तुम्हारी हैसियत है कुत्ते जैसा होने की? || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2015)

प्रश्न: हमारे जीवन का लक्ष्य क्या है?
वक्ता: न हो तो?
श्रोता १: तो हमारे और जानवरों में क्या फ़र्क रह जाएगा?
वक्ता: न हो तो? तुम में और जानवरों में कोई फर्क नहीं है, इसकी चिंता जानवरों को होनी चाहिए न!
“हममें और इंसानों में कोई फर्क ही नहीं है”, यह परवाह तो जानवरों को होनी चाहिए।
तुममें अगर जानवरों से कुछ अलग नहीं है तो तुम्हारे लिए तो गौरव की बात है।
“हम कुत्तों जैसे हैं” – तुम्हारे लिए तो गौरव की बात होनी चाहिए। कहाँ कुत्ते, कहाँ हम!
यह कोई विषाद की बात है कि हममें और कुत्तों में कोई फर्क नहीं है। यह तो वैसी ही बात है कि कोई भिखारी बोले कि हममें और करोड़पतियों में कोई फर्क नहीं है। इसकी चिंता तो करोड़पति को होनी चाहिए। भिखारी के लिए तो यह गौरव की बात है।



