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तुम्हारी हैसियत है कुत्ते जैसा होने की? || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2015)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्न: हमारे जीवन का लक्ष्य क्या है?

वक्ता: न हो तो?

श्रोता १: तो हमारे और जानवरों में क्या फ़र्क रह जाएगा?

वक्ता: न हो तो? तुम में और जानवरों में कोई फर्क नहीं है, इसकी चिंता जानवरों को होनी चाहिए न!

“हममें और इंसानों में कोई फर्क ही नहीं है”, यह परवाह तो जानवरों को होनी चाहिए।

तुममें अगर जानवरों से कुछ अलग नहीं है तो तुम्हारे लिए तो गौरव की बात है।

हम कुत्तों जैसे हैं” – तुम्हारे लिए तो गौरव की बात होनी चाहिए। कहाँ कुत्ते , कहाँ हम!

यह कोई विषाद की बात है कि हममें और कुत्तों में कोई फर्क नहीं है। यह तो वैसी ही बात है कि कोई भिखारी बोले कि हममें और करोड़पतियों में कोई फर्क नहीं है। इसकी चिंता तो करोड़पति को होनी चाहिए। भिखारी के लिए तो यह गौरव की बात है।

तुम क्या समझते हो अपने आप को! मैंने आज तक एक भी ‘संवाद’ कुत्तों के साथ नहीं किया। क्योंकि उन्हें जरूरत ही नहीं पड़ती।

अपनी हालत देखो।

मैं कुत्तों को बुलाऊँ और यहाँ बैठाऊँ, सुनेंगे ही नहीं मुझे। इसलिए नहीं कि वो नासमझ हैं, इसलिए कि वो मुझसे ज़्यादा समझदार हैं। उन्हें इसकी ज़रूरत ही नहीं। तुमने जितने भी सवाल पूछे, मैं प्रमाणित किये देता हूँ, इनमें से एक भी सवाल कुत्तों को परेशान नहीं करता है। तुमने कहा, “दूसरों के सामने बोलने से घबराता हूँ”, तुमने कोई कुत्ता देखा जो करोड़पतियों को देख कर के कुंठित हो जाए? वो तो जितनी बड़ी गाड़ी देखते हैं उतना उसपर भौंकते हैं। पैदल वालों को छोड़ देंगे, साइकिल वालों को छोड़ देंगे पर गाड़ियों को बिलकुल नहीं छोड़ते। और तुम, तुम जितना अमीर आदमी देखते हो तुम्हारे भीतर कुंठा उतनी ही बढ़ जाती है।

तो कुत्ता बेहतर कि तुम ?

और तुमने क्या सवाल पूछे कि “परिवर्तन क्यों नहीं आ रहा है?” किसी कुत्ते को देखा है कभी कि परेशान हो रहा है? सर फोड़ लिया कि परिवर्तन नहीं आ रहा है। और पूछ रहे हो कि भविष्य की चिंता बहुत परेशान कर रही है।

किसी कुत्ते को देखा है कभी भविष्य के प्रति चिंतित होते हुए ?

देखा है? बुढ्ढे से बुढ्ढा कुत्ता होगा, गरीब से गरीब कुत्ता, सड़क का, कभी देखा कि रो के सर पीट रहा है कि कल मेरा क्या होगा? उसकी शान देखो! वो बैठा हुआ धूल-मिट्टी-कीचड़ में। और ज़रा भी उसका सर झुक नहीं गया है कि “वो लैब्राडोर घर के भीतर रहता है और उसको शैम्पू से नहलाया जाता है और मैं कीचड़ में हूँ तो मैं जरा नीचा हो गया। और कुछ ऐसा जुगाड़ करूँ कि मैं भी पट्टेदार कुत्ता बन जाऊं और मैं भी घर के भीतर रहूँ!”

तुम कुछ कर लो, सड़क का कुत्ता पट्टा पहनने को राज़ी नहीं होगा। वो अपनी स्वतंत्रता बेचेगा ही नहीं। तुम उसे कुछ भी दे दो। कोशिश कर लेना। सड़क के कुत्ते को खूब लालच देना, पट्टा पहनाने की कोशिश करना, देखना क्या होता है। तुम पूछ रहे हो, “सम्मान क्या? किसको दें?” कुत्ता खूब जनता है। जहाँ प्रेम पाता है वहाँ बिलकुल सम्मान दे देता है। उसके सामने यह दुविधा कभी आती ही नहीं कि किसको दें, किसको ना दें!

हमारे साथ हैं दो कुत्ते, दो दोस्त। वो खूब जानते हैं। और वो जब सम्मान देते हैं तो पूरा देते हैं। वो उल्टा हो जाता है, चारों टांग ऊपर, यह उसका सम्मान है। और वो इस सम्मान के बदले में कुछ मांगता नहीं है। वो यह नहीं कहता है कि मैंने चार टांग ऊपर उठाई हैं, तुम एक तो उठाओ। अब उसको लोटना है मेरे आगे, वो लोट रहा है, उसकी मर्ज़ी है। और तुम्हें समझ में नहीं आता है कि किसको दें, किसको न दें। और ऐसा भी नहीं है कि मैं किसी दिन मुकुट लगा कर चला जाऊँगा तो वो मुझे ज़्यादा सम्मान दे देगा कि आज यह ज़्यादा आदरणीय हैं। यहाँ से लौटूँ, तो उसे दिखे कि आज कालेज के लड़कों ने मुझे फूल दिए, माला पहन के आ रहे हैं, तो आज ज़रा ज़्यादा इनके पाँव चाटें, ऐसा भी कुछ नहीं है।

यही बात तुम्हारे मन में भर दी गयी है न कि हम इंसान हैं। हमारी ज़िन्दगी का तो कोई लक्ष्य होना ही चाहिए! जानवर फ़िज़ूल हैं। उनके पास तो कोई लक्ष्य नहीं होता। और तुम्हारे मन में यह बात ज़रा भी नहीं कौंधती कि जिन्होंने यह बातें तुम्हारे मन में भरी हों, वही फ़िज़ूल हों, उन्हें ही कुछ समझ ना हो जीवन की!

तुमने कितने जानवरों को बलात्कार करते देखा? तुमने कितने जानवरों को रक्तचाप से, हृदयाघात से मरते हुए देखा? तुमने कितने जानवरों को तनाव और खिंचाव में देखा? तुमने चोर जानवर देखे हैं? तुमने धोखेबाज़ और डकैत जानवर देखे हैं? तुमने बलात्कारी जानवर देखे हैं? यह सारी महानताएं किसके लिए आरक्षित हैं? हमारे लिए! और दावा क्या होता है कि अगर जीवन का कोई लक्ष्य नहीं होगा तो हम जानवरों जैसे हो जाएंगे। तुम्हारी हैसियत है जानवरों जैसे होने की? तुम कोशिश कर के देख लो जानवर हो नहीं सकते।

मछली की मौज देखी है? पक्षी की उड़ान देखी है? और तुम्हारे पास क्या है? शेर का रौब देखा है? तुम्हारे पास है? वो पिंजड़े से भी गुर्रा देता है तो तुम मूत्र त्याग कर देते हो। यू ट्यूब पर देखना बहुत ऐसी वीडियोज हैं। एक चिम्पैंज़ी था, उसने आकर अपने पिंजड़े पर हाथ मर दिया तो दो दिन तक चिड़ियाघर बंद रहा खौफ़ के मारे। और उसे तुमसे कुछ चाहिए नहीं। उसके पास कोई बैंक का खाता नहीं होता। उसे जितना खाना है, उससे ज़्यादा ना वो पेड़ से तोड़ता है, ना वो मारता है। कल की परवाह करता नहीं। पेट भरा है तो मग्न है, सो जाएगा।

क्या लक्ष्य है ?

आसमान का क्या लक्ष्य है ?

तारों का क्या लक्ष्य है ?

चाँद को देखना , उसका क्या लक्ष्य है ?

नदी किनारे की रेत को देखना , उसका क्या लक्ष्य है ?

तुम्हारा ही लक्ष्य क्यों होना चाहिए ?

मैं बताता हूँ क्यों होना चाहिए। क्योंकि जिन्होंने तुम्हें यह बातें बताई हैं, उन्होंने तुम्हारे भीतर गहरी हीन भावना भरी है। और जिसके भीतर हीनता आ गयी वो लगातार उस हीनता से तड़पता है, वो उस हीनता से मुक्ति चाहता है।

अधिक से अधिक यही हो सकता है तुम्हारा लक्ष्य कि तुम्हें जो कुछ पढ़ाया गया है उससे मुक्त हो जाओ। तुम्हारे भीतर जो हीनता आ गयी है, उस हीनता को अपने भीतर से हटा दो। अधिक से अधिक यही लक्ष्य हो सकता है तुम्हारा। तुम्हारा लक्ष्य कुछ और पाना नहीं हो सकता। तुम्हारा लक्ष्य यही हो सकता है कि जो कुछ भी तुम्हारे भीतर ज़बरदस्ती ठूंस दिया गया है उसको तुम निकाल बाहर करो।

बनाना ही है लक्ष्य तो यह बनाओ कि साफ़ हो जाओ, खाली हो जाओ। जो व्यर्थ के विचार और धारणाएँ और दृष्टिकोण न जाने कब तुम में आरोपित कर दिए गए, उन्हें त्याग दो।

जब पैदा हुए थे तब पूछा था कि मेरे पैदा होने का लक्ष्य क्या है? तो कहीं न कहीं बीच में, जीवन में यह सिखाया गया न कि लक्ष्य होना चाहिए। जैसे इस बात को पकड़ लिया था वैसे इसको त्याग भी दो। पकड़ तो इसलिए लिया था कि तब अनजान थे, नासमझ थे, छोटे से तो थे, कोई भी तुम्हारे मन में कुछ भी ठूँस सकता था। और यह हम सब के साथ किया जाता है। ज़रा से होते हैं और पता नहीं कैसी-कैसी बातें हमारे मन में बैठा दी जाती हैं। पर अब ज़रा से नहीं हो।

अब काबिलियत है तुम्हारे पास।

ज़रा ध्यान में , ज़रा होश में , जांच परख लो। और जो कचरा लिए फिर रहे हो , उसको छोड़ दो।

जीवन जैसा है, प्रस्तुत है। प्रस्तुत होने का अर्थ है कि आगे कुछ नहीं है उसमें, जो है अभी है। मैं तुमसे पूछ रहा हूँ कि लक्ष्य यदि है भी तो उसके लिए विशेष क्या करोगे? है जीवन का कोई लक्ष्य तो अभी क्या करोगे, बताओ? ठीक अभी क्या करोगे यदि जीवन का कोई लक्ष्य है भी? तुम थोड़ी देर पहले जीवन का लक्ष्य नहीं जानते थे। मान लो मैंने जीवन का कोई ज़बरदस्त लक्ष्य बता दिया, तो उसका करोगे क्या? क्या कर लोगे अभी, बोलो? अभी तो सुन ही सकते हो न मुझे, कुछ बदला? और अगर कुछ बदलेगा तो इसका मतलब सुनने से चोरी करा समय।

तुम्हारे पास कोई लक्ष्य हो भी तो उसके लिए समय कहाँ से लाओगे? जीवन तो प्रतिपल तुम्हारे सामने घटित हो रहा है। मैं अभी तुमसे कुछ बोल रहा हूँ, अब लक्ष्य के लिए समय कहाँ से निकालोगे? कैसे निकालोगे, बोलो? यहाँ से चलोगे तो फिर जीवन तुम्हारे सामने कुछ और ला देगा, फिर कुछ और ला देगा। लक्ष्य का करोगे क्या? पकाओगे? उबालोगे? ओढ़ोगे? पहनोगे? क्या करोगे? बोलो न?

तुम्हारे जीवन में क्या बदल जाएगा अगर मैं अभी बता दूं कि जीवन का लक्ष्य है बृहस्पति ग्रह पर जा कर के मानव सभ्यता के बीज आरोपित करना। यह जीवन का लक्ष्य है, तो क्या करोगे? यहाँ से उड़ोगे, संवाद छोड़ के बृहस्पति पर जा कर के बैठ जाओगे? वहाँ बीज फैलाओगे? क्या करोगे? और तुम्हें लक्ष्य इससे नीचे का चाहिए नहीं। तुम्हें लक्ष्य यह थोड़ी चाहिए कि कुरता-पैजामा धो के सुखाना जीवन का लक्ष्य है। यह बता दूं, तो तुम कहोगे, “हम! और यह लक्ष्य! हमें तो बड़ा वाला चाहिए”, तो ठीक है तुम चादर फैलाओ!

जब लक्ष्य की बात आती है तो तुम इससे नीचे राज़ी कहाँ होते हो? “मोक्ष चाहिए! बृहस्पति बहुत छोटा बोल दिया! आकाश गंगा से बाहर का कुछ होना चाहिए। वहाँ हमें भेजिए। एलियन लड़कियाँ हमारा इंतज़ार कर रही हैं; यह जीवन का लक्ष्य है।” और क्या जीवन का लक्ष्य होगा बताओ न मुझे? इतनी बड़ी इमारत खड़ी करना कि वो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर पहुँच जाए कि उसकी छत पर हम लट्टू घुमाएँ तो वो उपग्रह बन जाए। इतनी ऊँची; कुछ ऐसी बात होती है तो तुम्हें कितना अच्छा सा लगता है न। कइयों के मन तो अभी से सोचने लग गए होंगे कि कितनी ऊँचाई होगी। जितनी ऊँचाई पर उपग्रह घूमते हैं, उतनी ऊँचाई पर हम छत पर बैठे हुए हैं, और वहां बैठ कर हम देख रहे हैं दुनिया को और कह रहे है, “हम (अपनी ओर इशारा करते हुए), यह देख!”

कितना अच्छा लगता है न सोचना, ये लक्ष्य और वो लक्ष्य। और सोच के ही बड़ी तसल्ली हो जाती है।

श्रोता २: सर, हम ऐसा सोचना नहीं चाहते हैं फिर ऐसा क्यों सोचते हैं?

वक्ता: नहीं, ऐसा नहीं हो सकता है कि तुम न चाहो और सोचने लग जाओ। हो ही नहीं सकता। यहाँ मेरे सामने बैठे हो, बिना तुम्हारे चाहे विचार आ कैसे जाएगा? तुम्हें फुर्सत कहाँ से मिलेगी? कहीं न कहीं तुम्हारी अनुमति से आता है। मैं तुमसे बात कर रहा हूँ, तुम मुझे कोई विधि तो बताओ सोचने की, मैं सोच ही नहीं पा रहा। मुझे फुर्सत कहाँ है सोचने की। और तुम मुझसे बात कर रहे हो, तुम्हें फुर्सत कैसे मिली सोचने की?

हम बात-चीत कर रहे हैं, अगर मुझे सोचने का अवकाश नहीं है, तो तुम्हें कहाँ से मिला? कहाँ से मिला? सुनने से भागे हो। जब सुनने से भागे हो तो विचारों को जगह मिल गई। सुनो न! बैठे हो शांति से, सुनो। बात करो। सुनो, बात करो। अभी सोच नहीं पा रहे होगे, ऐसे ही रहो। यूँ ही थोड़ी ही तुम्हें आगे बुलाया था (श्रोता को इंगित करते हुए)। जब तक ऐसे रहोगे (अपनी और श्रोता की सामीप्यता दिखाते हुए), तब तक परेशान नहीं होगे। इतना वादा कर सकता हूँ। उसके आगे तुम्हारी मर्जी।

खाली हो जाओ।

व्यर्थ के कचरे से खाली हो जाओ , यही लक्ष्य है।

ठीक है?

~ ‘शब्द योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

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