
क्या कभी आपको दुनिया की भीड़ में भी खुद से कोसों दूर निकल जाने का एहसास होता है? ऐसा एहसास जो बार-बार याद दिलाए कि जीवन में होना कुछ और था और बन कुछ और ही गए हैं।
क्या यह किसी एक गलत निर्णय का नतीजा है? या फिर जीवन के सारे निर्णय आपको इसी बेचैनी पर ले आते हैं?
प्रस्तुत वीडियो सीरीज़ में आचार्य प्रशांत आपका ध्यान उस ‘आधार’ की तरफ़ ले जाते हैं जहाँ से आपके जीवन के सभी चुनाव निकलते हैं। यह वही आधार है जहाँ व्यक्ति अपनी असुरक्षाओं, समाज की दी हुई झूठी इज़्ज़त और अपनी ही रची कहानियों के सहारे जीता है ताकि उसे कभी बदलना न पड़े।
आचार्य प्रशांत स्पष्ट करते हैं कि इस आधार से निकला हर निर्णय जीवन में केवल बेचैनी ही लाता है। जब इस झूठे आधार की असलियत दिखाई देने लगती है, तब उससे अपनी आदतों, मान्यताओं व धारणाओं के प्रति ऊब उठती है। और इसी ‘ऊब’ को दुनिया 'बौरापन' समझती है।
जो मैं बौरा तो राम तोरा,
लोग मरम का जाने मोरा
इस वीडियो श्रृंखला में, आचार्य प्रशांत कबीर साहब के भजन की पहली दो पंक्तियों को आज के संदर्भ में जीवंत करते हुए ‘राम केंद्र’ से आपका परिचय कराते हैं। वह केंद्र जहाँ जीवन में स्पष्टता और वास्तविक स्वतंत्रता आती है, जो हमें डरों और बाहरी पहचान के भारी बोझ से मुक्त करती है।
राम केंद्र में ऐसी मौज भी छिपी है जो आम मन को तो पागलपन जैसी लग सकती है, लेकिन इसी में वह गहरा होश भी है जो आपको बेचैनी से मुक्ति की ओर ले जाता है।
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