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लेख
अर्जुन की असल समस्या का उद्घाटन
Author Acharya Prashant
आचार्य प्रशांत
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आचार्य प्रशांत: प्रथम अध्याय पर श्लोक-क्रमानुसार पूरी चर्चा और व्याख्या हम पहले कर चुके हैं। आज हम एक-एक श्लोक को अलग-अलग न लेकर पूरे अध्याय का ही सार संक्षेप में समझना चाहेंगे, ज़रा ऊपर से देखेंगे, विहंगम दृष्टि से।

बात ही पूरी क्या है? पहला अध्याय उस समस्या को हमारे सामने रखता है जिसको फिर श्रीकृष्ण आने वाले सत्रह अध्यायों में सत्रह विधि से सुलझाते हैं। नाम है 'अर्जुन-विषाद योग’। और आज का सत्र उनके लिए तो महत्वपूर्ण है ही जो हमारे गीता-समागम, गीता-तीर्थाटन में आरम्भ से ही हमारे साथ हैं, उनके लिए विशेषतया महत्वपूर्ण है जिन्होंने हमें हाल ही में या पिछले दो-चार महीनों में साथ लिया है।

मेरे देखे पहला अध्याय चार हिस्सों में विभाजित हो सकता है, जैसे समस्या के ही चार पक्ष हों। जो उसका पहला पक्ष है वो पहले ही श्लोक में निहित है।

तो समस्या पक्ष एक — धृतराष्ट्र; धृतराष्ट्र का मोह। संयोग भर नहीं है कि श्रीमद्भगवद्गीता की पहले प्रकरण की शुरुआत ही होती है धृतराष्ट्र के वचन से, और धृतराष्ट्र का पूरे गीता ग्रन्थ को कुल योगदान यही है — पहला श्लोक, पहली बात। सात-सौ श्लोकों में बस पहली बात, कुल योगदान इतना ही है। कुल एक बात, लेकिन पहली।

तो वेदव्यास कोई साधारण चिंतक नहीं थे, अगर धृतराष्ट्र को श्लोकों के क्रम में वो सर्वोपरि रख रहे हैं तो कोई बात है। न गुरु न शिष्य, न मित्र न शत्रु, दोनों योद्धा-पक्षों में से कोई भी नहीं, किसी की बात नहीं। यहाँ तक कि जो योद्धा पक्ष में नहीं हैं, उनमें भी संजय नहीं, बल्कि धृतराष्ट्र।

इतने सेनानी हैं इस वक़्त युद्धस्थल पर — और उनके नाम आगे हमको सूचित किये जाते हैं, सूचीबद्ध रूप से सूचित किये जाते हैं — लेकिन उन सेनानियों में से कोई भी नहीं है जो गीता का आरम्भ करे। उन सेनानियों में अर्जुन भी नहीं, उन सेनानियों में अर्जुन के सारथी श्रीकृष्ण भी नहीं। और जो लोग, हमने कहा, रणक्षेत्र में नहीं हैं उन दो में से भी संजय नहीं, अपितु धृतराष्ट्र। तो कोई बात होगी।

पहला पूरा अध्याय ही जैसे बस समस्या हमारे सामने रख देता है। अध्यात्म का काम भी यही है न, समस्या को सुलझाना। समस्या न हो तो अध्यात्म की कोई आवश्यकता नहीं। अस्तित्व ही समस्या है, जीवन ही समस्या है, जीवन के निर्णय, सम्बन्ध हमारे, कर्म हमारे, विचार हमारे, उद्देश्य हमारे, यही समस्या हैं और इन्हीं को सुलझाना है।

पहला प्रकरण साफ़-साफ़ समस्या हमारे सामने रख देता है। और इस पहले प्रकरण में श्रीकृष्ण मौन हैं पूरी तरह क्योंकि समस्याओं में श्रीकृष्ण क्या योगदान दे देंगे! यहाँ तो समस्याओं को सूचीबद्ध किया जा रहा है। और मैंने आपसे कहा कि कुल जो सैंतालीस श्लोक हैं, उनको मैं चार खंडों में विभक्त कर चार मोटी-मोटी समस्याएँ देख पा रहा हूँ। जिसमें से पहली समस्या है हमारे पहले ही श्लोक के राजा धृतराष्ट्र।

विचित्र बात! श्रीमद्भगवद्गीता का उद्घाटन हो रहा है धृतराष्ट्र उवाच से। और कामना अपनी प्रस्तुत कर रहे हैं, क्या कामना प्रस्तुत कर रहे हैं? पहला श्लोक है आपके सामने — 'हे संजय, अरे धर्मक्षेत्र, कुरुक्षेत्र में बताओ मेरे पुत्रों और पांडवों ने क्या किया? क्या कर रहे हैं वो? एकत्रित हो गये हैं, क्या कर रहे हैं वो?' यही जिज्ञासा है। ‘जिज्ञासा’ इसको कहना उचित नहीं होगा, जिज्ञासा तो राजा जनक जैसों की होती है।

मेरे लिए ये बड़े आनन्द की बात है कि इन्हीं दिनों समानान्तर मुझे श्रीअष्टावक्र गीता पर बोलने का सौभाग्य मिल रहा है। और जब यहाँ मैं बात करता हूँ पहले श्लोक की तो मुझे अष्टावक्र गीता का भी पहला श्लोक याद आ जाता है। अभी मुश्किल से बीस दिन नहीं हुए होंगे, मैंने उस पर चर्चा करी थी।

तो अभी मैंने कह दिया था, धृतराष्ट्र की जिज्ञासा से शुरू हो रहा है पहला अध्याय। नहीं-नहीं, जिज्ञासा जैसा शब्द तो जनक जैसों के लिए आरक्षित है। वहाँ जिज्ञासा है, और वहाँ क्या जिज्ञासा है? अष्टावक्र गीता में पहला ही श्लोक क्या है? ‘मुक्ति कैसे मिले? सत्य कैसे मिले? और ज्ञान कैसे मिले?’ ये जनक हैं। तो इस तरह हम प्रवेश करते हैं अष्टावक्र गीता में, जहाँ पर वो समस्या सामने रख देते हैं कि भाई मेरी कुल समस्या ये है। और उन्हें बहुत ज़्यादा फिर समस्या बतानी नहीं पड़ती है।

और श्रीमद्भगवद्गीता में एक श्लोक नहीं, हमें पूरा एक अध्याय ही चाहिए सैंतालीस श्लोकों का मात्र समस्या को ही प्रस्तुत करने के लिए। और अष्टावक्र गीता में एक श्लोक में समस्या सामने रख दी गयी है। क्या है वहाँ समस्या? ‘सत्य कैसे मिले? मुक्ति कैसे मिले? ज्ञान कैसे मिले?’ ये समस्या वहाँ बता दी गयी है।

और यहाँ पर क्या समस्या है? 'बताओ-बताओ क्या हुआ? हे संजय, आमने-सामने एकत्रित होकर बताओ-बताओ, मेरे पुत्रों और पांडवों ने क्या किया?'

राजा हटाइए, पर घर के एक वरिष्ठ सदस्य को ये भाषा तो वैसे भी शोभा नहीं देती। धृतराष्ट्र के लिए तो कुरु और पांडु दोनों पुत्र समान ही होने चाहिए। ये कहना कि मेरे पुत्रों और पांडवों ने क्या किया, ये बात तथ्यात्मक हो सकती है, मर्यादित नहीं है। ऐसा नहीं हो सकता कि दुर्योधन सामने आयें तो कहें ‘मम पुत्र’ और अर्जुन सामने आयें तो कहें ‘पांडु पुत्र’, ये तो शोभा नहीं देता। कुरुवंश है, और आप तीनों भाइयों में ज्येष्ठ हो। तीनों भाइयों के पुत्र आपके ही पुत्र हैं, विशेषकर जब पांडवों के पिता अब शरीर रूप में हैं भी नहीं, वो दिवंगत हो चुके हैं। सब आपके ही पुत्र हैं। पर भेद खींच दिया है धृतराष्ट्र ने यहीं पर, और ये समस्या है।

धृतराष्ट्र जिज्ञासा नहीं रख रहे, धृतराष्ट्र सूचना माँग रहे हैं। धृतराष्ट्र जो खूनी खेल खेलने जा रहे हैं उसका सीधा प्रसारण माँग रहे हैं। इसे जिज्ञासा नहीं कह सकते। जिज्ञासा, हमने कहा, जनक जैसों के वक्तव्य पर शोभा देती है। जिज्ञासा शब्द ऊँचा है, और किसी ऊँचे कथन के साथ ही वो शोभित होता है।

ये क्या माँगा है? 'बताओ क्या किया?' और जो सूचना माँगी है, वो भी कोई निष्पक्ष होकर नहीं माँगी है। कुछ सुनना चाह रहे हैं, पहले ही नीयत बनी हुई है। क्या सुनना चाह रहे हैं? सुनना ये चाह रहे हैं कि दुर्योधन विजयी हुआ। बस इतना ही सुनना है। ‘पांडव हार गये, पांडु-पुत्र मारे ही गये’, बस यही सुनने की अभीप्सा है। पर थोड़ी नैतिकता है अभी शेष तो साफ़-साफ़ कह नहीं पा रहे हैं कि बताओ-बताओ, संजय, जल्दी बताओ कि अभी पांडव मरे कि नहीं मरे?

प्रश्न लेकिन यही है बिलकुल। अगर बिना लाग-लपेट के सामने रख दिया जाए तो धृतराष्ट्र का प्रश्न यही है, 'संजय, बताओ मेरे वीर दुर्योधन ने अभी तक मैदान साफ़ कर दिया कि नहीं कर दिया? पांडवों की देह अभी तक उन्हीं के रक्त से लथपथ हुई कि नहीं हुई?' यहाँ से शुरुआत होती है।

तो देखिए यहाँ भी एक कामना है और अष्टावक्र गीता में भी एक कामना है। वहाँ कामना है कि मुक्ति चाहिए, बोध चाहिए। और यहाँ क्या कामना है? यहाँ कामना है कि राज्य हो, सिंहासन हो, पुत्रमोह सफल हो। धर्म जैसी कोई बात नहीं, सत्यता जैसी कोई बात नहीं। एक बहुत ही निचले तल की कामना है जिसमें विचार तक सम्मिलित नहीं है, वृत्ति मात्र का खेल है। कौनसी वृत्ति? मोह वृत्ति, मम वृत्ति, पितृ वृत्ति — ‘मेरा है न!’ ‘मेरा है।’ और ये वृत्ति तो पशुओं में भी पायी जाती है, इसीलिए अब आप समझिए कि क्यों श्रीकृष्ण का काम अष्टावक्र ऋषि से बहुत ज़्यादा कठिन है।

अष्टावक्र ऋषि को किसी ऐसे को ऊपर खींचना है जो पहले ही बहुत ऊपर है। वो एक बहुत ऊँचे तल पर बैठकर के जिज्ञासा कर रहा है, कौन? राजा जनक। जो उठा हुआ है उसे और उठाना कोई बहुत मुश्किल नहीं हो सकता, साधारण बुद्धि की बात है। लेकिन यहाँ जो बात शुरू हो रही है वो बात लगभग पशुता के तल से शुरू हो रही है। मेरा पुत्र है तो उसको जीतना ही चाहिए, लाशें गिरें तो गिरें, अधर्म हो तो हो, पर मेरा पितृ-मोह तो रहेगा।

वहाँ पर एक विद्वान को उठाना है मुक्त के तल तक। राजा जनक विद्वान तो आरम्भ से ही हैं, उनको बस मुक्ति तक ले जाना है, वो बहुत कठिन नहीं है। और यहाँ तो पशु को मुक्ति तक ले जाना है। इसलिए अष्टावक्र गीता में आरम्भ से ही जो बात है वो बड़े ऊँचे तल की है।

आप भगवद्गीता का पहला अध्याय लें और अष्टावक्र गीता का पहला प्रकरण लें तो आप कहेंगे भगवद्गीता का पहला पूरा अध्याय बीत गया, अभी ज्ञान-चर्चा तो हुई भी नहीं किंचित। और अष्टावक्र गीता का पहला अध्याय ले लें, पहला प्रकरण, तो आप पाएँगे कि पहले श्लोक में जिज्ञासा और दूसरे श्लोक से ही ज्ञान वर्षा आरम्भ। और दूसरा ही श्लोक किसी भी मामले में, किसी भी आर्ष वचन से कमतर नहीं। और दूसरे से जब आप छठे-सातवें-आठवें-दसवें तक पहुँचते हैं तो बोध-वर्षा।

समझने वालों के लिए जैसे पहला प्रकरण ही पर्याप्त हो जाए। पहले प्रकरण में ही ऐसी बात बोल देते हैं अष्टावक्र जो आख़िरी है बिलकुल। और उसके बाद क्या होता है? पहले प्रकरण के बाद आप पाते हैं कि फिर उसके बाद जनक और अष्टावक्र की जुगलबन्दी होती है, क्योंकि जनक पहले ही प्रकरण के मध्य लगभग ऋषि अष्टावक्र के स्तर तक आ गये हैं। उसके बाद दोनों के मध्य क्या चलती है? जुगलबन्दी। जुगलबन्दी समझते हैं न? कि जैसे बाँसुरी है और तबला है, वो फिर दोनों का जो सम्मिलित संगीत है वो और सुन्दर हुआ जा रहा है।

यहाँ ऐसा नहीं है, यहाँ जुगलबन्दी नहीं है, यहाँ तो विरोध है। श्रीकृष्ण का काम मुश्किल है ज़रा। वहाँ तो गुरु और शिष्य एक सुर, एक लय, एक ताल पकड़ लेते हैं लगभग तत्काल ही। पहले ही प्रकरण में ऐसा होने लग जाता है। यहाँ तो बड़ी समस्या है। यही वजह है कि अष्टावक्र ऋषि की गीता अक्सर सबसे शुद्ध मानी गयी, लेकिन श्रीकृष्ण की गीता सबसे उपयोगी मानी गयी।

वेदान्त का जिन्होंने अध्ययन करा हो गम्भीर, वो आपको सहसा ही ये बता देंगे बिना किसी हिचक के कि यदि शुद्धता मात्र ही पैमाना हो, तो कई ऐसे उपनिषद् हैं जो भगवद्गीता के समतुल्य ही नहीं हैं, भगवद्गीता से ज़रा सा ऊपर भी रखे जा सकते हैं। यदि शुद्धता ही बस मानक हो तो अष्टावक्र की बात भी श्रीकृष्ण से कहीं भी उन्नीस नहीं ठहरती, इक्कीस ही होगी। लेकिन शुद्धता से क्या होता है!

जिन्होंने जीवन को समझा है, उन्होंने कहा है कि सत्य वही है जो उपयोगी है जीव के लिए। जीव के लिए सत्य वही है जो उपयोगी है। किस अर्थ में उपयोगी है? मुक्ति तक ले जाने के लिए। होगी कोई बहुत ऊँची-से-ऊँची बात, लेकिन यदि आपको मुक्ति तक ले जाने में वो सहायक नहीं हो रही तो क्यों उसे सत्य का दर्जा देना!

देखिए, पारमार्थिक सत्य तो कुछ होता ही नहीं, वहाँ तो सब शून्य है और मौन है। वहाँ तो कुछ कहा ही नहीं जा सकता। जब हम कह रहे हैं सत्य क्या है, तो हम पूछ रहे हैं व्यावहारिक सत्य क्या है। और व्यावहारिक सत्य वो है जो उपयोगी है, और गीता बहुत उपयोगी है — श्रीमद्भगवद्गीता बहुत-बहुत उपयोगी है। उपनिषदों से भी अधिक उपयोगी है और अष्टावक्र संहिता से भी अधिक उपयोगी है।

यही कारण है कि जो स्थान श्रीमद्भगवद्गीता का रहा है वो स्थान अन्य ग्रन्थों का नहीं रहा है। भले ही उनमें शुद्धता अधिक होगी, यहाँ व्यावहारिकता अधिक है। यहाँ जो चुनौती का स्तर है वो बिलकुल दूसरा है। श्रीकृष्ण के सामने जनक जैसा ज्ञानी अनुयायी नहीं है। उनका वास्ता कैसों से पड़ रहा है, ये हमें पहले ही प्रकरण में यहाँ स्पष्ट हुआ जा रहा है।

तो धृतराष्ट — समस्या के चार हिस्सों में से पहला हिस्सा — मोह, पितृ-मोह। जो मोह से ग्रस्त हों वो पहले ही श्लोक से समझ जाएँ कि भगवद्गीता उनके लिए है। मोह का ही दूसरा उदाहरण हमें अभी पहले ही अध्याय में मिलने वाला है, और वो मोह बिलकुल दूसरी दिशा में जा रहा है। एक है मोह धृतराष्ट्र का, जो कह रहा है खून बह जाए जल्दी से पांडवों का। और एक है मोह अर्जुन का, जो कह रहा है, ‘खून बहाना नहीं चाहता मैं कौरवों का।’

दोनों ही जगह बात मोह की ही है, लेकिन एक जगह ऐसा लग रहा है कि बड़ा हिंसात्मक मोह है, ऊपर-ऊपर देखने में और एक जगह लग रहा है कि बड़ा अहिंसात्मक मोह है। श्रीकृष्ण स्पष्ट कर देते हैं आगे कि मोह तो मोह ही होता है और मोह माने हिंसा। 'किसी को न मारने में भी बड़ी हिंसा हो सकती है, अर्जुन।'

धृतराष्ट्र कह रहे हैं, ‘मुझे मोह है इसीलिए एक पक्ष मरे।’ अर्जुन कह रहे हैं, 'मुझे मोह है इसलिए कोई न मरे।’ और श्रीकृष्ण कह रहे हैं, 'हिंसा दोनों जगह है।’ इस पर हम अभी आगे आएँगे।

समस्या के दूसरे पक्ष पर अब हम आते हैं। जो दूसरा पक्ष है, वो है दुर्योधन का भय। और दुर्योधन का भय हमें दिखाई देता है सैंतालीस श्लोकों में दूसरे श्लोक से लेकर के उन्नीसवें श्लोक तक।

तो संजय बताते हैं, आरम्भिक धृतराष्ट्र के प्रश्न के उपरान्त कि क्या हो रहा है, और हो ये रहा है कि दुर्योधन गये हैं द्रोण के पास और कह रहे हैं कि देखो आचार्य, पांडवों की विशाल सेना को देखो। और ये थोड़ी सी विचित्र बात है, युद्ध का आरम्भ होने ही वाला है, शंखनाद होने ही वाला है, और दुर्योधन उतरकर के द्रोणाचार्य के पास जाकर कह रहे हैं, ‘आचार्य देखिए, ये सब पांडवों के महारथी हैं।’

और फिर जैसे दिमाग चल सा गया हो, जैसे आवेशित हो गये हों। आवेशित समझते हो? जैसे कुछ सिर पर चढ़ गया हो, आविष्ट हो गये हों। वो द्रोण को गिनाने लग जाते हैं पांडवों के महारथियों के नाम। ये बात निसंदेह कौतूहल पैदा करने वाली है, बड़ी विचित्र है! ऐसा कोई क्यों करेगा? अरे, द्रोणाचार्य आपसे कहीं बड़े महारथी हैं। अरे आपके आचार्य हैं! क्या उन्हें इतना सामान्य ज्ञान नहीं कि सामने जो खड़े हुए हैं वो कौन हैं; वो तो जानते ही हैं सबको। सामने जो खड़े हुए हैं उसमें से न जाने कितने ऐसे हैं जो स्वयं द्रोण के ही शिष्य हैं। पांडवों के अतिरिक्त भी वहाँ खड़े हुए हैं द्रोण के पढ़ाये हुए चेले।

तो द्रोण तो सब जानते हैं भलीभाँति कि वहाँ सामने कौन-कौन खड़ा हुआ है। लेकिन दुर्योधन अपने रथ से उतर कर गये हैं, द्रोण से कह रहे हैं, 'मैं बता रहा हूँ कौन हैं।’ एक-एक के नाम गिना रहे हैं वहाँ पर। और फिर कहते हैं, 'अब मैं बताता हूँ कि हमारी ओर कौन खड़े हैं। और मैं आपको गिनती से बताता हूँ।’ पांडव पक्ष की ओर से लगभग तेरह महारथियों के नाम गिनाते हैं दुर्योधन। और फिर कहते हैं कि मैं बताता हूँ हमारी ओर से कितने महारथी हैं, उसमें नाम गिनाते हैं कुल नौ। जबकि तथ्य ये है कि पांडवों की सेना — महारथियों की संख्या के मामले में भी और कुल बल के मामले में भी — कौरवों से काफ़ी छोटी थी।

लेकिन दुर्योधन ने वहाँ जाकर के जितने अपने महारथियों के नाम गिनाये, उससे ड्योढ़े नाम गिना दिये पांडवों की तरफ़ से। इतना ही नहीं है, फिर आगे कहते हैं कि उधर वो जो भीम की सेना है, वो पर्याप्त है और इधर जो भीष्मदेव द्वारा नेतृत्व की जा रही हमारी सेना है वो अपर्याप्त है। ठीक यही शब्द हैं दुर्योधन के, ‘पितामह भीष्म के द्वारा रक्षित हमारा सैन्य बल अपर्याप्त है और उधर भीम के द्वारा रक्षित पांडवों की सेना पर्याप्त है।’

और अभी एक भी तीर चला नहीं है, अभी तो शंखनाद भी नहीं हुआ है और ये अवस्था है दुर्योधन की। और इसके बाद द्रोण को सलाह देते हैं दुर्योधन कि ऐसा करते हैं फिर, चूँकि हमारा बल अपर्याप्त ही है, हम कमज़ोर पक्ष हैं। और कमज़ोर नहीं हैं आप, आपकी सेना हर तरीक़े से पांडवों की सेना से, मैंने कहा, ड्योढ़ी है। पर हो उल्टा रहा है।

ज़मीनी तथ्य ये है कि आपके पास महारथी भी और सैन्य बल भी पांडवों से बहुत ज़्यादा है, ड्योढ़ा है लगभग। लेकिन आपको ऐसा लग रहा है मानसिक तौर पर कि उनका सैन्य बल आपसे ड्योढ़ा है। तो आपके डर ने आपकी तथ्य-परखता को बिलकुल विकृत कर दिया है। उधर जितना बल है आपको वो अपनी कल्पना में दूना दिखाई पड़ रहा है। या ऐसे कह दीजिए कि आपका जितना बल है, आपकी कल्पना में वो आपको आधा दिखाई पड़ रहा है। समझ में आ रही है बात ये?

'तो हम ऐसा करते हैं आचार्य द्रोण, कि हम सब मिलकर के भीष्मदेव की रक्षा करते हैं।' अब भीष्म कौन हैं? भीष्म वो हैं जो यदि इच्छा कर लें तो सामने जितना पांडु-बल है, सब धराशायी हो जाए, और इच्छामृत्यु का वरदान पाये हुए हैं। ठीक? इच्छामृत्यु के वरदान का यही अर्थ है कि इतने धुरन्धर थे कि उनकी इच्छा के विरुद्ध उन्हें परास्त करना लगभग असम्भव था। वो तभी गिर सकते थे जब वो कह देते कि अब मुझे तो गिरना ही है। ऐसे अजेय थे भीष्म।

जो भीष्म ऐसे अजेय हैं उनको लेकर के दुर्योधन द्रोण को मशवरा दे रहे हैं कि चलो, हमसब मिलकर के इन्हीं को बचाते हैं। जो तुम्हारा अजेय सेनापति है, तुम कह रहे हो कि हम उसको बचाते हैं। शुरू से ही इतनी दयनीय मानसिक स्थिति! और क्यों है इतनी दयनीय मानसिक स्थिति? क्योंकि दुर्योधन को पता है कि वो अधर्म के पक्ष में है।

ये सबकुछ श्लोक क्रमांक दो से उन्नीस के बीच में हो रहा है, और दुर्योधन जब ये सब बोल लेते हैं तो उसके बाद वर्णित है कि दोनों पक्ष शंखनाद करते हैं। तो पाॅंचजन्य शंख है कृष्ण का, देवदत्त शंख है अर्जुन का, और संजय कहते हैं, 'वो भीम जो भयंकर कर्म करते हैं, उन्होंने अपना पौंड्र नामक शंख बड़ी ही भीषण ध्वनि से बजाया।' और शंख बजे उस तरफ़ भी, कौरवों की तरफ़ भी, लेकिन हृदय विदीर्ण हो गये कौरव पक्ष के ही मात्र।

संजय नहीं बताते हैं कि पांडवों में भय का संचार हो गया कौरव पक्ष की तुमुल ध्वनि से, ऐसा कुछ नहीं। लेकिन जब इधर से शंख बजते हैं तो दुर्योधन इत्यादि जो पहले ही घबराये हुए थे वो और घबरा जाते है, ऐसा ज़बरदस्त शंखनाद, 'बाप रे! आगे क्या होगा!’

जबकि सत्य ये है कि शंखों की संख्या भी कौरव पक्ष में ही ज़्यादा थी, और सत्य ये भी है कि दुर्योधन जहाँ खड़े हुए थे वहाँ कौरव पक्ष के ही शंख ज़्यादा ज़ोर से सुनाई दिये होंगे। पांडव तो दूर हैं, उनके शंख की ध्वनि तो आप तक पहुॅंचते-पहुँचते ज़रा मन्द हो जाएगी। आपको सुनाई भी देगा शंखों का नाद तो अपने पक्ष का सुनाई देगा न।

पर मेरे ख़याल से उन्नीसवाँ ही श्लोक है:

स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्। नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलोऽभ्यनुनादयन्।। १.१९ ।।

उस भयंकर शब्द ने आकाश और पृथ्वी को प्रतिध्वनित करते हुए धृतराष्ट्रपुत्रों के हृदयों को विदीर्ण कर दिया।

‘धृतराष्ट्र पुत्र’ के हृदयों को विदीर्ण कर दिया। एक सूत्र होता है बहुत सीधा-सीधा अध्यात्म में, विशेषकर अद्वैत वेदान्त में — 'जहाँ से शुरुआत करोगे वहीं पहुॅंचोगे।'

जो अपनेआप को मानते हो वो मानते हुए जो भी कर्म करोगे वो तुम्हारी मान्यता को ही और पुख़्ता कर देगा।

दोहरा रहा हूँ, जो अपनेआप को मानते हो वो मानते हुए ही तुम जो कुछ करोगे वो तुम्हारी मान्यता को ही और सुदृढ़ कर देगा। तो माने शुरुआत में ही अन्त — जहाँ से शुरू कर रहे हो वहीं अन्त हो जाएगा। जो बने हुए हो वो बने रहकर जो कुछ भी करोगे वो तुम्हारे बने होने को ही और सुनिश्चित कर देगा, और ठोस कर देगा।

तो दुर्योधन की शुरुआत ही हो रही है, कौरव पक्ष की शुरुआत ही हो रही है डर से, और वो डर आ रहा है क्योंकि उनको पता है कि धर्म की तरफ़ नहीं खड़े हैं। हार इसी समय निश्चित हो गयी।

शत्रु आपसे छोटा है, शत्रु निश्चित ही आपसे कमज़ोर भी है। दस-बारह साल जंगल में भटककर आ रहा है शत्रु, एक साल का अज्ञातवास झेलकर आ रहा है शत्रु, न जाने कितनी विपदाओं में पड़ा हुआ था। क्या उसके पास धन बल है, क्या सैन्यबल है, बताइए तो? और सैन्यबल भी धन बल से आता है। हस्तिनापुर इतने वर्षों तक किसके हस्तगत था? कौरवों के। तो राज्यकोष किसके पास था? कौरवों के पास। सारी सेना किसके पास है? सब धुरन्धर महारथी किसके पास हैं? कौरवों के पास हैं। सबकुछ उनके पास है, धर्म उनके पास नहीं है, कृष्ण उनके साथ नहीं हैं। तो डर बहुत लग रहा है।

जो कुछ भी होता है सत्य से, आत्मा से, कृष्ण से वियुक्त होने पर, छिटके होने पर, अलग होने पर, उस सबकी गणना हो जा रही है इस पहले अध्याय में। तो एक हमने देख लिया धृतराष्ट्र को जो अपने मोह को पकड़े हैं और धर्म से बहुत दूर हैं। अब दूसरे हमको दिखाई दे रहे हैं उन्हीं धृतराष्ट्र के पुत्र लोग, दुर्योधन। ये भी किसको पकड़े हुए हैं? अपने हठ को पकड़े हैं, अपने लोभ को पकड़े हैं, कृष्ण से दूर हैं।

समझ में आ रही है बात?

आपके भीतर कुछ है जो भलीभाँति जानता है कि उसकी दशा क्या है, क्योंकि वो उसी की दशा है, वो नहीं जानेगा तो कौन जानेगा! जिसको लगती है, दर्द तो उसी को होता है न। आपके भीतर कोई बैठा है जिसे लगी हुई है, वो जानता है उसे लगी हुई है, उसे रोज़-रोज़ अपनी दयनीय अवस्था का अनुभव हो रहा है, उसे पता है वो ग़लत है। अब उसके पास दो विकल्प होते हैं — अपनी चोट को छुपाये रहे, अपने दर्द का झूठा निदान करता रहे, स्वयं को ही धोखा देता रहे या फिर दर्द को मिटाने की दिशा में सही कर्म कर ले।

भीतरी पीड़ा को मिटाने के लिए जो उपयुक्त कर्म किया जाता है, उसे धर्म बोलते हैं। यही धर्म की परिभाषा है।

धर्म क्या है? तुम भीतर से बिलख रहे हो, जो कुछ तुम्हें शान्ति दे दे, वो धर्म है। तुम्हारी अवस्था मात्र रुग्ण नहीं है, तुम्हारा केन्द्र ही रुग्ण है। तुम एक स्वस्थ व्यक्ति नहीं हो जो अकस्मात् बीमार पड़ गया है। तुम अपने बीज से ही बीमार हो। तुम्हारा केन्द्र, तुम्हारा स्रोत, तुम्हारी हस्ती की पहचान ही बीमारी है।

और यही वजह है कि लोग दर्द झेल जाते हैं, दर्द को मिटाने के लिए सही कर्म नहीं करते, धर्म की ओर नहीं बढ़ते, धार्मिक नहीं हो पाते। क्योंकि जब तुम ही बीमारी हो तो दर्द को मिटाने का अर्थ होता है ‘स्वयं को मिटाना’।

बीमारी है भीतर, इससे बहुत कम लोग इनकार करेंगे। ये स्वीकार कर लेने में कोई बड़ा ख़तरा नहीं हो जाता कि बीमारी है, बल्कि सहानुभूति भी मिल जाती है, है न? 'मैं बहुत परेशान रहता हूँ, ठीक? बहुत चिन्ता है, मैं भीतर से कई टुकड़ों में बँटा हुआ हूँ, मैं बहुत डर जाता हूँ', ये सब हम बोल देते हैं और इसमें हमें कोई समस्या नहीं आती। तो बीमारी है भीतर ये तो सभी स्वीकार कर लेते हैं, यहाँ तक कोई दिक्क़त नहीं है।

लेकिन जब आप बोलते हो न कि बीमारी है भीतर, तो साथ में आप एक बड़ा आत्मविश्वास-पूर्ण भाव रखते हो। वो ये है कि वो बीमारी एक आती-जाती घटना है, अकस्मात् घटित एक संयोग भर है, वो बीमारी मुझे लग गयी है कहीं बाहर से। जैसे कोई वायरस (विषाणु), कोई बैक्टीरिया (जीवाणु), कुछ आ गया है बाहर से बहता हुआ हवाओं में कीटाणु, जीवाणु, विषाणु कुछ लग गया है, बाहरी बात है। वो बाहरी चीज़ नहीं होगी अगर बीमारी वाली तो मैं तो स्वस्थ हूँ, मैं तो स्वस्थ ही हूँ।

तो जैसे आपको किसी को ये बताने में कोई लज्जा नहीं आती कि आपको ज़ुकाम है, ठीक उसी तरह आपको किसी को ये बताने में कोई लज्जा नहीं आती कि आपको भय है, कि लोभ है, कि चिन्ता है; नहीं आती न? क्योंकि दोनों में भाव एक ही रहता है। 'कुछ हो गया है ऐसा जो बाहरी है, जिसमें मेरा कोई योगदान नहीं, ये तो संयोग की बात है। बाहरी कोई घटना घटी, मुझे प्रभावित कर गयी है। बाहर से कोई विषाणु आया, मुझे बीमार कर गया है। तो इसमें लाज क्या!'

वही बात हम अंदरूनी बीमारियों के लिए भी लगा लेते हैं। ‘कुछ हो गया होगा मेरे साथ, जिसकी वजह से मैं इतना हीन जीवन जीता हूँ, इतना क्षुद्र रहता हूँ, इतना संकुचित रहता हूँ, इतना डरा हुआ रहता हूँ, इतनी अश्रद्धा में जीता हूँ, यक़ीन नहीं कर पाता। कुछ हो गया होगा मेरे साथ।’ तो फिर हम कह देते हैं, 'हाँ, अभी ऐसा चल रहा है, अभी थोड़ा तनाव है।'

नहीं।

बाहर की बीमारी संयोग होती है, भीतर की बीमारी चुनाव होती है।

आपके साथ कुछ हो नहीं गया है, आपने कुछ ग़लत होने का चुनाव कर लिया है, वो चुनाव आपने ही करा है। और ग़लत चुनाव करने का अर्थ है चुनाव करने वाला ही बीमार है न। अगर कोई विक्षिप्त होने का चुनाव करे तो वो चुनाव के क्षण में भी क्या रहा होगा? विक्षिप्त। नहीं तो विक्षिप्त होने का चुनाव क्यों करता? रोगी होने का चुनाव ही बताता है कि आप रोगी होने से पहले भी?

श्रोता: रोगी थे।

आचार्य: विक्षिप्त होने का चुनाव ही बताता है कि आप विक्षिप्त होने से पहले भी?

श्रोता: विक्षिप्त थे।

आचार्य: ऐसा नहीं कि कुछ हो गया, आप ग़लत हो। इसीलिए हम अपना दर्द झेले रहते हैं।

समझ में आ रही है बात?

दुर्योधन का आ गया सामने, उससे पहले दुर्योधन के पिता का आ गया सामने, अब आते हैं दुर्योधन के भाई पर। यहाँ पर हमें समस्या के दो पक्ष दिखाई देंगे। जो अर्जुन की बात है — इक्कीसवें श्लोक से लेकर उनचालीसवें श्लोक तक जो पक्ष हमारे सामने आएगा, उसको मैं नाम दे रहा हूँ 'विचार और वृत्ति', और फिर चालीसवें श्लोक से सैंतालीसवें श्लोक तक जो समस्या का पक्ष हमारे सामने आएगा उसको मैं नाम दे रहा हूँ 'संस्कृति और अध्यात्म’।

क्या होता है बीसवें श्लोक में? बीसवें श्लोक में अर्जुन एक ऐसी बात कहते हैं जो कि आमतौर पर कभी कोई योद्धा नहीं कहता। कहते हैं, 'हे मधुसूदन! मुझे ले चलो दोनों सेनाओं के मध्य।' और दोनों सेनाओं के मध्य जाकर के वो देखते हैं कि वहाँ कौरवों की तरफ़ कौन-कौन हैं। तो वहाँ उनको दिखाई देते हैं कि उनके भाई हैं, उनके पुत्र हैं, कहते हैं कि मातुल भी उधर हैं, मामा। आचार्य हैं, मित्र हैं, भ्राता तो हमने कहा ही है कि हैं, और न जाने कितने सगे-सम्बन्धी! शायद ही उधर कोई ऐसा चेहरा था जिसको अर्जुन पहले से ही न जानते हों।

तब जनसंख्या बहुत ज़्यादा तो थी नहीं, बड़े राज्य भी ऐसा नहीं कि पाॅंच-सात-सौ थे। कुछ दर्जन भर राज्य थे उस समय पर, और उनमें से अधिकांश राज्य एक-दूसरे से सम्बन्धित थे विवाह आदि के माध्यम से। एक राज्य की बेटी का विवाह दूसरे राज्य के राजकुमार से हो गया। और आमतौर पर विवाह वगैरह आपसी स्तर देखकर राजकुमार और राजकुमारियों के ही होते थे आपस में। तो सब एक-दूसरे से कहीं-न-कहीं जुड़े हुए थे, तार खिंचे हुए हैं। सब एक-दूसरे को जानते हैं।

अर्जुन ये भी कहते हैं कि उधर तो मेरे ससुर लोग भी हैं, उनको भी मारना है। कोई ऐसा नहीं है जो किसी-न-किसी तरीक़े से दूसरे से सम्बन्धित न हो। काशी की पुत्रियाँ भी हस्तिनापुर में ब्याही हुई हैं, और उधर गांधार की पुत्री भी हस्तिनापुर में ब्याही हुई हैं। सब एक-दूसरे की रिश्तेदारी में हैं। कहीं-न-कहीं कोई निकल रहा है, कोई उस रिश्ते में निकल रहा है, कोई उस रिश्ते में निकल रहा है। अर्जुन सभी को जानते हैं। सब एक-दूसरे को जानते हैं।

तो अर्जुन वहाँ पर खड़े हो गये हैं जाकर के, और अब अर्जुन को पकड़ रहा है मोह। और जो चीज़ अर्जुन को युद्ध के मैदान पर लेकर आयी थी वो थी कि राज्य तुम्हारा है, तुम्हें राज्य पाना चाहिए। युद्ध राज्य के लिए हो रहा है।

हम बिलकुल कह सकते हैं कि युद्ध खोये हुए आत्म-सम्मान को पाने के लिए हो रहा है, युद्ध पांचाली के अपमान का बदला लेने के लिए हो रहा है। लेकिन जब पांडव अज्ञातवास से वापस आये तब कोई द्वेष न हुआ होता, विवाद न हुआ होता, दुर्योधन ने सीधे कह दिया होता कि ले लो तुम कुछ, आधा ले लो, आधा नहीं तो चौथाई ही ले लो, कुछ ले लो। तो पांडव सहर्ष अपने कष्ट को भी भूल जाते, और दुर्योधन के तमाम षड्यन्त्रों को भी क्षमा कर देते, और पांचाली के अपमान को भी एक तरफ़ रख देते। कहते, ‘ठीक है, शान्तिपूर्वक जो मिल रहा है, ले लेते हैं, गुज़ारा करते हैं।’ उनकी तरफ़ वैसे भी श्रीकृष्ण थे, और श्रीकृष्ण का पहला प्रयास तो शान्ति की दिशा में ही था।

तो जो चीज़ प्रमुखतया अर्जुन को लेकर आयी है युद्ध भूमि में, वो है क्षत्रिय धर्म का निर्वाह। कि क्षत्रिय हो तो राज्य तो होना ही चाहिए न तुम्हारे पास! और यही वजह है कि आगे चलकर हम पाते हैं दूसरे अध्याय में, तीसरे अध्याय में भी, आगे कई जगह पर कि कृष्ण ये कभी नहीं कहते कि तुमने और तुम्हारे भाइयों ने इतना कष्ट सहा, उस कष्ट का हिसाब बराबर करने के लिए लड़ो अर्जुन। ये भी नहीं कहते कि तुम्हारी भार्या का ऐसा भरे दरबार में अपमान हुआ था, उसकी स्मृति को मिटाने के लिए लड़ो अर्जुन। ये सबकुछ नहीं कहते हैं।

हाँ, कृष्ण इतना ज़रूर कहते हैं दबाव देकर, दो-तीन बार, 'क्षत्रिय हो तुम, इसीलिए लड़ो।' पर वो विधि कारगर होती नहीं है। अब वजह उसकी समझेंगे। मैंने कहा, ये जो तीसरा पक्ष है, इसको मैं नाम दे रहा हूँ 'विचार और वृत्ति’। मोह वृत्ति है, क्षत्रिय होना मनुष्य की कृति है, तो वो विचार से निकला है।

बच्चा पैदा हुआ, आप उसको न बतायें कि उसका वर्ण क्या है, उसको कभी नहीं पता चलेगा। लेकिन बच्चा पैदा हुआ है, उसे आप कुछ न बतायें तो भी मोह उसमें रहेगा। बच्चे का जन्म होता है, उसे आप कुछ न बतायें उसके वर्ण के बारे में तो उसे कुछ नहीं पता लगेगा। क्षत्रिय को आप ब्राह्मण की तरह दीक्षित कर दीजिए, उसका काम चलता रहेगा।

आप बिलकुल तर्क कर सकते हैं कि साहब कुछ तो उनमें जैविक भेद होते हैं वगैरह-वगैरह, डीएनए अलग होता है। पहली बात तो इतना होता नहीं, और अगर होता भी है तो वो सब भेद बहुत न्यून होते हैं। लेकिन अन्तर नहीं पड़ता कि आप किस वर्ण के हैं, किस लिंग के हैं, किस देश के हैं, किस आयु के हैं, मोह तो सभी में विद्यमान होता है। और मोह की वृत्ति को कर्तव्य का विचार नहीं परास्त कर सकता।

इसमें सीख है हम सबके लिए — अर्जुन यहाँ कहना शुरू कर देते है, ‘अरे, नहीं! मुझे तो युद्ध करना ही नहीं है, जिनके लिए जिया जाता है उनको मारकर के मुझे क्या मिल जाएगा। दुर्योधन तो मूर्ख है और पापी है, वो धर्म-अधर्म नहीं समझता लेकिन, श्रीकृष्ण, हम लोग तो समझदार हैं न, हम क्यों इनका रक्त बहाएँगे!’ और दुर्योधन को न मारने के पक्ष में, युद्ध न करने के पक्ष में अर्जुन जितने तर्क दे सकते हैं सब दे डालते हैं।

वृत्ति; कौनसी वृत्ति? मोह की वृत्ति। मोह की वृत्ति क्षत्रियत्व के विचार पर भारी पड़ रही है। मन के ये तीन तल हैं। सबसे निचला तल है और सबसे स्थूल तल है विचार का। और नीचे आ जाते हैं, चार तल कर देते हैं अब हमने स्थूल कह ही दिया है तो। सबसे स्थूल तल होता है ‘कर्म’ का। ये मन के तल हैं, सबसे स्थूल तल होता है कर्म का। उसके ऊपर आता है विचार, उसके ऊपर आती है वृत्ति, और सबसे ऊपर है आत्मा। ये सब मन के ही तल हैं।

सूत्र ये है — नियम बता देता हूँ, पकड़ लीजिएगा — किसी भी तल को उससे नीचे के तल से नहीं जीता जा सकता। कर्म पर विचार भारी पड़ेगा। आपके विचार यदि उल्टे-पुल्टे हैं तो आप कुछ भी कर्म कर लीजिए विचार नहीं सुधरने वाले। कर्म को विचार से जीता जा सकता है। विचार पर वृत्ति भारी पड़ेगी। कर्म पर क्या भारी पड़ेगा? विचार। और विचार पर क्या भारी पड़ेगी? वृत्ति। मोह कहाँ आता है? मोह कर्म है, मोह विचार है, मोह वृत्ति है? वृत्ति है। वृत्ति को मात्र आत्मा के द्वारा ही जीता जा सकता है।

चूँकि श्रीकृष्ण के सामने यहाँ पर समस्या मोह की है, उसमें भय भी सम्मिलित हो सकता है। कुछ विद्वानों ने, कुछ भाष्यकारों ने कहा कि अर्जुन की समस्या मोह मात्र की नहीं है, इतनी विशाल सेना सामने देखकर — क्योंकि वहाँ सामने जो सेना थी कौरवों की बहुत बड़ी थी — उतनी विशाल सेना सामने देखकर अर्जुन भय से भी कुछ विचलित हुए होंगे।

तो मोह हो या भय हो, ये दोनों ही कहाँ आते हैं? ये वृत्ति हैं। और हम कह रहे हैं वृत्ति को विचार से नहीं जीता जा सकता। ठीक वैसे जैसे विचार को कर्म से नहीं जीता जा सकता। वृत्ति को विचार से नहीं जीत सकते। वृत्ति नहीं बदलेगी, तुम कितना भी विचार कर लो। अगर तुम सोच रहे हो मैं विचार कर-करके वृत्ति बदल लूॅंगा तो वृत्ति नहीं बदलेगी। और विचार नहीं बदलेंगे, तुम बाहर जितने कर्म कर लो। वो कर्म तुम सौ विधि के प्रदर्शित कर लो पूरी दुनिया को और स्वयं को, लेकिन उससे विचार नहीं बदलेंगे।

आपने देखा है कि आप कैसे उल्टे-पुल्टे विचार रखते हुए भी मर्यादित और स्वीकार्य कर्म समाज को प्रदर्शित कर लेते हो? आपके मन में किसी के प्रति बड़ी घृणा और हिंसा हो सकती है, लेकिन आप उसके सामने बैठकर नमस्कार कर सकते हो, आप मुस्कुरा भी सकते हो। वचन भी कर्म होते हैं। आप मुख से कह सकते हो कि साहब आप तो बहुत अच्छे आदमी हैं, और हम चाहते हैं आपका कल्याण हो। ये सब कह सकते हो न? और विचार भीतर कैसे हैं?

अब मुझे बताओ, तुम्हारे मन में किसी के प्रति द्वेष-घृणा के विचार हैं, क्या ये सम्भव है कि तुम उससे मीठी बातें करने लगे, तुम्हारे विचार बदल जाएँ? क्या ये सम्भव है कि तुम उसे गले लगाने का कर्म कर लो तो तुम्हारे विचार बदल जाएँ? नहीं। विचार बदले तो कर्म बदले, वो ठीक है। विचार बदलने से कर्म बदल गया तो ठीक है, पर विचार जैसे थे वैसे पड़े हुए हैं, तुम कर्म बदल दोगे तो विचार नहीं बदल जाएगा। हालाँकि ये बात बड़ी आकर्षक लगती है, मन सोचता है कि प्रयोग करके देख ही लें, क्या पता कर्म बदलने से विचार बदल जाता हो, नहीं बदलेगा। प्रयास आप कितना भी करें, होगा नहीं सफल।

इसी तरीक़े से विचार वृत्ति को नहीं बदल पाता। क्षत्रिय धर्म पर मोह भारी पड़ेगा। क्योंकि हमने कहा क्षत्रिय होना क्या है? मानव द्वारा कृत वर्ण व्यवस्था, यही है न। हमने वर्ण व्यवस्था निर्मित करी। क्योंकि सत्य तो मात्र आत्मा है, और प्रकृति में वर्ण व्यवस्था पायी नहीं जाती। तो निश्चित रूप से वर्ण व्यवस्था मनुष्य द्वारा ही रचित है। ठीक?

प्रकृति में, माने जड़ प्रकृति में तो वर्ण व्यवस्था पायी नहीं जाती, और आत्मा में भी कोई वर्ण नहीं होता, तो वर्ण व्यवस्था कहाँ से आयी होगी? मनुष्य के विचार से ही आयी फिर। ये विचार मोह की वृत्ति को नहीं हटा पाएगा। सीख क्या है आपके लिए? आप अपनेआप को अपने कर्तव्यों का कितना भी ध्यान दिला लो, जीतेगी आपकी वृत्ति।

आलस क्या है? वृत्ति। आपके सामने आपका कोई कर्तव्य रखा हुआ है, आलस जीतेगा, कर्तव्य हारेगा। क्योंकि कर्तव्य मौलिक नहीं होता न, कर्तव्य तो आपको किसी ने बताया है, कर्तव्य तो आपको किसी ने बताया है कि ये तुम्हारा कर्तव्य है, तुम्हें करना चाहिए। आलस कर्तव्य से कहीं ज़्यादा मौलिक है। एकदम मौलिक नहीं है, एकदम मौलिक तो मात्र आत्मा होती है। पर कर्तव्य की अपेक्षा आलस ज़्यादा मौलिक है तो आलस जीत जाएगा, कर्तव्य हारता है। इसीलिए कर्तव्य रोज़ हारता है, आलस रोज़ जीतता है। इसलिए नहीं कि आप बेईमान हैं या व्यभिचारी हैं, इसीलिए क्योंकि आप मन की बनावट को नहीं समझते, मन के नियमों को नहीं जानते।

आलस को हराने के लिए अपनेआप को आप बार-बार अपने कर्तव्य का स्मरण भी कराएँ तो भी आप हार जाएँगे। आलस या भय या मोह, ये कैसे हारते हैं? ये हारते हैं मात्र आत्मा के द्वारा, क्योंकि वृत्ति से ऊपर एकमात्र क्या है? आत्मा। अब समझ में आ रहा है कि पूरी गीता में आत्मा का उपदेश क्यों है? क्यों? क्योंकि समस्या है मोह की, और मोह क्या है? वृत्ति। और वृत्ति को हराना है तो आत्मा चाहिए। इसीलिए कृष्ण और नहीं कोई बात करते, ज्ञान की बात करते हैं, माने आत्मा की बात करते हैं। और कोई तरीक़ा ही नहीं है अर्जुन को धर्ममार्ग पर लाने का। अर्जुन की मोह, भय इत्यादि की वृत्ति को परास्त करने का एक ही तरीक़ा है — आत्मज्ञान।

आपके मन में कौतूहल उठना चाहिए कि यदि पहले अध्याय में समस्या का वर्णन है तो दूसरे से सत्रहवें अध्याय तक श्रीकृष्ण ने इस प्रकार का समाधान क्यों दिया, वो कोई और समाधान भी तो दे सकते थे। भाई, कृष्ण तो राजनीतिज्ञ भी थे, वो ये समाधान भी तो दे सकते थे, ‘चलो, ऐसा करते हैं एक बार दुर्योधन से बात करते हैं। चलो, ऐसा करते हैं पितामाह उधर हैं, सेनापति पितामह से बोलते हैं कि चार दिन बाद लड़ेंगे, चार दिन बस ऐसे ही हमें आपके साथ रहना है। कुछ भी कह सकते थे न। कृष्ण किसी भी दिशा में कोई सलाह या प्रस्ताव ला सकते थे, कुछ नहीं करा।

सीधे कृष्ण ने क्या करा? सत्रह अध्याय आत्मज्ञान के। सीधे शुरू होते हैं कृष्ण — ‘आत्मा क्या है ये जानो।’

कृष्ण सबको तो नहीं आत्मा का उपदेश दे रहे। कृष्ण को क्या पड़ी है आत्मा की बात करने की? अर्जुन एक बहुत सीधी-साधी बात बोल रहे हैं, अर्जुन जो बात बोल रहे हैं उसमें कोई आध्यात्मिक जिज्ञासा कहीं नहीं है। अर्जुन क्या कह रहे हैं? ‘ये मेरे भाई, मेरे सहोदर, मेरे सम्बन्धी हैं, मैं नहीं लड़ता।’

मान लीजिए आपसे कोई आकर ऐसे बोले कि बगल के मकान में मेरे रिश्तेदार रहते हैं, देखिए, मैं उनसे लड़ाई-झगड़ा नहीं करूँगा, तो आपके ये क्या कल्पना में भी आएगा कि उसके हाथ में गीता दे दें? आप ज़रूर उसको कोई उत्तर देंगे पर वो कैसा होगा? आप बताइए आप क्या उत्तर देंगे?

कोई आकर आपसे बोले कि बगल के घर में जो रहते हैं वो लोग व्यभिचारी हैं, अनाचारी हैं, प्रदूषणकारी हैं, हिंसाकारी हैं, सबकुछ हैं वो, लेकिन उनसे मेरी यारी है, तो मैं तो नहीं लड़ता उनके ख़िलाफ़। ये बात आपके मन में कल्पना के तौर पर भी आएगी क्या कि तुरन्त उसको गीता दूॅं? आप उसको क्या बोलेंगे? आप कुछ और कहेंगे। आप कहेंगे, ‘फिर अच्छा ऐसा करते हैं, ऐसा करते हैं।’ आप कोई युक्ति, कोई तरक़ीब, कुछ टैक्टिकल (चातुर्यपूर्ण) बात निकालेंगे। आप वो तो नहीं करेंगे जो कृष्ण ने करा।

लेकिन कृष्ण आपके-हमारे जैसे नहीं हैं, उन्होंने सीधे समस्या का मूल पकड़ लिया है। वो कह रहे हैं, ‘मोह’। मोह पकड़ लिया, मोह है। और अगर मोह है तो अर्जुन से और इधर-उधर की बात करने से तो कुछ होगा ही नहीं। थोड़ा सा प्रयोग वो करके देख लेते हैं। वो क्षत्रिय धर्म की बात आरम्भ मे ही करके देख लेते हैं। पर श्रीकृष्ण को भी पता है कि जिसकी समस्या मोह हो उसे कर्तव्य याद दिलाना व्यर्थ ही जाना है। तो दो-चार दफ़े वो बस बोलते हैं कि क्षत्रिय-क्षत्रिय, और देखो, दुनिया तुम पर हँसेगी, और क्षत्रिय को तो अपनी कीर्ति, अपना यश बहुत प्यारा होना चाहिए, तुम ये सब मत करो।

और उसके आगे बहुत प्रयास भी नहीं करते, कहते हैं, ‘छोड़ो, ये रास्ता बहुत दूर तक नहीं जाता।’ जो रास्ता दूर तक जाता है, अब ज़रा उसको खोलते हैं। और फिर वो किस रास्ते को खोलते हैं? आत्मा के रास्ते को खोलते हैं। और फिर पूरी गीता बस यही — आत्मा-सत्य, आत्मा-सत्य, आत्मा-सत्य। और कुछ नहीं है पूरी गीता में।

आपके सामने भी ऐसी समस्याएँ हैं जो वृत्तिगत हैं जीवन में? हैं?

श्रोतागण: हाँ।

आचार्य: तो उनका समाधान बस गीता में है, और इधर-उधर की बातें मत करिए। इधर-उधर के उपाय, प्रयास, कुछ मत करिए, उनका समाधान सिर्फ़ और सिर्फ़ गीता है। वृत्ति की समस्या — आपके जीवन में लोग हैं जिन्हें मोह बहुत है, आपके जीवन में लोग हैं जिन्हें भय बहुत है, ईर्ष्या बहुत है, लालच बहुत है कि पकड़ लूँ, भ्रम बहुत है, कुछ समझ में नहीं आता, अज्ञान है; आपके जीवन में ऐसे लोग हैं?

आपके जीवन में आप भी हैं। तो हो सकता है मैं आपकी ही बात कर रहा हूँ। क्या आप अपने भीतर ये सब पाते हैं? इनमें से अगर आप कुछ भी अपने भीतर पाते हैं तो अपनेआप को बचाने के लिए कुछ भी और मत करिए। न मनोरंजन से आपका काम बनना है, न रुपये-पैसे से, न प्रसिद्धि से, न अपने ऊपर और अनुशासन थोपकर के, न अपनेआप को हीन बनाकर के, लज्जित करके, ग्लानि भाव में डुबोकर के। किसी चीज़ से आपका काम नहीं बनना है, अपनेआप को दंड देकर भी काम नहीं बनना है।

आप कहें, ‘मैं बुरा आदमी हूँ, मुझमें लालच बहुत आ गया या मुझमें आलस बहुत आ गया, मैंने फ़लाना काम नहीं किया, अब मैं अपनेआप को दंडित करूँगा।’ कैसे दंडित करूँगा? ‘दो दिन काम नहीं करा था, आज रात भर करूँगा, या किसी और तरीक़े से, मैंने जो नुक़सान कर दिया मैं उसकी भरपाई करूँगा। मैं दंडित करूँगा या मैं अपने ऊपर अब अतिरिक्त अनुशासन डालूँगा।’ इस तरह की कोई भी विधि काम नहीं आएगी।

समस्या यदि वृत्ति के तल पर है तो समाधान मात्र आत्मा के तल पर होगा।

समझ में आ रही है बात?

और मूल समस्याएँ हमेशा वृत्ति के ही तल पर होती हैं। क्योंकि मूल समस्याएँ तो हमेशा यही होती हैं — मोह, भय, आलस, अज्ञान, प्रमाद, उन्माद। मूल समस्याएँ तो यही हैं। तो माने कुल-मिलाकर बात क्या हुई? अगर ये ही मूल समस्याएँ हैं और इनका समाधान आत्मा ही है, तो कुल-मिलाकर बात क्या हुई? कि दुनिया की सब समस्याओं का समाधान मात्र आत्मा ही है।

'ये कैसी बात हुई आचार्य जी, ऐसा थोड़े ही है! नहीं, आध्यात्मिक समस्याओं का समाधान हो जाता है गीता से, मान लिया, पर सब समस्याएँ? माने ये जो इतना प्रदूषण है, या ये जो इतनी जनसंख्या बढ़ रही है, या इतना जो आतंकवाद है, या जो वैश्विक अशान्ति है, या अमीरी बढ़ती जा रही है ग़रीबी के बढ़ने के साथ-साथ, दोनों के मध्य का फ़ासला अनन्त होता जा रहा है, ये सब समस्याएँ हैं। कहीं पर अन्न इतना है कि फेंका जा रहा है समुद्र में, कहीं लोग भूखे मर रहे हैं। आप कह रहे हैं इनका समाधान गीता में है?’

मैं सीधे कह दूँगा, इनका समाधान गीता में है तो आप कहेंगे कि नहीं-नहीं-नहीं। भई, आप आज का अख़बार उठा लीजिए, उसमें इतने तरह की समस्याएँ लिखी हुई हैं, लिखी हैं कि नहीं लिखी हैं? उधर रूस-यूक्रेन का कुछ चल रहा है, इधर धर्म के क्षेत्र में कुछ चल रहा है। जैनों के तीर्थ स्थल पर सरकार ने अनुमति दे रखी थी कि मनोरंजन के कार्यक्रम हो जाएँगे, वहाँ उपद्रव। अब वहाँ के स्थानीय जो वासी थे, उन्होंने आकर कह दिया कि नहीं, इस स्थान पर हमारा भी अधिकार है। वो एयरलाइन्स में एक व्यक्ति ने जाकर के एक महिला के साथ अभद्रता कर दी है।

यही सब देखा है न आज के अखबार में, और क्या देखा है आपने? कुछ राजनेता दूसरे पर टिप्पणी कर रहे हैं। दिल्ली और उत्तर भारत के ऊपर ऐसा कोहरा छाया हुआ है जिसने ठंड तो बढ़ाई ही है कड़ाके की, प्रदूषण भी ज़बरदस्त कर दिया है, एयर क्वालिटी इंडेक्स पाँच-सौ पर चढ़कर बैठा हुआ है। तो ये सब समस्याएँ जब हम देखते हैं तो हमें बड़े ज़मीनी तल की लगती हैं और बड़ी विविध लगती हैं।

मैं आपसे कहूँ कि दिल्ली का एक्यूआई (वायु गुणवत्ता का मानक) पाँच-सौ है, तो आपके मन में ये बात तो नहीं आएगी कि इसका समाधान गीता है; कि आती है? नहीं आती न। मैं आपसे कहूँ कि एक पंथ और दूसरे पंथ के लोग आपस में संघर्ष में हैं तो ये तो बात नहीं आती कि इसका समाधान गीता है; या आती है? मैं आपसे कहूँ कि भारत में एक खेल को ही ज़्यादा फंडिंग मिली जा रही है, और बाक़ी खेल बेचारे सब भुखमरी में हैं, तो वहाँ भी आपके मन में ये नहीं आएगी बात कि इस समस्या का समाधान गीता है, कि आएगी? एकदम नहीं।

और कौनसी समस्याएँ हैं जो अभी आजकल एकदम चढ़ी बैठी हैं दुनिया पर? चीन में कोविड फिर से नगाड़ा बजा रहा है अपना, और बाक़ी पूरी दुनिया एकदम आशंकित बैठी है कि हमारा क्या होगा! और जब कोविड की बात होगी, मैं कहूँ कि देखिए साहब, समाधान तो यहाँ भी गीता है। तब तो आपको बिलकुल अविश्वास हो जाएगा, आप कहेंगे, ‘कैसी बात कर रहे हो आप! कोविड की समस्या का समाधान गीता है, ये कैसी बात है!’

पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था भारी मन्दी के बिलकुल मुहाने पर पहुँच चुकी है। आशंका है कि एक लम्बा रिसेशन शुरू होने वाला है। आप कहेंगे 'ये अर्थव्यवस्था की समस्याएँ हैं, इसमें आप अध्यात्म को क्यों ला रहे हैं, यहाँ भी क्या गीता प्रासंगिक है?' मैं तो बस ऐसे कहूँगा, 'हाँ’ (हाँ में सिर हिलाते हुए)। आप कहेंगे कि ये देखो, इनकी दृष्टि और किधर को जाती ही नहीं, कोई समस्या बतायी जाएगी, कह देते हैं 'गीता'।

तो आपको मेरी बात पर विश्वास नहीं होगा। लेकिन फिर मैं बात को थोड़ा साफ़ करके आपसे पूछता हूँ, बताइए, जितनी भी हमने अभी समस्याओं की बात करी, क्या उनका सम्बन्ध मानव वृत्ति से नहीं है? कहिए, है न? प्रदूषण हो, आतंकवाद हो, उग्रवाद हो, अतिवाद हो, पशुओं के ऊपर इतनी आप हिंसा कर रहे हो, आप कोई समस्या ले लीजिए, क्या उसका सम्बन्ध मानव वृत्ति से नहीं है? वृत्ति माने एक भीतरी झुकाव जो आप लेकर पैदा ही होते हैं। जो कि शिशुओं में भी पाया जाता है, जैसे पशुओं में पाया जाता है। जो चीज़ आपको शिशु और पशु में एक समान मिल जाए उसको कहते हैं वृत्ति।

शिशु के पास विचार नहीं होते अभी, पर फिर भी उसमें वृत्ति होती है न? जैसे पशु के पास भी विचार नहीं होते, या होते भी हैं तो बड़े आरम्भिक तल के, न्यून, पर वृत्ति होती है। शिशु और पशु में एक समान आप क्या पाते हो? मोह पाते हो, भय पाते हो, क्रोध पाते हो, कामनाएँ भी पाते हो। अपने होने को बचाने का एक संकल्प पाते हो, अहम्, 'मैं हूँ, मेरा होना बना रहे’, ये भाव पाते हो, इसे वृत्ति कहते हैं।

ये बात अब देखिए कहाँ तक जा रही है। माने हम कह रहे हैं दुनिया की जितनी समस्याएँ हैं, वो सब शिशु और पशु के तल की हैं। (हँसते हुए) बड़ी-बड़ी जो अन्तर्राष्ट्रीय राजनैतिक समस्याएँ हैं जहाँ हम अर्थव्यवस्था की बात करने लगते हैं। कहते हैं, अरे इतने ट्रिलियन का ये चल रहा है वो चल रहा है, इतने फ़लाने ट्रिलियन डॉलर, वो भी सारी बातें हैं शिशु और पशु के ही तल की। बस हम उनको ऐसी गम्भीरता से लेते हैं जैसे ये तो बहुत बड़ी बात है। वो बहुत बड़ी बात नहीं है, उसके केन्द्र में क्या बैठा हुआ है? लोभ। तो लो हो गयी न शिशु के तल की बात। कुत्ता हड्डी के पीछे भाग रहा है, और एक राष्ट्र जीडीपी के पीछे भाग रहा है, अन्तर बता दो। बोलो।

दो कुत्ते लड़ पड़े क्योंकि एक आ गया था दूसरे के इलाके में। और इलाके को लेकर के बड़ी बहस है, खलबली मची हुई है, बड़ा अनिश्चय है इलाका है किसका। अब रात गहरा रही है, आधी रात हो चुकी होगी, कोई भरोसा नहीं है, अभी नीचे एक श्वान दल दूसरे से भिड़ ही जाए। और ये इसी मुद्दे पर भिड़ते हैं, ये इलाका किसका है। और रूस और यूक्रेन क्या कर रहे हैं? एक श्वान दल लगा हुआ है इलाका खींचने में, दूसरा कह रहा है, 'मैं न दे रहा।' शिशु और पशु, एक तरफ़ वाले को बोल दो शिशु है और दूसरी तरफ़ वाले को बोल दो पशु है। या दोनों को शिशु बोल दो, एक शिशु 'अ', एक शिशु 'ब'। इनका समाधान मात्र वही है जो कृष्ण देते हैं अर्जुन को।

जो समस्याएँ आज की हैं वो बस एक विस्तृत और विकृत रूप हैं उन सब समस्याओं का जो हमारे होने के साथ ही पैदा हो गयी थीं। वो समस्याएँ सदा से रही हैं, आज के युग की कोई समस्या नयी नहीं है, बस उसका रूप और विस्तार नया है। कोई आज नयी समस्या नहीं है, आज की जितनी समस्याएँ हैं वो सब आपको किसी-न-किसी रूप में गीता में भी मिल जाएँगी।

जब मैं 'दुर्गा सप्तशती' पर श्लोक-दर-श्लोक बात कर रहा था तो मैंने कितनी बार और कितना ज़ोर देकर के आपसे कहा था कि देखिए कि जब सब राक्षस मारे जाते हैं तो अन्ततः परिणाम क्या बताया जाता है। परिणाम ये बताया जाता है कि हवा साफ़ हो गयी, नदियों ने जो अपना रास्ता बदल दिया था नदी वापस अपने सही रास्ते पर आ गयीं, ग्रहों की घूमने की गति सामान्य हो गयी, सब पशु-पक्षी जिस प्रकार से आचरण करते थे और जैसे मंगलपूर्वक रहते थे, स्वच्छन्द विचरते थे, सब अपनी-अपनी प्रकृति में वापस लौट गये।

आप देख रहे हो, आज आप बोलते हो क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन) और वहाँ सप्तशती भी यही बता रही है कि ये जितने असुर थे, राक्षस-दानव इन्होंने यही कर रखा था, उन्होंने प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर रखा था। देवी प्रकृति का ही तो रूप हैं न। उन्होंने प्रकृति के साथ ही खिलवाड़ कर रखा था। तो आज आप कहते हो क्लाइमेट चेंज, क्लाइमेट चेंज की समस्या भी नयी नहीं है क्योंकि वृत्ति बहुत पुरानी है न। आज की कोई समस्या नयी नहीं है क्योंकि आज की कोई वृत्ति नयी नहीं है। इसलिए समाधान है गीता। इसलिए गीता सदा प्रासंगिक रहेगी।

जितने धर्म हैं जिनको आप धर्म बोलते हो, आयोजित धर्म, संगठित धर्म, सब मिट जाने हैं, मिट जाने चाहिए। गीता शेष रहेगी, क्योंकि गीता का किसी विचारधारा से कोई सम्बन्ध नहीं है, गीता का किसी आयोजन से, संगठन से, दल से, समुदाय से कोई सम्बन्ध नहीं है। गीता का प्रयोजन तो सत्य मात्र से है और सत्य तो नहीं बदलता, न मिटता। जैसे सत्य न बदलता है न मिटता है, गीता भी न बदलेगी न मिटेगी।

समझ में आ रही है बात?

जब तक मानव मन रहेगा तब तक गीता की उपयोगिता भी रहेगी प्रासंगिकता भी रहेगी। और जब मैं कह रहा हूँ 'गीता' उससे मेरा आशय है समूचा वेदान्त। ये रहेंगे। बाक़ी जितनी बातें आपने धर्म के नाम पर पकड़ रखी हैं, चाहे कोई आपका धर्म हो, आप अपना कोई भी धर्म, पंथ, समुदाय, मज़हब बताते हों वो सब मिट जाना है। उसका कुछ नहीं है। ये सब आती-जाती चीज़ें हैं। इसमें से ज़्यादातर बस वो हैं जो मनुष्य के विचार से उत्पन्न हुआ है, माने प्रकृति के अन्तर्गत है। जो प्रकृति के अन्तर्गत है, हमको पता है कि एक दिन उत्पन्न होता है तो एक दिन विलीन भी होता है।

कोई विचार स्थायी होता है क्या? तो जितनी बातें आपने किताबों में लिख दी हैं विचार करके वो कहाँ से स्थायी हो जाएँगी, वो भी मिट जानी हैं। प्रकृति में कुछ भी अमर होता है क्या? दो ही बातें हैं जो अमर हैं। आप कहेंगे, ‘अमर! दो आ गये! आचार्य जी ये कैसे हुआ? अभी तक तो एक थे।’ हाँ, हमारे देखे दो अमर हैं। हमारे प्रसंग में दो अमर हैं, एक तो सत्य और दूसरा सत्य से छिटके रहने की हमारी वृत्ति।

तो जब तक हम हैं तो दो अमर हैं क्योंकि हम तो हैं ही और हम तो सत्य से दूजे हैं, पराये हैं। तो एक तो हम हो गये, और हम माने ये शरीर भर नहीं, हम माने अहम् वृत्ति, जो तब से चली आ रही है। एक तो वो है जो चली आ रही है, मिट नहीं रही। और दूसरा सत्य है जो मिट सकता नहीं।

अहम् वृत्ति वो है जो मिट सकती है पर मिट रही नहीं। और सत्य है दूसरा जो मिट सकता ही नहीं। तो इन दोनों को मैं कह रहा हूँ, ये अमर हैं। गीता में इन्हीं दोनों की बात है।

वृत्ति को कैसे सत्य तक ले जाना है? एक बचेगा, दूसरा मिट जाएगा। कौन बचेगा? सत्य बचेगा, वृत्ति मिट जाएगी। वृत्ति को उसके बाप से टकरा देते हैं श्रीकृष्ण। और वृत्ति को एक ही मिटा सकता है, ये बात मैं आज शायद बीसवीं बार दोहरा रहा हूँ, वृत्ति को कौन मिटाएगा? आत्मा। क्योंकि वृत्ति आत्मा के लिए ही तो तड़प रही है।

तो मिटाने से ये मत समझिएगा कि वृत्ति के साथ बड़ा कोई अत्याचार, अन्याय हो गया। वृत्ति को उसका प्रियवर मिल गया और मनचाही मुराद मिल गयी, इसलिए मिट गयी वो। इसलिए नहीं मिट गयी कि उसको पीस डाला गया, उसके खंड-खंड कर दिये, काट-कूटकर, जलाकर उसको कहीं दफ़न कर दिया।

नहीं-नहीं, ऐसा नहीं हुआ है, वृत्ति को पूर्णता मिल गयी, वो विगलित हो गयी। वो बोली, ‘मैं एक बेचैनी थी, बेचैनी के रूप में ज़िन्दा थी, अब चैन मिल गया। बेचैनी मिट गयी।’

समझ में आ रही है बात?

अध्यात्म कोई क्षेत्र नहीं है इसलिए। यदि अध्यात्म सब समस्याओं का समाधान है तो क्या अध्यात्म जीवन के अन्य क्षेत्रों से पृथक कोई अपनेआप में क्षेत्र हो सकता है? नहीं। जीवन के जितने भी क्षेत्र हैं उनका समाधान है अध्यात्म। जीवन के जितने भी क्षेत्र हैं उनका आधार है अध्यात्म। अध्यात्म से ही शुरुआत है और अध्यात्म में ही अन्त है।

कोई ये न कहे कि द फील्ड ऑफ़ स्प्रिचुएलिटी (अध्यात्म का क्षेत्र)। फील्ड नहीं है स्प्रिचुएलिटी। आप होंगे किसी भी क्षेत्र में, आपको आध्यात्मिक होना पड़ेगा। आप आध्यात्मिक नहीं हो तो आप जिस भी क्षेत्र में हो, वहाँ आप घोर असफल हो। और आज पूरा विश्व ही असफल है, उसकी वजह यही है कि इंजीनियर मात्र इंजीनियर है, मैनेजर मात्र मैनेजर है, राजनेता मात्र राजनेता है, चिकित्सक मात्र चिकित्सक है, छात्र मात्र छात्र है, खिलाड़ी मात्र खिलाड़ी है, नर्तक मात्र नर्तक है, चिन्तक मात्र चिन्तक है। सब अपने-अपने क्षेत्रों में बैठे हुए हैं, किसी को भी अपने क्षेत्र के आधार का कुछ पता नहीं है।

कलाकार कह रहा है, ’मैं कला बना रहा हूँ।’ अरे तू बिना अध्यात्म के कौनसी कला बनाएगा रे! वहाँ न्यायालय में बैठे हुए हैं, योर ऑनर , वो कह रहे, ‘हम न्याय कर रहे हैं।’ बिना अध्यात्म के तुम कौनसा न्याय करोगे? बिना अध्यात्म के कैसे न्यायाधीश कहला लोगे? राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री बैठे हुए हैं, वो कह रहे हैं हम देश चलाएँगे। बिना अध्यात्म के तुम अपनेआप को नहीं चला सकते, तुम देश क्या चलाओगे!

आप किसी भी क्षेत्र में हों, आपको आध्यात्मिक तो होना पड़ेगा न। अध्यात्म अपनेआप में कोई क्षेत्र नहीं होता। ठीक वैसे जैसे दिल का धड़कना अपनेआप में कोई काम नहीं होता, साँस लेना अपनेआप में कोई काम नहीं होता। कभी आप कहते हो, 'दिन में मैं दस काम करता हूँ, जिसमें से नौवाँ है दिल का धड़कना और दसवाँ है साँस लेना, तो अभी आठ निपटा दिये हैं अभी आख़िरी के दो बाक़ी हैं, जल्दी से इनको भी निपटा दूँ'? आप कोई भी काम कर रहे हो, उसके साथ-साथ साँस भी चलेगी, दिल भी धड़केगा। अध्यात्म दिल के धड़कने जैसा है। उसे निरन्तर होना पड़ेगा, आप कुछ भी कर रहे हों, अध्यात्म को तो होना पड़ेगा।

अध्यात्म साँस लेने जैसा है, आप सो रहे हों तो भी साँस चलनी चाहिए, आप बायें जा रहे हो तो भी साँस चलनी चाहिए, आप दायें जा रहे हो तो भी साँस चलनी चाहिए। अध्यात्म वैसा ही है। अध्यात्म रोशनी जैसा है, नहीं फ़र्क पड़ता कि आप क्या देख रहे हो, कुछ भी देखने के लिए प्रकाश चाहिए। हो सकता है आप सफ़ेद को देख रहे हो तो भी प्रकाश चाहिए, आप काले को देख रहे हो तो भी प्रकाश चाहिए। अध्यात्म प्रकाश जैसा है। और यही सब उपमाएँ हैं जो अध्यात्म को दी भी जाती हैं। प्रकाश को नहीं देख सकते तो प्रकाश कोई अपनेआप में दृश्य विषय नहीं है। अध्यात्म इसी तरह कोई विषय नहीं है। प्रकाश के माध्यम से सबकुछ देखा जाता है।

समझ में आ रही है बात?

ये अब जो समस्या का चौथा अंग है, उसकी बात करते हैं। वो आता है हमारे सामने चालीसवें से सैंतालीसवें माने अन्तिम श्लोक तक। वहाँ क्या हो रहा है? अर्जुन देख रहे हैं अपनी बात कहकर के, मोह वाली, श्रीकृष्ण की आँखों को, कृष्ण के मुखमंडल को, और वहाँ उनको कोई प्रत्युत्तर मिल नहीं रहा। और कृष्ण सखा रहे हैं अर्जुन के, अर्जुन थोड़ा-बहुत तो कृष्ण के मनोभाव पढ़ना जानते ही हैं।

अर्जुन ने अपनी ओर से इतनी बड़ी बात बोल दी कि नहीं लड़ूँगा, न मारूँगा, इनको मारकर मुझे क्या मिलना है। इनके लिए तो मैं जीना चाहता था, अरे ये तो छोड़िए कृष्ण कि एक मुझे राज्य मिल जाएगा इनको मारकर, मुझे पूरी पृथ्वी मिलती हो तो भी न मारूँ इनको। अरे, ये भी छोड़िए श्रीकृष्ण कि पूरी पृथ्वी मिलती हो, इनको मारकर के, मैं कह रहा हूँ, तीनों लोक मिलते हों तो भी न मारूँ मैं।

अब इतनी बड़ी बात कह दी अर्जुन ने और श्रीकृष्ण बिलकुल उदासीन। अर्जुन की सारी बातें अनुत्तरित जा रही हैं। तो जैसे फिर अर्जुन अगला दाँव चलते हों, अब दूसरी बात कहते हैं। कहते हैं, 'देखिए, बात समझिए, मेरे पिछले तर्क से आप सहमत नहीं हो रहे हैं, ये मुझे आपकी आँखों से दिख गया। मैंने आपको इतना कहा कि मुझे नहीं लड़ना, मुझे नहीं लड़ना पर आपकी आँखें ऐसे हैं।' अब कह रहे हैं, ‘कह लिया जो कहना है, चलो गांडीव उठाओ।’ ‘देखिए, मुझे विवश मत करिए, मैं नहीं कर पाऊँगा। और मेरे पास एक और तर्क है, मैं बताये देता हूँ।’ अब दूसरा तर्क सामने आ रहा है।

इस तर्क में आप पाएँगे संस्कृति और अध्यात्म का भेद। और इसलिए गीता कही गयी है, ये वो चौथी समस्या है जिससे गीता लड़ती है, जिसका गीता समाधान देती है। चौथी समस्या क्या है? 'संस्कृति बनाम अध्यात्म।' तीसरी समस्या क्या थी? 'विचार बनाम वृत्ति।' चौथी है 'संस्कृति बनाम अध्यात्म।’

अब अर्जुन तर्क देते हैं कि देखिए कृष्ण, 'ये सब क्षत्रिय लोग हैं, सब मर गये अगर तो इनकी स्त्रियों का क्या होगा? वो बेचारी कहाँ जाएँगी?’ अब ये बात धार्मिक नहीं है लेकिन ये बात सामाजिक और सांस्कृतिक है। अर्जुन समाज की और संस्कृति की ओर से बोल रहे हैं, और श्रीकृष्ण को संस्कृति से कोई लेना-देना नहीं। तो ये जो बात है अर्जुन की, श्रीकृष्ण इसको बड़ी निर्ममता से आगे काट देते हैं। लेकिन अर्जुन की बात देखिए, वही जो संस्कृतिवादियों की बात होती है।

समझिएगा!

अर्जुन किसकी तरफ़ से बोल रहे हैं? संस्कृति और समाज की ओर से। और श्रीकृष्ण बोल रहे हैं अध्यात्म की ओर से। यहीं से स्पष्ट हो जाता है कि गीता सामाजिकता और सांस्कृतिकता को एकदम महत्व नहीं देती। अर्जुन कह रहे हैं, ‘प्रतिलोम विवाह हो जाएगा!’ प्रतिलोम विवाह। प्रतिलोम विवाह समझते हैं? जब एक ऊँचे वर्ण की महिला एक तथाकथित नीचे वर्ण के पुरुष के साथ संसर्ग कर लेती है। और उससे फिर जो पैदा होंगे वर्णसंकर कहलाएँगे, कितनी ग़लत बात हो जाएगी। और कृष्ण कह रहे हैं, ‘अच्छा! ग़लत बात हो जाएगी! ग़लत बात हो जाएगी, एक महिला को किसी पुरुष से प्रेम है वो उसके साथ आ गयी, ये ग़लत बात हो जाएगी, अर्जुन, सचमुच?’

अर्जुन कह रहे हैं, 'नहीं, पर देखिए समाज के ठेकेदार तो ऐसे ही बोलते हैं न, वर्ण-व्यवस्था क़ायम रहनी चाहिए।' श्रीकृष्ण कह रहे हैं, 'हटाओ वर्ण व्यवस्था, आत्मा मात्र सत्य है, बाक़ी सब मिथ्या। क्या तुम बात कर रहे हो!' हालाँकि आने वाले सूत्रों में कहीं-कहीं पर श्रीकृष्ण स्वयं वर्ण व्यवस्था की बात करते हैं। पर उस बात को गीता के समग्र सन्दर्भ में लेकर के देखना पड़ेगा। श्रीकृष्ण ख़ुद भी बता देते हैं कि ब्राह्मण माने होता क्या है वास्तव में।

अर्जुन कह रहे हैं, 'देखो, सारे क्षत्रिय मर गये तो महिलाएँ बेचारी दुखी हो जाएँगी। फिर वो जाकर के इधर-उधर वालों से विवाह कर लेंगी और फिर उनके बच्चे पैदा हो जाएँगे, वो वर्णसंकर होंगे।' इतना ही नहीं, अर्जुन और आगे बढ़ जाते हैं, और इससे आपको पता चलेगा गीता किन ताक़तों से लड़ रही है।

अब अर्जुन जो बात कह रहे हैं, गीता उस बात से लड़ रही हैं। अर्जुन कहते हैं, 'पता है क्या होगा? ये जो वर्णसंकर लोग हैं न, ये जब श्राद्ध करेंगे तो पितरों की जो जीवात्माएँ भटक रही हैं न, उनको पानी नहीं पहुँचेगा और वो बेचारे प्यासे घूमेंगे।' और श्रीकृष्ण फिर ऐसे ही देख रहे हैं, ‘अर्जुन, क्या हो गया है?’ और अर्जुन वो सारी बातें कर रहे हैं जो आज भी करी जा रही हैं। और लोगों को समझ में नहीं आता कि गीता तुम्हारी इन्हीं बातों को काटने के लिए है। ये जो तुम पितरों की आत्माएँ भटकने की बात वगैरह करते हो, वही बात तो यहाँ अर्जुन ने कर दी है। मैं श्लोक बताये देता हूँ आपको।

बयालीसवाँ श्लोक, पहले ही अध्याय का — “वर्णसंकर कुल-नाशियों और कुल के नरक की प्राप्ति के लिए होता है। वर्णसंकर जब पैदा होता है तो कुल का नाश हो जाता है। और पूरा कुल किसी नरक में पहुँच जाता है क्योंकि इन वर्णसंकर लोगों के श्राद्ध-तर्पण आदि कार्य लुप्त होने से उनके पितर लोग पतित हो जाते हैं।”

और ये तर्क अर्जुन जाकर के दे रहे हैं कृष्ण को। उस समय भी ये सब चलता था, व्यर्थ का कर्मकांड। निश्चित सी बात है, श्रीकृष्ण पर इस तरीक़े के कर्मकांडी तर्कों का कोई प्रभाव पड़ता नहीं है।

आम आदमी कैसे कह देता है कि मुझे गीता बड़ी पसन्द है, मुझे समझ में नहीं आता। गीता हर उस चीज़ के विरुद्ध है जो तुम्हें बहुत पसन्द है, तो तुम्हें गीता कैसे पसन्द हो सकती है! तुम जो कुछ करते हो धर्म और संस्कृति के नाम पर, गीता उसके बिलकुल विरुद्ध है। तुम्हें गीता कैसे पसन्द हो सकती है! यही वजह है कि दुनिया में होंगे सौ, एक-सौ-दस करोड़ हिन्दू और ऊपरी-ऊपरी मौखिक तौर पर सब बोलते होंगे कि गीता तो हमारा पूज्य और प्रिय ग्रन्थ है, लेकिन गीता को समझने वाले दुनिया में इस वक़्त शायद मुट्ठी भर लोग भी न हों। और गीता को जीने वाले लोग तो आप उँगलियों पर गिन लो।

और ऐसे लोग जो गीता को न समझते, न जीते, ऐसों को मैं सनातनी मानता ही नहीं। नाम के सनातनी हो, नाम में भी उपनाम के। पैदा हो गये हो नाम के किसी हिन्दू घर में तो अपनेआप को हिन्दू बोलने लगे हो। और जो कुछ तुम करते हो हिन्दू होने को लेकर के, उन सब चीज़ों का गीता विरोध ही नहीं, निषेध करती है।

जानते हैं तर्क क्या है? श्राद्ध को लेकर के मैंने कुछ बातें कहीं, तो उसमें से लोगों का तर्क आया — 'अरे, श्राद्ध ग़लत कैसे होता है, श्राद्ध का उल्लेख तो स्वयं गीता में भी है। ये पितर और कर्मकांड और पितरों की आत्माओं को तृप्त करना, ये सब करना, इन सबका उल्लेख तो गीता में भी है। तो श्राद्ध कैसे, आचार्य जी, आप कह रहे हैं कि ठीक नहीं?'

गीता में किस तरीक़े से हैं श्राद्ध का उल्लेख, पागल! गीता में उल्लेख ये है कि अर्जुन कह रहे हैं कि अरे! वर्णसंकर आ जाएगा तो श्राद्ध कौन करेगा और कृष्ण कह रहे हैं हटाओ ये मूर्खता की बात तुम्हारी, वर्ण संकर और श्राद्ध! तो गीता में श्राद्ध का उल्लेख है, श्राद्ध को नकारने के लिए उल्लेख है। श्राद्ध के समर्थन में नहीं है गीता। श्राद्ध की बात हुई है और वहाँ श्राद्ध को नकार ही दिया है। कि ऐसा कहा है कि जैसे ही अर्जुन ने कहा कि वर्णसंकर आ जाएँगे, फिर श्राद्ध नहीं होगा तो पितरों का पतन हो जाएगा, तो कृष्ण ने बोला, ‘अरे अर्जुन, धन्यवाद! इतनी अद्भुत बात तो मैंने सोची ही नहीं थी, मैं कहाँ का केशव! आज से भगवान तुम। लाओ ज़रा गांडीव, मुझे दो और रथ तुम हाँको। क्या है कि मुझसे ज़्यादा बुद्धिमान तो तुम ही हो, श्राद्ध वाली बात मैंने तो सोचा ही नहीं। और ये वर्णसंकर वाली बात कि एक वर्ण की महिला दूसरे वर्ण में जाकर के ब्याह न करें, ये तो मैंने सोची नहीं, तुमने सोची।’

अर्जुन ने सोची क्योंकि अर्जुन इसी समाज का उत्पाद है। और ये समाज जितना मूर्ख और पतित आज है इतना ही लगभग हमेशा रहा है। कृष्ण इसीलिए विरल तब भी थे, कृष्ण इसीलिए विरल आज भी हैं। आज भी जात-पात से ऊपर नहीं उठ पाये, उस समय भी अर्जुन वही जात-पात की बात कर रहे हैं। आज भी आप उथले कर्मकांड से अधिक धर्म को कुछ जानते नहीं, उस समय भी अर्जुन यही उथले कर्मकांड की बात कर रहे हैं।

उस समय भी कोई कृष्ण चाहिए थे जो अर्जुन को बोले कि अर्जुन इन चक्करों में मत पड़ो, ये वर्ण और श्राद्ध और पितर और ये सब। आज भी कोई कृष्ण ही होता है जो आपको ये सब समझाता है पर सुनना तो आपको है नहीं। 'संस्कृति बनाम अध्यात्म।' गीता इन चार चुनौतियों से लड़ रही है। समझ में आ रही है बात?

गीता लड़ रही है आपकी वृत्ति से, गीता लड़ रही है आपकी संस्कृति से, और गीता लड़ रही है मोह से। इन चार को इसीलिए आप दो में समाहित कर सकते हो — 'वृत्ति बनाम विचार’ और 'संस्कृति बनाम अध्यात्म’। क्योंकि पहली बातें जो दोनों थीं, धृतराष्ट्र और दुर्योधन की, वो तीसरी बात में आकर के समा जाती हैं।

धृतराष्ट्र के पास क्या था? पुत्रमोह। दुर्योधन के पास क्या है? भय। और अर्जुन के पास क्या है? रक्तमोह, या अतीत-मोह, या ममता। ये तीनों ही चीज़ें किसमें समा जाती हैं? वृत्ति में। तो जो हमने चार बातें कहीं उनको हम अन्ततः दो कह देते हैं।

तो गीता हमें शुरू में ही बता देती है कि कौनसी समस्याएँ हैं जिनको वो सम्बोधित करेगी। पहली समस्या होगी वृत्ति की, दूसरी होगी संस्कृति की। तो अब से आपसे कोई पूछे कि गीता किसलिए है, तो कहिए, ‘गीता है भीतर से हमारी वृत्ति को चुनौती देने के लिए, और बाहर से हमारी संस्कृति को चुनौती देने के लिए।’ और भीतरी वृत्ति ही बाहरी संस्कृति बन जाती है।

आपसे कोई पूछे कि गीता क्यों बोली गयी, तो क्या उत्तर देंगे आप? बिलकुल लिख लीजिए, समझ लीजिए, पकड़ लीजिए —

भीतर से गीता है हमारी वृत्ति को चुनौती देने के लिए और बाहर गीता है हमारी संस्कृति को चुनौती देने के लिए। ये गीता का काम है।

तो पहला अध्याय बिलकुल स्पष्ट कर देता है कि ये रहा प्रॉब्लम स्टेटमेंट , समस्या का वक्तव्य अब ये रहा। और अब आगे आएगा समाधान।

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