प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। स्वास्थ्य को लेकर कुछ दिक्क़तें थीं, आपसे मेरी बात हुई थी। तो मन में कुछ शंकाएँ सी रहती हैं, मन एकाग्र नहीं होता, तनाव बना रहता है। कई मुद्दे जैसे पारिवारिक दायित्व जो हैं वो पूरे नहीं हो पा रहे हैं, कुछ अड़चनें आ जाती हैं सामने। कुछ उसका समाधान बताइए।
आचार्य प्रशांत: समाधान तो बताया था पूरा-पूरा - सही व्यस्तता। आपसे बात करके मैंने वह पूरी बात ही लिख दी थी एक ट्वीट में, अनमोल (स्वयंसेवी) ने भेजी होगी आपको आगे। बस वही है उत्तर।
मन को अगर सही काम नहीं देंगे, तो वो ख़ुद को खाना शुरू कर देता है। हम कहते हैं न, कि जीव-जंतुओं को दुख क्यों दे रहे हो भाई, क्यों माँसाहार कर रहे हो, क्यों किसी को खाते हो? तो ये तो बुरी बात होती है, किसी को खाना, पर हममें से ज़्यादातर लोग उससे भी बुरी बात करते हैं; क्या करते हैं? हम ख़ुद को खाते हैं। और ख़ुद का हमें ऐसा चस्का, ऐसा ज़ायका लग जाता है कि फिर हम सही काम करते ही नहीं, क्योंकि सही काम करा तो ख़ुद को खाना छोड़ना पड़ेगा, सही काम करा नहीं कि ख़ुद को खाना छोड़ना पड़ेगा।
ज़्यादातर लोग जो व्यर्थ की चीज़ों में लिप्त रहते हैं, वो लिप्त ही इसीलिए रहते हैं क्योंकि हमें आदत लग गयी है आत्मभक्षण की, हम स्वभक्षी हो गये हैं। हम क्या करते हैं? (हाथ को मुँह के पास लाकर खाने का अभिनय करते हुए) हम ऐसे ख़ुद को खा रहे हैं, आंतरिक तौर पर।
एक आदमी खाली बैठा-बैठा और कर क्या रहा है, ख़ुद को खा रहा है! न हाथ हिल रहा है, न पाँव हिल रहा है, मन चल रहा है और परेशानी बढ़ रही है, उसका रक्तचाप बढ़ता जा रहा है। हो सकता है कि नहीं? आप बैठे हुए हों और आप कुछ ऊल-जलूल सोचना शुरू कर दें, देखिए आपका बी.पी. (रक्तचाप) बढ़ जाएगा, सिर्फ़ सोचने भर से। ये हम क्या कर रहे हैं? हम ख़ुद को खा रहे हैं।


