प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, वसुधैव कुटुम्बकम् का वास्तविक अर्थ क्या है? जब स्रोत एक है तो वो अलग-अलग रूपों में क्यों प्रकट होता है? वैविध्य है ही क्यों? सीमाएँ हैं ही क्यों? वस्तुएँ हैं ही क्यों? व्यक्ति हैं ही क्यों? नानात्व हैं ही क्यों? जब स्रोत एक है तो उसके अवतार अलग-अलग क्यों हैं?
आचार्य प्रशांत: किसके लिए अलग-अलग हैं? किसको दिख रहे हैं अलग-अलग? किसको दिख रहे हैं अलग-अलग? कौन है जो भेद कर रहा है कि सब अलग-अलग है? मन में अहंकार जितना घना होता है विविधता उतनी ज़्यादा दिखाई देती है। उतनी ज़्यादा डाइवर्सिटी (विविधता) तुमको दिखाई देगी। सबकुछ अलग-अलग दिखाई देगा। बाँटोगे, खूब बाँटोगे। अलग-अलग होने का अर्थ ही है बाँटना। ये अलग और ये अलग, ये अलग और ये अलग।
अहम् की यात्रा जब विराट की ओर होती है तो शनै:-शनै: जो अलग-अलग दिख रहा है, वो अलग-अलग की जगह एक-एक दिखने लगता है। सीमाएँ फिर अगर रहती भी हैं तो वो विस्तृत होने लगती हैं। बहुत ही जो छोटे मन का आदमी है वो कहेगा, ‘मैं अलग और पूरी दुनिया अलग।’ ये टुच्चा स्वार्थ है। मन जब उससे ज़्यादा फैलेगा तो वो कहेगा, ‘न मेरे साथ मेरा परिवार भी जुड़ा हुआ है। मुझे परिवार को भी देखना है।’ तुम्हारा अहम् एक पायदान ऊपर चढ़ा, उर्ध्वगमन हुआ उसका। अब कम से कम तीन-चार लोग उसे अपने से अलग नहीं दिख रहे। उनको वो कह रहा है कि मैं और ये एक ही हैं, अलग नहीं रहे।
अहंता जब और ऊपर की यात्रा करेगी तो वो कहेगा, ‘नहीं, मैं और मेरा समुदाय हम एक हैं। जान दे सकता हूँ इनके लिए।’ उसकी सीमा थोड़ा और फैली। अलग-अलग दिखना कम हुआ। फिर वो और ऊपर बढ़ेगा, कहेगा, ‘मैं, मेरा राष्ट्र एक है। प्राण चले जाएँ, राष्ट्र पर आँच नहीं आनी चाहिए।’ है, अभी भी सीमा है। राष्ट्र एक सीमा ही है। राष्ट्र भी एक बँटवारा ही है। पर अब थोड़ा विस्तृत बँटवारा है, बड़ा बँटवारा है। क्षुद्र, संकीर्ण बँटवारा नहीं है। फिर बाँटने का भाव और कम हुआ, ऊपर गया। वो बोलेगा, ‘दुनिया के सारे इंसान और मैं एक ही हैं।’ वो जो वाक्य है बड़ा प्रसिद्ध है आपके बीच – “वसुधैव कुटुम्बकम्।”




