दुनिया आपको तोड़े वो एक संयोग होगा। हम उस संयोग से घबराते रहते हैं कि बाहर निकलेंगे, न जाने किस पग पर, किस चौराहे पर, कोई हम पर आघात कर दे और हम सह नहीं पाएँगे, हम बिखर जाएँगे। इतना क्यों इन्तज़ार कर रहे हो कि कोई और आकर आपको तोड़े? खुद ही खुद को तोड़ लो और देख लो कि बिखरते हो कि नहीं। पाओगे कि बिखरते तो हो, पर फिर सिमट भी जाते हो।
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प्रश्नकर्त्ता: नमस्ते सर, आपने बोला माँग सकते हो, माँगने में दिक्कत नहीं है। मैं जानती हूँ, आप कहते हैं कि नीयत की जब बात हो तो मैं कुछ नहीं कर सकता। मैं आज आपसे वही माँगने आयी हूँ। मुझे श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम और नीयत दे दीजिए। मैं दोगली ज़िन्दगी नहीं जीना चाहती। आप कुछ कहेंगे तो ज़रूर भीतर कुछ टूटेगा। कृपया, कुछ बोलें।
आचार्य प्रशांत: आपकी चीज़ है, मैं आपको कैसे दूँ? आपके और कृष्ण के बीच में, मैं कोई नहीं होता आने वाला। मैं आसपास थोड़ा घूम-घामकर दो-चार बातें बोल दूँगा, हो सकता है ज्ञान की बोल दूँ, या हो सकता है जोकर की तरह उछल-कूद करूँ, आपको हँसाऊँ। कुछ इस तरह के काम मैं कर सकता हूँ। लेकिन ये तो बहुत निजी प्रेम-प्रसंग होता है। वो था न कि “सच से मिलना तो कुछ नहीं है…”, (श्रोताओं को सम्बोधित करते हुए) पूरा कर दो यारों।
श्रोतागण: “बस दिल आ गया है।”
आचार्य प्रशांत: “बस दिल आ गया है, बेवजह।” ये तो दिलों की बात होती है। यहाँ दिल से मेरा आशय है अहम्। दिल माने और कोई फ़िल्मी कुछ नहीं। अहम् का आत्मा से प्रेम हो जाए, उसी को कह रहा हूँ कि कृष्ण पर दिल आ जाए। तो दिल की बात होती है, एक फ़ैसला होता है। भाई, एक ज़िन्दगी है, क्या उसको मजबूरी में काटें! और थोड़ा प्रयोग करना होता है। शुरू में कल्पनाएँ ज़्यादा होती हैं, लगता है, सही राह चलेंगे तो पता नहीं कौन-सा दुख मिलेगा, कौन-सी चोट मिलेगी। थोड़ा चलो तो दिखता है कि चोट तो मिली, लेकिन उतना भी नहीं घायल कर गयी जितना हम सोचते थे।




