आतम त्यागि अनातम पूजत मूरख शीश नवाय
~ कबीर साहब
आचार्य प्रशांत: “मूरख शीश नवाय।” ये शीश को लेकर के सन्त कबीर बड़े सतर्क रहे हैं। बार-बार शीश की बात करते हैं। “सिर काटे भुई धरे।” कितनी जगह उन्होंने शीश की या सिर की बात करी है। बहुत इसको लेकर सतर्क रहे हैं। ये सिर क्या होता है? शीश से आशय क्या है? अहम्। अहम् पोषण पाता है ग़लत को सम्मान देकर। इसको अच्छे से समझ लीजिए।
एक बार मैंने कहा था कि आपकी सारी ज़िन्दगी इसी बात से तय हो जानी है कि आपको आदर्श या सम्माननीय कौन लगता है। किसको आपने अपना आदर्श, नायक, हीरो बना लिया। उसी से आपकी ज़िन्दगी तय हो जाती है। और मैंने ये भी कहा था कि आप हीरे और कचरे को एक साथ सम्मान नहीं दे सकते। हीरे और कचरे को एक साथ सम्मान देंगे तो हीरे की ज़रूरत क्या है, कचरा काफ़ी है।
ये जो चीज़ें हैं न ऊँची, ये सार्वजनिक नहीं होतीं। ये सर्वसामान्य के लिए नहीं होतीं। प्रेम और सम्मान, इन दो को तो ख़ास तौर से जान लीजिए कि ये सबके लिए नहीं हो सकते। ये बहुत एक्सक्लूसिव होने चाहिए। एक्सक्लूजिव समझते हैं? विशेष। और विशेष मात्र को ही ये समर्पित या सम्बोधित होने चाहिए।
जो सबको सम्मान दे सकता है, वो किसी को सम्मान नहीं दे रहा। जो सबके सामने झुक सकता है, वो अब आकर झुके श्रीराम के, श्रीकृष्ण के आगे, तो उस नमन का कोई अर्थ नहीं। प्रेम का तो अर्थ होता है ऊँचाई की ओर बढ़ना। सबसे प्रेम कैसे कर सकते हो! हाँ, जहाँ पर तुम हो, उससे नीचे जो है, उसके प्रति करुणा रख सकते हो। करुणा सार्वजनिक हो सकती है, प्रेम नहीं। अन्तर समझिएगा।







