
भूले मन समझ के लाद लदनिया थोड़ा लाद बहुत मत लादे, टूट जाए गर्दनिया
पूरी पृथ्वी में एक मनुष्य ही है जो परेशान है। आप किसी और जानवर, पक्षी या अन्य जीव जंतु को इतना परेशान नहीं देखेंगे। इसलिए मात्र मनुष्य ही है जिसे दर्शन चाहिए ताकि समझ सके कि इस जीवन का करना क्या है।
आरंभ में ही कबीर साहब मन को भूले की उपाधि दे दी है। भूल से आशय है अविद्या, अज्ञान। वह अपनी जैसे समझ रखने वालों से ज्ञान लेने निकल पड़ता है। वह अज्ञानी है इसलिए हर बार ज्ञान गलत जगह खोजने निकल जाता है। तभी कबीर साहब बोल रहे हैं- समझ के लादना कि क्या मन पर डाल रहे हो। बात कम और ज्यादा लादने की नहीं है। बात है मन पर वही लादो जो मन को थोड़ा कर दे।
संत हमेशा से समाज के लिए करुणामूर्ति बन के आए हैं। किसी ऋषि ने भी हमसे हमारी ज़मीनी भाषा में बात नहीं की। वे संत ही थे जो ऋषि और समाज के बीच का पुल बने और हमें हमारी ही लोकभाषा में ज्ञान दिया।
आचार्य जी द्वारा समझाया हुआ कबीर साहब का यह भजन हमें हमारे हाल से परिचय कराएगा ताकि हम स्वयं देख सकें कि कैसे कैसे प्रपंचों में हम खुद को उलझा लेते हैं।
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