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ज्ञानयोग [Must Read]
श्रीमद्भगवद्गीता भाष्य ४
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Book Details
Language
hindi
Print Length
231
Description
कृष्ण अर्जुन को तीसरे अध्याय में 'कर्मयोग' की सीख देते हैं पर कृष्ण जानते हैं कि ज्ञान के बिना कर्म की दिशा भटकी हुई होगी, जहाँ आत्मज्ञान नहीं होगा वहाँ कर्म निष्काम नहीं हो सकता। इसीलिए तीसरे अध्याय के ठीक बाद अर्जुन को मिलती है 'ज्ञानयोग' की सीख। ज्ञानयोग कर्मयोग से भिन्न नहीं है बल्कि कर्मयोग का आधार है। कृष्ण अर्जुन से कहते हैं, "धर्म प्राप्ति के लिए अनेक मार्ग हैं, अनेक विधि हैं; पर उन सबमें श्रेष्ठ है निष्काम कर्मयोग, जो आत्मज्ञान से ही संभव है।" प्रस्तुत अध्याय में कृष्ण ज्ञानयोग की सीख देकर अर्जुन के कर्म को निष्कामता की ओर ले चलते हैं। और इसी से श्रीमद्भगवद्गीता की सीख पूर्ण होती है।
Index
1. कृष्ण कौन हैं? वो कब प्रकट होते हैं? (श्लोक 4.1-4.7) 2. आम जीवन में कृष्ण को चुनने का अर्थ 3. कभी युद्ध, कभी उपेक्षा क्योंकि उद्देश्य है धर्म की रक्षा 4. कृष्ण से अगर प्रेम हो तो कृष्ण को जन्म दो (श्लोक 4.8-4.9) 5. जिधर मोहक विषय नहीं, उधर कृष्ण हैं (श्लोक 4.10) 6. कृष्ण – आवश्यक भी, अनिवार्य भी (श्लोक 4.11)
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