कम बारिश, ज़्यादा गर्मी - इस अकाल का जिम्मेदार कौन?

Acharya Prashant

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कम बारिश, ज़्यादा गर्मी - इस अकाल का जिम्मेदार कौन?
जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि चेतना का संकट है। अंधाधुंध उपभोग, अनियंत्रित विकास, जनसंख्या वृद्धि और भविष्य के भ्रम ने पृथ्वी के सीमित संसाधनों पर असहनीय दबाव डाल दिया है। समाधान डर फैलाने या आदेश देने में नहीं, बल्कि स्पष्टता, जागरूकता और सही समझ में है। जब मनुष्य होश में जीना सीखता है, तभी उपभोग, विकास और जीवन के निर्णय प्रकृति के साथ संतुलित हो पाते हैं। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा सवाल जो है, लगभग 80–100 करोड़ भारतीय लोगों के बारे में है। ये लोग ऐसे हैं, जिनकी सालाना आय, महीने की आय पच्चीस, बीस हज़ार से ज़्यादा नहीं होगी। और ये लोग ऐसे हैं, क्लाइमेट चेंज के ऊपर या तो ये नज़रअंदाज़ करते हैं, या तो इनके बारे में पता नहीं है। हम थोड़ा-बहुत जानते हैं, सॉल्यूशन जो है, वो आध्यात्मिक ही है। बट हमारे पास इतना समय नहीं है। तो तत्काल में, एट लीस्ट कम-से-कम चार-पाँच सालों में, इन 80 से 100 करोड़ लोगों को क्या ऐसा करना चाहिए कि इनके सबके सारे लाइबिलिटीज़ कम करें? लेकिन इनको कैसे, इनको पता चले? चाहे वो बच्चा पैदा करना हो, चाहे लोन लेना हो, कुछ भी हो, ये सब चीज़ें वो ना कैसे करें?

आचार्य प्रशांत: क्या माँग रहे हैं मुझसे ये? कर्म बता दो, कर्म। लिस्ट बता दो कर्म की इन्हें क्या करना चाहिए।

प्रश्नकर्ता: सर टाइम नहीं है न, सर।

आचार्य प्रशांत: “जल्दी वो काम है जहाँ बता दो क्या हो जाएगा। और समझने में तो पंद्रह बीस साल लग जाते हैं कि ये चारमीनार नहीं है।” चारमीनार गिराना तत्क्षण हो सकता है, कर्म बता दो। समझने में तो बीस साल लगते हैं। समझने में बीस साल लगेंगे, ये चारमीनार नहीं है। पर ये चारमीनार है, और मैं अब आया हूँ गिराने के लिए, और बीस साल भी लगेंगे तो चलेगा।

अच्छा, ये बाल इतने जो लंबे हैं, बढ़ाने में कितना समय लगा? बताओ, बताओ।

प्रश्नकर्ता: एक साल।

आचार्य प्रशांत: एक साल। कैंची किसके पास है? नेति-नेति में कम समय लगता है, जल्दी बताओ, या कर्म में? बताओ।

श्रोता: नेति-नेति।

आचार्य प्रशांत: नेति-नेति में कम समय लगता है, या कर्म में? साल भर लगाए हैं बढ़ाने में, और नेति-नेति कितनी देर में हो जाएगी?

प्रश्नकर्ता: सर, मैं ऐसा समझ रहा था कि एट लीस्ट डर के वजह से लोग, एट लीस्ट आपके, लाइक, किसी का भी बात सुन के ये सब करना बंद कर दें।

आचार्य प्रशांत: अरे बाबा, डराने की कोई ज़रूरत नहीं है, यथार्थ पर्याप्त होता है। जो जी रहा है, जिस स्तर में, जिस वर्ग में, जिसकी तुम बात कर रहे हो, उसके लिए भविष्य बहुत बड़ी चीज़ होती है। उसकी हस्ती के केंद्र पर ही कौन बैठा हुआ है? भविष्य-मुखी अहंकार। उसको जीवन कुछ नहीं दे रहा होता है, वो जो कर रहा होता है कल के लिए कर रहा होता है। क्यों इतना घटिया तुम जॉब करते हो दिन भर अपने बच्चों के भविष्य की ख़ातिर? ठीक? तू क्यों सड़ी-पड़ी रहती है? तू क्या है? ये क्या बना रखा है तूने अपनी ज़िंदगी का? “दस साल बाद फूल खिलेंगे।”

तो बता दो न उन्हें कि क्या भविष्य है सामने। तुम क्यों बता रहे हो कि क्या करना है? तुम उनको बता दो कि क्या होना है। आप जिस राह पर चल रहे हो, देखिए साहब, यह राह चल रहे हो, यह आपने राह पकड़ रखी है इस पर आप चल रहे हो। हम सामने ऐसे है, धुंध, तो आपको दिख बस नहीं रहा है, राह कहाँ जा रही है। और ऐसे आगे-आगे मोड़ हैं, तो आपको पता नहीं चलता राह कहाँ जा रही है।

मैं आपको कोई राह दिखाने नहीं आया, मैं आपको आपकी राह से रोकने भी नहीं आया। मैं नहीं कह रहा हूँ कि मुड़ जाओ, मैं नहीं कह रहा हूँ, झुक जाओ। मैं आपके सामने खड़ा हूँ, और मैं क्या कर रहा हूँ? धुंध हटा रहा हूँ। बस, तुम देख लो कि यही राह, यही तुम्हारे क़दमों के नीचे, कहाँ जा रही है देखो। जिन बच्चों के लिए तुम कहते हो, "ये सब कुछ कर रहे हो", ज़्यादा नहीं, दस ही साल बाद उनके लिए क्या है, ये देख लो। इसके बाद उन्हें क्या करना है, ये उनको देखने दो न, वो भी चैतन्य प्राणी हैं। सब अपने-अपने तल पर देख लेंगे, समझ लेंगे। तुम्हें किसी को निर्देशित करने की ज़रूरत नहीं रहेगी कर्म के तल पर। "अब तुम ऐसा करोगे, करोगे। तुम ऐसा करोगे, तुम ऐसा करोगे। आधे उधर जाओ, आधे उधर जाओ। बाक़ी पीछे आओ।" यह सब नहीं करना पड़ेगा।

क्लैरिटी में जो ताक़त होती है, उसको तुम मानना ही नहीं चाह रहे हो। तुम्हारे हिसाब से ताक़त डिसिप्लिन में होती है, ऑर्गेनाइज़्ड ऐक्शन में होती है, फ़ियर में होती है, अभी तुमने बोला। तुम्हें इन सब में ताक़त दिखती है, पर बोध में, स्पष्टता में ताक़त होती है, ये नहीं दिखाई देता।

प्रश्नकर्ता: सर, ये जो कंडीशनिंग जो है, डर की, वो दसों हज़ारों साल पुरानी...

आचार्य प्रशांत: अरे, उसे डरना होगा तो डर जाएगा। तुम उसको दिखा दो कि सामने क्या है। हो सकता है, जिस चीज़ से तुम सोच रहे हो, वो डर जाएगा, उसी चीज़ से वो जग भी जाए। वो उसका अपना मामला है। तुम्हें क्या पता? तुम क्यों उस पर छा जाना चाहते हो कि "तुझे डरा दूँगा"? तुम्हें क्यों डराना है उसको? तो तुम उसको दिखा दो न बस क्या होने वाला है।

क्या होने वाला है?

ये होने वाला है कि फसलें नहीं पैदा होने वाली हैं। मास माइग्रेशन होने वाला है। एग्रीकल्चर ही नहीं, एग्रो-रिलेटेड जितनी इंडस्ट्रीज़ हैं, ये सब तगड़ी मार खाने वाली हैं, और खा रही हैं, वो शुरू हो चुका है। क्लाइमेट क्राइसिस भविष्य में नहीं, अभी तक ही ट्रिलियंस ऑफ डॉलर्स का नुकसान कर चुकी है। मेडिकल एक्सपेंडिचर जबरदस्त तरीके से बढ़ने वाला है। कोई दिन ऐसा नहीं होगा, जिस दिन टेंपरेचर में एबनॉर्मल स्पाइक न हो।

और आप जिस आय-वर्ग से आते हो, समाज के जिस वर्ग से आते हो, आपको शायद एयर-कंडीशंड वर्कप्लेसेज़ उपलब्ध भी नहीं हैं। आप मैन्युफैक्चरिंग में काम कर रहे हो, आप कंस्ट्रक्शन साइट्स पर काम कर रहे हो। आप सड़क किनारे अपनी छोटी-सी दुकान या ठेला लगाकर बैठे हो। आप ऑटो चलाते हो, या कि आप फूड डिलीवरी बॉय हो। यू आर वल्नरेबल टू द वेदर। तुम अंदर क्लाइमेट कंट्रोल में नहीं बैठे हो। ये होने वाला है तुम्हारे साथ, ये रहा। तुम्हारा काम है बता देना। उसके बाद इतना भरोसा रखो कि इंसान है, तो ख़ुद भी कुछ सोच-समझ सकता है। तुम थोड़ी उसको बोलोगे कि अब तू बच्चा नहीं पैदा करेगा। समझ में आ रही है बात ये?

ज़ूनोटिक एपिडेमिक्स आने वाले हैं, क्योंकि ये जो वायरसेज़ होते हैं, ये इंसान के शरीर के बाहर सिर्फ़ केमिकल होते हैं। और उनमें से बहुत सारे सिर्फ़ इसलिए इनऐक्टिव हैं, क्योंकि उनको ऐक्टिवेट करने वाली जो थ्रेशहोल्ड एनर्जी है, वो नहीं मिल रही है। वह जिस क्षेत्र में हैं, उस क्षेत्र में जो क्लाइमेटिक कंडीशंस हैं, उसमें उनको एक तरह की ऐक्टिवेशन एनर्जी जो है, उतनी नहीं मिल रही है। उतना टेंपरेचर नहीं है। जैसे ही मिलेगी, तो ऐसे वायरस ऐक्टिव हो जाएँगे, जो हमारे इतिहास में कभी ऐक्टिव रहे ही नहीं। या कि थे कभी करोड़ों साल पहले, जब गर्मी बहुत थी। फिर उसके बाद से वो ठंडे पड़े हुए हैं, किसी चट्टान के नीचे दबे हुए हैं, पृथ्वी के नीचे दबे हुए हैं, बर्फ़ के नीचे दबे हुए हैं। और बर्फ़ आप पिघला रहे हो, जब बर्फ़ पिघल जाएगी, तो वो सब बाहर निकल आएँगे।

वो बर्फ़ के नीचे सिर्फ़ फ़िज़िकली नहीं दबे हुए थे, वायरस-रूपी केमिकल, टेंपरेचर के कारण भी दबे हुए थे। बाहर आते ही पहली बात तो अब उनके ऊपर जो फ़िज़िकल इंसुलेशन था, वह नहीं रहा। और दूसरी बात, अब उन्हें हीट से डायरेक्ट एक्सपोज़र मिल गया है, सन का रेडिएशन। अब वो छा जाएँगे। क्यों छा जाएँगे? क्योंकि, साहब, वो लाखों-करोड़ों सालों से वहाँ दबे हुए थे, इसका मतलब, किसी ह्यूमन बीइंग को उनका कोई एक्सपोज़र नहीं था। जब एक्सपोज़र नहीं था, तो कोई एंटीबॉडी भी नहीं थी। न सिर्फ़ इंसान के पास एंटीबॉडी नहीं, जानवरों के पास भी एंटीबॉडी नहीं थी। तो अब तुम इतनी आसानी से उनका एंटीडोट भी नहीं बना पाओगे। तुम इतनी आसानी से नहीं कह पाओगे कि "मैंने वैक्सीन बना ली, वैक्सीन बना ली।"

तुम्हारा काम है ये बात सामने रख देना। रखो उसके सामने, वो जाकर के दूसरे से बात करेगा। तुम पर कम यक़ीन करेगा, दूसरे से पूछेगा। ख़ुद खोजेगा, सर्च करेगा, अख़बार पढ़ेगा। बहुत सारी उसको मिसइन्फ़ॉर्मेशन भी मिलेगी। मिसइन्फ़ॉर्मेशन मिलेगी, तो उसको ये भी पता चलेगा कि देखो, ये किस तरह की हमारी दुनिया है कि जो सबसे बड़ा प्राणघातक संकट है, हम उसको भी गप्पबाज़ी बना रहे हैं। हम उसको भी डिनाई कर रहे हैं। क्लाइमेट क्राइसिस को होक्स बोल रहे हैं क्लाइमेट डिनायलिज़्म अपने आप में एक इंडस्ट्री है पूरी।

किसी भी समस्या का समाधान अंधविश्वास फैलाना नहीं होता, डर फैलाना नहीं होता। अंधविश्वास, डर, ये सब तो समस्या के कारक होते हैं। समस्या कोई भी हो, उसका समाधान तो क्लैरिटी है, स्पष्टता है। उस क्लैरिटी के कारण आपको एक भयानक भविष्य दिखाई दे, ठीक है। ऐसा डर शुभ है फिर। पर वो डर भी आना चाहिए किससे? क्लैरिटी से।

प्रश्नकर्ता: एक्चुअली, मुझे ये सवाल क्यों आया कि मैं एक फ़िल्म देख रहा था, जहाँ पर विलेन था, हीरो था। हीरो, विलेन के सामने कुछ कर देता है, और फिर हीरो सीधा विलेन को गोली मार देता है। तू सस्पेंस में मर। तो बहुत सारे लोगों के साथ ऐसा होने वाला है। तो इससे मेरा सवाल आया?

आचार्य प्रशांत: क्या कहते हो आप लोग? क्या देखते हो? चलिए, आगे बढ़िए।

जिनके पास थोड़ी भी सोचने की क्षमता होगी, वो ख़ुद ही बहुत आगे तक सोच ले जाएँगे। एक आदमी का घर नहीं रहता, उसे किसी दूसरे घर में भी जगह नहीं मिलती आसानी से। मिलती भी है, तो बड़ी अपमानजनक शर्तों पर। जिन्होंने रिफ्यूजी काल देखा या सुना है, वो जानते हैं कि पाकिस्तान से जो रिफ्यूजी आए थे, उनका कई सालों तक भारत में क्या हाल रहा। जो आज का समय जानते हैं, वो भी देखते हैं कि वेस्ट एशिया से जो रिफ्यूजीज़ थे, जब वो यूरोप गए, तो उनका क्या रहा। वो ये भी जानते हैं कि ये जो रोहिंग्या रिफ्यूजीज़ हैं, जब ये अलग-अलग देशों में जाने की कोशिश करते हैं, तो उनका क्या हाल होता है।

जब आपके क्षेत्र में बारिश होना ही बंद हो जाएगी, क्योंकि मॉनसून भी टेंपरेचर डिफरेंसेज़ पर ही ऑपरेट!करता है, तो आपको अपनी जगह छोड़नी पड़ेगी। वहाँ कुछ पैदा नहीं होगा, या वहाँ अतिवृष्टि होगी, इतनी बारिश होगी, कुछ नहीं पैदा होगा। ग्लोबल वार्मिंग का मतलब यूनिफ़ॉर्म वार्मिंग नहीं होता। ग्लोबल वार्मिंग का मतलब होता है, वार्मिंग की भी एक्सट्रीम्स आएँगी और कूलिंग की भी आएँगी” अनावृष्टि की भी, अतिवृष्टि की भी। जब होगी बारिश, तो ऐसी होगी, रोके नहीं रुक रही। जब नहीं होगी, तो नहीं होगी।

हमारे जो क्रॉप्स के, फ़ार्मिंग के पैटर्न्स हैं, वो पूरी तरह डिसरप्ट हो जाएँगे। जगह छोड़नी पड़ेगी। कौन सहारा देगा? कहाँ जाकर रुकोगे? किसके देश में रुकोगे? भारत में खाली जगह, खाली ज़मीन भी नहीं है। मान लो, पैसा तुम्हारे पास है भी कि "पैसा तो मेरा पैसा है।" पर दूसरी जगह कहाँ जाओगे? और दूसरा देश कौन-सा है, जो तुम्हारे लिए दरवाज़े खोल देगा? और जो आसपास के देश हैं, वहाँ हालत हमसे भी ख़राब होने वाली है। इधर पाकिस्तान, इधर बांग्लादेश, कहाँ जाओगे? पाकिस्तान में अभी बाढ़ आई थी, फिर सूखा पड़ गया। हालत तो यह भी हो सकती है कि पाकिस्तानी कोशिश करें यहाँ घुसने की, क्योंकि उनकी अपनी पूरी ज़मीन ख़राब हो गई हो और आसमान से आग बरस रही हो। फिर?

अब इंसान हो, तो किसी के तो काम आ ही जाओगे। क्या होता है? क्या होता है, जब कोई मजबूर होता है? जब मजबूर होता है, तो जितने स्वार्थी, अहंकारी होते हैं, वो उनका फ़ायदा उठाते हैं। फिर चीप लेबर बनोगे। बहुत सारे देश हैं दुनिया में, जिनमें आबादी बहुत ज़्यादा नहीं है और पैसा खूब है। वो कहते हैं कि पैसा तो खूब है पर हमारे यहाँ मैनुअल लेबर करने के लिए कोई नहीं मिलता। अपना कमोड ख़ुद ही साफ़ करना पड़ता है, झाड़ू ख़ुद ही लगाना पड़ता है। तो अगर चीप मैनुअल लेबर मिल जाए, तो बढ़िया रहेगा। अब वो मैनुअल लेबर उन्हें फिर कहाँ से मिलेगा? ऐसों से ही मिलेगा, जो बेचारे बेघर हो गए। क्लाइमेट क्राइसिस ने जिनका सब कुछ छीन लिया, वो फिर जाकर के इधर-उधर मज़दूरी करेंगे।

बहुत सारे जो अमीर देश हैं, वो जो क्लाइमेट क्राइसिस को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। है उनकी भी मूर्खता। मरेंगे वो भी। पर जो उनके मूर्खतापूर्ण तर्क होते हैं, जानते हो न किस तरीके के होते हैं? "हमारे बहुत सारे एरिया में बर्फ़ पड़ी हुई है, आइस शीट है। क्लाइमेट चेंज जब होगा, तो आइस पिघल जाएगी, तो ग्रीनरी आ जाएगी। फिर हम वहाँ खेती करेंगे। यह है हम पर क्या असर पड़ना है? हम तो ठंडे देश हैं। हम तो ठंडे देश हैं। हमारे लिए तो वार्मिंग अच्छी बात है। जो हमारा ऑयल इंपोर्ट बिल होता है, वहाँ बहुत सारा ऑयल सिर्फ़ इसलिए इंपोर्ट किया जाता है कि जलाया जाएगा हीटिंग के लिए। हमारा ऑयल इंपोर्ट बिल कम हो जाएगा।"

इन्हें यह नहीं पता है कि क्लाइमेट चेंज, ग्लोबल वार्मिंग नहीं है। एक अभी इफ़ेक्ट चल रहा है। आप उसके बारे में पढ़िएगा। एक करंट है, जो गर्म रखती है और ओपन रखती है यूरोप के कई पोर्ट्स को। क्लाइमेट चेंज के कारण वो जो करंट है, वो कमज़ोर हुई जा रही है। वीक हुई जा रही है। फिर तो होगी तो ग्लोबल वार्मिंग, और ये जगह बर्फ़ से ढक जाएँगी। और क्लाइमेट चेंज भी इक्वली नहीं होता है पूरी दुनिया में। उदाहरण के लिए, आर्कटिक में तीन-चार गुना ज़्यादा है, बाक़ी दुनिया की अपेक्षा। इसका मतलब क्या है? इसका मतलब यह है कि समुद्र का तल उठेगा, आर्कटिक पर ज़्यादा तापमान होना। हम दो सौ साल आगे की बात नहीं कर रहे हैं? हम अभी की बात कर रहे हैं, अभी हो रहा है।

ज्ञान पर्याप्त है। जब आप कहते हो, "ज्ञान भर से नहीं होगा, लोगों को डरा कर होगा।" तो आप ज्ञान का अपमान कर रहे हो। ये साधारण-सी बातें हैं। इनको दो-चार पन्नों में, आप चाहो तो प्रिंट निकलवा लो। उसका सोर्स लिख दो, जो वेरिफ़ाइड, जो क्रेडिबल सोर्स है, विश्वसनीय है, वो लिख दो। और बँटवाओ उसको अपने-अपने क्षेत्र में, अपने-अपने शहर में।

फ़ियर-मॉन्गरिंग नहीं है ये, यह तो ज्ञान का प्रसार है। कुछ भी अपनी ओर से मत लिखो। जो इंटरनेशनल, क्रेडिबल, रिलायबल एजेंसियाँ हैं, उनके डेटा के आधार पर लिखो और बँटवाओ अपने क्षेत्र में, या आपके जो वर्चुअल ग्रुप्स हों, व्हाट्सऐप पर, फ़ेसबुक पर, जहाँ कहीं भी जाओ, वहाँ पर ये सारी सूचना जो है, वो आगे बढ़ाओ।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, फॉलोइंग अप ऑन द सेम क्वेश्चन। वी वर जस्ट टॉकिंग अबाउट कर्मणि एंड कर्तरि। राइट? द क्लाइमेट साइंस हैज़ नाउ कम टू अ पॉइंट टू व्हेयर साइंटिस्ट्स आर सेइंग दैट द रीज़न फ़ॉर क्लाइमेट चेंज इज़ बिकॉज़ ऑफ़ परपेचुअल ग्रोथ इन अ फ़ाइनाइट प्लैनेट। राइट? द आस्क फ़ॉर परपेचुअल ग्रोथ इन अ फ़ाइनाइट प्लैनेट। एंड द सॉल्यूशन दे आर गिविंग इज़ डीग्रोथ। वी शुड कम टू सिस्टम्स व्हेयर वी शुड कम टू डीग्रोथ। नो, डीग्रोथ सीम्स लाइक अ कर्म फ़ॉर मी। लाइक दे आर जस्ट प्रपोज़िंग एक्शन टू बी डन।

आचार्य प्रशांत: नॉट एक्शन, इट्स एब्सेन्स ऑफ़ एक्शन। ग्रोथ इज़ एक्शन। ग्रोथ इज़ एक्शन, डीग्रोथ इज़ द विदड्रॉअल ऑफ़ एक्शन। ग्रोथ रिक्वायर्स द इंजिन्स ऑफ़ ग्रोथ टू परपेचुअली फ़ायर। डीग्रोथ डज़ नॉट रिक्वायर द इंजिन्स टू फ़ायर इन द ऑपोज़िट डायरेक्शन। डीग्रोथ सिंपली रिक्वायर्स द इंजिन्स टू शट डाउन, नॉट फ़ायर इन द ऑपोज़िट डायरेक्शन। तो यह कर्म कैसे हो गया?

प्रश्नकर्ता: बट इट सीम्स लाइक द साइंस बीइंग स्टक देयर। दे आर जस्ट प्रपोज़िंग अ सॉल्यूशन।

आचार्य प्रशांत: फॉर द फ़र्स्ट टाइम साइंस इज़ एडमिटिंग इट्स लिमिट्स। साइंस कह रहा है कि ग्रोथ माने कर्तृत्व, डूअरशिप। इसका समाधान यही है कि तुम वो न करो, जो करते आए हो। डीग्रोथ का मतलब यह थोड़ी है कि जो इमारत है, उसको जाकर तोड़ दो। डीग्रोथ का मतलब है, नई मत बनाओ। और जो बनी हुई है और व्यर्थ है, उसको बस छोड़ दो, तोड़ो नहीं दो। क्या कर दो? छोड़ दो। कर्म क्या होता? तोड़ना। तोड़ने की बात नहीं हो रही है। छोड़ने की बात हो रही है। तो डीग्रोथ कोई एडिशनल एक्शन नहीं है। इट्स द विदड्रॉअल ऑफ़ एक्शन। आई रिफ्यूज़ टू एक्ट एनी मोर फ़्रॉम द यूज़ुअल सेंटर।

यह वैसी-सी बात है जैसे डीपॉप्युलेशन। पृथ्वी की आबादी कम करने के लिए क्या इंसान मारने पड़ेंगे? मारने थोड़ी पड़ेंगे, सिर्फ़ जितने पैदा कर रहे हो उतने पैदा मत करो। पृथ्वी से इंसान गुज़र तो अपने-आप जाते हैं, मृत्यु तो अपने-आप हो जाती है। डीपॉप्युलेट करने के लिए तुमको हथौड़ा थोड़ी चलाना है कि "मार दूँगा, मार दूँगा, डीपॉप्युलेट करना है।" तुम ये जो ताबड़तोड़ पैदा करते हो, बस उतने मत पैदा करो, आबादी अपने-आप कम हो जाएगी।

जैसे ग्रोथ में द इंजिन्स नीड टू फ़ायर। इसी तरीके से ये थोड़ी कहा जा रहा है कि डीग्रोथ में हमने कहा न, मेकिंग द इंजिन्स फ़ायर इन द ऑपोज़िट डायरेक्शन। इसी तरीके से पॉपुलेशन ऑल्सो रिक्वायर्स, यू नो, द फ़िज़िकल इंजिन्स टू फ़ायर। एंड डीपॉप्युलेशन डज़न्ट मीन द फ़िज़िकल इंजन शुड फ़ायर इन द ऑपोज़िट डायरेक्शन। इट सिंपली मीन्स दैट यू सी द फ़्यूटिलिटी ऑफ़ दिस फ़ायरिंग। नहीं भाई, टू एक्सपेंसिव, टू मीनिंगलेस, टू डिस्ट्रक्टिव।

प्रश्नकर्ता: अगर डीग्रोथ का मतलब सम पीपल आर टेकिंग इट लाइक... सम पीपल आर सेइंग, "20% वीगन बन जाओ।" देन दैट इज़ नॉट टेकिंग इट टुगेदर।*

आचार्य प्रशांत: नथिंग टू से। वैसे ही है जैसे "20% ब्रह्मचारी।" देखो, समझो। कहाँ गए? डीग्रोथ और डीपॉप्युलेशन तो होंगे ही। सवाल यह है कि अपनी तमीज़ से, अपनी समझ से, अपनी मर्यादा से ख़ुद कर लेते हो, या इंतज़ार करते हो कि बड़ी माँ अपना हथौड़ा ले आए और करे। होगा तो है ही। पॉपुलेशन ग्रोथ रेट पूरी दुनिया में कम हो रहे हैं, क्यों हो रहे हैं? लोग ज़्यादा समझदार हो गए हैं? नहीं। क्योंकि लिविंग कंडीशंस इतनी बुरी हो गई हैं, इतनी बुरी हो गई हैं कि बच्चा पैदा करने का सवाल ही नहीं पैदा होता। इतना-सा तुम्हें जगह मिली हुई है, झुग्गी में, चाल में। तुम वहाँ बच्चा रखोगे ही कहाँ? तो इसलिए नहीं पैदा करोगे। मियाँ-बीवी दोनों मिलकर भी इतना नहीं कमाते हैं कि किसी तरह खा सकें, वो बच्चा कैसे लेके आ जाएँगे? या दो बच्चे पहले ही हैं, अब तीसरा कहाँ से ले आएँ?

तो या तो स्थितियों को इतना बुरा हो जाने दो कि मजबूरी में तुम्हें डीग्रोथ और डीपॉप्युलेशन करनी पड़े, या तो क्लाइमेट क्राइसिस को इतना बुरा हो जाने दो कि चारों तरफ़ ज़ूनोटिक डिज़ास्टर्स छा जाएँ और अपने-आप पॉपुलेशन गिर जाए, कि लोग करोड़ों में मर रहे हैं। वो अपने-आप हो जाएगा। वो तो होना ही है।

डीग्रोथ भी होनी है, डीपॉप्युलेशन भी होनी है। सवाल यह है कि तुम ख़ुद कर लेते हो अपने होश में, या इंतज़ार करते हो कि प्राकृतिक शक्ति आकर के फिर अंधाधुंध तरीके से…।

तुम कर लोगे, तो हो सकता है उसमें तुम कम कष्ट पाओ। पर जब प्रकृति का हथौड़ा गिरेगा, तो वो फिर बहुत परवाह नहीं करेगा किसी की। और वो फिर जितना दंड दोषियों को देगा, उतना ही दंड निर्दोषियों को भी देगा।

शुरू हुआ होगा कोविड चीन से, मरे ज़्यादा भारतीय थे। उसमें फिर यह नहीं देखती प्रकृति कि तुम्हारी नेशनलिटी क्या है। उसके लिए इंसान, इंसान, सब एक बराबर हैं। वो उसे चीनी, भारतीय नहीं पता। वो कहती है, "इंसान ने शुरू करा है। इंसान मरेगा।" अब तुम कहते रहो, "नहीं, मैंने नहीं किया। चीनी ने करा है।" प्रकृति के लिए ये लेबल्स महत्त्व नहीं रखते। वो इंडिस्क्रिमिनेटली फिर सज़ा देगी। तो या तो उसकी सज़ा पा लो, या ख़ुद ही सुधर जाओ। और सज़ा देनी उसने शुरू तो कर ही दी है।

जो लोग कहते हैं न, "पॉपुलेशन बढ़ाओ, पॉपुलेशन बढ़ाओ।" भाई, उस पर अपर लिमिट हमारी आइडियोलॉजी नहीं लगा रही। उस पर अपर लिमिट पृथ्वी के रिसोर्सेज़ लगा रहे हैं। प्रकृति स्वयं अपर लिमिट लगा रही है तुम्हारी पॉपुलेशन और तुम्हारी कंज़म्प्शन पर। लोगों को समझ में क्यों नहीं आ रहा? लोग सोचते हैं, "ये तो आइडियोलॉजिकल रीज़न्स से कह रहे हैं न, डोंट कंज़्यूम सो मच।" हम आइडियोलॉजिकल नहीं, फ़ैक्चुअल रीज़न्स* से कह रहे हैं। द प्लैनेट सिंपली डज़ नॉट हैव इनफ़। दैट्स द फ़ैक्ट।

वो कोई मेरी आइडियोलॉजी की बात नहीं है। वो कोई अध्यात्म की बात नहीं है। वो कोई मिनिमलिज़्म की बात नहीं है। वो कोई विचारधारा नहीं है। वो क्वांटिफ़ायबल यथार्थ है। तुम गिन सकते हो इस *प्लैनेट के पास कितना है। गिन सकते हो” फ़ैक्ट है। इतना, इतना, इतना, ये रहा। इतना ही है। आप यहाँ बैठे हुए हो, मान लो हज़ार लोग बैठे हो। और यहाँ खाने के दो हज़ार डब्बे रखे हैं, पैकेट्स। आप हज़ार बैठे हो, यहाँ दो हज़ार रखे हैं। इनको छह चाहिए, इनको आठ चाहिए, उसको पंद्रह चाहिए। उसके पास अभी कुछ नहीं। उसके पास कुल एक डब्बा ही मिला उस ज़िंदगी में। वो कह रहा है, "मैं अपनी सक्सेस स्टोरी ख़ुद लिखूँगा। मैं सब पूरी दुनिया को दिखा दूँगा मैं कौन हूँ। मैं बीस डब्बे निकालूँगा।"

सेल्फ-हेल्प बुक्स पढ़ रहा है, "कैसे अपनी ड्रीम्स को साकार करें?" वो एक है, जो सुबह 5:00 बजे उठता है कि "सुबह 5:00 बजे उठ के वर्जिश करूँगा, मुझे दस डब्बे निकालने हैं।"

अरे भाई, बात तुम्हारे अरमानों की, तुम्हारी फ़ैंटेसीज़ की नहीं है। यहाँ डब्बे ही कुल दो हज़ार हैं। और तुम हज़ार लोग हो, एक आदमी को दो से ज़्यादा मिल ही नहीं सकते। और अगर कोई बीस उठा रहा है, तो बाक़ियों को भूखा मारने का इंतज़ाम कर रहा है। वो फिर तभी हो सकता है, जब स्टीप इनकम इनइक्वैलिटी हो, जो कि अब हो रही है दुनिया में, इसीलिए। क्योंकि पृथ्वी के पास तुम्हारे सबके अरमान पूरे करने के रिसोर्सेज़ हैं ही नहीं। तो जिसके होंगे, वो बाक़ियों को भूखा मारेगा ही मारेगा। और आप उनको वर्शिप करते हो, उन्हीं की पूजा करते हो। "देखा, इसके पास तो तीन सौ डब्बे हैं।"

दीदी, इसीलिए तेरा पूरा कुटुंब मर रहा है, क्योंकि उसके पास तीन सौ डब्बे हैं। उसके पास तीन सौ नहीं होने चाहिए थे। वो अपराधी है, अगर उसके पास इतना कुछ है, तो। द फ़ाइनाइट प्लैनेट कैन नॉट सपोर्ट इन्फ़ाइनाइट डिज़ायर्स। “नहीं, आई एम सो इम्प्रेस्ड। ही इज़ अ डब्बा ट्रिलियनएयर नाउ। वाओ! जस्ट दैट यू नो, आई फ़ील आई एम स्टार्विंग अ बिट। आई डोंट नो व्हाय।"*

ये सिर्फ़ और सिर्फ़ एक स्पिरिचुअल क्राइसिस है, जिसमें चूँकि हम नहीं जानते कि आनंद क्या है। इसलिए हम सस्ती-सी खुशी पृथ्वी को जलाकर हासिल करना चाहते हैं।

हम नहीं जानते आनंद क्या है। दिवाली पर मैंने देखा है, आपने भी देखा होगा। हमें नहीं मालूम राम कौन हैं, और हम नहीं जानते कि दिया माने क्या, और प्रकाश माने क्या। न हम रामत्व से परिचित हैं, न हम प्रकाश का भीतरी अर्थ समझते हैं। देखा होगा आपने, होते हैं ऐसे लड़के ज़्यादातर टीनएजर्स, किशोर। उनको जितने पटाखे मिले होते हैं, जब वो सब ख़त्म कर लेते हैं, वो जाकर गत्ते में आग लगाना शुरू कर देंगे। कहीं लकड़ी मिल जाएगी, लकड़ी जलाना शुरू कर देंगे।

हम भी वही कर रहे हैं। हम नहीं जानते आनंद क्या है, तो आनंद की तलाश में हम सब कुछ जला रहे हैं। आनंद मिलना था राम से, आनंद मिलना था प्रकाश से, वो मिला नहीं, तो अब जला रहे हैं और उसको पर्व का नाम दे रहे हैं। हम पृथ्वी ही पूरी जलाए दे रहे हैं, जैसे कि उससे आनंद आ जाएगा। कुछ नहीं बचा, आख़िरी एक-आध बम है, तो उसके ऊपर ले जाकर कनस्तर रख दिया है। बम जला रहे हैं, "बूम!" से फटेगा, उछलेगा। क्या पता मैं भूखा हूँ आनंद का, क्या पता इसी में आनंद मिल जाए। देखो, कनस्तर कितनी ज़ोर से उछला। "हाउ इज़ दैट वेरी डिफरेंट फ्रॉम टेस्टिंग अ न्यू मिसाइल?" देखो, कितनी ज़ोर से उछली। "बिग टॉयज़ फ़ॉर बिग बॉयज़।” प्लीज़ टेल मी, हाउ इज़ दैट वेरी डिफरेंट?

वो भी यही कर रहा है, नीचे से बम फोड़ के कनस्तर उछाल रहा है। और ये जो बिग बॉयज़ हैं, एग्रीगेटेड इन द फ़ॉर्म ऑफ़ बिग नेशंस, ये भी तो वही कर रहे हैं। नीचे से बम फोड़ के कनस्तर उछाल दिया। "लेटेस्ट आईसीबीएम।" क्यों? क्योंकि आनंद क्या है, पता नहीं। हम नहीं जानते कि एक किताब कितना आनंद दे सकती है, हम नहीं जानते कि सुंदर, अच्छी संगति क्या आनंद दे सकती है। हम नहीं जानते संगीत क्या आनंद दे सकता है। हम नहीं जानते कि चुपचाप अकेले बैठना क्या आनंद दे सकता है। तो फिर हम आनंद के लिए क्या करते हैं? हम कंज़्यूम करते हैं, क्योंकि हमें और कोई आनंद पता ही नहीं है। हमें नहीं पता।

आपने अभी कुछ खाया, और आप में से बहुत लोगों के लिए वह आज का डिनर होगा। आप शायद वापस जाकर खाना नहीं खाओगे। आपने अभी जो खाया, उसमें क्या-क्या था? क्या-क्या था? कितने? छह तरह के व्यंजन? आठ? बारह? अठारह? छप्पन भोग? क्या-क्या था? कईयों को तो शायद अब याद भी न हो क्या खाया, क्योंकि आनंद उसमें नहीं है। डज़ इट ईवन मैटर? और क्या यह नहीं हो सकता था कि अभी, भाई, क्रिसमस बीता है। अब ये तो चल रहा है, "द न्यू ईयर फ़ेस्टिव पीरियड।" तो अभी 26, 27 तारीख़ है, 28 तारीख़ आने वाली है अभी। अब इन दिनों में तो रात को कुछ स्पेशल फ़ीस्ट होनी चाहिए न?

अच्छा, बताइए, यहाँ न होते, तो शायद क्या खाते? कुछ तो अपवाद होंगे, जो कहेंगे, "कुछ नहीं खाते।" यहाँ न होते, तो यह जो खाया चावल और दाल, ठीक? कुछ इससे आगे का ही खाते। बहुत सारे लोग तो वर्षांत समारोह के लिए बाहर से आए हैं। जो बाहर से आए हैं और शहर में पधारे हैं, वह तो निश्चित रूपेण कहते हैं कि चलो कहीं जाते हैं, कुछ अच्छा खाते हैं। क्योंकि ज़िंदगी में जब कुछ और है ही नहीं, तो खाओ ही, और करोगे क्या?

आदमी वो जानवर है, जो अपनी सब इंद्रियों को हर दिशा से ठूँस रहा है, और तब भी भूखा मर रहा है। जानवर के पास एक मुँह होता है। हमारे पास दस मुँह हैं, और सब में हम ठूँसे जा रहे हैं, जो कुछ भी ठूँस सकता है; और तब भी भूखे मर रहे हैं। क्योंकि हमें जो चाहिए, वो इनके (इंद्रियाँ) माध्यम से नहीं मिलेगा। कंज़म्प्शन मिल सकता है इनके माध्यम से। भोग का चैनल, साधन हो सकती हैं इंद्रियाँ। चाहते हो आनंद, और उसके लिए जलाते हो ईंधन। ईंधन जलाने से तो नहीं मिलेगा, जंगल काटने से तो नहीं मिलेगा। और ज़्यादा केमिकल्स नदियों में बहाने से तो नहीं मिलेगा। और ज़्यादा मांस खाने से तो नहीं मिलेगा।

ज़िंदगी बर्बाद। वीकेंड पर; वीकेंड नहीं, ईयर-एंड पर जाकर कहीं मालदीव्स में वेकेशन मना रहे हो, उससे तो कुछ नहीं मिलेगा। कि मिलेगा? स्टूपिड इन इंडिया इज़ स्टूपिड इन मालदीव्स। “नहीं, तो ये पैसे सब बर्बाद गए क्या?” यस। स्टूपिड इन इंडिया रिमेन्स स्टूपिड इन मालदीव्स। स्टूपिड अलोन रिमेन्स स्टूपिड इन अ पेयर। अब भोग लो उसको, जितना भोगना है।

तुम जैसे रूखे, सूखे और रिक्त पहले थे, वैसे ही बाद में भी रहोगे। लेकिन गलत दिशा में उम्मीद लगाकर, गलत दिशा में अंधाधुंध भागकर तुमने पूरी पृथ्वी ख़त्म कर दी।

और पृथ्वी भोग पर कोई पाबंदी नहीं लगाती है। वास्तव में देखो, तो प्रकृति में भी भोग का लगातार काम चल रहा है, लगातार चल रहा है। कोई प्राणी नहीं है, जो खाता न हो। कोई प्राणी नहीं है, जो अपने वातावरण को और पर्यावरण को अपने हिसाब से थोड़ा बदलता न हो। कोई प्राणी नहीं है, जो अपना मल इसी ग्रह पर न त्यागता हो। सब होता है, लेकिन उनके पास भोगने वाला अहंकार नहीं है। भोग में भी बुराई नहीं है, क्योंकि भोग भी कर्म ही है। जब कोई कर्म निश्चित अच्छा या निश्चित बुरा नहीं होता, तो भोग भी निश्चित अच्छा, निश्चित बुरा नहीं। समस्या यह है कि भोगने वाला कौन है?

यदि प्रकृति ही प्रकृति को भोग रही है, तो चलेगा। वो सदियों से चल रहा है। उसमें कोई समस्या नहीं हो जाती। चिड़िया भी भोगती है। चिड़िया भी साधारण-सी, छोटी-सी, नन्ही गौरैया, वो भी भोगती है। कुछ नहीं हो जाता, कोई समस्या नहीं। एक पौधा लगा होता है। वह भी तो क्या कर रहा है? वह हवा ले रहा है, वह धूप ले रहा है। उसमें भी कई तरीके के बैक्टीरिया हैं, वो सब संगत कर रहे हैं। तब जाकर के वो फल-फूल रहा है। मिट्टी ले रहा है। पानी, सब कुछ है।

क्या पेड़ मिट्टी से पानी नहीं लेता? और हम भी तो लेते हैं। पर हम क्या करते हैं? हम पेड़ की तरह नहीं लेते। क्योंकि वहाँ लेने वाला कौन है? पेड़। यहाँ लेने वाला कौन है? अहंकार। मिट्टी नहीं मना कर रही मुझसे, "पानी मत लो।" जंगल नहीं मना कर रहे कि हमसे फल न लो, पत्तियाँ न लो। लकड़ी भी देने को तैयार हैं। जंगल भी बहुत कुछ देने को तैयार है। पर हम लेने नहीं जाते वहाँ, हम लूटने जाते हैं।

प्रेम में भी लिया जाता है, और प्रेम में प्रकृति बहुत कुछ देती है, ले लो। पर आप मुझे कुछ दें, मैं आपसे लूँ; और मैं कहूँ, "इसका मांस अच्छा है, इसी को खा जाऊँ।" इन दोनों बातों में अंतर है कि नहीं? तो चिंता मत किया करिए कि भोग अगर बंद हो गया, तो फिर मतलब रोटी कैसे खाऊँगा? पृथ्वी नहीं मना कर रही है कि रोटी भी नहीं खानी है। पृथ्वी नहीं मना कर रही है कि ऊपर छत भी नहीं होनी चाहिए। पृथ्वी नहीं मना कर रही है कि यात्रा भी नहीं करनी है। पृथ्वी कह रही है, "करो यात्रा।" यात्रा के पीछे अहंकार तो नहीं है? नहीं है, तो करो।

पृथ्वी नहीं मना कर रही है कि दुकान में जाकर कुछ ख़रीदना नहीं है। पृथ्वी कह रही है, "ख़रीद लो।" बस यह जाँच लेना कि खरीदने वाला कौन है। ख़रीदने वाला अगर अहंकार है, तो ठिठक जाओ। पृथ्वी नहीं कह रही है कि चश्मा टूट गया है, तो चश्मा नहीं लाना है नया। जो कुछ भी देखने में सहायक हो, पृथ्वी कह रही है, "जाओ, ख़रीदो और प्रबंध करो।" बिल्कुल। एक नहीं दो चश्मे ले लो, अगर उससे देखने में मदद मिलती है।

हाँ, एक बात और, और पृथ्वी यह भी नहीं कह रही है कि जोड़े मत बनाओ। स्त्री-पुरुष दूर-दूर रहेंक् संतान मत पैदा करो। पृथ्वी ये सब नहीं कह रही है। आप जोड़ा बनाओ, पृथ्वी को कोई समस्या नहीं है। आप सेक्स करो, पृथ्वी को कोई समस्या नहीं है। आप प्रेग्नेंट हो जाओ, बच्चे पैदा करो। पृथ्वी उसमें भी मना नहीं कर रही है। पृथ्वी किसी कर्म को प्रतिबंधित नहीं कर रही है। पृथ्वी बस इतना कह रही है, "मेरे बच्चे, मेरे लाडले, तेरा होश कहाँ है?” होश में रह के तुम्हें जो करना है, करो। बेहोशी में बहक करके क्यों सब जगह आग लगा रहे हो? बस यह है।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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