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ये नहीं सनातन धर्म || आचार्य प्रशांत, दिल्ली विश्वविद्यालय सत्र (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मैं आपको पिछले ढाई-तीन वर्षों से सुन रहा हूँ। मैं हिन्दू परिवार से हूँ, मेरे घर में लोग सारी मान्यताओं को मानते हैं — वो श्रृंगार हो, पति के लिए व्रत रखना हो, आदि-आदि। लेकिन उपनिषद्, भगवद्गीता के बारे में मुझे कभी घर से कोई जानकारी नहीं मिली। आपको सुनने के बाद मैं इन पुस्तकों की तरफ़ गया और अन्धविश्वास ख़त्म होने शुरू हुए।

तो मेरा पहला सवाल ये है कि हमारे परिवार में जो हिन्दुत्व है और जो आपने दिखाया वो बिलकुल अलग क्यों है? इससे मुझे वास्तविकता मिलती है, उससे नहीं मिलती।

दूसरा, बॉलीवुड और भोगवाद को लेकर आप बोलते हैं। मैं भी मूवीज़ (चलचित्र) देखने जाता हूँ। मैं भी शिकार हूँ उपभोक्तावाद का। मैं आपको सुनता हूँ फिर भी मैं नियंत्रण में नहीं रह पाता हूँ। मेरा प्रश्न है कि हम शिकार क्यों हैं और हम उस ओर क्यों बढ़ते चले जा रहे हैं?

आचार्य प्रशांत: हिन्दू धर्म का बड़े-से-बड़ा दुर्भाग्य रहा है कि उसमें कर्मकांड को प्रधानता मिली। इतनी प्रधानता मिली कि आम हिन्दू अपने धर्म का मतलब ही यही समझता है — रीति-रिवाज़, प्रथाएँ-परम्पराएँ, सौ तरीक़े के कर्मकांड, मान्यताएँ, अन्धविश्वास — इसी को मान लिया गया है कि यही तो धर्म है।

ये पक्ष धर्म का क्यों आगे आया? क्योंकि ये आम बुद्धि को सरल पड़ता है; और इसका कोई उत्तर नहीं है। ये आम बुद्धि को सरल पड़ता है, और आम बुद्धि में उन पुरोहितों की बुद्धि भी शामिल है जिन पर दायित्व था कि धर्म का असली अर्थ आम जनता को बताएँ। उन्हें स्वयं नहीं समझ में आया। कुछ उन्हें समझ में नहीं आया, कुछ उनका स्वार्थ इसमें था कि आम जनता को कर्मकांड में ही उलझाकर रखें, क्योंकि कर्मकांड में जजमानी मिलती है, दान-दक्षिणा मिलती है। वेदान्त में तो स्वाध्याय है, वेदान्त में तुम किसको जाओगे दान-दक्षिणा करने?

तो जो वास्तविक अध्यात्म है, भारतीय दर्शन में जो केन्द्रीय हीरा बैठा हुआ है, वो आम जनता में कभी प्रचलित ही नहीं होने पाया। धर्म का मतलब ही यही बन गया है — इस तरह से पूजा करनी है, फ़लानी जगह दूध चढ़ाना है, फ़लाने पेड़ पर धागा बाँधना है, फ़लानी तारीख़ को फ़लाना व्रत रखना है, फ़लाने पेड़ के नीचे से नहीं गुज़रना है, इस देवता को फ़लाना अन्न चढ़ाना है, अक्षत ऐसे लाना है। लंबी-चौड़ी विधियाँ, ये-वो, पचास तरीक़े की बातें जिनसे कुछ होता नहीं है, पौराणिक क़िस्से-कहानियाँ — ये सबकुछ धर्म बनकर रह गया।

वजह ले-देकर के यही समझ लो कि चीज़ जितनी ऊँची और जितनी असली होती है, वो उतनी मुश्किल से आगे बढ़ती है — ये मानव-प्रकृति है।

जो मैं कर रहा हूँ वो करने के लिए मुझे बहुत मेहनत पड़ती है, तब भी जैसा तुमने कहा कि तुम मुझे सुनते भी हो फिर भी बार-बार फिसल जाते हो। लेकिन जितनी भी मूर्खतापूर्ण चीज़ें होती हैं वो अपनेआप आगे बढ़ती हैं। तुम कह रहे हो कि तुम यूट्यूब पर मुझे सुनते हो। तुम तक अपना वीडियो पहुँचाने के लिए संस्था को बहुत खर्च करना पड़ता है। हमारे पास जितना आता है, लगभग सबकुछ चला जाता है प्रचार में ही। लेकिन बेवकूफ़ी से भरे हुए, भौंडेपन से भरे हुए, और मूर्खता से भरे हुए वीडियो वायरल होते रहते हैं। सिर्फ़ वही वायरल होता है, और वहाँ उनको लाखों-करोड़ों लोग देख रहे होते हैं।

वास्तव में लाखों-करोड़ों लोग अगर किसी वीडियो को देख रहे हैं या किसी भी चीज़ की तरफ़ जा रहे हैं, फ़िल्म हो सकती है, तो संभावना यही है कि वो बहुत बड़ी बेवकूफ़ी से भरी हुई कोई चीज़ होगी। क्योंकि आदमी की प्रकृति ही ऐसी है, हम बेवकूफ़ हैं और हमें बेवकूफ़ियाँ ही ज़्यादा पसंद आती हैं।

स्कूल आपको ज़बरदस्ती भेजना पड़ता है, और बाक़ी कितने सारे काम हैं जिनसे आपको ज़बरदस्ती रोका भी जाए तो आप नहीं रुकते। जानते हो कि नहीं जानते हो? और स्कूल जाते हो, रो रहे हैं, चिल्ला रहे हैं, माँ पकड़कर बस में फेंक रही है। वहाँ से भी कूदने की धमकी दी, सारे काम कर लिये। इसी से समझ लो कि हमारा रुझान किधर को रहता है बचपन से ही।

फिसलने की ओर हमारा रुझान है, क्योंकि फिसलने में ज़रा भी ऊर्जा नहीं लगानी पड़ती न? बैठ जाओ, फिसल जाओगे! और ऊपर चढ़ने में बड़ी मेहनत लगती है, जैसे पहाड़ पर चढ़ाई चढ़ रहे हो, तो कोई करना नहीं चाहता। इसीलिए जो बिलकुल, एकदम व्यर्थ की, दो-कौड़ी की चीज़ें होती हैं वो आम जनता में बड़ी आसानी से फैल जाती हैं।

किसी को ये बताना बहुत आसान है न, कि सोमवार को व्रत रख लो, तुम्हें खूब पैसा मिल जाएगा। और किसी को ये समझाना कितना मुश्किल है — “अयम् आत्मा ब्रह्म“ - ‘यह आत्मा ही ब्रह्म है’। अब कैसे समझाऊँ?

वो कहता है, ‘मुझे यही बता दो बस, कि कौनसे पेड़ पर कौनसा धागा बाँधना है जिससे मन्नत पूरी हो जाए।‘ तो बताने वालों ने बता भी दिया, और ये भी कह दिया कि जब वो धागा बाँधना तो साथ में सौ रुपैय्या वहाँ चढ़ा भी देना। तो बढ़िया है, वो महिला भी खुश हो गयी, उसको धागा बाँधने को मिल गया और उसको दिलासा मिल गया कि अब मेरी सारी मुरादें पूरी हो जाएँगी, और जिन्होंने सलाह दी थी उनको सौ रुपैय्या भी मिल गया, दोनों ओर खुशी-ही-खुशी।

अब होगा कोई खड़ा ये बताने वाला — “अहम् ब्रह्मास्मि।” वो मुँह ताक रहा है। वो कहेगा, 'ये मैं किसको बताऊँ? वो सुनने को कोई तैयार ही नहीं है।' क्योंकि “अहम् ब्रह्मास्मि” बताया तो अहम् को ही बहुत बुरा लगता है।

अहंकार ये नहीं सुनना चाहता कि वो ब्रह्म है, अहंकार ये सुनना चाहता है कि मेरी उम्मीदें, मेरी चाहतें कैसे पूरी होंगी, उसको तो ये बताओ। उसको बस बता दो कि फ़लाने मंदिर में जाकर के तुम्हारी सब मुरादें पूरी हो जाती हैं, वो चला जाएगा। कहीं चादर चढ़ाने से कुछ हो जाता है, वो भागकर जाएगा वहाँ पर। तुम उसको समझाओ मन का विज्ञान, वो नहीं सुनना चाहता। तुम उसको भूत-प्रेत, टोना-टोटका बताओ, वो एकदम तैयार हो जाएगा, ‘हाँ, और बताओ, और बताओ! फिर क्या हुआ? फिर कैसे हुआ? पैरानॉर्मल कैसे होता है?’

तो इंसान की मूल प्रकृति को समझो‌, हम कौन हैं इस बात को जानो‌। हम जंगल से ताज़ा-ताज़ा निकले जानवर हैं, हमारी बुद्धि कोई जागृत नहीं हो गयी। हमारे भीतर एक दीया है तो ज़रूर, पर वो जला हुआ नहीं है, प्रज्ज्वलित नहीं है वो बिलकुल भी। बड़ी मेहनत से वो दिया जलाना पड़ता है, वो मेहनत करने को हम तैयार नहीं होते, और इसमें भी कारगुज़ारी इस शरीर की ही है‌।

ये जो प्रकृति है, इसमें जो सबसे प्रधान गुण है वो है तमसा। तमसा माने आलस। तमसा माने एक अन्धेरी रात जिसमें तुम नशे में डूबे हुए हो, बेहोश पड़े हो। तुम मेहनत करना चाहोगे? रात में धुत पड़े हुए हो खूब पीकर के, दो-तीन बजे हैं, इसी का नाम जीवन है। जीवन समझ लो एक लम्बी, अन्धेरी रात है जिसमें तुम बेहोश पड़े हो, जिसमें कोई प्रकाश नहीं, जिसमें कोई बोध नहीं — कौन मेहनत करना चाहेगा?

धुत पड़े हैं, मज़ा आ रहा है पड़े रहने में। कोई झिंझोड़कर भी उठाना चाहे तो हम उठना नहीं चाहते, कौन श्रम करे! कोई सस्ती चीज़ बता दो, कोई ऐसी चीज़ बता दो जो आसानी से हो जाए, कर लेंगे। अब आसानी से तो सिर्फ़ अन्धविश्वास ही फैलते हैं, तो अन्धविश्वास फैले हुए हैं।

ये कितनी विचित्र बात है कि वेदान्त को विदेशियों ने भारत से ले लिया। भारत से जितनी भी तमाम धार्मिक धाराएँ बहीं, वो सब मूलतः वेदान्त पर ही आधारित हैं। सबको वेदान्त से लाभ हो गया, हिन्दुओं को ही वेदान्त से लाभ नहीं हुआ। "रात और दिन दीया जले, मेरे घर में फिर भी अंधियारा है।" जहाँ से दिया जला था, वहीं प्रकाश नहीं होने पाया। पूरी दुनिया प्रकाशित हो गयी, हिन्दुओं का ही घर अन्धेरे में रह गया, और दीया हिन्दुओं का ही था।

और आज भी, अब जब बहुत बात होती है हिन्दू पुनर्जागरण वगैरह की, तो उसमें भी उन्हीं चीज़ों को बढ़ावा दिया जा रहा है जो हमारा अभिशाप रही हैं। कोई नहीं वेदान्त की बात कर रहा, आज भी वही बातें हो रही हैं कि हम जुलूस कितना लम्बा निकालेंगे, हम तमाम तरीक़े की प्रथाएँ कैसे और आगे बढ़ा दें — यही सब बातें हो रही हैं। और अन्धविश्वासों को पुख़्ता करने की बातें हो रही हैं — सामाजिक, राजनैतिक, हर तल पर। लेकिन जो केन्द्रीय दर्शन है, जिसमें सार है, जिसमें मुक्ति है, उसकी कोई बात नहीं करना चाहता क्योंकि वो बात ज़रा कठिन पड़ती है, और कठिनाई का रास्ता कोई लेना नहीं चाहता।

इतना और समझ लेना कि कर्मकांड और जाति-व्यवस्था एक-दूसरे से एकदम जुड़े हुए हैं। इन्हीं कर्मकांडों का परिणाम है कि हिन्दू अकेले समुदाय हैं दुनिया में जिन्होंने अपने ही भाइयों के ख़िलाफ़ भेदभाव किया।

इतनी सारी और धार्मिक धाराएँ और पन्थ हैं दुनिया में, वो सब ये कहते हैं कि हम ऊँचे हैं और दूसरे नीचे हैं। तुम किसी भी धर्म के लोगों से मिलो, उनमें सबमें ये छुपी हुई भावना रहती है कि हम ऊँचे हैं, हम बेहतर हैं, हम भगवान के, गॉड के, अल्लाह के चुने हुए लोग हैं, और बाक़ी सब हमसे नीचे के लोग हैं। हिन्दू अकेले लोग हैं दुनिया के जिन्होंने अपने ही घर के भीतर ऊँच-नीच बना दी, उन्होंने कह दिया कि हमारे ही भीतर कुछ लोग ऊँचे हैं, कुछ लोग नीचे हैं। ये सबकुछ इसी कर्मकांड से जुड़ा हुआ है, ये हम समझ ही नहीं पा रहे।

हमें वेदान्त से ज़्यादा मनुस्मृति प्यारी है। हमने अष्टावक्र का नाम नहीं सुना, हम दत्तात्रेय को नहीं जानते। कोई हमसे ‘याज्ञवल्क्य’ बोल दे, हम पूछेंगे, ‘कौन?’ हमें ये सब नहीं पता। हाँ, हमें धर्म के नाम पर पौराणिक कहानियाँ खूब पता हैं। ‘फिर उसने ऐसा कहा, फिर फ़लाने ऋषि ने ज़ोर से ज़मीन पर लात मारी, तो वहाँ से एक नदी निकल पड़ी!’ ये धर्म है? तुम ये बच्चों की कहानियाँ, ये परीकथाएँ, ये कॉमिक स्ट्रिप , इसको तुम धर्म बोलते हो?

‘फिर फ़लानी अप्सरा उड़ती हुई जा रही थी, नीचे ऋषि तपस्या कर रहे थे, तो अप्सरा ने अपना वस्त्र उनके ऊपर डाल दिया, ऋषि ने वस्त्र को भस्म कर दिया। फिर उसकी जहाँ पर राख पड़ी वहाँ हर साल एक मेला लगता है, और जितनी औरतें उस मेले में जाकर वहाँ की मिट्टी अपने माथे पर लगाएँगी वो सदा सुहागन रहेंगी।’ ये धर्म है! ये धर्म है? ये बेवकूफ़ी धर्म कहलाती है?

पर आम आदमी धर्म के नाम पर इससे आगे कुछ नहीं जानता — वो थाली ले लो, उसमें छेद कर लो, उसमें से चाँद को देखो। ये धर्म है? इनसे बोल दो, ‘बृहदारण्यक’, इन्हें छः दिन लगेंगे उच्चारण करने में, पर करवाचौथ इन्हें खूब पता है। तो फिर इसीलिए भारत देश की इतनी दुर्गति भी हुई न!

आदमी क्या है? आदमी अपनी चेतना है। तुम्हारी चेतना ही अगर मिट्टी में मिल गयी है तो तुम दुनिया में फिर हर क्षेत्र में पिछड़े हुए रहोगे; न तो तुम कोई आविष्कार कर पाओगे, न तुममें कोई बल रहेगा। आज भारतीयों को देखो न, एक-सौ-चालीस करोड़! तुम कोई एक क्षेत्र दिखा दो जिसमें भारत अग्रणी हो! और अब तो आज़ाद हुए भी इतने दशक बीत गये, अब हम वो मजबूरी भी नहीं बता सकते।

वजह बस यही है — वेदान्त का जो हमने अपमान करा है हमें उसकी सज़ा मिल रही है, धर्म के नाम पर ये जो हम मूर्खताएँ चला रहे हैं हमें उसकी सज़ा मिल रही है। कहते हैं हम कि वेद हमारे सर्वोच्च ग्रन्थ हैं, और वेदों के ही दर्शन को वेदान्त बोलते हैं। आपको अगर वेदान्त नहीं पता तो आप किस हक़ से अपनेआप को हिन्दू बोलते हो? और फिर उसी का परिणाम है कि हर तरीक़े से पिछड़े हुए हो; हर तरीक़े से।

जिन चीज़ों में हम आगे हैं वो यही हैं — हाइपरटेन्शन (उच्च रक्तचाप), डायबिटीज़ (मधुमेह), क्राइम (अपराध), पॉल्यूशन (प्रदूषण) — इनमें सबसे आगे हैं। बाक़ी चाहे विज्ञान का क्षेत्र हो, चाहे एकेडेमिक्स (शैक्षणिक) हो, एंटरटेनमेंट (मनोरंजन) हो, आर्ट्स (कला) हों, स्पोर्ट्स (खेल) हों — हम कहाँ हैं? क्योंकि हर काम में उत्कृष्टता के लिए बल चाहिए।

कृष्ण अर्जुन को कहते हैं — पूरा विभूतियोग यही है — कि जहाँ कहीं भी ऐश्वर्य है वो मेरे ही दम से है अर्जुन, और जहाँ मैं नहीं हूँ वहाँ पर कोई उत्कृष्टता नहीं मिलेगी तुम्हें, एक्सिलेन्स मिलेगी ही नहीं। हमारे जीवन में कहाँ कृष्ण हैं, हमने तो कृष्ण की जगह पकड़ भी लिया है तो कान्हा को। कौनसे कान्हा? वही, मक्खन-मलाई खिला दो, पालना झुला दो। गीता वाले कृष्ण? उनसे हमें कोई मतलब ही नहीं है। अब कोई ताज्जुब है कि हमारी इतनी बुरी हालत है?

हज़ारों साल तक हम पिटते रहे हैं, और उसमें हम फिर फ़क्र बताया करते हैं — कुछ बात तो है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-जहाँ हमारा। ये नहीं बोलते कि सदियों तुम पिटते रहे हो, लात खायी है‌। बहुत इस बात में गुरूर आ रहा है कि देखो हम मिटे नहीं।

मिटे कैसे नहीं, भौगोलिक रूप से भी एक छोटे से क्षेत्र में सिमटकर रह गये हो! कहाँ है तुम्हारा अफ़गानिस्तान, कहाँ है तुम्हारा पाकिस्तान, कहाँ है तुम्हारा बांग्लादेश? बताओ मुझे! एक समय पर इंडोनेशिया, मलेशिया, कम्बोडिया — कहाँ हैं वो सब? बताओ! और बोल रहे हो कि मिटे नहीं। मिटना और किसको बोलते हैं? लद्दाख को भी अब गँवा रहे हो। मिटना और किसको बोलते हैं?

और इस हार का कारण रहा है बल का अभाव, और बल आता है सत्य से। तमाम तरह की परम्पराओं और प्रथाओं से सत्य नहीं आता, वेदान्त से सत्य आएगा क्योंकि वेदान्त अकेला है जो सत्य का अनुसन्धान करना चाहता भी है, बाक़ियों को तो सत्य से कोई मतलब ही नहीं है।

तुम जो बाक़ी प्रथाएँ-परंपराएँ करते हो, क्या वो ऐसा कहती भी हैं कि वो सत्य के लिए हैं, सच्चाई के लिए हैं? न! वो तो मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए हैं। वेदान्त नहीं कहता कि वो तुम्हारी मनोकामनाओं की पूर्ति करना चाहता है। वो कहता है, ‘हमें सच्चाई जाननी है। चाहे अच्छी लगे या बुरी, हम सच्चाई जानने में उत्सुक हैं।‘ हर तरीक़े की प्रगति सिर्फ़ सच्चाई से आ सकती है।

जिन लोगों की धर्म में ज़रा भी रुचि हो, या जिन भी लोगों को अपनेआप को हिन्दू कहने का शौक हो या हिन्दू कहने में गौरव हो, मैं उनसे साफ़ निवेदन कर रहा हूँ — वेदान्त के बिना हिन्दू जैसा कुछ नहीं। मूर्ति पर फूल चढ़ाने से या होली-दिवाली मनाने से आप हिन्दू नहीं हो जाओगे।

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