
भारत की सभ्यता में एक गहरा विरोधाभास छिपा है, जहाँ कभी गार्गी और मैत्रेयी जैसी वैदिक काल की महिलाओं ने अपने प्रश्नों से विद्वानों को चुनौती दी थीं; जहाँ स्त्री केवल पूजनीय नहीं, बल्कि वह विचार की जननी भी थी। वहीं जब हम अपने ही उच्चतम दर्शन से दूर होने लगे और धर्म की जगह कठोर नियमों ने ले ली, तब उसी समाज ने, जिसने कभी ज्ञान की अग्नि को पूजा था, उसने स्त्री की शिक्षा पर पाबंदियाँ लगाकर, उसे ज्ञान के अधिकार से वंचित कर दिया। लगभग तीन हज़ार वर्षों के इसी मानसिक पतन से महात्मा ज्योतिबा फुले लड़ रहे थे।
1848 में, जब फुले दंपति ने भारत का पहला महिला विद्यालय स्थापित किया, तब उन्हें अपने ही समाज से घोर प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। अपमानजनक व्यवहार, सामाजिक अवहेलना और तरह-तरह की बाधाएँ उनके मार्ग में थीं। फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी, क्योंकि वे जानते थे कि स्त्री-शिक्षा के बिना कोई समाज वास्तविक रूप से स्वतंत्र नहीं हो सकता।
आज, 21वीं शताब्दी में भारत जब महिला समानता, स्वतंत्रता और अधिकारों की बात करता है, तो यह याद रखना आवश्यक है कि इन अधिकारों की नींव स्वतः नहीं बनी। आज की महिलाएँ जो शिक्षित हैं और जिन बेटियों को शिक्षा का अधिकार मिला है,वो ज्योतिबा फुले के संघर्ष के कारण ही है। और उन्हीं से प्रेरित होकर डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान के माध्यम से उस व्यवस्था को चुनौती दी, जिसने सदियों तक भारतीय महिलाओं की प्रगतिशील यात्रा को रोका।
महात्मा फुले की इस वीडियो शृंखला में आचार्य प्रशांत आपको ले चलेंगे इतिहास और संघर्ष की उस यात्रा पर, जिसके मुख्य बिंदु कुछ इस प्रकार हैं :
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