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वो लूटती नहीं, ठगती है || आचार्य प्रशांत (2019)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
23 min
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अगर किसी व्यक्ति को यह भ्रम है या असल में ज्ञान हुआ है कि यह सत्य है। तो वह सांसारिक माया में फिर से लिप्त होना चाहता है थोड़ा-बहुत। तो कितना हो सकता है या नहीं हो सकता? या वह भी उसका भ्रम ही है?

आचार्य प्रशांत क्या हो सकता है?

प्र: किसी को सत्य का एहसास हुआ अगर और उसको लग रहा है कि वह ही सही है। तो क्या सांसारिक माया में वापस जाएगा? अगर जाएगा तो वह असल में सत्य था या नहीं?

आचार्य बेटा, सत्य के सारे एहसास माया ही तो होते हैं। माया यह बता कर थोड़ी आएगी कि झूठ हूँ। माया झंडा फहराती थोड़ी आएगी कि मेरा नाम झूठ है। वह तो यही बताएगी मैं सच हूँ और बड़े अच्छे-अच्छे एहसास कराएगी। सच का एहसास प्यारा लगता है न। तो यह मत कहो कि सच का एहसास हुआ लेकिन मैं माया के चंगुल में फँस गया। सच का एहसास हुआ इसीलिए माया के चंगुल में फँस गये। वो माया ही थी। माया लुटेरी नहीं है, ठगिनी है। अन्तर समझना, लुटेरे की क्या पहचान होती है?

प्र: वह लूट लेता है।

आचार्य नहीं, लूट लेता है यह तो बाद की बात है। तुम्हें पता होता है कि वह तुम्हें लूट रहा है। वह तुम्हारे सामने से लूटता है तुमको। उसकी शक्ल देखकर दूर से बता दोगे कि यह लुटेरा है। वह तुम पर ताक़त का इस्तेमाल करके लूटता है तुमको, ठीक? और तुमको भलीभाँति पता होता है लुटते वक़्त कि तुम्हें लूटा जा रहा है। तुम्हें ज़ोर-ज़बरदस्ती से लूटा जा रहा है, यह लुटेरा है।

माया लुटेरी नहीं है, माया ठगिनी है। वह तुम पर ज़ोर-ज़बरदस्ती करती ही नहीं। वह तुम पर ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं करती है। वह तुम्हें ही तुम्हारे ख़िलाफ़ इस्तेमाल कर लेती है। वह तुम्हारी बुद्धि पलट देती है। लुटेरे के तो तुम ख़िलाफ़ बुद्धि चलाते हो। जब लुटेरा सामने आता है तो उसके ख़िलाफ़ बुद्धि चलाते हो न। कहते हो किसी तरह से बच जाऊँ, कुछ करूँ। उपाय करते हो, जोड़-तोड़ करते हो। कुछ नहीं चला तो मिन्नत करते हो। हो सके तो तुम विरोध भी करोगे।

माया तुम्हें इतना मौक़ा नहीं देती। तुम माया के ख़िलाफ़ बुद्धि नहीं चलाओगे। माया तुम्हारी बुद्धि हर लेती है। तुम अपनी बुद्धि माया के पक्ष में चलाओगे। यह अन्तर है। तुम्हारी बुद्धि उल्टी हो जाएगी। तुम्हारे सब ख़याल, विचार बिलकुल पलट जाएँगे।

जानने वालों ने यह बहुत पहले से जाना हुआ है। वह कहते हैं, “जापे हरि विपदा दीनी, ताकी मति आगे हर लीनी।” अब हरि तो किसी को विपदा देते नहीं। हाँ, हरि की माया विपदा देती है। और अपने ऊपर इल्ज़ाम कभी नहीं लेती है। जो करोगे, तुम करोगे। तुम्हारी बुद्धि ही दूसरी होगी – "विनाश काले विपरीत बुद्धि।" तुम कुछ-का-कुछ करने लगोगे।

माया ऐसी नहीं है कि तुम्हारा कंप्यूटर कोई चुरा ले गया, माया ऐसी है कि तुम्हारे कंप्यूटर में वायरस लग गया। दोनों में अन्तर है न। कम्प्यूटर कोई उठा ले जाए तो यह तो बल प्रयोग की बात होती है कि कोई आया तुम्हारा कंप्यूटर चुरा ले गया तुम्हें घूँसा-ऊँसा मारकर। नहीं, ये सब नहीं; माया तुम्हारे कंप्यूटर के भीतर ही घुस जाती है। वहाँ सारा डेटा (आँकड़ा) करप्ट (भ्रष्ट) कर देती है। दिमाग ही ख़राब हो जाता है।

अब आते हैं सच के एहसास पर। देखो, सच का कोई एहसास नहीं होता है। हाँ, जब अहम् सच की छाया में होता है, सच को पसन्द करता है, सच के प्रेम में होता है तो वह सारे एहसासों की हक़ीक़त जान जाता है।

इसे ध्यान से समझेंगे, सब एहसासों का भोक्ता कौन है? एहसास सब होते किसको हैं? अहम् को होते हैं न। तो अहम् सब अनुभवों का भोक्ता है, ठीक है न? अहम् सब अनुभवों का भोक्ता है। तो अहम् है और अहम् के सामने और इर्द-गिर्द चारों तरफ़ क्या है? संसार है। अहम् संसार से अनुभव ले रहा है इन्द्रियों इत्यादि के माध्यम से, ठीक ऐसा ही है न। अहम् संसार से अनुभव ले रहा है इन्द्रियों इत्यादि के माध्यम से, यही चल रहा है न? ठीक है। तो सब अनुभवों का निर्धारण कौन कर रहा है कि सही है या ग़लत है, अच्छे हैं या बुरे हैं, असली है या नकली है, ये सारा फ़ैसला कौन कर रहा है? अहम् कर रहा है। यहाँ तक बात सबको स्पष्ट है, बोलिए।

प्र: हाँ, जी।

आचार्य: अहम् है और उसी को सब अनुभव हो रहे हैं न। दुनियाभर के सब अनुभव आपको ही होते हैं न, आप कहते हैं, ‘मुझे ऐसा लगा।’ तो अहम् को दुनियाभर के सब अनुभव हो रहे हैं। अच्छा, अनुभव कैसे हैं, इसका भी फ़ैसला कौन कर रहा है? अहम् ही कर रहा है, ठीक है। तो अनुभव सच्चा था या झूठा था, सत्य का था या फ़रेब का था, यह कौन तय करेगा?

प्र: अहम्।

आचार्य अहम् सही निर्णय भी कर सकता है अनुभवों के बारे में। अहम् ही अनुभवों का निर्णेता है। अहम् अनुभवों का सही निर्णय भी कर सकता है और ग़लत निर्णय भी कर सकता है, वह इस पर निर्भर करता है कि अहम् सच से कितनी दूरी पर है। ऐसे समझ लो कि पहले ज़माने में देखते थे, छतों पर ऊँचे-ऊँचे एंटीना लगा करते थे। जो लोग चालीस पार के हैं, उनको याद होगा, उन्होंने देखा होगा। टीवी के एंटीना लगते थे बहुत ऊँचे-ऊँचे, ठीक है। एंटीना बिलकुल अगर नीचे है तो क्या होगा?

प्र: सिग्नल नहीं आएगा।

आचार्य नहीं, सिग्नल नहीं आएगा इसका मतलब क्या, टीवी पर कुछ नहीं दिखाएगा क्या? टीवी पर क्या दिखाता था फिर? अगर एंटीना नीचे हो गया तो ऐसा तो नहीं है कि टीवी पर कुछ भी नहीं दिखाता था। टीवी पर तो दिखाता था, स्क्रीन पूरी भरी ही रहती थी। क्या दिखाता था? घटिया ही कुछ दिखाता था। जो दिखाना चाहिए वह नहीं दिखाता था। उसकी जगह मक्खियाँ दिखा रहा है, कीट-पतंगे दिखा रहा है, मच्छर दिखा रहा है। और जो सुनाना चाहिए था वह नहीं सुनाता था। झर-झर, झर-भर, भर-भर, दुनियाभर की नोइस (शोर) आ रही है, यही होता था न। यही होता था न? यह एंटीना क्या है?

प्र: सत्य।

आचार्य अरे साहब! कितने दिनों से सुन रहे हैं मुझे। यह एंटीना क्या है? अहम्। यह एंटीना क्या है? अहम्। ये जो सिग्नल आ रहे हैं ये क्या हैं? अहम् किसका अनुभव करता है, संसार, ठीक है? वही एंटिना, वही सिग्नल, लेकिन जब यह एंटीना, अहम्, आसमान से प्यार करता है, आसमान की ओर बढ़ता है, ऊँचाई ले लेता है तो सब सिग्नल इसको समझ में आने लगते हैं, एक-एक बात खुल जाती है। स्क्रीन साफ़ हो जाती है, हो जाती है न? आसमान से प्यार हो गया अहम् को। आसमान माने सत्य। आकाश की उपमा हमेशा किसको दी जाती है? सत्य को ही दी जाती है न।

एंटीना को आकाश से प्यार हो गया। वह ऊँचा-ऊँचा-ऊँचा चला गया। अब वही पुराना सिग्नल जिसका वह पहले अंड-बंड अनुभव कर रहा था, कुछ-का-कुछ कर रहा था, चिड़िया को मक्खी दिखा रहा था। कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था यह चल क्या रहा है। जैसे ही वह ऊँचा उठा, ऊँचा उठा, सब साफ़ दिखायी देने लग गया न, स्क्रीन साफ़ हो गयी, सब साफ़ हो गयी बिलकुल। अहम् जितना ऊँचा उठेगा उतना उसको अनुभवों को लेकर सफ़ाई मिलती जाएगी, वह सब समझ जाएगा। सब समझ जाएगा। स्क्रीन पर बिलकुल साफ़-साफ़ दिखायी देगा यह बात, यह बात, यह बात; साफ़। और अहम् जितना गिरा हुआ होगा, जितना नीचे रहेगा, उतना उसको सब सिग्नल विकृत ही समझ आएँगे, डिस्टॉर्ट (विकृत) हो जाएगा सबकुछ। समझ में आ रही है बात?

तो जो लोग निचला जीवन जीते हैं, जीवन के निचले तलों पर जीते हैं, उनको सज़ा यह मिलती है कि उनकी स्क्रीन पर मक्खियाँ-ही-मक्खियाँ होती हैं। उन्हें कुछ समझ में ही नहीं आ रहा होता। और जो उठने लगते है — अब आत्मा तो उठेगी नहीं, कौन उठता है हमेशा? जब कहा जाता है कि प्रगति करो, उन्नति करो, उठो, आरोहण हो, तो यह बात किसको कही जा रही है? यह उपदेश किसको दिया जा रहा है?

प्र: अहम् को।

आचार्य अहम् को। अब अहम् उठने लग गया, अहम् माने वही एंटीना, जो अनुभोक्ता है। वह उठने लग गया, वह आकाश की तरफ़ बढ़ने लग गया। तो अब बढ़ तो वह आकाश की तरफ़ रहा है लेकिन सफ़ाई हो रही है अनुभवों की। बढ़ तो वह आकाश की तरफ़ रहा है और साफ़ हो रहे हैं अनुभव। एक-एक अनुभव समझ में आता है। वही अनुभव आपको होता है, आपको कोई बात ही समझ में नहीं आती।

वही अनुभव कबीर साहब को होता है, वो खट से एक दोहा कह देते हैं। सारी बात कुल जमा साफ़-साफ़ प्रस्तुत कर देते हैं। और जो अनुभव उनको होते थे, वैसे अनुभव आपको भी तो होते हैं। आपने भी तो चलती हुई चक्की देखी है, कि नहीं देखी है? आपने चलती हुई चक्की कभी देखी है कि नहीं? आपको कभी समझ में आया, "दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय", कभी समझ में आया? क्योंकि आपका एंटीना बहुत नीचा है। आप निचली ज़िन्दगी जी रहे हो। तो इसीलिए वही सिग्नल आपको भी मिल रहा है, आपको कुछ समझ में ही नहीं आ रहा।

वही ज़िन्दगी आपको भी दिख रही है, वही संसार आपको भी दिख रहा है, लेकिन आपको कुछ समझ में ही नहीं आ रहा कि दुनिया चीज़ क्या है। और वही चक्की कबीर साहब को दिखती है, उन्हें सबकुछ दिख जाता है, उन्हें अद्वैत दिख जाता है। चक्की में अद्वैत दिख गया! और कौनसी चीज़ है जिसमें उन्होंने पूरी दुनिया नहीं देख डाली, बोलो। चादर में देख ली, ताने में देख ली, बाने में देख ली, पतंग में देख ली, पशुओं में देख ली।

और पशु ऐसा तो नहीं कि आप नहीं देखते, ऐसा तो नहीं कि कपड़ा कभी आप नहीं देखते, ऐसा तो नहीं कि बाज़ारों के हाल आप नहीं देखते। पर उन्हीं बाज़ारों को कबीर साहब देखते थे और क्या बात कह जाते थे! आप कभी सोचते क्यों नहीं कि आप भी वही सब चीज़ें देखते हो और आप कोई अंतर्दृष्टि, कोई इनसाइट विकसित क्यों नहीं कर पाते?

आपके लिए बाज़ार बाज़ार है, कबीर साहब बाज़ार को देखते थे उनको पूरी दुनिया समझ में आ जाती थी। दुनिया के पार का भी समझ में आ जाता था। ऐसा कैसे हो जाता था? उनका एंटीना बहुत ऊँचा है। उनके एंटीना को आसमान से प्यार है। उनका एंटीना बहुत ऊँचा है, तो सब सिग्नल फिर वो साफ़-साफ़ पकड़ता है। सब सिग्नल साफ़-साफ़ पकड़ता है। उनकी स्क्रीन पर हर चीज़ जस-की-तस दिखायी देती है। हमारी स्क्रीन पर न कुछ दिखायी देता है न कुछ सुनायी देता है और ज़्यादा देखो तो आँख और फूट जाए। ऐसी हमारी स्क्रीन है।

वो दुनिया को देखते थे, सब समझ जाते थे। हम अपनी ज़िन्दगी को भी साफ़-साफ़ नहीं देख पाते। अभी आपके सामने हों कोई संत, कोई ज्ञानी, वो आपकी ज़िन्दगी को देखें तो आपको सब बता देंगे कि क्या चल रहा है तुम्हारी ज़िन्दगी में। और यह बात विचित्र नहीं है क्या? आपकी ज़िन्दगी, लेकिन उसे पढ़ कोई ज्ञानी पाता है। आप अपनी ज़िन्दगी क्यों नहीं पढ़ पाते? और जब वह बता देता है कि यह चल रहा है तुम्हारी ज़िन्दगी में तो आप अवाक् रह जाते हैं। आप कहते हैं, 'अच्छा! यह चल रहा है, मुझे तो समझ में ही नहीं आया था यह हो रहा है मेरे साथ।'

एंटीना नीचा है। उनके एंटीने को आसमान से मतलब था। हमारे एंटीने को अगल-बगल के घरों से मतलब है, पड़ोस से मतलब है। हमारा एंटीना नीचे झुक कर झाक रहा है कि पड़ोस की रसोई में क्या पक रहा है। बड़ी उत्सुकता रहती है न ये सब जानने की, कि इसकी रसोई में क्या पक रहा है, उसका लड़का क्या कर रहा है, उसकी लड़की क्या कर रही है, उसके शयन कक्ष में क्या चल रहा है। हमारा एंटीना यहीं नीचे ही, यही सब ख़ुफ़ियागिरी करता रहता है; ऊँचाई से उसको प्यार ही नहीं।

जिसको ऊँचाई से प्यार नहीं होगा, उसको सज़ा यह मिलेगी कि उसे ज़िन्दगी समझ में ही नहीं आएगी। यह बात विचित्र है! ज़मीन उनको समझ में आती है जिन्हें आसमान से प्यार हो जाता है। हमारी तकलीफ़ यह है कि हमें आसमान से प्यार नहीं और सज़ा यह है कि हमें ज़मीन की कुछ समझ नहीं।

जिन भी लोगों को ज़मीन की बातों से बहुत मतलब होगा, उनको सज़ा यह मिलेगी कि उन्हें ज़मीन ही समझ में नहीं आएगी। यह तो उल्टा हो गया खेल। जिन्हें ज़मीन से मतलब नहीं, जो ज़मीन की उपेक्षा कर रहे हैं, जो बढ़ रहे हैं आसमान की तरफ़, उन्हें ज़मीन पूरी समझ में आ जाती है। जो बढ़ रहे हैं आसमान की तरफ़, वो ज़मीन के खेल को पूरा देख लेते हैं कि यह खेल चल रहा है ज़मीन में। और जिन्हें ज़मीन से बहुत मतलब है, वो ज़मीन में लिप्त तो हो जाते हैं, ज़मीन को समझ कभी नहीं पाते। वो ज़मीन में लोट लेंगे, कीचड़ में नहा लेंगे पर ज़मीन को कभी समझ नहीं पाएँगे।

एंटीना कितना ऊँचा रखना है, यह आपके ऊपर है। एंटीना नीचा है इसका प्रमाण क्या है? स्क्रीन भाई, ज़िन्दगी की स्क्रीन, जिसमें मक्खियाँ भिनभिना रही हैं। कुछ समझ में ही नहीं आ रहा है चल क्या रहा है।

जैसे कह रहे हैं कि सच का एहसास होता है और फिर माया छा जाती है। यह यही बता रहा है कि सच से दूरी है और सच से दूरी इसलिए है क्योंकि निचाई से आसक्ति है। एक बार थोड़ा ऊपर उठकर तो देखिए, तर हो जाएँगे। फिर नीचे लौटने का मन नहीं करेगा, क्योंकि ऊपर उठ गये तो नीचे की हक़ीक़त साफ़ हो जाती है। अब कौन नीचे आये! तो सच का एहसास नहीं होता, सच से अगर प्यार हो तो सारे एहसास स्पष्ट हो जाते हैं। यह याद रहेगा?

जहाँ कहीं भी किसी को कहते सुनो कि मुझे सत्य का अनुभव हुआ या फ़लाने को सत्य का अनुभव हुआ, तत्काल समझ जाना कि ये आदमी बिलकुल ही भोंदू है। ये सच का अनुभव करने निकले हैं! तुम पहले ज़मीन के अनुभवों को तो स्पष्टता से देख लो, उतना ही काफ़ी होता है। सच का कोई अनुभव नहीं होता। यह जो एंटीना है यह अधिक-से-अधिक क्या पकड़ सकता है? सिग्नल ही तो पकड़ेगा न, या आसमान को पकड़ लेगा? आसमान से यह प्रेम कर सकता है, आसमान को पकड़ नहीं सकता। अहम् के बारे में यह बात साफ़ समझ लीजिए। आकाश से प्रेम करना सम्भव है, आकाश को पकड़ पाना सम्भव नहीं है। ये कोशिश कभी मत करिएगा।

हाँ, आकाश का प्रेम ही आपको इतने वरदान, इतनी तृप्तियाँ, इतने फूल दे देगा कि आप अघा जाएँगे। आकाश को पकड़ने की तो बात ही बहुत असम्भव है। उसकी तरफ़ बढ़ना ही आपको तृप्त कर जाएगा, आपकी झोली पूरी भर जाएगी। आकाश को कभी पकड़ने की कोशिश मत करना, बस उसकी ओर बढ़ते रहना, इतना बहुत है। और जो आकाश की ओर बढ़ेंगे उन्हें ज़मीन बिलकुल समझ आने लगेगी। अब उन्हें कोई नहीं धता बता सकता, अब उन्हें कोई नहीं फंदे में फँसा सकता। आकाश के साथ रहो, ज़मीन समझ में आएगी। आकाश से दूर हो गये, ज़मीन तुम्हें खा जाएगी।

ज़मीन का क्या काम है? खाना। आज तक जितने भी लोग धरती पर हुए हैं, धरती ने एक-एक को खाया है। धरती के पेट में मौजूद हैं वो सारे। धरती पर जो हुआ है आज तक, बताओ कहाँ गया वो? धरती के पेट में। धरती का काम है सबको चबा जाना। कोई बचेगा? कहाँ जाओगे? धरती के मुँह में, धरती के पेट में। जब वहीं जाना ही है तो काहे को बार-बार धरती-धरती की ओर देखते रहते हो। वहाँ तो जाना ही अंततः, ज़िन्दा हो तो थोड़ा आसमान की ओर देख लो। फिर तो मिट्टी के नीचे जाओगे-ही-जाओगे। जब तक नहीं गये मिट्टी के नीचे, समय का सदुपयोग कर लो, ऊपर को बढ़ लो। स्पष्ट हो रही है बात कुछ?

तो इसमें तुम्हारे करने के लिए क्या है? जो पूरी बात बतायी, आचार्य जी ने ख़ूब बुलबुले उड़ा दिये। इन बुलबुलों में तुम्हारे लिए क्या है?

श्रोता: ऊपर बढ़ना है।

आचार्य हाँ। ऊपर बढ़ जाओगे, नीचे से इतना मोह छोड़ो। ये दोनों काम एक साथ होते हैं – नीचे से मोह कम होता है, ऊपर की ओर प्रेम बढ़ता है। नीचे से स्वार्थ के जो नाते बना लिए हैं, उनको थोड़ा काटो। बहुत आनन्द है ऊँचा उठने में।

प्र: आचार्य जी, फिर शुरुआत कहाँ से की जाए जिसको नहीं पता कि वह कहाँ है?

आचार्य जीवन में जहाँ निचाई देखो, वहीं से शुरुआत करो। जहाँ देखो कि जीवन में निचाई मौजूद है, वहीं समझ जाओ कि ठीक नहीं है यह बात।

प्र२: आचार्य जी, कबीर साहब के बारे में बात हो रही थी, उसमें एक माया के ऊपर दोहा कहा है कबीर साहब ने और आपने भी बताया था कि मन पर जो भी छाया हुआ है उसको माया ही समझो कि वह माया ही है। और मन पर जैसे-जैसे समय बीतता रहता है, कुछ-न-कुछ छाया रहता है। जैसे तीन महीने तक कुछ छाया हुआ है उसके बाद अगले तीन महीने तक कुछ और छाया हुआ है फिर छः महीने तक कुछ और छाया हुआ है। तो यह समझा कैसे जाएगा कि यह माया जो है यह नहीं है, क्योंकि यह तो स्पष्ट है कि मन पर जो भी छाया है वह माया है।

आचार्य स्पष्ट है तो प्रश्न क्या है?

प्र२: प्रश्न यह है कि यह कैसे पता लगेगा कि यह माया नहीं है। मतलब आज अगर मेरे मन पर कोई चीज़ छायी है। जो चीज़ छायी है, उसका कैसे पता चलेगा?

आचार्य जो छायी है सब माया है। किसने कह दिया कि उसमें से कुछ भी माया नहीं है?

प्र२: तो अगर मेरे मन पर प्रभु छा गये हैं या मैं इस तरीक़े से उसमें चल पड़ा हूँ तो मैं इसको कैसे डिफरेंशिएट (भेद) करूँगा कि यह जो चीज़ है यह माया से अलग है।

आचार्य दो बातें हैं। पहली बात, जब आप कहते हैं मेरे मन पर प्रभु छा गये हैं तो वो वही बात होती है जो आपसे थोड़ी देर पहले मैंने कही थी। तुमने कोई रूप पकड़ लिया होता है, वह माया ही है। मन पर प्रभु कैसे छा सकते हैं? मन का तो एक कटोरा है, उस कटोरे में सामग्री होती है और छोटा सा कटोरा। उस कटोरे में आपने प्रभु को भी डाल लिया, इतने छोटे हैं वो? हाँ, तो फिर कैसे छा गये?

प्र२: कर्म कर रहा हूँ। मैं पुराने कर्मों को त्याग रहा हूँ और जो नये कर्म कर रहा हूँ वो कर्म इस तरीक़े के हैं जो कि मेरे हिसाब से मुझे अच्छाई की तरफ़ बढ़ा रहे हैं, आकाश की तरफ़ बढ़ा रहे हैं, तो उसमें मैं कंफ्यूज (भ्रमित) न हो जाऊँ कि यह माया है या।

आचार्य देखिए, आप अपनी दृष्टि से अच्छे-बुरे का जो निर्धारण करेंगे, वह आपकी ही दृष्टि होगी। थोड़ी देर पहले हम एंटीना की बात कर रहे थे। नीचा है एंटीना तो भी वह किसी चीज़ को तो सफ़ेद दिखाएगा, किसी चीज़ को तो काला दिखाएगा। एंटीना नीचे भी है तो भी स्क्रीन पर कुछ सफ़ेद और कुछ काला तो आ ही रहा होगा न। अब सफ़ेद को मान लो अच्छाई, काले को मान लो बुराई। तो आप कितनी भी निचाई पर जी रहे हों फिर भी आपको कुछ अच्छा और कुछ बुरा लग रहा होता है। जो अच्छा लग रहा है वह अच्छा है कहाँ, जो बुरा लग रहा है वह बुरा है कहाँ?

आप अपनी नज़र से अगर तय करोगे कि कुछ अच्छा है, कुछ बुरा है तो फिर तो फँसे। आप कह रहे हो कि आपने अपने हिसाब से बुराइयों को त्यागना शुरू किया है और अच्छाइयों को जीवन में लाना शुरू किया है। अगर यह आपका हिसाब ही उल्टा-पुल्टा हो तो? जिसको आप अच्छाई समझ रहे हो वह वास्तव में अच्छा ही है, यह कैसे पता चला आपको? अपनी नज़र में तो हर आदमी कुछ-न-कुछ अच्छा ही कर रहा है। अपनी दृष्टि में तो जो कर रहा है उसके पास कुछ-न-कुछ वाजिब कारण है करने का। पर आपको कैसे पता कि आप जो कर रहे हो वास्तव में अच्छा है, शुभ है, कैसे पता?

प्र२: आचार्य जी, जैसे मैं मेरा पुराना जीवन देखता हूँ तो मैं बुरे कर्म कर रहा था।

आचार्य बुरे हैं यह कैसे पता?

प्र२: सामाजिक स्तर पर अगर कर रहा था।

आचार्य सामाजिक स्तर पर आध्यात्मिकता नहीं चलती। आध्यात्मिकता सिर्फ़ एक बात पूछती है – बंधन या मुक्ति? फँस गये न। एंटीना नीचा है, सही-ग़लत की पहचान ही गड़बड़ चल रही है। जो सही लग रहा है वह सही नहीं, जो ग़लत लग रहा है ग़लत नहीं। एंटीना नीचा क्यों है? क्योंकि एंटीना समाज को देखना चाहता है। समाज तो ज़मीन पर ही फैला हुआ है। तो एंटीना नीचे है और वह देख रहा है समाज को कि पड़ोसी क्या कह देगा। पड़ोसी ने जो काम बता दिये कि बुरे काम हैं, वो बुरे लगने लग गये। सामाजिक मापदंडों के हिसाब से अच्छे-बुरे का निर्धारण हो रहा है। यह तो गड़बड़ हो गयी न।

बुरा क्या?

बंधन।

अच्छा क्या?

मुक्ति।

मुक्ति की कोई छवि मत बना लीजिएगा। बस बंधनों को काटते चलिए, इतना काफ़ी है। मुक्ति की कोई छवि बनाने की ज़रूरत नहीं है, बंधन काट दीजिए, इतना बहुत है।

अब आप कहें कि अगर मन पर लगातार मुक्ति ही छाये रहे तो क्या मुक्ति भी माया है। "जो मन से ना उतरे माया कहिए सोय।" अब मन में अगर लगातार मुक्ति ही छायी हुई है तो क्या मुक्ति भी माया है? बिलकुल, क्योंकि अगर मुक्ति मन में छायी हुई है तो पहली बात आपने मुक्ति की भी कोई छवि बना ली है। मुक्ति की छवि नहीं बनानी है, बंधन काटने हैं। मुक्ति की छवि नहीं बनानी है कि मुक्त आदमी ऐसा दिखता है, ऐसे चलता है, ऐसे खाता है, ऐसे पीता है, ऐसे बोलता है। मुक्ति की छवि बना लोगे तो जो छवि है उसी के अनुसार आचरण करना शुरू कर दोगे और ख़ुद को शाबाशी दे दोगे कि मैं तो मुक्त हो गया। गड़बड़ हो गयी न। मुक्ति की छवि नहीं बनानी है, बंधनों को काटना है, ठीक है?

दूसरी बात, जब कुछ चाहिए होता है, बड़ी तत्परता से, बड़ी कशिश से तो तुम उसे मन पर रखते हो या उसको पाने के लिए जूझ जाते हो। मन में जो रखा हुआ है वह तो विलंबित है। मन या तो अतीत जानता है या फिर भविष्य जानता है। तो मन में आप जो कुछ भी रखते हैं वह निश्चित रूप से आगे के लिए ही होता है।

जो आप अभी कर रहे होते हैं, ठीक अभी, उसका विचार मन में नहीं हो सकता। समझिएगा, जो कुछ भी आप ठीक अभी कर रहे हैं वह विचार के तौर पर मन में नहीं हो सकता क्योंकि आप तो उसमें डूब गये, अब विचार नहीं बचेगा। जो कुछ भी मन में विचार के तौर पर है, वह कल के लिए है कि मैं विचार कर रहा हूँ मुक्ति के बारे में। और मैं लगातार विचार कर रहा हूँ मुक्ति के बारे में यानी मैं लगातार मुक्ति को कल पर टाल रहा हूँ। जिन्हें मुक्ति चाहिए होती है, जिन्हें मुक्ति प्यारी होती है वो मुक्ति का विचार करेंगे, मुक्ति को कल पर टालेंगे या अभी कूद पड़ेंगे उसमें? अभी कूद पड़ेंगे न, बोलो।

प्र२: हाँ, जी।

आचार्य जब खड़े हो तालाब के किनारे तो विचार कर रहे हो पानी का, 'कूदें, न कूदें, कितना गहरा है, कितनी देर लगेगी, ठंडा तो नहीं है।' विचार कर रहे हो। जब कूद गये, उसके बाद विचार बचते हैं?

प्र२: नहीं।

आचार्य हाँ, तो मुक्ति का अगर विचार है लगातार मन में, तो इसका मतलब है कहाँ खड़े हो? तालाब किनारे खड़े हो, कूद नहीं रहे हो। मुक्ति की बात कर रहे हो, मुक्ति में डूब नहीं रहे हो। बस बात ही कर रहे हो ताकि कूदना न पड़े। और तालाब किनारे जो खड़ा होकर विचार कर रहा है, वह विचार ही करता रह जाएगा। मुक्ति का जो विचार कर रहा है उसे विचार से ही लगाव है। वह विचार करता रहेगा मुक्ति का, उसे मुक्ति नहीं चाहिए फिर।

प्र२: मैंने बंधन काटने अपने, अपने हिसाब से, शुरू कर दिये। मुझे यह भी नहीं पता कि बंधन काटना जो है वह क्या है। मैंने अपने हिसाब से बंधन काटने शुरू कर दिये हैं। मतलब मैंने उनको तवज्जो देना कम कर दिया है या मैं उनमें बहुत ज़्यादा लिप्त नहीं होता। तो इसका मतलब यह है कि मैंने मुक्ति की तरफ़ क़दम बढ़ा दिये हैं?

आचार्य आप यह भी न कहिए कि मुक्ति की तरफ़ क़दम बढ़ा दिये हैं। इतना कहना काफ़ी है कि मुझे बंधनों से दूर जाना है। क्योंकि मुक्ति का तो कोई भरोसा नहीं है, यहाँ है कि वहाँ है, उसकी कोई दिशा तो होती नहीं विशेष। हमें क्या पता वह किस तरफ़ है कि हम कहें कि हमने उसकी तरफ़ क़दम बढ़ा दिये। आप इतना ही कह दीजिए कि बंधनों से दूर जा रहा हूँ। बंधनों से दूर जा रहे हैं तो मुक्ति की तरफ़ ही जा रहे होंगे। बंधनों की बात करना ज़रूरी है ज़्यादा। मुक्ति बात की चीज़ नहीं है। मुक्ति की बात करना मुक्ति को बात के तल पर गिरा देने जैसा है। मुक्ति कोई बात नहीं है। बंधनों की बात की जाए साफ़-साफ़। कर्म वहीं हो सकता है, एक्शनेबल (करने योग्य) वही है।

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