
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, दंडवत प्रणाम। मैं 2020 से आपको सुन रहा हूँ। आज पहली बार आपके सेशन में आया हूँ। मैं नाम जप के बारे में आपसे जानना चाहता हूँ। बहुत से हम यूट्यूब पर ऐसे संतों को सुनते हैं, जो यह बात कहते हैं कि हमारे हेडेक था, लीवर या किडनी फेल, हम सुनते हैं, हम उनको मानते हैं। हम उनसे सुनते हैं कि 20 साल अगर डॉक्टर ने कह दिया था, दो साल हम जीवित रहेंगे, बट 20 साल हम जीवित हैं। एंड वो संसार में अच्छी शिक्षा भी देते हैं। अल्कोहल, नो मीटिंग, नो गैंबलिंग, ऑल दोज़। वो कुछ पैसे भी नहीं लेते हैं। सो एक उस डायरेक्शन में भी ट्रस्ट बिल्ड होता है कि नाम जप से या सिमिलर सुपरस्टिशन अगर ये है, तो इस पर आपकी क्लेरिटी चाहता हूँ, आचार्य जी, कि क्या है ये?
आचार्य प्रशांत: आप 2020 से सुन रहे हो। आप गीता सत्रों में हो?
प्रश्नकर्ता: नहीं, आचार्य जी।
आचार्य प्रशांत: तो बस यही है जवाब। हमारी गीता कम्युनिटी में से कोई नहीं होगा, जो ऐसे फंसेगा। वो कम्युनिटी नहीं है, वो इंश्योरेंस है, वो आर्मर है। वो बहुत तरह की मूर्खताओं से आपको बहुत बचा के बहुत आपका फायदा करवा देती है, नुकसान बचा देती है। नहीं तो लूटोगे।
देखो, समझो। बाक़ी मैं नहीं बोलूँगा कि कौन पैसा लेता है, कौन नहीं लेता है। एक लंबी-चौड़ी अगर व्यवस्था चल रही है, तो इतना भी दिमाग नहीं लगाया कि बिना पैसे के नहीं चल रही होगी। एक बहुत भारी व्यवस्था अगर आप कहीं चलते देखो, तो सोचते भी नहीं हो कि इसके पीछे क्या है। खैर, वो चलो अलग बात। जो इसमें जो टेक्निकल मुद्दा है, मैं उस पर आता हूँ।
मन में लगातार क्या भरा रहता है?
श्रोता: कामना।
आचार्य प्रशांत: कामना हमेशा किसी विषय की होती है। मन में लगातार क्या भरी हुई है? तो यानी मन की परिभाषा ही क्या है? गीता कम्युनिटी वाले बताएँ। बिल्कुल ठीक है। भंडारगृह है वह अहंकार का। अहंकार अपने सारे विषय जहाँ इकट्ठा करके रखता है, उसको बोलते हैं मन। तो माने, मन में यह विषय, यह विषय, यह विषय, यह विषय, यही होता है न? आप बोलोगे, मन में कामना है। कामना का भी पहले विषय होगा। मुझे वो विषय चाहिए, वो चीज़, वो ऑब्जेक्ट चाहिए। आप कहोगे, मन में डर है, डर का भी विषय होगा; मुझे उस विषय से डर लगता है।
तो मन में लगातार क्या भरे हुए हैं? यहाँ तक सब समझ रहे हो? मन में लगातार क्या भरे हैं?
श्रोता: विषय।
आचार्य प्रशांत: और सब विषयों के क्या होते हैं? नाम। मन विषयों से बोझिल रहता है। इसी को ऐसे भी कह सकते हैं कि मन नामों तले दबा रहता है। आप जब भी परेशान हो, आपकी परेशानी का कुछ नाम होता है कि नहीं होता है? होता है कि नहीं होता है? कभी ऐसा हुआ है कि बिना नाम की परेशानी है? कभी ऐसा हुआ है कि बिना नाम की कामना है? बोलो जल्दी। तो नाम जो है न वो मन का बोझ होते हैं। तो फिर जिन्होंने मनोविज्ञान समझा, उन्होंने एक तरीका निकाला। उन्होंने कहा, इन नामों को हटाना ज़रूरी है, क्योंकि विषय आता ही है। अब कुर्सी है अगर मन में, तो कुर्सी ख़ुद उठ के तो यहाँ (मन) नहीं आ सकती ना। तो कुर्सी यहाँ क्या बनकर बैठती है? नाम।
पैसा है अगर मन में, तो पैसा नोट ख़ुद तो नहीं आ सकते। वो कुछ बनकर बैठता है। कोई व्यक्ति है, जिसकी आपको बहुत लालसा है। वो व्यक्ति तो आप उठाकर यहाँ नहीं बैठा लोगे। तो यहाँ भीतर लगातार क्या रहता है? उसका नाम। तो नाम ही बोझ है। तो एक विधि यह निकाली गई कि क्यों न इन नामों को किसी तरीके से हटाया जाए, क्यों न इन नामों को किसी तरीके से हटाया जाए। कैसे हटाया जाए? कैसे हटाया जाए? क्योंकि सब नाम तो किसी न किसी विषय की ओर इशारा करते हैं और विषय जो है, वो अहंकार की जान होता है। वो उसी विषय की कामना में तो मरा जा रहा है।
अहंकार बिना किसी सहारे के रह नहीं सकता। माने, अहंकार बिना नाम के रह नहीं सकता। जैसे डेटाबेस में आप प्राइमरी की और ये सब आप कितने लोग जानते हैं, डेटाबेस? तो प्राइमरी की माने, जिससे किसी भी डेटा सेट को पहचाना जाता है सबसे पहले। ठीक है? मोटे तौर पर। तो वैसे ही किसी विषय को आप पहचानते कैसे हो? उसके नाम से। ठीक है? और विषय के साथ आमतौर पर यह होता है कि यह रहा अहंकार, यह रहा नाम और उस नाम के पीछे क्या है? विषय। नाम पॉइंटर है। किसकी ओर? नाम एक पॉइंटर है विषय की ओर।
तो नाम को रख कर के अहंकार किसको रख लेता है? क्योंकि विषय तो बाहर है, विषय को उठाकर तो रख नहीं सकता। तो विषय के नाम को रख लेता है और नाम पॉइंट करता है विषय की ओर। तो नाम हटा दें, तो मौज आ जाएगी, हल्का हो जाएगा मन। लेकिन बिना नाम के अहंकार रह नहीं सकता। क्या बोलता है वो? मैं अधूरा हूँ, मैं अकेला हूँ, सूनापन आ जाएगा। अरे, मैं क्या करूँ? मैं बहुत लोनली हूँ, कोई नाम तो चाहिए पकड़ने के लिए, सहारे के लिए।
तो जिन्होंने मन को समझा, उन्होंने कहा, फिर एक काम करते हैं। कोई ऐसा नाम लेकर आओ, जो नाम तो हो, पर पॉइंटर न हो। कोई ऐसा नाम लेकर आओ, जो किसी भी विषय की ओर इशारा न करता हो। जो नाम तो हो पर किसी का नाम न हो। जो नाम तो हो पर किसी का नाम न हो, माने, नाम है पर उस नाम के पीछे कोई विषय नहीं है। कोई ऐसा नाम ले आओ। और उस नाम को ज़िंदगी में सबसे ज़्यादा इज्जत, सम्मान, प्रेम दे दो। उसको बिल्कुल मन में सबसे ऊपर, एकदम केंद्र पर बैठा दो। अहंकार की सारी ऊर्जा उस एक नाम को दे दो। तो क्या होगा? अहंकार के पास बाकी नामों को देने के लिए ऊर्जा…। माने जो बाक़ी नाम हैं, वह क्राउड आउट हो जाएँगे। वो एक नाम आकर के बाक़ी सब नामों को हटा देगा।
लेकिन एक शर्त है, वो नाम बाक़ी नामों जैसा…।
बाक़ी नाम क्या होते हैं? पॉइंटर्स होते हैं किसी विषय की ओर। तुम्हारे पास जो नाम होना चाहिए, जो खास नाम, वह ऐसा होना चाहिए जो किसी विषय की ओर इशारा न करे। और ऐसे नाम को अगर तुम जप सकते हो, सुमिरन कर सकते हो, अगर ऐसे नाम हमको तुम अपनी ज़िंदगी बना सकते हो, एक कबीरा नाम अरे जाके नाम आधार, उसको राम आधार भी बोलते हैं, नाम आधार जैसे भी, तो फिर बहुत एक गजब घटना घट जाएगी, मन हल्का हो जाएगा। अहंकार के विषय हट गए, तो अहंकार तर गया। आत्मस्त हो गया, आनंद मिल गया।
लेकिन नाम विशिष्ट होना चाहिए, नाम विशिष्ट होना चाहिए। वो किसी विषय की ओर इशारा न करे। उसके पीछे कोई छवि नहीं हो सकती, उसके पीछे कोई किस्सा-कहानी नहीं हो सकता। तब तो नाम जप सफ़ल होगा। लेकिन यदि आपने नाम ऐसा पकड़ा है जिसके साथ छवि, चेहरा, किस्सा, कहानी जुड़े हुए हैं, तो यह आपने सब गुड़गोबर कर लिया। आपने नामों की भीड़ में एक नाम और जोड़ लिया। और आप जो यह नाम लेकर आए हो, यह अलग नहीं है, यह विशिष्ट नहीं है। यह बिल्कुल उन्हीं नामों जैसा है, जैसे आपके बाक़ी के नाम हैं।
क्योंकि आप जो अब नाम लेकर आए हो, यह नाम भी किसी कहानी की ओर इशारा कर रहा है और वो कहानी किसने रची? आपने। तो माने, आप जब उस नाम को याद कर रहे हो, तो ले-देकर किसको याद कर रहे हो? ख़ुद को। तो इससे तो अहंकार और दृढ़ हो जाएगा न।
तो नाम जप अपने आप में बड़ी सुंदर और बड़ी उपयोगी विधि हो सकती है। लेकिन उस नाम के साथ कोई छवि, कोई चेहरा, कोई कहानी नहीं होनी चाहिए।
समझ रहे हो बात को?
आप आदि ग्रंथ में जाएँगे, तो वहाँ पर सिख गुरुओं ने बार-बार नाम जपने को कहा है। पर जिसका नाम जपने को कहा है, वो निर्गुण है, उसका चेहरा नहीं है, उसके किस्से नहीं हैं। उसका रूप, रंग, सौंदर्य, छवि इत्यादि नहीं है, तब जाकर के वो नाम मन को हल्का कर पाएगा। क्योंकि अब यह जो नाम है, यह आयामगत रूप से श्रेष्ठ है। अब यह नाम आपके काम आएगा। लेकिन आप यूँ ही कोई नाम ले आए। नाम तो हम सब जपते ही रहते हैं साधारणतः भी, सेठ जी लगातार जप नहीं रहे हैं क्या? रोकड़ा, रुकड़ा, रोकड़ा, रुकड़ा, रोकड़ा, रुकड़ा, रोकड़ा, रुकड़ा, रोकड़ा, रुकड़ा, रोकड़ा। जप तो रहे हैं, तो सभी जपते रहते हैं, लेकिन तुम वही जप रहे हो जो तुम्हारी कामना का विषय है।
और आप एक और नाम ऐसा ले आए, जिसके साथ आपने कामना की कहानियाँ जोड़ रखी हैं। तो उससे लाभ नहीं होने वाला। जपते तो सभी हैं, सभी जितने हैं सभी बैठे हुए हैं। कौन नहीं जप रहा? बोलो। जिसको जो वस्तु चाहिए, जिसकी जो कामना की वस्तु है, वो उसको लगातार जप ही रहा है। तो आपके पास एक विशिष्ट नाम हो, तब तो लाभ हो जाएगा। ऐसा नाम कि जिसके साथ आप अपनी कोई कहानी जोड़ न पाओ।
आप अगर कहोगे, मेरे पास एक नाम है। उस नाम का एक चेहरा है, और तो वह चेहरा किसकी पसंद का होगा? आपकी। तो लो, आप तो अपनी ही पसंद को जप रहे हो। और आपका दुख यही है कि आप अपने जैसे हो और आप अपनी ही पसंद को जप रहे हो। तो माने, आप अपने ही दुख को फिर जप रहे हो, तो फंस गए। तो गड़बड़ हो गई।
तो नाम जप में जो भी लोग हैं, उन्होंने अच्छा तरीका चुना है पर जो उसमें मूल सावधानी है, उसका ख़्याल रखें, नहीं तो बहुत फंसेंगे। मन बहुत कल्पनाशील होता है, वो किसी भी शब्द को लेकर उसके साथ मनचाही छवियाँ, रंग, रूप और कहानियाँ जोड़ देता है। और उन सब कहानियों में कौन बैठा हुआ है? स्वयं अहंकार।
प्रश्नकर्ता: पर कोई भी नाम अगर हम ले रहे हैं, तो नाम में तो ऑलरेडी एक इमेज छुपा है उसको।
आचार्य प्रशांत: यही सावधानी रखनी है कि आप जो नाम ले रहे हो, उसमें इमेज न हो। ओम में, प्रणव में क्या इमेज है?
प्रश्नकर्ता: लोग एक सिंबल इमेजिन कर लेते।
आचार्य प्रशांत: अगर इमेजिन कर रहे हैं, तो फंस गए। अगर इमेजिन कर रहे हैं, तो यह नाम का अपमान हो गया। आप ओम मंत्र को जप रहे हो और साथ में आप कुछ इमेजिन भी कर रहे हो, तो फिर तो आप अपनी इमेजिनेशन को ही जप रहे हो ना। यह तो आपने मंत्र का अपमान कर दिया।
प्रश्नकर्ता: तो पॉसिबल कैसे है फिर नाम जपना विदाउट?
आचार्य प्रशांत: हाँ तो यही तो उसकी साधना है, यही तो ध्यान है कि नाम हो पर उस नाम के साथ कोई छवि या चेहरा या कहानी ना हो। यही तो साधना है, नहीं तो फिर तो बहुत सस्ती चीज़ हो गई कि नाम लिया और बोले जा रहे। ऐसे थोड़ी हो जाएगा। इतना सस्ता थोड़ी है खेल।
प्रश्नकर्ता: तो नाम जपना भी एक तरह से एक सिंबल है किसी और चीज़। मतलब आपको नाम नहीं…।
आचार्य प्रशांत: किसी और चीज़ का नहीं। वो नहीं होने दूँगा, जो साधारणतः मेरे साथ हुआ है। एक तरह का विद्रोह है नाम जप। आज तक मैंने जितने भी नाम याद रखे, वो सब साधारण सीमित विषयों के थे। यही हुआ है न हमारे साथ? नाम तो हमें न जाने कितने याद हैं हमें, लेकिन जितने भी नाम याद हैं, वह सब साधारण सीमित विषयों के हैं जिनके साथ हमारा कामना का रिश्ता है। नाम जप कहता है, एक विद्रोह चाहिए, एक ऐसा नाम चाहिए जो मुझसे बहुत आगे का हो। अहंकार जो मैं बना बैठा हूँ, वो मेरी पहुँच से दूर का हो। मैं गंदा हूँ, वो साफ़ हो। वो मेरी कल्पना से बाहर का हो, मैं उसके बारे में कुछ बोल न पाऊँ। ऐसा नाम चाहिए।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जब हम कह रहे हैं कि कोई ऐसा नाम हम जपें जो मुझसे परे हो, तब भी तो हमारे में एक अहंकार है कि हम कुछ ऐसा ढूँढ रहे हैं।
आचार्य प्रशांत: बिल्कुल ठीक, बिल्कुल सही। और इस विशिष्ट कामना को बोलते हैं मुमुक्षा। क्योंकि यह कामना पाने की नहीं, नकारने की है। मुझे कुछ ऐसा चाहिए, जो बिल्कुल मेरे जैसा न हो। मुझे कुछ ऐसा नहीं चाहिए जो मैंने चाहा है, मुझे कुछ ऐसा चाहिए जो मेरी चाहत से बहुत आगे का हो। मैं जिसकी कल्पना भी ना कर सकता हूँ, मुझे मेरे जैसा होना ही नहीं है। आपने बिल्कुल ठीक कहा, यह भी एक कामना ही है। यह आखिरी कामना होती है। यह मुमुक्षा है, मुमुक्षा; मुझे मोक्ष चाहिए। मुझे मेरे जैसा नहीं रहना है, हे राम, मुझे मुझसे बचा। ये ये कामना है।
अभी आप पहले गीता सत्रों में आइए।
प्रश्नकर्ता: तो मैंने एक्चुअली बचपन से पापा पाँच साल से गुजरने के बाद, मैंने जिस जैसे मैं ब्राह्मण के फैमिली में हूँ, बहुत ऐसे प्रथा चलती है ब्राह्मण लोग के घर में, तो बहुत सारे रेस्ट्रिक्शन जैसे पीरियड्स को लेके और लड़की होने के नाते मैं बहुत अत्याचार भी सहे हैं। मेरे साथ बहुत गलत व्यवहार भी घर में सब लोग किए।
तो मैं भी अच्छे स्टूडेंट नहीं थी, तो और स्कूल भी नहीं गई थी फाइव ईयर तक। उसके बाद थोड़ा हमारे घर में रिच फैमिली है, सब इंजीनियर, डॉक्टर हैं, तो मेरे को इंटरेस्ट नहीं था कि पढ़ने में, बेसिकली साइंस पढ़ने में। और मैं फिजिकल हैंडीकैप्ड भी हूँ। तो उसके बाद मेरे को अच्छी हस्बैंड के लिए, तो मेरे को ऐसे टेंथ के बाद इंजीनियरिंग पढ़ा दिया गया है। और वहाँ पर भी अकेला मैं रहती थी, तो बहुत सारे ऐसे रेस्ट्रिक्शन था घर में, जो मैं सुसाइड करने के लिए भी सोचती थी।
तो इसी चक्कर में बहुत मैंने पूजा करती थी, ऐसे बहुत मन से करती थी और जैसे झाड़-फुंक होती थी, ऐसे सब नौटंकीबाज मैं करती थी। और एक के लिए कि मैं मेरा मम्मी को सेटिस्फाई करूँगी, वो खुश हो जाएँगे। और इसके नाते फिर से 15 ईयर के बाद मैंने बाबा जी के चक्कर में दीक्षा ले लिए। और जो बाबा जी बोलते थे कि वो ख़ुद थर्ड स्टैंडर्ड पढ़े हुए हैं। तो जो उस टाइम में मैं इंजीनियरिंग पढ़ती थी। तो उस टाइम में मैंने जप, ध्यान वो सब करने लगी।
और मेरा वही इच्छा था कि मेरे को शांति मिले। मेरे अच्छा नहीं लग रहा है ये संसार, जबकि मेरा उम्र था 17 साल और मेरा लड़का लोग से बात करने की भी इच्छा होता था उसी उम्र में। बट बाबा जी ने बोले थे, लड़का से बात नहीं करना, मतलब शांत रहना। मेरे पास लैपटॉप थे, फिर भी मैंने एक भी फिल्म नहीं देखा था। तो ऐसे बहुत से रेस्ट्रिक्शन है। जैसे आपने हर सत्र में जो जो बोल रहे हैं, आज भी जो जो बोले, मेरा लाइफ़ में वो था। तो सुबह से 3:00 बजे तक, रात को मैं 9:00 बजे ही सो जाती थी, क्योंकि बाबा जी का जो रूल्स था। और हर दिन क्या-क्या, क्या-क्या नहीं करना, मैं रट्टा मारती थी। और इसके लिए क्या-क्या नहीं किया, क्या-क्या फाइनेंशियल भी नहीं खर्च किए, क्योंकि मैं एक रेफरेंस में भी जॉब किए थे।
तो उसके बाद बाबा जी ने बोले थे कि तुम शादी कर जाओगे, तो तुमको साक्षात्कार हो जाएगा। क्योंकि मैं बहुत साक्षात्कार के लिए बहुत तड़प थी। क्योंकि साक्षात्कार के बाद भी मेरे को पता नहीं था। बट बाबा जी ने बोले थे, तुमको शांति मिल जाएगा।
इस चक्कर में बहुत सारे पूजा-पाठ में मैं बहुत इनवॉल्व हो गई। ऐसे कि मैंने लड़का लोग से बात करना भी बंद कर दिया था और सारे जो भी फिल्म नहीं देखना है, पढ़ाई नहीं करना है। ऐसे छुप-छुप के भी मैंने B.Tech जो करती थी, तो वो सब नष्ट कर दी थी, मेरा पढ़ाई। और सन्यासी होने के लिए मैं तैयार कर रही थी।
मेरा सवाल ये है, तो मैं जो अभी चेंज कर रही हूँ मेरा लाइफ़, जैसे मैंने अभी M.Tech तो कर चुकी हूँ, बट कुछ भी मेरे को पता नहीं। ऐसे बहुत सारे जैसे स्पोर्ट्स में इनवॉल्व किए, सब लोग देख रहे हैं। तो उसी चीज़ को मैं स्कूल, स्कूल में जाके संस्कार देती थी लड़की लोग को कि तुम ये नहीं करना, वो नहीं करना, जो मैं करती थी। अभी मैं उसी लड़की लोग को जाके बोलती हूँ। तो वो बोलते हैं कि तुम तो एक बाबा जी को छोड़ के दूसरे बाबा जी को, एक भगवान को छोड़ के दूसरे बाबा जी को फॉलो कर रहे हो। हम आपकी बात कैसे मानेंगे?
तो मेरे को इतने साल, एक-एक साल से मैं गीता से जुड़ी हुई हूँ। तो मेरे को इतने साल लगे उसी माइंड में हटाने के लिए अंधविश्वास को। तो उन लोगों को मैं कैसे समझाऊँ?
आचार्य प्रशांत: अभी किसी को कुछ ज़्यादा मत समझाइए। अभी अगर सत्र में एक साल हुआ है, थोड़ा समय और निकालिए, इतनी लंबी आपकी कहानी है, थोड़ा और अपने आप को समय दीजिए।
बाबा जी। छोड़ दीजिए, बेचारे बाबा जी। क्या वो तो, क्या करेंगे बाबा जी, क्यों इतना हम उनको? बाबा जी आपको जो कुछ बोलते रहे वो न बोले, तो आप जाओगे उनके पास। बाबा जी की भी तो मजबूरी समझो न। बाबा जी उतने मूर्ख होते नहीं है, जितने वो लगते हैं। पर अगर कोई उनसे हम ढंग की बात करें, बाबा जी अगर हमसे कोई ढंग की बात करें, तो बाबा जी के पास कोई जाएगा क्या? है न? तो बाबा जी को भी वही बातें करनी पड़ती है, जो हम चाह रहे हैं उनसे। छोड़ो उनको, बाबा जी को।