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[वेदांत दिवस विशेष] क्यों रचा गया वेदांत? || आचार्य प्रशांत, वेदांत पर (2020)
Author Acharya Prashant
आचार्य प्रशांत
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प्रश्नकर्ता: वेदान्त क्यों रचा गया?

आचार्य प्रशांत: ऋषियों का एक-एक शब्द सुनने वाले बेचैन मन की शान्ति हेतु ही है। यही एकमात्र उद्देश्य है उपनिषदों का। एक-एक बात जो कही जा रही है वह किसी अवस्था विशेष से कही जा रही है; सत्य, अनावलंबित सत्य, निरुद्देश्य सत्य, निष्प्रयोजन सत्य, कहा ही नहीं जा सकता। जो कुछ कहा जाता है वह सदा किसी सीमित इकाई के लाभ हेतु कहा जाता है। असीम सत्य को शब्दों में वर्णित करने का कोई उपाय नहीं है। उपनिषदों में भी जो कहा गया है वह मन के लाभार्थ कहा गया है। वैसे ही उसको देखना होगा। सत्यता मत ढूँढिएगा, उपयोगिता देखिएगा।

‘सत्य या ब्रह्म से श्रेष्ठ दूसरा कोई नहीं’, यह वाक्य बहुत औचित्यपूर्ण नहीं होगा क्योंकि सत्य या ब्रह्म के अतिरिक्त दूसरा कोई है ही नहीं, जब दूसरा कोई है ही नहीं तो दूसरा कोई श्रेष्ठ या हीन कैसे हो सकता है? तो यह बात इसीलिए किसी पूर्ण या मुक्त संदर्भ में नहीं कही गई है, यह बात मन के सीमित संदर्भ में कही गई है। मन ही है जिसको बहुत सारे दिखाई देते हैं, जिसके लिए वैविध्यपूर्ण संसार है, जिसके सामने हज़ारों-करोड़ों भिन्न-भिन्न इकाइयाँ हैं, और उन इकाइयों में वह किसी को श्रेष्ठ समझता है और किसी को हीन। तुम्हारे लिए ब्रह्म से श्रेष्ठ कोई दूसरा नहीं। ब्रह्म से श्रेष्ठ कोई दूसरा कैसे हो जाएगा? सबकुछ तो ब्रह्म के भीतर है। जो पूर्ण है उससे श्रेष्ठ अंश कैसे हो जाएगा? पूर्ण की तुलना आप किस से करेंगें? जिस तुला पर आप पूर्ण को नापेंगे-जोखेंगे, उसका मूल्य या वज़न करेंगे, वह तुला भी पूर्ण के अंदर ही है। पूर्ण का अर्थ ही है जिसमें सब कुछ समाहित हो, तो तुलना का कोई उपाय नहीं।

पर अगर हम बहुत सावधान होकर के इस बात को नहीं समझेंगे तो हमारे मन में जानते हैं छवि कैसी आएगी? हमारे मन में छवि आएगी कि बहुत सारी इकाइयाँ हैं इस संसार में, ब्रह्म भी उनमें से कोई एक इकाई है, थोड़ी खास इकाई है, उच्च इकाई है, श्रेष्ठ इकाई है, श्रेष्ठतम इकाई है, लेकिन है तो इसी संसार की एक इकाई ही ब्रह्म। ऐसी हमारे मन में भावना, धारणा आएगी अगर हमने यह सोचा कि ऋषि कह रहें हैं कि बात ब्रह्म की संसार की दूसरी इकाइयों से तुलना से है।

नहीं, संसार की दूसरी इकाईयों से ब्रह्म की तुलना नहीं की जा रही, क्योंकि ब्रह्म संसार की कोई इकाई है ही नहीं। तो इसको कैसे पढ़ना है? ऐसे नहीं कहना है कि ब्रह्म सर्वश्रेष्ठ है, ऐसे नहीं पढ़ना है कि ब्रह्म से श्रेष्ठ कोई अन्य नहीं। इसको पढ़ना है, ‘मेरे लिए ब्रह्म से श्रेष्ठ कोई अन्य नहीं।' क्योंकि सारी बात किससे कही गई है? तुमसे। मुझे मालूम है मैं यह बात इतनी बार दोहराता हूँ, आप इससे ऊब भी सकते हो, पर तुम्हारा ऊब जाना कम नुकसान की बात होगी, मूल संदर्भ को भूल जाना ज़्यादा नुकसान की बात होगी, तो मैं दोहराता रहूँगा।

हम हैं न जिनको बहुत सारे चौराहे मिलते हैं, चुनाव मिलते हैं, निर्णय करने पड़ते हैं। हम हैं जिन्हें तय करना पड़ता है क्या ऊँचा, क्या नीचा, क्या दायाँ, क्या बायाँ, क्या श्रेष्ठ और क्या त्याज्य; क्या प्रिय, क्या अप्रिय, कहाँ हित है और कहाँ अपहित है। यह हमें तय करना है न? हमें तय इसलिए करना है क्योंकि हमें तमाम तरह के भेद, विभाग, विभाजन, अंतर लगातार दिखाई देते रहते हैं। तुम्हारे लिए कोई भी दो चीज़ें एक तो नहीं होती न? यह दो खम्भे हैं, पर तुमसे कह दिया जाए इन दो खम्भो में से किसी एक को चुनो तो तुम कोई-न-कोई आधार लगा कर के चुन लोगे।

हमारे लिए तो सदा कुछ थोड़ा सा ऊँचा, कुछ थोड़ा सा नीचा है। कोई भी दुनिया में दो वस्तुएँ, व्यक्ति या इकाइयाँ बता दो जिनके बारे में तुम पूरे तरीके से निष्पक्ष हो सकते हो, हो सकते हो क्या? तुम्हारे ही दो कपड़े होते हैं, तुम किसी एक पर अंगुली रख देते हो, दोनों एक बराबर तो नहीं हो जाते न? तो हम हैं जो निरंतर चुनाव की प्रक्रिया में रहते हैं। ऐसी हमारी संरचना है, यही हमें करना है, यही हमारा बंधन है, इसी में हम फँसे हुए हैं; कुछ चुनो, कुछ चुनो, सदा कुछ चुनो। और इसी क्रिया में इस जाल से बाहर आने का उपाय भी है, कौन सी क्रिया? लगातार चुनते रहने की क्रिया।

यह जो हम लगातार चुनाव करते रहते हैं न, वही हमारा बंधन है कि हमारी चेतना में पूर्ण स्पष्टता नहीं है। हमारी चेतना इसीलिए ऊहापोह में रहती है। हमारी चेतना को, जैसा हमने कहा चौराहे दिखाई देते हैं, वह फँस जाती है; सीधे जाएँ, दाएँ जाएँ, बाएँ जाएँ, क्या करें, रुक जाएँ, पीछे ही लौट जाएँ। तो यही हमारी त्रासदी है, इसी में हमारा दुःख है, संदेह है, संशय है। और मैं कह रहा हूँ चुनाव की इसी क्रिया में और चुनाव के इसी अधिकार में हमारी मुक्ति की कुंजी भी है, कैसे? सही चुनाव करोगे तो हित होगा तुम्हारा, मुक्त हो जाओगे, स्वास्थ्य पाओगे, शुभता पाओगे।

तो उपनिषद हमें सही चुनाव करने का तरीका बता रहें हैं, क्या कह रहे हैं? ‘तुम्हारे लिए ब्रह्म से श्रेष्ठ कोई दूसरा नहीं है।’ जब भी चुनना, ब्रह्म को चुनना। तो पूरा यह जो सूत्र है उसकी सीख यह है: जब भी चुनना ब्रह्म को चुनना। अब फँस गए हम क्योंकि हमे तो जब चुनाव करना होता है तो उस चुनाव में ब्रह्म जैसा कोई विकल्प ही उपलब्ध नहीं होता। चुनाव क्या करना है? कि घर में खाना खाना है कि बाहर खाना खाना है, इसमें ब्रह्म कहाँ है? उपनिषद ने कह दिया जब भी चुनाव सामने आए, किसको चुनना? ब्रह्म को चुनना। पर ब्रह्म उपलब्ध भी तो होना चाहिए न चुनने के लिए? या तो ऐसा होता कि घर में खाना है, बाहर खाना है या ब्रह्म लोक में खाना है तो हम कहते कि, "चलो अब उपनिषदों का सहारा लेते हैं उन्होंने कहा है कि ब्रह्म को चुनना तो हम चुन रहें हैं; ब्रह्म लोक में खाना।" पर ऐसा तो हमें कोई चुनाव देता ही नहीं करने को, तो क्या करें? मतलब समझो। नकार की प्रक्रिया से आगे बढ़ो; वह सब नकारते चलो जिसमें ब्रह्म से विपरीत लक्षण हैं।

अब समझे तुम कि ब्रह्म की कोई उपाधि नहीं हो सकती, गुण नहीं हो सकता, नाम नहीं हो सकती, छवि-छाया नहीं हो सकती, रंग नहीं हो सकता, जाति नहीं हो सकती, कुछ नहीं हो सकता लेकिन फिर भी ब्रह्म का भाँति-भाँति से क्यों निरूपण किया गया है। कभी ऐसे कह कर के, कभी वैसे कह कर के ब्रह्म को क्यों इंगित किया गया है, क्यों किया गया है? तुम्हारी सहायता के लिए किया गया है। जो कह रहे थे उनको भी पता था कि ब्रह्म के बारे में कुछ भी बोलना तात्विक दृष्टि से ठीक नहीं है। बात थोड़ी सी भ्रष्ट हो जाती है जब हम नाम दे देते हैं उसको जो किसी भी नाम की सीमा में आ ही नहीं सकता। यह जानते हुए भी वे खतरा उठाते रहे और कुछ-न-कुछ बोलते ज़रुर रहे सत्य के बारे में। क्यों बोलते रहे? तुम्हारी मदद के लिए बोलते रहे। कैसे है इसमें हमारी मदद? ऐसे है कि जो-जो कुछ कहा गया है ब्रह्म के बारे में वह उठा लो और देख लो कि तुम्हारे सामने चुनाव के लिए जो विकल्प हैं उनमें से किस विकल्प पर वह सबकुछ लागू हो रहा है या फिर वह सारे लक्षण, वह सारे वृतांत किस विकल्प के ज़्यादा निकट पता चलते है। जिस विकल्प के ज़्यादा निकट पता चलते हो उसी को चुन लो।

ब्रह्म को किन-किन उपाधियों से इंगित किया गया है, विभूषित किया गया है, कहो! जैसे? अनिकेत, अनिकेत कह दिया वहीं से शुरुआत कर लो। तो तुम्हारे सामने दो विकल्प आ रहें है; एक विकल्प ऐसा है जो तुमको इस धरती पर ही किसी पार्थिव वस्तु से, व्यक्ति से बाँध देना चाहता है, घरौंदा बना देना चाहता है तुम्हारा। और दूसरा विकल्प है जो तुम्हें बाँध नहीं रहा, जो तुम्हें मुक्ति दे रहा है। तो तुम जान लो कि कौन-सा विकल्प तुम्हें ब्रह्म की ओर ले जाएगा और उपनिषद हमसे कह रहे हैं, "तुम्हारे लिए तो ब्रह्म ही श्रेष्ठ है।"

इसी तरीके से ब्रह्म को क्या और कहा गया है? अज्ञेय। कौन सा विकल्प ऐसा है जो तुम्हारे पास तुम्हारे पूर्व-संचित ज्ञान के कारण आ रहा है या तुम्हारे पूर्व-संचित अनुभवों के कारण ही आकर्षक लग रहा है? जो विकल्प तुम्हें तुम्हारे पुराने स्मृति-बद्ध ज्ञान के कारण ही आकर्षक लग रहा हो और वह ज्ञान सिर्फ तुम्हें समाज से, शिक्षा से नहीं मिला है, वह ज्ञान तुम्हारे शरीर में भी बैठा हुआ है, जो तुम्हारी जैविक पूरी संस्कारिता है उसके रूप में। तो जो कुछ भी तुम्हें शारीरिक या सामाजिक कारणों से आकर्षक लग रहा हो वह ब्रह्म जैसा नहीं है। ब्रह्म तो है अज्ञेय और कोई विकल्प है जो तुम्हें इसलिए बुला रहा है क्योंकि उसके बारे में जो तुम्हारा अनुभव है या स्मृति है या कल्पना है वह बड़ी रोमांचक और आकर्षक पता चल रही है, तो जान जाओ कि यह रास्ता ब्रह्म का नहीं है।

हम अभी चर्चा कर रहे हैं कि ब्रह्म को आधार बनाकर के जीवन में निर्णय और चुनाव कैसे करने हैं। ऋषि हमसे कह रहे हैं अगर चाहते हो कि जीवन में तुम्हारे सब निर्णय सही बैठें तो आधार, क्राइटेरिया किसको रखो? ब्रह्म को रखो। बस पूछ लिया करो, "यह अभी तीन-चार सामने विकल्प रखे हुए हैं इसमे से ब्रह्म जैसा कौन सा है?" ब्रह्म के लिए ऐसे ही नाम है; मुक्त। देख लो कौनसा विकल्प ऐसा है जो तुम्हारे बन्धनों से तुमको दूर ले जाएगा; कौनसा विकल्प ऐसा है जो तुम्हारे ऊपर नई बेड़ियाँ बनकर चढ़ जाएगा। जैसे ही दिखाई दे कि अभी एक ऐसा विकल्प बुला रहा है जो जीवन में नई बेड़ियाँ ही लाने वाला है हर तरीके से - मानसिक, आर्थिक, शारीरिक, समझ जाओ कि यह तो ब्रह्म वाला रास्ता नहीं है और ऋषि महाराज बोल गए थे कि, "तुम्हारे लिए तो बच्चा, ब्रह्म ही श्रेष्ठ है", तो तुरंत अस्वीकार कर दो उसको जो श्रेष्ठ नहीं है।

ऐसे ही ब्रह्म को निरालंब कहते हैं, वैसे ही ब्रह्म को निर्गुण कहते हैं। निर्गुण माने - जो प्रकृति से आगे का हो, सब गुण प्रकृति में होते हैं। तो जो कोई तुम्हें इसलिए आकर्षित कर रहा हो, जो विकल्प तुम्हें मूल्यवान लग ही इसीलिए रहा हो क्योंकि उसमें एक प्राकृतिक कर्षण है, एक प्रकृतिक कशिश है, तुरंत सावधान हो जाओ, वह रास्ता ब्रह्म का नहीं है। ब्रह्म क्या है? निर्गुण, और वह जो रास्ता है जो तुम्हें आमंत्रित कर रहा है उसमें प्रकृति का कोई-न-कोई गुण है, वह प्रकृति का रास्ता है। प्रकृति माने माया, वहाँ माया नाच रही है, तुमको खींच रही है। ब्रह्म निर्गुण है, तुम बढ़ उसकी ओर रहे हो जिसके पास गुण ही गुण है।

और यहाँ जब हम गुण की बात कर रहे हैं तो गुण से हमारा वही आशय नहीं है जो हिन्दी भाषा में होता है। हिन्दी भाषा में गुण का बड़ा शुभ अर्थ होता है। जब किसी में कुछ बहुत लाभप्रद या शुभ प्रवृत्तियाँ होती हैं तो उसको हम कहते हैं कि यह व्यक्ति गुणी है। अध्यात्म में गुणी होना कोई अच्छी बात नहीं होती। अध्यात्म में अगर तुम गुणी हो तो इसका मतलब है कि तुम प्रकृति के क्षेत्र में बंधक हो। सब गुण तो वहीं पाए जाते हैं, तो इसीलिए अध्यात्म में गुणों का अतिक्रमण करना होता है, गुणों से आगे जाना होता है। संसार में और आम सांसरिक भाषा में गुणी बनना होता है, अध्यात्म में गुणों से आगे जाना होता है। अध्यात्म में अगर कोई गुण है जो थोड़ा सा उचित या श्रेष्ठ माना भी जाता है तो वह सतोगुण है। तो देख लो यह कि कहीं ऐसा तो नहीं कि मात्र तुम्हारी जो प्रकृतिक वृत्तियाँ हैं और जो तुम्हारे मानसिक सब विकार हैं उन्हीं के कारण कोई रास्ता तुमको लाभप्रद जान पड़ रहा हो? छोड़ो उसको।

वैसे ही ब्रह्म निराधार, निरालंब है। उसको किसी दूसरे पर आश्रित होना स्वीकार ही नहीं। जिसके लिए कोई दूसरा है ही नहीं, वह दूसरे पर आश्रित क्या होगा? तुम देख लो कि तुम्हारे सामने जो जीवन विकल्प लेकर के आ रहा है उसमें से कोई रास्ता आश्रयता का तो नहीं है, निर्भर तो नहीं हो जाओगे किसी भी तरीके से। अगर कोई रास्ता ऐसा है जिसमें तुम निर्भर हुए जा रहे हो, तुम्हारी पहचान दूसरे से जुड़ रही है तो तुरंत समझ जाओ कि मामला गड़बड़ है।

और जब बात आती है दूसरे से अपनी पहचान जोड़ लेने की तो याद रख लेना चाहिए कि ब्रह्म का नाम अद्वैत भी है। ब्रह्म या ब्रहमिय अवस्था को कैवलीय अवस्था भी बोलते हैं। मतलब होता है कोई दूसरा है ही नहीं। किस दूसरे की याद करें? कौनसा दूसरा हमारे नाम के साथ अपना नाम जोड़ गया? किस दूसरे के साथ हमने अपनी पहचान जोड़ ली?

जहाँ कहीं भी पाओ कि जो रास्ता तुम चुन रहे हो वह रास्ता तुमको और-और आश्रित बना देगा, बचो। और अगर कोई ऐसा रास्ता है जिसपर चल करके तुम्हारे बंधन टूटेंगे, तुम्हारी निर्भरताएँ शनै-शनै कम होती जाएँगी, तुम स्वावलंबी होते जाओगे, तुम निरालंबी होते जाओगे उस रास्ते पर आगे बढ़ जाओ।

यह है मतलब ब्रह्म का चुनाव करने का, ब्रह्म को श्रेष्ठ जानने का। चाहो तो इसी युक्ति से ब्रह्म की जो अन्य उपाधियाँ हैं उनका प्रयोग करके भी तुम चुनाव कर सकते हो।

करना है प्रयोग? एक-दो और उपाधियाँ बताओ। असंग है वह। क्या है? असंग है। माने दो रास्ते हों, एक रास्ता ऐसा हो जिसमें जिसकी संगति कर रहे हो वह आवश्यक कर दे तुम्हारे लिए लगातार उसकी संगति, तो बच जाना, भाग लेना। और एक दूसरा रास्ता है, जिसमें जिसकी संगति कर रहे हो वह तुम्हारे भीतर की उस कमज़ोरी को ही खत्म कर दे जिसके कारण तुम संगति के लिए लालायित रहते हो, ऐसे की संगति कर लेना। दोनों ही रास्ते संगति के हैं पर एक रास्ता तुमको संगति-रूपी परनिर्भरता में और गहरे गाड़ देता है और दूसरी संगति ऐसी है जो धीरे-धीरे तुम्हारे लिए अनावश्यक बना देती है किसी दूसरे की संगति करने को, वह तुमको आंतरिक रूप से ही परिपूर्ण, स्वस्थ, आत्मनिर्भर बना देती है। यह संगति तुम्हारे लिए उचित है पर यह याद सिर्फ तब रहेगा जब तुम्हें यह स्मरण रहे कि तुम्हारे चुनावों का आधार यह नहीं हो सकता कि तुमको क्या पसंद है क्या नापसंद है, क्या तुमको प्रिय लग रहा है। तुम्हारे चुनावों का आधार ब्रह्म को होना चाहिए।

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