं जुड़े हैं कि एक-दूसरे की बेड़ियाँ बन जाएँ — ऐसी हथकड़ी जो तुमने अपने एक हाथ में पहन रखी है और दूसरे हाथ में मैंने। रिश्ते ज़्यादातर ऐसे ही होते हैं।

पुलिस वाले चोरों को ले जा रहे होते हैं, वो भी कहते है कि बहुत सारी हथकड़ियाँ कौन खर्च करे। तो वो क्या करेगें कि दो होगें चोर, एक हथकड़ी लेंगे, एक के दायें हाथ में और एक के बायें हाथ में। कहेगें, ‘अब ठीक है। अब वो भाग भी नहीं सकते। कितना भागेंगे? बड़ी कला चाहिए होगी, एकदम साथ-साथ भागने के लिए।'

ज़्यादातर रिश्ते ऐसे ही हैं, ऐसे नहीं बनाना है। रिश्ता ऐसा हो जो उन बन्धनों को काटे जिनमें हम पहले से ही फँसे हुए हैं। अगर दावा करते हैं आप किसी से प्रेम का तो उसकी मुक्ति के कारण बनिये, उसको और बाँधिये, फँसाइये, परेशान मत करिए। वो तो पहले ही परेशान था, परेशान न होता तो आपके साथ क्यों फँसता?

आ रही है बात समझ में?

अब आते हैं नौकरी पर। आदमी क्यों करता है नौकरी? कह रहे हैं, एक नौकरी छोड़ी है और ये अक्सर होता है, इसमें आपको सोचना पड़ेगा थोड़ा। अक्सर लोग जब एक रिश्ता तोड़ते हैं तो फिर कई बार नौकरी भी छोड़ते हैं, कभी-कभी तो शहर भी छोड़ देते हैं। जैसे कि वो सब चीज़ें साथ ही चलती थीं। इसमें कोई राज़ ज़रूर है।

अगर आपका एक बहुत पुराना रिश्ता हो और फिर जब ब्रेकअप होता है तो आप बस रिश्ता नहीं तोड़ते, आप बहुत सारी चीज़ें तोड़ देते हो। नहीं? उसकी तस्वीर इत्यादि और जो उसने भेंट, गिफ़्ट दिये होते हैं वो सब तो तोड़ ही देते हो। घर की खिड़कियाँ तोड़ देते हो, टीवी तोड़ देते हो, ख़ासतौर पर टीवी अगर उसने दिया हो। क्योंकि वो सब चीज़ें साथ चलती ही थीं, वो एक ही थीं।

एक छूटेगी, बाक़ी सब भी छूटेगा। ये अच्छा है कि वो सब एक साथ छूटा। लेकिन अच्छा नहीं है, क्योंकि वो सब एक साथ छूटा। फिर उसके बाद दोबारा उसी तरह की किसी चीज़ का निर्माण कर लेंगे।

नौकरी की उपयोगिता क्या है जीवन में? पैसा आता रहे ताकि आप अपने झूठे जीवन को और झूठे सम्बन्धों को फ्यूल देते रहो, ईन्धन की आपूर्ति करते रहो। नौकरी इसीलिए करते हो न? बताना और नौकरी किसलिए करते हो?

नौकरी करी, कमाया, ठीक-ठीक बताइए, वो कमायी गयी कहाँ, जगत के कल्याण में, विलुप्त हो रहे पशु-पक्षियों को बचाने में, अनाथ बच्चों की सहायता में? वैज्ञानिक हैं जो अपनी प्रयोगशाला में प्रयोग कर रहे हैं, पर उनके पास संसाधन नहीं हैं, आपने उन वैज्ञानिकों को जाकर अपनी कमायी दे दी? आप इसलिए हाड़तोड़ मेहनत करते हो?

आप इसीलिए जल्दी-जल्दी जॉब हॉपिंग (नौकरी बदलते) करते हो कि थोड़ी तनख़्वाह बढ़नी चाहिए, तनख़्वाह नहीं बढ़ेगी तो जो नन्ही गौरैया शहरों से गायब होती जा रही है, इसे बचाएगा कौन? तनख़्वाह नहीं बढ़ेगी तो जगत में ये जो धर्म मिटता जा रहा है, उसको बचाएगा कौन? मुझे पैसा चाहिए भाई ताकि मैं उसे धर्मार्थ खर्च कर सकूँ, इसलिए पैसा कमाने के पीछे आतुर रहते हो, बोलो?

मुझे पैसा कमाने से कोई आपत्ति नहीं है, बिलकुल नहीं! यहाँ आयें हैं आप, बाहर दानपात्र रखा हुआ है कृपया करके उसमें डालिएगा, पैसा आवश्यक है। मैं पूछ रहा हूँ, किसलिए आवश्यक है? किसलिए आवश्यक है? क्यों कमाते हो? ये जो नौकरी-नौकरी का रोना चलता रहता है, भाई! नौकरी चाहिए किसलिए, ये तो बता दो।

मैं अभी बिलकुल नहीं कह रहा हूँ कि नौकरी नहीं चाहिए, मैं कह रहा हूँ, ‘चाहिए, पर क्यों चाहिए?’ क्या करते हो पैसे का? बताओ।

तो साहब, हमारा किस्सा कुछ इस तरह से है, हम घर पर बहुत परेशान रहते हैं। हम घर पर बहुत परेशान रहते हैं, इसीलिए तो हम दफ़्तर में वक़्त भी ज़्यादा गुज़ारते हैं और हम दफ़्तर में जान लगाकर के कोशिश करते हैं पैसा कमाने की ताकि वही घर और चलता रहे जिसमें हम खूब परेशान रहते हैं। शाबाश! क्या बात है!

तो माने आप अपनी ही क़ब्र खोदने पर उतारू हैं। जो चीज़ आपके प्राण लिये ले रही है, उसी को ईन्धन देने के लिए आप नौकरी करते हो। क्या बात है! ये जो इतना पैसा कमाते हो, मैं पूछ रहा हूँ, जाता कहाँ है? और जहाँ जाता है, वहाँ पूछो कि तुमको आनन्द है या बन्धन है? तुम किस चीज़ को और ताक़त दे रहे हो और तगड़ा किये दे रहे हो, अपनी मुक्ति को या अपने बन्धनों को?

हर महीने कमा-कमाकर अपने बन्धनों को और मज़बूत करते हो। आप कहें कि आपको करोड़ों कमाने हैं, अरबों कमाने हैं अपने आनन्द के लिए, धर्म के लिए और मुक्ति के लिए। मैं कहूँगा, ‘आप करोड़ों नहीं कमाइये, आप ख़रबों कमाइये।’ क्योंकि आपका उद्देश्य सही है। इस उद्देश्य के लिए अगर आपको अरबों-खरबों की ज़रूरत है तो आपको ज़रूर कमाने चाहिए।

उद्देश्य सही हो तो उस उद्देश्य के लिए जो चीज़ें चाहिए वो ज़रूर हासिल करनी चाहिए। लेकिन आपका उद्देश्य क्या है कमाने में, बताइए? वो उद्देश्य समझ लो, फिर जान जाओगे कि उचित नौकरी कौनसी है। आदमी की सारी ज़िन्दगी इन्हीं दो जगहों पर जाती है, घर और दफ़्तर। ठीक? घर और दफ़्तर। और दोनों एक-दूसरे पर बिलकुल आश्रित हैं कि नहीं हैं? दोनों एक-दूसरे से बिलकुल जुड़े हुए हैं और दोनों ही जगहों पर मारे जा रहे हो, दोनों ही जगहों पर बन्धन हैं।

इससे मेरा ये अर्थ बिलकुल भी नहीं हैं कि घर छोड़ दो या नौकरी मत करो। मैं कह रहा हूँ जैसा घर बना रखा है, वैसा नहीं होना चाहिए और जैसी नौकरी कर रहे हो, वैसी नहीं होनी चाहिए।

घर तो रहेगा ही। क्योंकि दुनिया में जी रहे हो तो रिश्ते तो होंगे ही, पर जैसे रिश्ते हैं वैसे नहीं होने चाहिए। और काम तो करोगे ही, क्योंकि जानवरों तक को काम करना पड़ता है तो इंसान हो तो काम तो करोगे ही, पर जैसा काम कर रहे हो वैसा काम नहीं करना चाहिए।

बहुत अच्छा करा कि ये दोनों बातें एक ही साँस में पूछी कि रिश्ता और नौकरी, क्योंकि ये दोनों बातें एक ही हैं। एक अपनेआप से ईमानदार सवाल पूछ लीजिएगा, ’अगर आपके सब रिश्ते सही होते, तो क्या आपको कमाने की और नौकरी की उतनी परवाह करनी पड़ती, जितनी अभी करनी पड़ती है?'

दिल से बताइएगा। स्त्री हैं यदि आप और पति आपके होते — वैसे ही जिनका आज त्यौहार है — राम सरीखे, तो घर आपका वैसा ही होता जैसा अभी है? और अगर आप नौकरी करती हैं, तो क्या आपको वैसी ही नौकरी करनी पड़ती जैसी आप अभी करती हैं? और पुरूष हैं यदि आप, और पत्नी होती सीता समान तो आप उसी तरह कमाने के लिए व्याकुल रहते, जैसे अभी आप रहते हैं?

अभी तो अक्सर हालत यहाँ तक पहुँच जाती है कि कमायी अगर बन्द हो जाए या कम हो जाए तो रिश्ता ही टूट जाए। विदेशों में तो तलाक़ का ये जायज़ कारण माना जाता है, अदालतों द्वारा भी। अगर वहाँ आप जाकर कह दें कि ये मेरे पतिदेव हैं या मेरी पत्नी हैं और इनमें अब ये ताक़त नहीं रही कि ये भरण-पोषण कर सकें घर का, तो अदालत कहेगी, ‘ठीक है, हम तलाक़ स्वीकार करते हैं।’

इसी तरीक़े से अगर आप जाकर सिद्ध कर दें कि पति में अब ताक़त नहीं रही कि वो आपको शारीरिक रूप से सन्तुष्ट कर सकें, तो अदालत कहेगी, ‘ये बात ठीक है, हम तलाक़ स्वीकार करते हैं।’

ये तो रिश्ते हैं हमारे और फिर ऐसे ही रिश्तों को बचाये रखने के लिए हमें ऊटपटाँग नौकरियाँ करनी पड़ती हैं, नालायक तरीक़े के बॉस लोगों के सामने नाक रगड़नी पड़ती है।

सोचकर तो देखो कि उसके सामने क्यों नाक रगड़नी पड़ती है। इसीलिए रगड़नी पड़ती है, क्योंकि अगर मोटी गठरी घर लेकर नहीं आओगे तो घर टूट जाएगा। ये घर प्रेम पर नहीं चल रहा, ये घर स्वार्थ पर चल रहा है। इसमें पैसे कि आपूर्ति होनी बन्द हो गयी तो ये घर बिखरने लगेगा।

तो नौकरी मत कहो, कहो काम। नौकरी में तो किसी इंसान के नौकर हो जाते हो। कहो काम। सही काम ढूँढो! ऐसा काम ढूँढो जिसमें छाती ज़रा चौड़ी रहे। वो काम मत ढूँढो कि जिसमें रोज़ घी चुपड़ी रोटी खा रहे हो और पचास तरह के पकवान खा रहे हो, लेकिन भीतर फिर भी कुछ ख़ाली-ख़ाली है। वो काम करो जिसमें कुछ भी खाओ, चाहे न खाओ ये नहीं कि खाने के पैसे नहीं हैं; खाने की सुध नहीं है, खाने का समय नहीं है।

खाओ, चाहे न खाओ, भीतर सब भरा-भरा रहे, दिल खोखला सा न लगे। पर वैसा काम ढूँढने के लिए ज़िन्दगी भी वैसी ही चाहिए। अगर घर ग़लत है तुम्हारा तो तुम मजबूर हो जाओगे ग़लत नौकरी भी करने के लिए और अगर ग़लत नौकरी करते हो तो अनिवार्यतः घर भी ग़लत ही होगा तुम्हारा। ये दोनों बिलकुल जुड़े हुए हैं। मजबूरी की कोई ज़रूरत नहीं है। हम बेबस जीने के लिए पैदा नहीं हुए हैं।

क्या आपको आचार्य प्रशांत की शिक्षाओं से लाभ हुआ है?
आपके योगदान से ही यह मिशन आगे बढ़ेगा।
योगदान दें
सभी लेख देखें