आचार्य प्रशांत आपके बेहतर भविष्य की लड़ाई लड़ रहे हैं
लेख
कैसे जानें कि प्यार सच्चा है या नहीं?
Author Acharya Prashant
आचार्य प्रशांत
39 मिनट
522 बार पढ़ा गया

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हमारे जो ये सम्बन्ध होते हैं, उसमें हम ये दावा तो करते हैं कि बेशर्त प्रेम है, पर एक इंसान कोशिश करता रहता है कि प्रेम सम्बन्ध टूटे नहीं और एक इंसान बार-बार निराशा से सम्बन्ध तोड़ देता है, कि मुझसे और हो नहीं रहा। वो ये दावा करता है कि नहीं मैं भी प्यार करता हूँ, पर वो अंततः सम्बन्ध तोड़ देता है। तो क्या वो प्यार करता है? और जो बार-बार कोशिश करे जा रहा है, वो भी कभी तो निराश हो ही जाएगा, पर वो प्यार करता है। आपको मेरा प्रश्न समझ में आया!

आचार्य प्रशांत: नहीं समझ में आया, पर फिर भी बोल दूँगा। तुम लोगों की बातें ऐसी होती हैं कि ख़ुदा न समझे, मैं कैसे समझूंगा?

(श्रोतागण हँसने लगते हैं)

तो सोनाली का सवाल, मेरी छोटी सी समझ के अनुसार ये है कि क्या प्रेम में धैर्य अनंत होता है, या कोई बिंदु आता है जहाँ पर आदमी डोर तोड़ भी देता है, साथ छोड़ भी देता है, और अगर कोई साथ छोड़ने की बात करे तो क्या इसका अर्थ है कि उसका प्रेम अवास्तविक था, नकली था। स्पष्ट है सबको? बोलूँ?

पकड़े रहना या छोड़ देना ये दोनों व्यवहार की बातें हैं, और व्यवहार तो व्यवहार होता है; व्यवहार को लेकर के कोई आत्यंतिक सूत्र नहीं दिया जा सकता। जैसे कि आपको कोई सूत्र दे कर नहीं बताया जा सकता कि हाथ ऐसे ही चलना चाहिए (आचार्य जी हाथों को सामने बढ़ाते हुए) या ऐसे ही चलना चाहिए(आचार्य जी हाथों को बाईं ओर बढ़ाते हुए), या मुट्ठी भींचे, या हथेली खुले। बात ह्रदय की है, केंद्र की है, स्रोत कीㄧमाने शुरुआत की है।

पकड़े हुए ही क्यों हो? छोड़ने की प्रेरणा कहाँ से आ रही है? बहुत हैं जो आजन्म पकड़े रहते हैं, वो कहते हैं “हम वफ़ादारी निभा रहे हैं, हम-सा प्रेमी दूसरा नहीं होगा।” पकड़े रहने का अर्थ आवश्यक रूप से वफ़ादारी नहीं होता। तुम पकड़े इसलिए भी रह सकते हो क्योंकि डरते हो, पकड़े इसलिए भी रह सकते हो क्योंकि पकड़ने में सुविधा है, या पकड़ने की आदत लग गई है। सिर्फ इसलिए कि तुमने अपने जीवन में किसी को स्थापित ही कर लिया है, ये तो नहीं कहा जा सकता कि हृदय प्रेमपूर्ण है।

इसी तरह छोड़ देने को देखकर भी कोई पक्का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। प्रश्न यह है कि छोड़ने वाला कौन है? छोड़ तुम इसलिए भी सकते हो कि कलतक तुम्हारे हितों की पूर्ति होती थी, आज नहीं हो रहीㄧतुमने छोड़ दिया। छोड़ तुम इसलिए भी सकते हो क्योंकि कलतक तुम्हें साथी से, प्रेमी सेㄧजिसके साथ हो, उससे फायदा मिलता था; आज नहीं मिल रहा फायदा तो छोड़ दिया। और छोड़ने के पीछे दूसरा स्रोत भी हो सकता है। तो आचरण को लेकर, व्यवहार को लेकर, कोई नियम न बनाओ, न माँगो; पूछो ही मत कि बने रहें कि त्याग दें? धर्म आचरण की बात नहीं है; धर्म सही जगह पर पहुँचने की बात है, सही केंद्र से जीने की बात है।

आप सब लोग (सभी श्रोतागणों से) इस जगह पर पहुंचे हैं, हमारी बात-चीत हो रही है। आप कहाँ से आईं (किसी श्रोता से)? आप दिल्ली से आईं। आप कहाँ से आए (किसी दूसरे श्रोता से)? आप पुणे से आए। आप दोनों एक ही दिशा से आएं क्या यहाँ? (वे असहमति जताते हैं) तो जब ये दोनों चल रहे होंगे, यात्रा में गति कर रहे होंगे, तो उनको देखें (दूसरे श्रोता से) तो उनकी गति ज़रा पश्चिम की ओर थी, इनको देखें (पहले श्रोता से) तो इनकी गति दक्षिण की ओर थी। कोई आ रहा है पुणे से मुंबई, और कोई आ रहा है दिल्ली से मुंबई; दोनों का अगर आप आचरण देखें, दोनों का ‘चरना’ देखें; ‘चरना’ माने - गति करना। तो दोनों कि गति अलग-अलग थी; कि नहीं थी? एक की गति किधर को थी? लगभग दक्षिण की ओर, और एक की गति किधर को थी? लगभग पश्चिम की ओर। अगर आचरण को लेकर के कोई सूत्र, कोई सिद्धान्त बना दिया गया होता तो हमें लगता कि या तो ये (पहले श्रोता) अधर्मी हैं, या ये (दूसरे श्रोता) अधर्मी हैं। क्योंकि दोनों तो एक सा आचरण तो कर नहीं रहें।

बात ये नहीं है कि आचरण क्या है, बात ये है कि चाह क्या रहे हो? कहाँ को जा रहे हो? निगाहें किस पर हैं? मंज़िल सही है कि नहीं? और मंज़िल अगर सही है, तो दिशा से अंतर नहीं पड़ता, ‘जिस भी दिशा मंज़िल हो, वही दिशा सही है’। प्रेम का अर्थ; इस बात को ध्यान से समझ लेना; प्रेम का अर्थ किसी व्यक्ति के प्रति किसी विशेष प्रकार का व्यवहार नहीं होता। “लव इस नॉट अबाउट एक्सहिबिटिंग अ पर्टिकुलर काइंड ऑफ़ बेहेवियर टुवर्ड्स अ स्पेशल और पर्टिकुलर पर्सन।”

थोड़ी देर पहले हमने बात करी थी सहलाने-बहलाने की, और सहलाने-बहलाने को मन प्रेम से बहुत जोड़कर देख लेता हैं न? तुम्हारे लिए ही बड़ा मुश्किल हो जाए, अगर कोई सहलाए-बहलाए न; कि तुम कह पाओ कि वह मुझे प्रेम करता है। जिन्हें तुम प्रेमी भी मानते हो, अगर वो तुम्हें ज़रा सा डाँट देंㄧतुम्हें तकलीफ़ हो जाती है। और अगर दो-चार दिन लगातार कड़वा व्यवहार कर दें तो तुम्हें शक हो जाता है कि इनका प्रेम अब काम पड़ रहा है। बोलो हाँ या ना?

जहाँ कहीं किसी ने तुमसे दो खरे-खरे बोल बोले, तहाँ मन में पीड़ा उठती है। उठती है कि नहीं? बुद्धि भले ही ये बता दे कि तुमसे जो बोला गया है, दूसरे व्यक्ति के द्वारा, वो तुम्हारे भले के लिए ही है। लेकिन फिर भी भीतर कुछ है जो इसी उम्मीद में रहता है कि हमें सहलाया जाए, हमें बहलाया जाए। कोई हमारी और क्रुद्ध निगाहों से न देखे, कोई अनुशाशन में न रखे हमें, कोई हमारे दोषों कि ओर इंगित न करे; और दोष अगर बताने भी हों तो बड़े मीठे तरीके से बताओ। एक बार को सुन भी लेंगे कि हमारी गलती है, पर वो ऐसे बताओ हमें जैसे चाशनी चटाई; नहीं तो तुरंत कहोगे “बेबी यू डोंट लव मी एनीमोर।” निकलता है?

इस भ्रान्ति पर चोट करिए, इस भ्रान्ति को जानिए कि ‘भ्रान्ति’ है। पिक्चरों ने हमारा दिमाग खराब कर दिया है। वहाँ तो प्रेम का मतलब ही हो जाता हैㄧमुस्कुराहट, सौम्य स्पर्श। हमें प्रेम से तो कोई मतलब ही नहीं रहा; हमारा ज़्यादा वास्ता अब प्रेम से सम्बन्धित छवियों से हो गया है। है न? दो लोग एक-दूसरे की ओर देख कर मुस्कुरा रहें हों, एक छवि आपको ये दिखाई जाए, और दूसरी छवि दिखाई जाए कि दो लोग हैं और एक-दूसरे को ज़रा तर्रा के, टेढ़ी नज़रों से देख रहें हैं। और आपसे पूछा जाए: बताना इनमें से प्रेमी युगल कौन सा है? दिल से बताइएगा, किधर को इशारा करेंगे? पहली छवि की ओर कर देंगे न? अब आपको कैसे पता उनके दिलों का हाल? पर हमें दिलों का हाल जानने की ज़रुरत ही नहीं, हम तो छवियों पर जी रहें हैं। कोई मुस्कुरा दियाㄧहमें लगा प्यार ही करता है। और किसी ने ज़रा रुखाई से बात कर दी तो तुरंत हम कह देंगे कि प्यार नहीं करता।

यही कारण है कि ‘प्रेम’ㄧजो मुक्ति का वाहक होना चाहिए था; बहुत बड़ा बंधन बन गया है। क्योंकि दुनिया जान गई हैㄧआप प्रेम किसको बोलते हो। सबको पता है कि आपके लिए प्रेम क्या है। तो उनके लिए, और सबके लिए, हमारे लिए भी बहुत आसान हो गया है, अपने आपको ये जताना, या किसी और को ये जताना कि हम प्रेम करते हैं। कोई भी बहुत आसानी से आपको जाता सकता है कि वो प्रेमी है।

सबसे ज़्यादा आसानी से तो दुकानदार जाता देते हैं; वो भी भली-भाँती जानते हैं कि किन बातों को हम प्रेम का पर्याय समझेंगे, या प्रेम का इशारा समझेंगे; वो उन साड़ी बातों को अपनी दुकान में इकट्ठा कर के रख लेते हैं; चौदह फरवरी को देखिएगा। और आप ऊँचे दाम दे के खरीद लेते हैं क्योंकि: प्रेम तो बड़ी सूक्ष्म चीज़ होती हैㄧवास्तविक प्रेम, वो तो पकड़ा नहीं जा सकता था। पर प्रेम की छवियाँ बड़ी सार्वजनिक और बड़ी स्थूल होती हैं; वो पकड़ी जा सकती हैं। और दुर्भाग्यवश हमारी स्थिति ये आ गई है कि हमें प्रेम से नहींㄧमतलब रह गया है हमें सिर्फ प्रेम की छवियों से।

किसी के पास प्रेम बिलकुल न हो, हमें कोई ऐतराज़ ही नहीं होता; पर कोई की छवि न प्रदर्शित करेㄧहम तड़प जाते हैं। किसी का दिल प्यार से बिलकुल खाली हो, सूखा हो, हमें फर्क ही नहीं पड़ेगा क्योंकि दिलों में झाँकने वाली हमारे पास आँख नहीं है; पर कोई प्रेम से सम्बन्धित आचरण न दिखाए तो हम बुरा मान जाएंगे।

आपका सर दर्द कर रहा हो, दूसरा बस पूछ ले दो-चार बार, "सर दर्द कर रहा है क्या? सर दर्द कर रहा है क्या?" आपका चित्त प्रसन्नㄧये मिला खरा प्रेमी, तीन बार इसने पूछाㄧसर दर्द कर रहा है क्या? भले ही तीन बार उसकी बात सुन कर सर दर्द और बढ़ गया हो, क्योंकि सर दर्द की ये बुरी आदत हैㄧउसके बारे में जितना सोचो, उसकी ओर जितना ध्यान दो, वो उतना बढ़ता है। लेकिन हमें बड़ा अच्छा लगता हैㄧकोई सहला गया। प्रेम शय ही दूसरी है, बिलकुल दूसरी है। लेकिन जैसा मैंने कहा - पिक्चरों ने हमारा दिमाग खराब कर दिया है। पिक्चर से मेरा अर्थ मूवीज़ ही नहीं है, पिक्चर माने छवि।

समझ रहे हो न?

प्रेम तलवार की धार है।

प्रेम-प्रेम सब कोई कहे, प्रेम न जाने कोई।

जा मारग साहिब मिलें, प्रेम कहावे सोई।।

प्रेम का एक ही लक्षण है: साहिब से मुलाक़ात करवा रहा है या नहीं; इसी कसौटी पर कस लेना। जा मारग साहिब मिलें प्रेम कहावे सोइ। जिसको तुम अपना प्रेमी कहते हो, उसके साथ रहने से साहिब के पास पहुँचते हो या नहींㄧअपने आप से ये सवाल पूछ लो। द वन यु आर विथ, डज़ ही हेल्प यु, एनेबल यू टू गिव प्रोक्सिमिटी विथ ‘हिम’? दैट्स द लिटमस टेस्ट।

बात आ रही है समझ में?

प्रेम-प्रेम सब कोई कहे, प्रेम न जाने कोई।

जा मारग साहिब मिलें, प्रेम कहावे सोई।।

जिसको अपना प्रेमी कह रहे हो, वो तुम्हें किसके दर्शन करा रहा हैㄧअपने या साहिब के? जो तुम्हें अपने ही दर्शन करता रहे और तुम्हारा ही दर्शन करने को व्याकुल रहे, कि देवीㄧदर्शन कराओ, अपने मूल रूप में, और मूल रूप माने क्या? प्राकृतिक रूप, निर्वस्त्र हो जाओ और दर्शन दो; उसको जान लेना कि एक ही तरह का दर्शन जानता है ये। और एक होता है प्रेमी जो कहता है, “हमारी ओर क्या देखते हो? जो देखने लायक है उसकी ओर देखो न।”

अब उसके साथ उलझन होगी; तुम कहोगे “ये प्रेमी कैसा है? न ये हमारी ओर देखता है, और न चाहता है कि हम इसकी ओर देखें। ये कह रहा हैㄧचलो दोनों मिल कर ‘उधर’ देखें। और उधर क्या है ये हमें पता नहीं, इधर क्या है हमें खूब पता है। इधर तुम भी जवानㄧहम हसीन, दोनों आकर्षक, दोनों एक दूसरे की ओर देखें न; क्या अद्भुद मज़ा है। पर ये पगला बता रहा है कि न तुम हमें देखो न हम तुम्हें देखें दोनों आसमान की ओर देखें। आसमान में है क्या? बहुत ध्यान दिया तो एक कौआ नज़र आया।” अब उलझन होती है तुम्हेंㄧ‘कौन सा प्रेमी?’

कोई मिल जाए ऐसा जो दिनभर तुम्हें ही ताकता रहे; लगे फ़िल्मी गाने गुनगुनाने: दिल में हो तुम, आँख में हो तुम, मुँह में हो तुम, नाक में हो तुम। जाने ये साँस कैसे लेते हैं, मुँह-आँख-नाक, जितने शरीर के द्वार है सब में तुम्हीं को भर लिया है। तो बड़ा अच्छा सा लगता है न? कितने ही वंश ऐसे ही बन गएㄧबढ़ गए। बस दो-चार बार यही गुनगुनाना होता है, दिल में हो तुम, कान में हो तुम, नाक में हो तुम, मुँह में हो तुम; प्रेम डन।

और रही-सही कसर शायरों ने पूरी कर दीㄧ‘रात भर तुम्हारा ही तसव्वुर रहा’। अहंकार और चाहता क्या है? वो तो अपूर्णता में जीता है; उसे चाहिए कोई जो उससे एक मीठा झूठ बोल दे। क्या मीठा झूठ? कि तुम पूर्ण हो, तुममे कोई कमी नहीं, तुममे कोई खोट नहीं, तुम इतने पूर्ण हो कि हम दिन-रात तुम्हारा ही सुमिरन करते हैं। तो वो प्रेम जो अहंकार से आज़ादी का वाहक बनना चाहिए थाㄧसबसे बड़ी गुलामी बन जाता है। बड़ी उलझन हो जाएगी जब आप इस कसौटी पर कसेंगे अपने प्रेमी को कि इसने साहब से मिलवाया या नहीं मिलवाया। अधिकांश मामलों में तो खेल ही उल्टा रहता है; आप साहब की ओर जा भी रहे हो तो पीछे से साथी खींच लेगा टांग।

मैं होटल में कबड्डी का मैच देख रहा थाㄧवहाँ मध्य रेखा है, बीच में। एक पाला इधर, एक पाला उधर और बीच में हैㄧरेखा। अब वो खिलाड़ी पूरी जान लगाकर कोशिश कर रहा है कि रेखा को छू लूँ, इससे पहले कि साँस टूट जाए; बात समझना। जैसे जीवन में साँस टूटती है वैसे कबड्डी का खेल भी तब तक चलता है, जब तक साँस हैㄧसाँस टूटी नहीं कि तुम बाहर, और वहाँ पर तो साँस बहुत थोड़ी देर को रहती है। साँस बांधनी पड़ती है वहाँ पर; और बहुत थोड़ी देर को बांध सकते हो तुम; उतनी देर में तुम्हें दूसरे पाले से अपने पाले में वापस आना पड़ता है। खेल में एक अनिवार्यता है कि अपना पाला छोड़ना पड़ेगा, और खेल की ये मांग है कि अपना पाला अगर छोड़ा है तो फिर दूसरे पाले में जा कर, काम पूरा कर के सकुशल वापस भी आ जाना। और दूसरे पाले वालों की लगातार क्या कोशिश रहती है? कि तुम अपने पाले में वापस जाने न पाओㄧतुम्हारी साँस यहीं तोड़ दें हम। अधिकांश प्रेमी ऐसे ही होते हैं।

तो मैंने देखा कि वो बेचारा अपने पाले में जाने की कोशिश कर रहा है वापस और पीछे से चार ने उसकी टांग पकड़ रखी है, और वो लड़खड़ा रहा है और पूरी कोशिश कर रहा है कि किसी तरीके से वो रेखा एक बार छू दूँㄧमुक्ति मिल जाए। अरे काहें को छूने दें! चारोㄧ'घोर प्रेमी', ऐसे प्रेमी न देखे हों। वो मारा गया बेचारा, बहार मुँह लटकाए खड़ा है, कि अब कोई दूसरा साथी झिलाए तो फिर हम वापस आएँ। साहिब से मिलाना तो दूर की बात है, यहाँ तो जो साहिब की ओर जा रहा हो उसकी भी टंगड़ी पकड़कर खींच लो। और आम प्रेमियों कि दृष्टि में इससे बड़ा अपराध दूसरा नहीं होता कि तुमने हमें छोड़कर साहिब को भी कैसे देख लिया; ‘हम ही हैं अव्वल’, ‘पहला नंबर हमारा होना ही चाहिए’; ‘परमात्मा भी हमसे बाद में आता है’, ‘हमें ही ताको दिन रात’।

बचोगे कैसे? जिधर भी जाओगेㄧफ़िल्मी गाने तो हर तरफ है न? मैं क्यों ज़िक्र कर रहा हूँ बार-बार उनका? क्योंकि हमारी चेतना किस हद्दतक प्रचलित सभ्यता से बानी हैㄧबल्कि संस्कृति से बानी है, इसका आपको अभी अनुमान ज़रा काम होगा। हमारी चेतना हमारी नहीं है, हमारी चेतना सार्वजनिक है। हमारी चेतना हमने बहार से सोखी है; इसलिए मैं कहता हूँ हमारी चेतना फिल्मों की है। जो बात मैं कह रहा हूँ सच्ची है और हर सच्ची चीज़ की तरह खतरनाक है। क्योंकि ये बात सुनने वाले से अपेक्षा करती है कि वो अपने रिश्तों को एक नई और साफ़ नज़र से देखे, और फिर जो धर्मोचित बदलाव हो उसको लाए।

तो सोनाली तुम्हें हर्ष को लेकर के जाना है उस द्वार की ओरㄧऔर वो तो बच्चा; जो परमात्मा से नहीं मिला वो तो अभी बच्चा। बड़प्पन तो एक ही होता हैㄧ’बड़े से मिल जाना’। जो ही कोई अभी उस बड़े से नहीं मिला वो क्या है?

प्र: बच्चा।

आचार्य: भले उम्र उसकी अस्सी साल की ही हो, पर उसको यही मानो कि शिशु है। इसीलिए देखते नहीं हो संतों कोㄧउनके सामने कोई भी आए तो क्या बोलते हैं? ‘अरे बच्चा!’ क्योंकि वयस्कता तो तभी आती है जब विराट से मिलन हो जाए, वो हुआ नहीं है तो अपने आप को छौना ही मानते रहो। अब ‘इस’ छौने को लेकर के तुमको जाना है, और ये बहुत समझता नहीं; समझता होता तो इतनी दूर (विराट से) तो नहीं होता; ये दूर है इससे सिद्ध हो जाता है कि नासमझ है, और क्योंकि ये नासमझ है इसलिए ये अपनी समझ के अनुसार तो वहाँ तक जाएगा नहीं। कि जा सकता है? इसे कैसे ले कर के जाओगी वहाँ तक? और ले कर के तो जाना ही है। कैसे भी ले कर के जा सकती होㄧप्रेम में सब जायज़ है। बस एक चीज़ नाजायज़ हैㄧकि तुम उसको साहिब की ओर ले जाने की जगह कहीं और ले गई; कहीं और तो क्या ले जाते हो, अपने ओर ही ले आते हो।

जैसे भी हर्ष को वहाँ तक ले जाना है, लेकर जाओ। कभी हाँथ पकड़ना पड़ेगा, कभी हाथ छोड़ना पड़ेगा, कभी गोद में उठा कर ले जाना पड़ेगा, कभी कंधे पर, कभी एक चपत भी लगानी पड़ेगी, सब चलेगा। क्या नहीं चलेगा? उसको भ्रमित करना नहीं चलेगा। मिलना भी चलेगा, बिछुड़ना भी चलेगा; मिठाई भी चलेगी, जुदाई भी चलेगी; ‘अधर्म नहीं चलेगा’।

और इस बात का कोई महत्व नहीं है कि तुमने कितना समय, शारीरिक रूप से उसके साथ बिताया। प्रेम का मतलब ये नहीं होता कि हम तुम एक ही घर में रहें, प्रेम का ये नहीं मतलब होता कि हम तुम एक-दूसरे के सामने बैठें, या एक ही बिस्तर पर लेटें। एक और एक मात्रा कसौटी क्या है? दोहराइये, ‘साहिब के पास ले गए या नहीं ले गए’। अगर किसी के साथ रह कर साहिब के पास ले जाने में मदद मिलती है तो उसके साथ रहो, रोज़ रहो; तुम्हें सुविधा न हो तो भी रहो, तुम्हारी जान जाती हो, तो भी रहो। और कभी अगर ज़रूरत ऐसी दिखाई दे कि उसके साथ रहने के कारण ही वो साहिब के पास नहीं जा पा रहा, तो तत्काल उससे कह दो कि तुम्हारे साथ नहीं रहेंगे, क्योंकि तुम्हारे साथ रहते हैं तो तुम हम ही से संतुष्ट हो जाते होㄧदूरी ज़रूरी है।

बात आ रही है समझ में?

चलो साहिब नहीं समझ आते, कोई बात नहीं। आप सब प्रौढ़ हैं, आधे लोग तो दैहिक उम्र में मुझसे आगे के हैंㄧबच्चे तो होंगे, बहुतों के होंगे; जिनके अपने नहीं हैं उनहोंने भी रिश्तेदारी में आस-पड़ोस में तो बच्चे देखे होंगे, पाले होंगे, बड़े भी किए होंगे। बच्चा है छोटा, उसको इंजेक्शन लगवाना है, वैक्सीन है मान लीजिए कोईㄧपोलियो की, या तमाम तरह के और टीके लगते हैं, हमारे समय में तो बहुत सारे लगते थे, अब सुना है कि एक-दो से ही काम चल जाता है। आप बच्चे को समझा लेंगे कि वायरस क्या होता है और एंटी वायरस क्या होता है? आप उसे समझा लेंगे कि इम्युनिटी कैसे काम करती है, और इम्यूनाइज़ेशन क्या होता है? तो ठीक है भाई, अभी तो उसने समझा नहीं, तो छोड़ दीजिये कि जब समझेगा और अपनी सहमति देगा, तब उसका टीकाकरण होगा। छोड़ देंगे?

जैसे होगा वैसे उसको ले जाएंगे, हाँ, ये कोशिश कर लीजिएगा कि असुविधा काम-से-कम हो तो अच्छा; प्रक्रिया में कष्ट काम-से-काम हो तो अच्छा। पर किसी वजह से प्रक्रिया में कष्ट देना भी पड़ता है, तो देना होगाㄧभले बच्चे को बुरा लगेㄧभले आपको बुरा लगे। या नहीं दोगे? अब बच्चा बोल रहा है “नहीं लगवाएंगे सुई।” तुम कहोगे “जी आपकी इच्छा का सम्मान करते हैं; संविधान ने सबको हक़ दिया है, अपनी मर्ज़ी अनुसार जीने का।” ये कहोगे? बच्चा है न?

और मैं कह रहा हूँㄧ‘अध्यात्म में सब बच्चे हैं’; वहाँ सिर्फ शारीरिक उम्र नहीं देखी जाती। लेकिन जो मैंने बात बोली, वो अहंकार को बहुत रुचेगी, तुरंत उसका अभ्यास मत करने लग जाइएगा। प्रेम का अर्थ ये नहीं होता कि अपनी इच्छा दूसरे के ऊपर थोप दी, और फिर कह दिया कि देखोㄧबच्चों की इच्छा का सम्मान थोड़े ही किया जा सकता है; हम बड़े हैं हमें हक़ है कि हम अपने इच्छा अनुसार दूसरे को चलाएँㄧयही तो प्रेम है। न बाबा!

सर्वप्रथम आपको ये देखना होगा कि आपके मन में दूसरे के हित की कामना है या अपने हित की कामना है। और जब तक आपको इसकी पूर्ण आश्वस्ति न हो, दूसरे के साथ कोई चाल मत चलिएगा। नहीं तो ये बहुत संभव है कि दूसरे का भला करने के नाम पर आप अपना ही स्वार्थ साध रहें हों और कह दें कि आचार्य जी ने ही कहा था कि साम-दाम-दंड-भेद कुछ भी प्रयुक्त करना, पर टीका लगवाना तो ज़रूरी है न, तो ये मानती नहीं थी, सुनती नहीं थी, तो हमने खूब झूठ बोल कर इसको लगवा दिए हैं टीके।

तो सर्वप्रथम अपने मन का शोधन करना पड़ेगा; सबसे पहले अपना मन साफ़ होना चाहिए। जब तक तुम्हें यही नहीं पता कि साहब कौन, साहब की भव्यता क्या और साहब पहुँचना ज़रूरी क्यों, तब तक तुम दूसरे को क्या खींच-तान के ले जा रहे हो। कहीं ऐसा न हो कि तुम साहब को भी अपने स्वार्थ का साधन बना लो।

समझ में आ रही है बात?

देखो कि तुम्हारा गहनतम हित कहाँ पर है; जब अपना हित समझोगे तो साथ में ये भी समझ जाओगे कि किसी भी अन्य व्यक्ति का हित कहाँ पर है, क्योंकि मूलतया हम सब के हित एक हैं। स्वार्थ सबके अलग-अलग होते हैं, हित पूरी मानवता का साझा है; हित नहीं अलग-अलग होते। और अगर दिखाई दे कि दो लोगों की इच्छाएँ आपस में टकरा रही हैं, तो समझ जाना कि दोनों अपना-अपना स्वार्थ ही साध रहें हैं, या कम-से-कम उनमें से एक ऐसा है जो स्वार्थ साध रहा है। दो संतों की इच्छाएँ आपस में कभी नहीं टकराएंगी, इसी तरीके से दो ज्ञानियों की इच्छाएँ कभी आपस में नहीं टकराएंगी, क्योंकि उनकी इच्छा अब हित के साथ जुड़ गई है और हित तो सबके एक होते हैं।

अपने मन से जानिए मेरे जिउ की बात।

प्रेम का कबीर साहब ने यही लक्षण बताया है। ‘अपने मन से जानिए मेरे जिउ की बात’ㄧअपना मन समझ गए अगर तुम तो मेरा मन भी समझ जाओगे। और जब तक अपना मन नहीं समझे हो, उसका टीकाकरण मत करा देना। अध्यात्म का मतलब ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं होता; दूसरे के ऊपर विधियाँ भी प्रयुक्त करने का अधिकार सिर्फ उसको है जो निस्वार्थ-निष्काम हो। नहीं तो तुम्हारी विधी फिर विधि नहीं हैㄧवो चालाकी है, धूर्तता है; वो फिर प्रेम नहीं हैㄧकपट है।

एक-दूसरे से जुड़ने का, रिश्ता बनाने का ये बड़ा अलग तरीका है। यहाँ तुम कहते हो कि मेरा-तेरा एक ही रिश्ता हो सकता है: ‘तेरा हित और मेरा हित, आख़िरी हित’। हमारा रिश्ता इसलिए तो हो ही नहीं सकता कि ‘मैं भी डूबूँ और तू भी डूबे’, ये कोई रिश्ता हुआ? तेरा-मेरा रिश्ता तो इसलिए हो ही नहीं सकता कि तुझे भी क्षणिक, शारीरिक उत्तेजना मिले, मुझे भी मिले और शरीर के द्रव्यों में ही हम गोता मारते रहें। ये कोई रिश्ता हुआ? तू मेरे शरीर में घुसा हुआ है, मैं तेरे शरीर में घुसा हुआ हूँ। कौन सा तीर्थ है वहाँ?

आ रही है बात समझ में?

अब दिक्कत ये है कि इस तरह के रिश्ते में ग्लैमर कि बड़ी कमी नज़र आती है। कहते हैं "ये तो बड़ा रूखा-सूखा लग रहा है; वो लाल-पीली-हरी बत्तियों का क्या हुआ? वो गिटार और वायलिन का क्या हुआ? वो फूल नहीं झड़ेंगे आसमान से? और वो नग़में, वो ग़ज़लें, उनका क्या हुआ?" ये तो दिक्कत है।

पर देखो भाई, ऐसी शायरी भी है जो साहब के लिए की गई है, ग़ालिब भी सूफी ही थे। तुम्हें वो शायरी ढूंढनी पड़ेगी और न मिले तो रचनी पड़ेगी। फूल वैश्यालय में भी होते हैं और देवालय में भी होते हैं; तुमसे किसने कह दिया कि देवालय में फूलों के लिए जगह नहीं। खुशबू सुहाग-रात के बिस्तर पर भी की जाती है और पूजा घर में भी जाती है; तुमसे किसने कह दिया कि असली प्रेम में खुशबू के लिए जगह नहीं।

तो ग्लैमर की उतनी भी कमी नहीं है। कि है?

फूल और खुशबू एक सुन्दर रिश्ते में भी हो सकते हैं। कि नहीं हो सकते?

और मैं तुमसे कह रहा हूँ, फूल भी जब तुम स्वार्थ और वासना के लिए इस्तेमाल करते हो तो जान लेनाㄧफूल भी बुरा मानते हैं। कहते हैं “एक तो हमारी जान गई और दूसरा हमारा इस्तेमाल घटिया। चलो जान की हमें बहुत फिक्र नहीं, आज नहीं तो कल झाड़ ही जाते, पर कम-से-कम हमारा इस्तेमाल तो ठीक कर लेते।

छोटे थे तो स्कुल के पाठ्यक्रम में एक कविता होती थी, जिसमें फूल की इच्छा का ज़िक्र किया गया थाㄧ‘पुष्प की अभिलाषा’। याद है किसी को? मुझे याद नहीं।

श्रोता: ‘चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूथा जाऊँ’।

आचार्य: आगे बोलो।

(श्रोतागण हँसते हैं)

‘मुझे तोड़ लेना वनमाली मुझे उस पथ पर देना फेक, मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जाते वीर अनेक’। ठीक?

चलो वो देशभक्ति की बात हो गई। देशभक्ति से भी आगे हैㄧ'साहब की भक्ति’। पर फूल भी यही कह रहा है कि कहाँ सुरबाला के गहनों के लिए मेरी जान ले रहे हो? तुम्हारी सुरबाला दो कौड़ी की नहीं। कुछ ढंग का इस्तेमाल करो भाई मेरा।

बात समझ में आ रही है?

और वो श्रृंगार, वो रस, वो आभूषण, वो आयोजन, वो सौंदर्य, वो अप्रतिम होता है, अपूर्व होता है; उसकी तुलना आप वासना के नृत्यों से नहीं कर सकते। मीरा जब कृष्ण के लिए नाचती हैं और गाती हैं और सजाती हैंㄧउनके बोल, उनकी मिठास, उनका सौंदर्य, उनका नृत्य, उसकी एक झलक भी जिसको मिल गई वो फिर आम स्त्री-पुरुष के भड़कीले सौंदर्य को कई मूल्य नहीं दे सकता।

तो डरो मत, असली प्रेम में जीवन रस से, सौंदर्य से, अलंकार से खाली नहीं हो जाने वाला; बल्कि एक ऊँचा सौंदर्य, एक ऊँचा गीत, एक ऊँचा अलंकरण जीवन में उतरेगा। अभी तो हमें सुंदरता का कुछ पता ही नहीं, तभी तो सुंदरता के नाम पर ब्यूटी सलून चलते हैं। सुंदरता का हमें पता होता तो मुँह पर हम चीज़ें थोपते? सुंदरता का हमें कुछ पता होता तो हम गहनें धारण करते। ये तो छोड़ दो कि तुम्हें प्रेयसी की आत्मा से मतलब है, तुम्हें तो उसका शरीर भी ठीक नहीं लगता; तुम कहते हो “अभी शरीर भी ठीक नहीं है, जा गहने पहन के आ।” हम तो ये भी कहें कि इन साहब लोगों को बस खाल से प्यार है, तो वो भी झूठ है। हमें खाल से भी नहीं प्यार है, हम कहते हैं “खाल भी पहले सजाओ।”

ये सब बचकानी चीज़ें पीछे छूट जाएंगी; रस ही रास रहेगा। साहब के बारे में जानने वालों ने जानते हो न क्या कहा है? ‘रसो वै सः’ वह रस स्वरुप ही है। ‘पी ले प्याला हो मतवाला, प्याला नाम अमीरस का रे’ यों ही थोड़े ही बार-बार कहा गया है कि ‘साकी’ है और ‘जाम’ है; कुछ रस तो होगा ही, रस के बिना कैसा जाम। बड़ा मादक रस है, उसकी बात दूसरी है; ये छोटी-मोटी आशिकी भूल जाओगे। जिसको उसका ख़ुमार चढ़ गया, वो फिर असली आशिक हो जाता है; वो फिर ये दो टके की आशिकी नहीं करता।

जीव को एक ही झंझट है, उसका जीव रूप; तो एक ही उसकी हसरत भी है: मुक्ति; तो एक ही फिर उसका प्रियतम भी हो सकता है: वो जो परम मुक्त है। बाकी कौन सी आशिकी कर रहे हो? किस झंझट में पड़े हो? जो बेड़ियों में है उसे प्यार सिर्फ आज़ादी से ही हो सकता है न? तो तुमने किससे प्यार कर लिया? द वन हु इज़ इन फेटर्स कैन जस्टिफ़ाइबली लव ओनली फ्रीडम। नाउ व्हाट आर यू आफ्टर?

इधर-उधर का अंट-शंट प्यार तो वही करेंगे जिन्हें अपनी हालत का कुछ संज्ञान ही न हो; जिन्हें ये पता ही न हो कि उनकी हालत क्या है, वही दो कौड़ियों के प्यार में पड़ेंगे। वो प्यार नहीं है, वो बेहोशी है।

अभी लखनऊ से आ रहा हूँ, ‘शतरंज के खिलाड़ी’ याद आ गई। तो दुश्मन की फौजें घुसी आ रही हैं और मियाँ साहब और शेख साहब लगे हुए हैं शतरंज में, क्योंकि उन्हें पता ही नहीं है कि वो किस आपदा से घिरे हुए हैं, उन्हें अपनी विपत्ति का कुछ पता नहीं, तो वो मशगूल हैं। घंटा-घंटा भर ले कर के प्यादा सरकाया जा रहा है, और हुक्का। वैसे ही हमें नहीं पता कि हमारी हालत क्या है। वो भैसे वाला काला सरदार, भैसा दौड़ाता हुआ चला ही आ रहा है और यहाँ प्रेम-पत्र लिखे जा रहें हैंㄧ‘हम जनम-जनम तुम्हारे हैं’, और भैसे वाला बोल रहा है “तू इस जनम का तो देख ले, बचा कितना है? पचास जनम की क्या बात कर रहा है?” और वो पूछ भी रही है “वादा करो तुम इस जनम नहीं हर जनम हमारे रहोगे।” अरे पगली वो इस जनम का भी वादा करने की स्थिति में नहीं है। उसका ये जनम भी बस गया ही समझो। पर उसे अपनी हालत का ज़रा भी अनुमान नहीं, संज्ञान तो पीछे की बात, उसे अपनी हालत का ज़रा भी कुछ अनुमान तक नहीं है।

जैसे किसी इमारत में आग लगी हो, और एक युवा जोड़ा काम-क्रीडा में मग्न हो; वो न एक दूसरे को छोड़ रहे हैं न बिस्तर को छोड़ रहे हैं। और जितनी आग बढ़ती जा रही है, उतना वो कह रहे हैं “बेबी इट्स वैरी हॉट।” आज तो मामला ज़्यादा ही हॉट है, आज तो देर तक खिचेगा। तुम्हे पता ही नहीं है कि जीवन क्या है? जीवन का उद्देश्य क्या है? हमारी हालत क्या है? घर पूरा जल रहा है, तुम किन लफड़ों में फसे हो? जान बचाओ। भागो! बस थोड़ी सी देर बाद लपटें तुम्हें भी घेर लेंगी।

तुम कहाँ लड़ रहे हो कि आज नाश्ता कौन बनाएगा और तुम मुझे ज़्यादा समय क्यों नहीं देते और तू मेरी माँ का ख्याल क्यों नहीं रखती। माँ को मृत जानो, स्वयं को भी मृत जानो, बच्चे को भी मृत जानो; हम सब मरणधर्मा हैं। अब बताओ तुम कहाँ फसे हुए हो। चिता पर नाश्ता करोगे? कब्र से पूछोगे कि मेरी माँ को दवा दी कि नहीं दी?

हमने तो नहीं सुना कि जहन्नुम में भी ब्यूटी पार्लर होते हैं, और रहना वहीं है ज़्यादा समय; स्वर्ग में उनकी ज़रूरत नहीं होती, और नर्क में वो पाए नहीं जाते। तो यहाँ इतना समय शरीर को अलंकृत करने में क्यों गवा रहे हो भाई? क्योंकि इरादा ये है कि कोई रीझे, कोई हमें साहब का पर्याय बना ले, बल्कि साहब का विकल्प बना ले, कोई हमें इतनी हैसियत दे जितनी वो परमात्मा को भी नहीं देता; ये तो इरादे हैं।

अभी गए दिनों मैं आई.आई.टी. के अपने कुछ पुराने दोस्तों से मिला; बहुत-बहुत कमा रहे हैं। फिर रात के दो तीन बजे जब सब बिलकुल टुन्न हो गए, तो मैंने कहा ज़रा बात-चीत की जाए, अब ये बोलेंगे। जब तक ये बेहोश नहीं होते, तब तक सिर्फ ऐक्सेंट बोलता है, ये नहीं बोलते। तो मैंने कहा “अब बोलेंगे।” मैंने पूछना शुरू किया “क्या कर रहे हो? चालीस पार कर गए। जब कैंपस से निकले थे तो बात दूसरी थी, इरादे दूसरे। कर क्या रहे हो? और जहाँ तक मुझे याद हैㄧलालची तुममे से कोई नहीं था।” सब मौज में छह-सौ-बीस नंबर पर बैठ कर पिक्चर देखने जाते थे, कोई लालची नहीं था। दो रूपए का समौसा, पाँच रूपए का डोसा खाते थे कैंटीन में और मौज में रहते थे।

पहले तो इधर-उधर की बात “नहीं देखो… ये-वो, मैन मस्ट प्रूव हिमसेल्फ… ऐसा-वैसा। मैंने कहा अभी भी ये खुल नहीं रहें हैं, मैंने कहा "ये लो और पियो अभी।”

(श्रोतागण हँसते हैं)

ये सब करना पड़ता है। तो बोले कि अब हवाई जहाज़ उड़ चूका है और इतनी आगे बढ़ आया है कि वापस लौटने जितना ईंधन शेष नहीं है; अब जो जिधर को जा रहा है, उधर को ही जाएगा, अब वापस नहीं लौट पाएंगे; दिख भी रहा है कि गड़बड़ हो गई पर अब बहुत आगे आ गए हैं। और बात हमारी नहीं है, हम अभी भी शायद वैसे जी लें जैसे हॉस्टल में जीते थे, पर कुछ और दिखा कर बहुत सारे रिश्ते बना लिए हैं, वहाँ क्या जवाब देंगे? वहाँ तो रिश्ता बनाया ही ये दिखा कर था कि हम बड़े पुरुषार्थी हैं, बड़े कमाऊ हैं, बड़े कर्मठ हैं। आओ हमारे साथ हमारे साथ आओगे तो हम तुम्हें इस प्रकार का जीवन, इस प्रकार की लाइफस्टाइल देंगे। यही वादा कर के कई रिश्ते बना लिए, उनको अपने जीवन में ले आए। अब उनको क्या बोलें? कैसे पीछे हट जाएँ?

ये बात बेबसी भर की नहीं थी, इसमें अहंकार भी शामिल था। तुम चाहते हो कि अपना दम, अपना पैसा, अपनी काबिलियत दिखा कर, किसी की नज़रों में महत्वपूर्ण बने रहो। ले देकर बात वही आती है कि हम इतने क़ाबिल और इतने बड़े हैं कि परमात्मा का विकल्प बन जाएंगे। अब हमें साथी को साहब तक पहुँचाने की ज़रूरत नहीं, हम कह रहें हैं कि देखो, हम ही तो साहब हैं, हम इतने बड़े हैं, तुम हमारी ही शरण में आ जाओ, साहब तक जा कर क्या करोगे? ये प्रेम हुआ? ये प्रेम हुआ?

‘प्रेम पंख देता है, पिंजड़ा नहीं’।

यही सवाल करो अपने आप से: तुमने अपने साथियों को पंख दिए या पिंजड़े? और अपने साथियों को भी ऐसे ही देख लो, उन्होंने तुम्हें पंख दिए या पिंजड़े?

प्र: यदि मुझे ही साहब (भगवान) का पता नहीं है, तो मैं दूसरों को कैसे बताऊंगा?

आचार्य: कहा है कि मुझे ही जब पता नहीं है कि साहब कहाँ हैं तो किसी को क्या दिखाऊँ। गौतम ने कहा कि दूसरे को दिखने चलते हैं तो उसकी अपनी ज़िद होती है, अपने आग्रह होते हैं। और इतना सुनिश्चित तो मैं भी नहीं हूँ कि अपनी बात उसके ऊपर आरोपित ही कर दूँ, चढ़ ही बैठूँ। तो फिर मैं छोड़ ही देता हूँ, कि भाई तुम अपनी मर्ज़ी करो, हमें हमारी राह चलने दो। मैंने ठीक समझा आप दोनों की बात?

देखो, मैंने बोला कि दूसरे को द्वार तब दिखाना जब पहले तुम्हें द्वार का स्वयं कुछ पता हो। मैं आभारी हूँㄧआप लोगों ने ये सवाल पूछा, इस सवाल के माध्यम से मुझे अपनी बात को आगे बढ़ने का मौका मिल रहा है। हम सब क्योंकि परस्पर रूप से जुड़े हुए हैं, इसीलिए साहब तक एकाकी यात्रा हो भी नहीं पाती। साहब तक जाने के लिए बहुत बार ये आवश्यक हो जाता है कि दूसरे के साथ ही जाओ। साथ हमारा तथ्य है, क्योंकि हम सब एक भी हैं और सम्बंधित भी हैं। कई बार साहब की ओर अगला कदम तुम ले तब पाओगे पाओगे जब दूसरे को रास्ता दिखाओगे।

आज से पंद्रह साल पहले जब मैंने पढ़ाना शुरू किया तो किसी ने मुझसे पूछा था “पढ़ना क्यों चाहते हो?” मैंने कहा “क्योंकि सीखना चाहता हूँ। दूसरों को रास्ता दिखाऊंगा तो मुझे भी रास्ता ज़रा और साफ़ दिखेगा।” कई बार अपनी मदद करने का सर्वश्रेष्ठ तरीका होता है दूसरे की मदद करना। दूसरे को तुम रास्ता दिखने चलते हो, दूसरे को तुम कुछ बात सुधाने चलते हो और वो विरोध करता है, तर्क देता है। उसके तर्कों को तुम दूसरे का व्यक्तिगत तर्क मत मान लेना, न उसका विरोध उसका व्यक्तिगत विरोध है। क्योंकि हम सब के मन एक हैं, इसलिए दूसरे का कुतर्क तुम्हारा भी कुतर्क है। दूसरा साहिब की ओर जाने के विरूद्ध जो विरोध दे रहा है, वो विरोध तुम्हारे मन में भी मौजूद है साहिब की ओर जाने के प्रति। मूल अहम् ग्रंथि तो एक ही होती है न?

दूसरे की बात सुनोगे, तुम्हें अपने चित्त का कुछ पता चल जाएगा। दूसरे की बाधाएँ देखोगे तुम्हें अपनी बाधाओं का पता चल जाएगा। इसीलिए जब दूसरे की मदद करोगे कि वो अपनी बाधाओं को लांघे, तो तुम वास्तव में अपनी भी मदद कर रहे हो।

बात समझ में आ रही है?

इसी तरीके से कई बार लोगों ने मुझसे पूछा कि आप इतना बोलते हैं, बोलते ही जाते हैं। आपको कैसे पता कि किसी का कोई फायदा होता भी है या नहीं? मैंने कहा “होता होㄧन होता हो, मुझे तो होता है? मुझे अपना पता है।” क्योंकि जब मैं बोलता हूँ तो तुम ही थोड़े ही सुन रहे हो? मैं भी तो सुन रहा हूँ। जिस तरीके से आप शायद पहली बार सुनते हैं मेरी कोई बातㄧमैं भी तो पहली बार अपनी ही बात सुनता हूँ। मैं न बोलता तो मुझे भी पता न चलता उस बात का। और अगर उस बात से मेरी मदद हो पाई तो मैं आश्वस्त हूँ कि आपकी भी मदद हो रही होगी। तो ले-देकर आपकी मदद करने की प्रक्रिया में किसकी मदद हो गई? मेरी मदद हो गई।

‘परमार्थ बहुत बड़ा स्वार्थ है’। स्वार्थी होकर तुम एक सीमा से ज़्यादा अपना स्वार्थ पूरा भी नहीं कर पाओगे। और अगर तुम्हें अपने स्वार्थ की वास्तव में फिक्र हो तो परमार्थी हो जाना। तुम चाहोगे कि तुम्हारा भला हो, थोड़ा बहुत भला होगा, बहुत सीमित और जो सीमित है वही कष्ट देता है। तो अपना भला करने की प्रक्रिया में अपने आप को कष्ट और दे लोगे। सीमित सुख को ही तो दुःख बोलते हैं। और एक सीमा से ज़्यादा अगर अपना भला करना चाहो तो परमार्थ करो, दूसरे का भला करो, तुम्हें पता भी नहीं चलेगा, तुम्हारा भला हो जाएगा। तुम चाह भी नहीं रहे हो कि तुम्हारा भला हो, और चुपके-चुपके हो गया। तुम्हें पता भी नहीं चलाㄧतुम आगे बढ़ गए।

बात आ रही है समझ में?

इंतज़ार मत करिएगा कि जिस दिन मुझे शत प्रतिशत स्पष्टता हासिल हो जाएगी, ओ साथियों! उस दिन मैं तुझे राह दिखने आऊंगा। क्योंकि शत प्रतिशत स्पष्टता कभी हासिल होने नहीं वाली। और दूसरा अगर कोई आपको उलाहना दे, ताने मारे कि अभी तुम्हें ही क्या पता है जो हमें बताने आए हो। तो भी विनम्रता के साथ सर झुका कर कहिएगा कि बात तो तूने बिलकुल ठीक कही पता तो हमें वास्तव में कुछ नहीं है, इसीलिए तो तेरे पास आएँ हैं, तू भी चल हम भी चलते हैं, पता करते हैं। साथ-साथ पता करेंग, बड़ा आनंद रहेगा। ‘न तुम जानो न हम, चलो फिर साथ सनम’। अब ये बात मज़ेदार है।

तो ये कहके रुक मत जाना कि अभी जब खुद ही नहीं पता तो क्या बताएँ। मुझे क्या पता है? मैं सोचने लग जाऊँ कि मुझे क्या पता है कि मैं बताऊंगा, तो फिर तो मैं कभी इस द्वार के भीतर ही न आऊँ, मैं बहार खड़ा हो कर सोचूँ कि पता क्या-क्या है और अंशु से कहूँ “अंशु सिलेबस क्या था?” और कोई भी सवाल आउट ऑफ़ सिलेबस नहीं होना चाहिए। पहले से ही बता दो आज सवाल क्या आने वाले हैं और दो दिन दो, पहले तैयारी करेंगे। आधे सवाल तो ख़ारिज करेंगे कि ये तो पाठ्यक्रम से बहार के हैं; ये क्या पूछ दिया?

हमें तो पता है कि हम कुछ जानते नहीं। आपके सामने आकर बैठ जाते हैं जाते हैं, आप कुछ पूछते होㄧबोल देते हैं। जो बोलते हैं, वो जैसे आप सुनते हो वैसे ही हम सुन लेते हैं। इंतज़ार थोड़े ही करता रहूँगा कि कोई परम दिवस आएगा, जब मैं स्वर्ग पे चढ़ के वहाँ से उपदेश दूँगा। कोई ऐसा परम दिवस आना नहीं है, न कोई स्वर्गारोहण होना है। जैसे आप, वैसे हम; आपके सामने बैठ के बात-चीत हो जाती है। और परस्पर लाभ भी हो जाता हैㄧकुछ आपका, कुछ हमारा। आ रही है बात समझ में? ऐसे ही होता है।

ये बहुत बड़ा बहाना बन जाता है, ‘कि अभी ठीक-ठीक जानते नहीं हैं, अभी ज्ञान हमारा किताबी है, जब बिलकुल ठीक जान जाएंगे, तब अध्यात्म की ओर बढ़ेंगे। अध्यात्म को तो तुम ठीक-ठीक जानते नहीं तो तुमने सिद्धान्त बता दिया कि ठीक-ठीक नहीं जानते, इसलिए अध्यात्म की और नहीं जा रहे। वो जो पकौड़ा चबा रहे हो उसे ठीक-ठीक जानते हो? और नहीं जानते तो खाया काहें? जब राम की बात आती है तो कह देते हो “अभी राम को हम ठीक-ठीक जानते नहीं, तो राम की दिशा कैसे बढ़ जाएँ?”

पकौड़ा? पकौड़ा जानते हो? बताओ कौन सा तेल है उसमें? बताओ कौन-कौन से कीड़े पड़े हैं उसमें?

तब तो भका-भक चबा गए, तब वो सिद्धान्त छुपा दिया कि जब तक जानेंगे नहीं तब तक करेंगे नहीं। और जब अध्यात्म की बात आई तब अचानक तुम्हारी ईमानदारी जग जाती है। तब तुम कहते हो “आचार्य जी हम आपको बताई देते हैं, ‘शत प्रतिशत स्पष्टता होनी चाहिए’।” अभी पूछ दूँ, जिस कंपनी में काम करते हो उसमें कौन-कौन शेयर होल्डर हैं, तुम्हें यही न पता हो; नाम भी उनके पता हों तो पूछ दूंगाㄧबताना उनकी शेयर होल्डिंग कितनी-कितनी है? तो बगलें झाँकोगे।

तब तो नहीं कहते कि दफ्तर तब तक नहीं जाएंगे जब तक बोर्ड ऑफ़ डिरेक्टर्स का और शेयर होल्डर्स का पूरा नहीं पता चल जाता। है पूरा पता? वहाँ पहुँच जाते हो, रोज़ सुबह झोला टाँग के। मंदिर जाते वक्त कहते हो “अभी पूरा पता नहीं है। ये हनुमान का मामला क्या था? बात साफ होनी चाहिए, हम अंधविश्वासी नहीं हैं।” अगर बिना पूरा पता किए मंदिर तक गए तो अंधविश्वासी कहलाएंगे; मैं पूछ रहा हूँ, तुम पूरी बात पता करके दफ्तर जाते हो?

जिन लोगों ने आयोजित विवाह किए थेㄧबीवी के बारे में पूरा पता किया था? या शौहर के बारे में? पूरा तो तुम्हें आज तक पता नहीं चला, तो घर काहे को जाते हो? वहाँ बोलते हो “अब ये देखिएㄧकृष्ण ने राधा से शादी क्यों नहीं की? इसीलिए तो हमारी भक्ति नहीं जगती। इतने दिनों तक उसके साथ झूलें झूले, शादी नहीं की? ये बात कुछ ठीक नहीं लगती हमको। और जब तक पूरी बात नहीं पता चलेगीㄧअब पूरी बात तुम जानते हो पता चल नहीं सकती, न वृन्दावन, न मथुरा, न यमुना, न झूला, न दैहिक कृष्ण, न दैहिक राधा, कौन है?" पूरी बात पता चलने का खतरा ही नहीं है तुम्हें। तो तुम सुरक्षित हो; अब कभी अध्यात्म की ओर जाना नहीं पड़ेगा, कभी अहंकार को मिटाना नहीं पड़ेगा। समझ रहे हो?

कुछ पूरा नहीं पता चलता। परम सत्य कोई ज्ञान की बात होती है कि पता चलेगा, वो भी पूरा? तुमको ये धरना दे किसने दी कि अध्यात्म ज्ञान की बात होती है? ‘पता चलेगा’ क्या पता चलेगा? कोई चीज़ होगीㄧपता चलेगी। कोई बात है? कोई कहानी है? कैसे पता चलेगी? क्या पता चलेगा?

मुझे क्या पता है? मैं फिर पूछ रहा हूँ: बताओ मुझे क्या पता है? और जो पता है वो दो कौड़ी का है; वो अधिक-से-अधिक उदाहरण देने के काम आता है; वो अधिक से अधिक वाक्य निर्माण के काम आता है। वो ऊपरी चीज़ है, आत्मा नहीं है। ज्ञान को टटोलोगे तो मरते दम तक भी यही पाओगे कि ज्ञान अपूर्ण है क्योंकि ज्ञान तो पूर्ण हो ही नहीं सकता।

तो इस फिराक में मत रहना कि ज्ञान को पूर्ण कर लेंगे; ‘पूर्ण ज्ञान जैसी कोई चीज़ नहीं होती’। प्रेम होता है, आशिकी होती हैㄧकि नहीं पता है, ज्ञान नहीं है कि दरिया कितना गहरा है पर ‘कूद पड़े’। प्रेम हो तो बात करो, यहाँ ज्ञान वगैरह का कोई हिसाब नहीं।

खुसरो दरिया प्रेम का… याद है? अरे! पता करना।

खुसरो दरिया प्रेम का उल्टी वा की धार, आगे नहीं बताऊंगा, लालच आ रहा है, पर तुम पता करना।

क्या आपको आचार्य प्रशांत की शिक्षाओं से लाभ हुआ है?
आपके योगदान से ही यह मिशन आगे बढ़ेगा।
योगदान दें
सभी लेख देखें