
ज़िंदगी का कोई अहम फ़ैसला हो या आगे न बढ़ पाने की स्थिति - क्या आप ऐसे वक़्त खुद को कमज़ोर मानकर चुनौती के सामने हार मान लेते हैं?
“मैं क्या करूँ?”
“मैं मजबूर हूँ!”
क्या ऐसी आवाज़ें आपको घेरने लगती हैं?
जीवन को गहराई से जानने वाले हमें मजबूर देखकर मुस्कुराते हैं क्योंकि उन्हें दिख रहा है कि हम मजबूर है नहीं, बस अपना दम भूल गए हैं।
ऐ जान, कब आया तुझ में ये दम?
ऐ दिल, कब से इस धड़कन को जाना?
संत रूमी की इन पंक्तियों पर आधारित प्रेम-काव्य की आख़िरी वीडियो सीरीज़ में आचार्य प्रशांत से हम सीखेंगे कि जब इश्क़ जीवन में आता है, तब कैसे वह भीतरी दम प्रकट होता है, जिसे हम बार-बार भुला देते हैं।
Can’t find the answer you’re looking for? Reach out to our support team.