प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरी परेशानी यह है कि मैं वर्तमान में केन्द्रित नहीं रह पाता। जैसे कभी अतीत की चिंता, कभी भविष्य की चिंता। और जो वर्तमान में चल रहा होता है वह भी ख़राब हो जाता है। दिमाग में ही कुछ-न-कुछ चलता रहता है, लेकिन उसे लागू नहीं कर पाता। कुछ शुरू नहीं कर पाता।
आचार्य प्रशांत: यह किसने बताया कि प्रेजेंट (वर्तमान) पर फोकस करना चाहिए?
प्र: जो भी मैं कर रहा हूँ उसकी समझ शत प्रतिशत नहीं रहती।
आचार्य: जो कर रहे होते अगर वो सही ही होता तो मन अतीत और भविष्य में भटकता क्यों? सवाल ये है कि सतनाम (प्रश्नकर्ता) कह रहे हैं कि मन प्रेजेंट में नहीं रह पाता, आगे-पीछे भागता रहता है। मैं पूछ रहा हूँ कि यह किसने बता दिया कि मन को प्रेजेंट में रहना ही चाहिए।
जिसको तुम कहते हो अतीत और जिसको तुम कहते हो भविष्य और जिसको तुम कहते हो ये क्षण, उपस्थित क्षण, प्रेजेंट मोमन्ट इन तीनों में कोई अन्तर नहीं है। ये तीनों समय की धारा के हिस्से हैं। जैसे खड़े हो तुम एक नदी के सामने, पानी है जो तुम्हारे पीछे है, पानी है जो तुम से आगे है और पानी ही है जो तुम्हारे समक्ष है, सामने है। इन तीनों पानियों में फ़र्क हो गया क्या?
धार बह रही है, कुछ पानी यहाँ है, कुछ यहाँ है, कुछ यहाँ है; तीनों में कोई अन्तर आ गया? आ गया हो तो बताओ। तो फिर ये इतना शोर क्या मचा रखा है कि फोकस ऑन द प्रेज़न्ट मोमन्ट







