प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अगर मुझे लगता है कि स्वयं के प्रयास करके मुझे मुक्ति मिलेगी, तो उसमें एक तो मानसिक बंधन होते हैं, वो तो मैं अपने स्तर पर हटा सकता हूँ। लेकिन मान लीजिए कुछ ऐसे बंधन हैं, जैसे देश का क़ानून किसी चीज़ की आज्ञा नहीं देता, और वही बात मुक्ति में बाधा बन जाए, तो ऐसे में क्या करना चाहिए?
आचार्य प्रशांत: अगर वाकई-वाकई ऐसी स्थिति आ गई है कि तुम्हारी मुक्ति में देश का क़ानून बाधा बन रहा है, तो छोड़ दो देश।
प्र: कुछ भी करके, मेहनत करके?
आचार्य: देश बड़ा होता है, पर मुक्ति से बड़ा नहीं।
प्र२: तो ये जो आतंकवादी होते हैं, वो भी तो यही सोचते हैं कि एक तरह की गतिविधियाँ करके उनको मुक्ति मिल जाएगी। उनके अनुसार तो वो जो करते हैं, वो सही है। कैसे कोई समझे कि क्या सही है, क्या ग़लत?
आचार्य: कितने आतंवादियों से तुम्हारा भाईचारा है?
(श्रोतागण हँसते हैं)
बेटा, तुम्हारी अपनी ज़िंदगी में जो आतंकवाद है, पहले उसकी बात करो। अपनी ज़िंदगी में जो आतंकवादी घुसे हुए हैं, पहले उनकी बात करो। इधर-उधर की बातें – ‘आतंकवादी ऐसा सोचते हैं’। किसी आतंकवादी के सौ-पचास किलोमीटर के दायरे में भी कभी गयी हो? कहानियाँ, किस्से, कल्पनाएँ! “ग़लत है सो है” – किसके लिए ग़लत है? तुम कौन हो? वो तो मैंने सुना ही नहीं। पहला प्रश्न जो सत्र में पूछा गया, और उसपर दिया गया आधे घण्टे का उत्तर, बर्बाद गया।




