
संत कबीरदास जी के आध्यात्मिक भजनों की गहराई को आम इंसान के समझने योग्य बनाना एक कठिन कार्य है, लेकिन आचार्य प्रशांत ने इस पुस्तक में इसे बेहद सरलता और स्पष्टता से कर दिखाया है। यह पुस्तक केवल कबीर साहब के प्रसिद्ध भजन "मन मस्त हुआ तब क्यों बोले" की व्याख्या नहीं है, बल्कि यह हमारे मन की उलझनों, संशयों और झूठे अहंकार को सीधा निशाना बनाती है। पुस्तक का हर अध्याय (जैसे 'हलकी थी तब चढ़ी तराज़ू' और 'हं...