तुम मजबूर हो नहीं, बस मजबूरी पकड़ रखी है

Acharya Prashant

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तुम मजबूर हो नहीं, बस मजबूरी पकड़ रखी है
गिरोगे, मिट्टी लगेगी चेहरे पर, क्रोध भी आएगा, हारते हुए भी प्रतीत होओगे। ये सब अनुभव होंगे, और जब अनुभव हों तो ये मत सोच लेना कि प्रक्रिया टूट गई। होता है भाई। बल्कि हार रहे थे हारते-हारते जीत गए, तब तो और मज़ा है। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। आचार्य जी, मुझे चार साल हो गए आपसे जुड़े हुए। तो शुरू में, डेढ़-दो साल बाद जब स्वभाव में बहुत चेंज आने लगा धीरे-धीरे, तो परिवार वालों को, दोस्तों को चेंज नज़र आने लगा बहुत ज़्यादा। लेकिन बीच-बीच में कभी कुछ दुख आता था शरीर से रिलेटेड, तो अज्ञान फिर से घर कर जाता था। और बीच में या सेशन नहीं रेगुलर हो पाए या माया ज़्यादा हावी हो गई फिर से, तो वो चीज़ फिर से दिखने लगती थी। मैं उसको थोड़े टाइम बाद रिकवर भी लेती, लेकिन बाहर वालों को कंफ्यूजन हो जाती थी कि अभी तो ये इतनी ज्ञान की बातें कर रहे थे, कुछ कर रहे थे, लेकिन देखिए, ये फिर से वैसे ही इनका बिहेवियर हो गया है।

तो कुछ मेरे दोस्तों ने फिर मुझे कहा कि देखो, “बेसिक नेचर तो कभी नहीं बदलता।” तो क्या ये जो “बेसिक नेचर” होता है?

आचार्य प्रशांत: बाहर दो छवियाँ चलती हैं, एक तो ये कि “बेसिक नेचर” का मतलब होता है कि फलाना क्रोधी है, फलाने में दया ज़्यादा है, फलाने में डर ज़्यादा है, इसको वो कहते हैं कि ये सब “बेसिक नेचर” होता है। और दूसरी छवि वो बनाते हैं कि जब आप किसी आध्यात्मिक प्रक्रिया में होते हो तो आपको फिर उस तरह का बर्ताव करना चाहिए।

प्रश्नकर्ता: एक नैतिकता के तौर पर बाँधने लगते हैं।

आचार्य प्रशांत: हाँ, “साध्वी हैं आप, क्या ये काला क्यों पहन के आई हैं? अच्छा नहीं लगता।”

प्रश्नकर्ता: हाँ, ऐसे कपड़े पहन लिए, या ये खा लिया।

आचार्य प्रशांत: “सफ़ेद में चलिए और ऐसे चलिए जैसे आप ज़मीन पर नहीं, बादलों पर चल रही हों।”

तो ये उनके पास छवियाँ हैं, और इन छवियों को खूब दृढ़ किया जाता है लोकधर्म में। और बहुत सारी संस्थाएँ हैं जो विशेषकर महिलाओं को तो ऐसा ही दिखाती हैं कि अगर वो आध्यात्मिक हो गई है महिला, तो बादलों पर ही चलेगी बिल्कुल सफ़ेद-सफ़ेद, और ऐसे (धीरे धीरे चलने का अभिनय करते हैं) “मैं इस अखिल जगत की दृष्टा मात्र हूँ।” वो कुछ नहीं है। जंग है, युद्ध है, दो कदम आगे बढ़ोगे तो जिससे लड़ रहे हो, वो चीज़ हल्की नहीं है वो पलटवार करती है। एक कदम पीछे भी हटना पड़ेगा।

युद्ध में योद्धा से ये उम्मीद करना कि वो बादलों पर चलेगा और सब उसके कदम नपे-तुले होंगे, भयानक मूर्खता की बात है।

गिरोगे, मिट्टी लगेगी चेहरे पर, क्रोध भी आएगा, हारते हुए भी प्रतीत होओगे। ये सब अनुभव होंगे, और जब अनुभव हों तो ये मत सोच लेना कि प्रक्रिया टूट गई। होता है भाई। बल्कि हार रहे थे हारते-हारते जीत गए, तब तो और मज़ा है। कोई देखने जाओगे ऐसा मैच जिसमें एक ही खिलाड़ी शुरू से ही जीत रहा हो, स्कोर है सिक्स–लव, सिक्स–लव। देखोगे? देखोगे क्या? कुछ नहीं है, इसमें क्या रखा है।

तो आप सबको कह रहा हूँ, जिन चीज़ों को आप पीछे छोड़ आए हो, वो बीच-बीच में फिर सिर उठाती दिखाई दें तो निराश, क्रोधित मत हो जाइएगा कि “अरे, इतनी गीता कर ली, इसके बाद ये चीज़ फिर है, वापस है, बची हुई है।” वो सब बड़ी माँ के फ़रमान होते हैं, वो रहते हैं। और अगर मैं बिल्कुल तथ्य कहूँ, तो उम्र भर रहते हैं, आख़िरी पल तक रहते हैं। अधिक से अधिक ये होगा कि कम हो जाएँगे, उनके प्रकट होने की आवृत्ति कम हो जाएगी, यही हो सकता है।

लेकिन आपके आसपास वाले जो होंगे, उनके पास दूसरी छवियाँ हैं, और उन छवियों का इस्तेमाल वो हथियार की तरह करेंगे। वो कहेंगे, “अच्छा, इतना गीता पढ़ती है तो फिर चिड़चिड़ा क्यों रही है?” हुआ है?

प्रश्नकर्ता: बहुत होता है।

आचार्य प्रशांत: और भी है, “पहले तो फिर भी सीधी-सादी थी।”

प्रश्नकर्ता: ये तो सबसे ज़्यादा होता है।

आचार्य प्रशांत: हाँ भाई, पहले रोटी बेलते थे, अब दुश्मन पेलते हैं। तो फ़र्क़ तो दिखेगा ही तुम्हें हमारे व्यवहार में। पहले बेलन सिर्फ़ चलाते थे, अब चलाते हैं, तो फ़र्क़ तो दिखेगा ही व्यवहार में। ये फ़र्क़ है अवनति नहीं है, अवरोह नहीं है, गति है अपगति नहीं है।

बिल्कुल हो सकता है कि पहले आपको क्रोध न आता हो, अब आप ज़्यादा क्रोधी हो गए हों पहले की अपेक्षा। तो परम्परागत अध्यात्म तो कहेगा कि “ये बुरा हो गया! शीतल चित्त का व्यक्ति था, और अब देखो कैसे ये उमड़ता-घुमड़ता है।” हाँ, क्योंकि दब्बू और कायर बनकर नहीं बैठना है। पहले घर की सुरक्षा में थे, ए.सी. में बैठे थे, टी.वी. देख रहे थे, नेटफ़्लिक्स लगा हुआ था, तो ठीक है चुपचाप बैठे रहते थे। अब उतरे हैं न मैदान में, और मैदान में उतरे हैं चोट खा रहे हैं, तो हाँ, अब दर्द भी आता है और गुस्सा भी उठता है।

दिक़्क़त बस ये है कि तुम्हारे पास वो बादलों में चलने वाली छवि है। तुम्हारे पास वो पुरानी चरित्रगत, आचरणगत, व्यवहारगत सब बातें हैं, सिद्धांत हैं कि जो आध्यात्मिक हो जाता है वो वैसे बात करता है जैसे सब किरदार नहीं बात करते थे जो रामायण, महाभारत के टी.वी. सीरियल आता था। कैसे? “माते” अरे, क्यों ऐसे? मेरी भी माते बैठी हैं यहाँ। कोई, “भ्राताश्री, यदि आप आदेश दें तो दुष्ट का मुंडा अभी काट के ले आऊँगा।” अरे, उनके पास यही छवि है ऐसे ही, कि ऐसे बात करो तो आध्यात्मिक हो।

और यहाँ बहुत बार होता है कि भाई बोलते थे, वो चाहते हैं कि “भ्राताश्री” बोलो, वो “ब्रो” बन जाता है। और मैं कह रहा हूँ, कोई समस्या नहीं। कहते हैं, “ये तो गिर गया, पहले तो फिर भी भाई, भैया बोल देता था, अब ‘ब्रो’ बोलता है। और देखो, बाबा जी के पास जो आता है, वापस आकर क्या बोलता है? ‘भ्राताश्री!’”

फिर से समझना। क्या है? युद्ध है। योद्धा साफ़-सुथरे कपड़ों में देखा कभी? मिट्टी तो मिट्टी, ख़ून भी लगा होता है। वो निर्मल श्वेत साड़ी, नीले और लाल बॉर्डर वाली, ये वो नहीं चल रहा है। ये बात जब बोली गई है, हज़ारों सैनिकों के बीच बोली गई है और तभी इसकी उपयोगिता है। छोटी-मोटी नहीं, उस समय की सबसे बड़ी लड़ाई थी ये, विश्व-युद्ध था ये! वास्तविक वर्ल्ड वॉर वन ये था! भारत भर के जितने छोटे-बड़े थे, सब इकट्ठे होकर के कोई इस तरफ़, कोई उस तरफ़ लग गए थे, राजा, सेनाएँ।

अरे भाई, सिर्फ़ यूरोप की अगर लड़ाई हो तो उसको आप विश्व-युद्ध बोल सकते हो, तो सिर्फ़ पूरे भारत की लड़ाई हो तो क्यों नहीं बोल सकते? और उस समय का भारत, उस समय के यूरोप से ज़्यादा आबादी रखता था, तो ये विश्व-युद्ध क्यों नहीं है? विश्व-युद्ध के बीच में गीता उतरी थी। और पगले लोग सोचते हैं कि आप कैसे बात करोगे? बोलिए।

प्रश्नकर्ता: “भ्राताश्री, माते।”

आचार्य प्रशांत: पतिदेव से आके बोलेंगी, “आर्य।” आर्य भी नहीं, “हे आर्य।” अरे हम जल्दी में हैं, हमारे नहीं समय है इतने पानी पी-पी कर बोलने का, बहुत काम बाक़ी है।

आपसे कह रहा हूँ, आप सबमें वो-वो वृत्ति बहुत बाक़ी है, बहुत-बहुत बाक़ी है। आप सब धार्मिकता का मतलब अभी भी लगाते हो इन सब बातों से, कि कैसे शब्दों का इस्तेमाल हो रहा है, कैसे कपड़े पहने जा रहे हैं, कैसा आचरण किया जा रहा है, ये बहुत है। और उसका एक मैं आपको परिणाम बता देता हूँ, मैं आपके सामने खुलकर नहीं आ पाता क्योंकि मुझे आप पर…

प्रश्नकर्ता: भरोसा नहीं है।

आचार्य प्रशांत: एक आपको उदाहरण देता हूँ, आज आ रहा था। अब आपको ब्रेक देना है डेढ़ बजे, और डेढ़ से ऊपर हो गया अभी-अभी देखा। तो अब यहाँ घड़ी तो है नहीं, घड़ी नहीं है तो मैंने ये पहना (कलाई में घड़ी की ओर इंगित करते हुए)। ये आम तौर पर मैं अपने कदम गिनने के लिए पहनता हूँ, मुझे बोला गया है कि दिन के 12–15 हज़ार कदम चलो। जब ये पहन रहा था तो सब जो अभी साथ में संस्था के थे, उन्होंने कहा, “अब ये नया इल्ज़ाम लग जाएगा कि देखो, घड़ी पहननी शुरू कर दी पहले तो कभी नहीं पहनते थे।” ये हालत है। क्योंकि आपके मन में भी वही छवि है।

आपको सही बता रहा हूँ, जन्माष्टमी है आज, और आज मैं किसी पारंपरिक वेशभूषा में आ गया होता तो बहुत लोग गद-गद हो जाते, बड़ा अच्छा लगता! और जिस देश में हूँ, वैसा वेश बनाकर अभी आ जाऊँ बॉक्सर शॉर्ट्स पहन करके, तो “अरा! ररर! घोर कलियुग है, घोर! बाबा जी बिल्कुल ठीक बोलते थे, घोर कलियुग है।”

अब दिन-भर भले मैं शॉर्ट्स में रहता हूँ, भले ही मैंने पूरी ये किताब लिख डाली वही पहन करके कैफ़े में बैठकर और भले ही वो किताब किसी ऊँचे ग्रन्थ के तुल्य हो, लिख डाली और वही पहनकर लिख डाली। पर वो पहनकर मैं ग्रन्थ तो लिख सकता हूँ, पर आपसे बात नहीं कर सकता। वो कैसे ख़राब हो सकता है वेश अगर उसको पहनकर के मैंने ये लिख डाली तो? और यही कर रहा हूँ मैं, आप क्या सोच रहे हो मैं क्या करने आया हूँ? वहाँ से आया हूँ ताकि कुछ समय मिले, दिखाई न दें चीज़ें तो ये किताब ख़त्म कर पाऊँ। तो ख़त्म कर ली है। पर आपके सामने आ जाऊँ साधारण अपनी टी-शर्ट पहनकर और शॉर्ट्स पहनकर, तो अभी हो जाएगा, “ये देखो।”*

आपके सामने आ जाऊँ तो फिर भी कम होगा, कहेंगे “देखो, ख़ुद ही सामने आ गए थे।” वैसा मैं कहीं घूम रहा हूँ और कोई फ़ोटो खींच ले, या कि मान लो हम ही ने खींची है, हमारे ही सोशल मीडिया पर है वो वहाँ से कोई ले जाए, “आचार्य प्रशांत एक्स्पोज़्ड।” क्या एक्स्पोज़्ड है? टाँगें हैं! क्योंकि आपके मन में भी वो धारणा बनी हुई है न इसीलिए दूसरे आपका हैंडल घुमा देते हैं ऐसे। आपकी ही हस्ती पर हुक है, वो उन हुकों में रस्सी फेंक के आपको फिर नचा लेते हैं। क्योंकि ये बात है आपके भीतर, अच्छे से है, खूब है, विशेष किस्म का लहजा, कपड़े। मैं कहूँ कि देखो, वैसे तो मैं व्यावहारिक और सांसारिक बनकर रहता हूँ, पर आज विशेष दिन है, तो आज मैं ये देखो कंठी-माला, तिलक ये सब धारण करके आया हूँ। “अरे देखो, साधु-साधु! हम तो जानते ही थे आचार्य जी संत हैं, छुपे हुए संत थे। आज उनसे रहा नहीं गया तो उन्होंने अपनी सच्चाई जाहिर कर दी। देखा, बढ़िया! कितने अच्छे लग रहे हैं।”

इतना हममें, इतना ज़्यादा हममें ये वेशभूषा और इन बाक़ी बाहरी चीज़ों के लिए आग्रह है, अनुराग है। आपने देखा है? युद्ध में खड़े हुए हैं श्रीकृष्ण, उनको भी लंबी-लंबी मालाएँ वहाँ पहना देते हैं! युद्ध में योद्धा, ऐसी फूलों की मालाएँ पहन के? तुम पागल हो गए हो? वहाँ सामने खड़े हुए हैं पहलवान दुर्योधन और वहाँ भीष्म खड़े हैं बाणों की धार लेकर, ये फूल सूँघेंगे इधर? पर बहुत आग्रह है कि धार्मिक है तो कमल-दल तो होना चाहिए न, फूल नहीं पुष्प होने चाहिए, गाड़ी नहीं वाहन होना चाहिए। है न आग्रह? बोलो, है न?

श्रोता: नहीं।

आचार्य प्रशांत: अरे छोड़ो। अरे मैं आचार्य जी हूँ, मैं खाना खा के हाथ थोड़ी धोता हूँ, मैं हस्त-प्रक्षालन करता हूँ। है न? आप लोग सब भक्तजन हैं आपका काम, “हाय-हैलो” बोला तो पाप लग जाएगा, नरक में सड़ोगे, आपको तो “शतशत नमन्” बोलना है और वो भी “शतशत नमन्” बस बोलना नहीं है, दोनों हाथ आपको जोड़ने हैं और ऐसे झुकना है। तब तक झुकना जब तक चररर! की आवाज़ न आए, और आए तो भी सीधे मत हो जाना, बिछ जाना पूरा, कोई आके ऊपर चादर डाल ही देगा, दुनिया बड़ी लाजवंती है। है न?

प्रश्नकर्ता: आपने अभी बोला कि “मैं आप लोगों के ऊपर भरोसा नहीं करता हूँ।” तो अब आप ये बताइए कि आप भरोसा करेंगे कैसे?

आचार्य प्रशांत: दिख जाएगा, चालाकी देखो।

** प्रश्नकर्ता:** चालाकी नहीं है।

आचार्य प्रशांत: मैं बता दूँ, भरोसा कैसे करूँगा? कोई चिन्ह होगा, कोई लक्षण होगा, कोई कर्म होगा, कुछ आचरण होगा, तो जैसे ही मैं बता दूँ, फिर धारण कर लें और काम बन जाए। ये अब मेरी ख़ुफ़िया आँख है वो देख लेगी कि अब मामला भरोसे से जैसा हुआ है कि नहीं हुआ है। ये मैं नहीं बताऊँगा।

एक बात पक्की है, जब तक अभी ये सवाल है, तो उससे यही पुष्टि होती है कि आप अभी भरोसे वाली बात समझ ही नहीं रहे हैं। लक्षणों पर ज़ोर है। जितना अपने बंधनों को पकड़े होते हैं न, उतना उन्हें अच्छा समझकर पकड़ा होता है, समझिएगा। आप जाइएगा किसी से मिलिएगा जो आपको दिखाई दे साफ़-साफ़ कि पूरे तरीके से जकड़ा हुआ आदमी है, फँसा हुआ आदमी हैं। वो भी यही कहेगा कि “मैं जो कर रहा हूँ या सोच रहा हूँ, अच्छा है, बंधन अच्छे हैं।” और बंधन अगर अच्छे हैं, तो कोई निर्बंध हो जाए तो बहुत बुरा लगने लगेगा।

बंधन अगर अच्छे हैं, तो कोई निर्बंध हो गया तो बहुत बुरा लगने लगेगा, इसलिए दूरी रह जाती है। अपनी-अपनी नज़र में सब अच्छे हैं, हम जो कर रहे हैं ठीक होगा तभी तो कर रहे हैं; जैसे हम जी रहे हैं, वो ठीक होगा तभी तो जी रहे हैं। अगर बंधन अच्छे हैं, तो जो बिना बंधन का है वो बुरा लगेगा न?

प्रश्नकर्ता: हाँ।

आचार्य प्रशांत: तो मैं बचाता हूँ अपने आपको आपसे, आप मुझे बहुत बुरा न मानने लगें। तो जो बंधन में है, उनके सामने मैं भी बँध के ही आता हूँ। आप मुझे बहुत बुरा मानने लगोगे, बुरा मानने लगोगे तो फिर मैं आपसे अपनी बात कैसे कह पाऊँगा? आपको मैं अच्छा तभी लग पाऊँगा जब आपको अपनी हस्ती बुरी लगने लगेगी। जब तक आप अपनी नज़र में ठीक-ठाक ही हो, जिस हद तक आप अपनी नज़र में ठीक-ठाक ही हो, उस हद तक अभी ख़तरा है कि आप मुझे ही बुरा घोषित कर दोगे।

प्रश्नकर्ता: तो ये कैसे जानेंगे?

आचार्य प्रशांत: उसके लिए तो आपको किसको जानना पड़ेगा? ख़ुद को जानना पड़ेगा।

प्रश्नकर्ता: क्योंकि जैसे मैं अभी जो अपने आप को जान रही हूँ, तो जितना मैं पढ़ रही हूँ, समझ रही हूँ और जो मैं काम कर रही हूँ, जो तौर-तरीके मैं यूज़ करती हूँ, तो उसमें मुझको ख़ामियाँ नहीं दिखती हैं या बहुत कम दिखती हैं। जो मुझको दिखते हैं कि मेरा इम्प्रूवमेंट ऑफ़ एरिया क्या है, मुझे किधर और काम करना है, तो वो मैं करने की पूरी कोशिश करती हूँ, और मुझको अपने को बदलने में कोई प्रॉब्लम नहीं होती। तो या तो आप मुझको गलतियाँ बताओ कि ये ये गलतियाँ दिखती हैं।

आचार्य प्रशांत: गलतियाँ बताने के जो सूत्र होते हैं, पूरा गीता कार्यक्रम ही वही है। अब मैं अलग से कौन-सी गलती बताऊँ? जब आप कह रही हैं, “अच्छा, अब आज आप मुझको मेरी गलती बताइए,” सबसे बड़ी गलती तो यही हो गई। ये जो रोज़ 10:30 बजे शुरू होकर 1:00 बजे तक चलता है, वो और क्या है? गलतियों का घोषणापत्र ही तो है, पूरा लंबा-चौड़ा। माने आपने सत्र नहीं सुने।

प्रश्नकर्ता: नहीं, मैं।

आचार्य प्रशांत: नहीं सुने, नहीं तो अभी गलती क्यों पूछती? वहाँ पर तो सब गलतियाँ उजागर हो चुकी हैं।

प्रश्नकर्ता: अच्छा, मैं आपको ठीक-ठीक बात बोलती हूँ।

आचार्य प्रशांत: मतलब समझो, अभी तक जो बताया…।

प्रश्नकर्ता: दूसरी तरफ़ से समझाने की कोशिश करती हूँ कि मैं क्या कहना चाहती हूँ। वो मैं सिर्फ़ इतना पूछना चाहती हूँ, मैं सीरियसली पूछना चाहती हूँ आचार्य जी, कि मैं जहाँ पर अभी खड़ी हूँ, मैं इससे आगे कैसे बढ़ूँ? क्योंकि मैं सच में अपने आप को अपग्रेड करना चाहती हूँ।

आचार्य प्रशांत: सत्र ही माध्यम है। देखिए, जो सबकी अपनी-अपनी विशिष्ट स्पेसिफिक परिस्थितियाँ हैं, सिचुएशन्स हैं, या तो मैं वो सुनूँ, जो मैं कभी करता भी था, पर उसमें हर आदमी के साथ तीन घंटे-चार घंटे लगाने पड़ेंगे, वो भी एक बार नहीं, कई बार। या दूसरा तरीका ये है कि मैं आपको वो रोशनी, वो सूत्र ही दे दूँ जिससे हम आप ख़ुद ही देख पाएँ। तो मैं वो कर रहा हूँ। अब या तो तीन-चार घंटे में किसी एक व्यक्ति के साथ लगाऊँ, वैसा मैंने करा भी है और वो सफल भी होता है कार्यक्रम। ठीक है, अच्छा है। पर उसमें दिक़्क़त क्या रह जाती है?

श्रोता: एक।

आचार्य प्रशांत: एक व्यक्ति। और दूसरा ये है कि मैं कहूँ कि आपके पास आँखें हैं, बस आपने ये रोशनी भी है, उसके ऊपर आपने ऐसे पर्दा डाल रखा है, मैं पर्दा हटा देता हूँ। आँखें भी हैं, रोशनी भी है, सब कुछ आपका ही खेल है, हो जाएगा। तो वो कर रहा हूँ। “आगे कैसे बढ़ूँ?” सूत्र तो इसके सत्रों में मौजूद हैं। मैं कैसे करूँ भरोसा? कौन है जो सभी सत्र देख रहा है?

प्रश्नकर्ता: आपके पास तो रिज़ल्ट है।

आचार्य प्रशांत: मेरे पास ये रिकॉर्ड है कि आपने एक सत्र एक बार देखा है। और मुझे ये पता है कि मैं जब सुनता था और जिनको गुनता था, वहाँ मैं घुस जाता था। और कई-कई तो ऐसे अध्याय हैं और ऐसी रिकॉर्डिंग्स हैं जो शायद मैंने पचास बार, सौ बार सुनी हों। और मैं ख़ुद पर भरोसा नहीं करता था, तो मैं स्वचालित प्रक्रियाएँ बनाकर छोड़ देता था कि मैं अगर नहीं भी स्वेच्छा से जाकर के किताब खोलूँ या बटन दबाऊँ, तो काम अपने आप शुरू हो जाए। जहाँ उतना होने लगेगा, वहाँ मुझे भरोसा आने लगेगा। पर जैसे ही मैं कहूँगा “उतना होने लगेगा,” तो आप कहेंगे, “अरे, हम दुनियादार लोग हैं। हमारे पास और भी तो काम हैं।” मेरे पास भी और काम थे, मैं उन सब कामों के बीच में ये काम लगातार करता जाता था। लगातार माने लगातार।

दिल्ली में हूँ तो दिल्ली में, बाहर हूँ तो बाहर। वो चीज़ ध्यान जैसी थी। लैपटॉप पर काम कर रहा हूँ तो एक विंडो में शीट खुली हुई है, दूसरी विंडो में कुछ और चल रहा है। गाड़ी चला रहा हूँ तो मैं अपने ऊपर ये ज़िम्मेदारी नहीं छोड़ता था कि मैं ऑन करूँगा। तब सी.डी. प्लेयर होते थे, उससे भी पहले कैसेट्स होते थे। उसमें मैंने ऐसा जुगाड़ कर दिया था कि यहाँ मैं ऐसे इग्निशन देता था और वो अपने आप चालू हो जाता था। वो मुझसे पूछता ही नहीं था कि “सुनना है कि नहीं सुनना है।” ये इग्निशन दिया, वो चालू हो गया। और मैं ड्राइव बहुत करता था, अद्वैत लाइफ़ एजुकेशन के दिन थे, तो जो हमारे कॉलेजेस थे वो सब दूर- दूर दूसरे-दूसरे शहरों में इधर-उधर। तो दिन भर संवाद लेने के लिए जाना ही है, जाना ही है, और पसंद था मुझे ड्राइव करना ख़ुद ही।

बैठा हूँ, दिन के छह-छह घंटे, आठ-आठ घंटे। वहाँ पर जो भी सुनना है, सब कुछ उपलब्ध है, अष्टावक्र गीता सुनना है, वो सुनिए। कबीर अमृतवाणी, वो सुनिए। क्या है जो उपलब्ध नहीं है? और नहीं, ख़ुद पर भरोसा करता था।

हमने क्या कहा थोड़ी देर पहले, शरीर जमा कर लेता है, जब जमा कर लेता है तो फिर कई बार घिसना पड़ता है। एक बार में तो शुरुआत भी नहीं होती ठीक से, कि “हाँ, हम तो सत्र सुनते हैं, हमारे पास देखिए रिकॉर्ड है, यहाँ पर 98% है।” शुरुआत भी नहीं हुई उतने में तो। 98% आपने सत्र सुने हैं, तो शुरुआत भी नहीं हुई है।

किसी ने कहा अभी कुछ दिन पहले कि पुराने जो परीक्षा पत्र हैं, उनको खुलवा दीजिए कि और लोग भी देख पाएँगे। मैंने कहा अच्छी बात है, चलो पुराने देखो। अच्छा, ये बताइए, कितने लोगों ने कभी किसी कंपिटिटिव एग्ज़ाम की तैयारी करी है? जो पुराने सालों के पेपर्स होते थे, उनको कितनी बार घिसा था? कितनी-कितनी बार? बोलो, जल्दी बोलो।

श्रोता: बार-बार।

आचार्य प्रशांत: अब समझ में आ रहा है न भरोसा क्यों नहीं है? गीता परीक्षाएँ पुरानी कितनी बार जाकर घिसते हो?

प्रश्नकर्ता: एक बार तो करते हैं।

आचार्य प्रशांत: पर्याप्त है एक बार में हो गया न? और जेईई दे रहे हो, तो मैंने जेईई 95 दिया था, तो 92, 93, 94, इनके सवाल रट गए थे, अभी तक याद है मुझे। वो धड़कन बन जाती है चीज़, वो साँस बन जाती है चीज़। और एक बात और बोलता हूँ, एक चीज़ होती है सत्र सुना। जो हमारा सिस्टम है न, वो आपने सत्र अटेंड किया वो तब भी बोल देता है जब आपने सत्र सिर्फ़ थोड़ी देर को अटेंड करा हो। और थोड़ी देर क्या, अगर आपने तीन-चौथाई भी करा है तो भी आप चूक गए हैं। नंबर ऑफ़ सेशन्स अटेंडेड, वो तो तब भी आ जाता है अगर आपने बस थोड़ी-सी देर को कर लिया है, तो भी आ जाएगा “यस” ऑनलाइन हुए थे आप तो वो कैप्चर कर लेता है।

सवाल ये भी है न कि कितनी देर को और कितनी देर में। अगर 90% भी है तो भी चूक गए। फिर 100% है तो भी चूक सकते हो। किस माहौल में? अभी यहाँ पर सीटियाँ बज रही हों और चिल्ल-पों लगी हुई हो, और कुत्ते भौंक रहे हों, और कोई कुछ बोल रहा हो, और एक जगह पर टी.वी. भी चल रहा हो, और बगल की स्क्रीन पर जो मूवी है, उसकी आवाज़ भी आ रही हो, हो चुकी बातचीत या हो जाएगी?

तो किस माहौल में सुन रहे हो?

आप बताइए? भाई ये शर्तें कड़ी होती हैं। और ऐसा नहीं है कि आप इतने मासूम हैं कि आप जानते नहीं हैं कि शर्तें कड़ी होती हैं, जेईई हो कि नीट हो कि कैट हो, यूपीएससी हो आप बहुत अच्छे से जानते हो कि पुराने पेपर्स को भी कई-कई बार हल करना चाहिए। यहाँ कितनी बार आप पुराने पेपर्स को हल करते हो? जानते आप सब हो और फिर मासूमियत से पूछ रहे हो, “हमारा भरोसा क्यों नहीं करते?” जानते तो आप सब कुछ हो कि नहीं जानते? मैंने अपनी ओर से तो तय नहीं करा था कि मैं आज भी डाँट लगाऊँ।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ये डाँट नहीं है मेरे लिए। मैं सिर्फ़ इतना बोलना चाहती हूँ कि मैंने जिस दिन से सुनना शुरू किया, मुझको नौ महीने हुए हैं। क्योंकि यहाँ पर हम देखते हैं कि बोलते हैं कि हमारे पुराने लोगों ने, जितने ज़्यादा पुराने होते जाते हैं हम उतने ज़्यादा पकते जाते हैं और हम चीज़ें सीखते जाते हैं। तो मुझको अभी सिर्फ़ नौ ही महीने हुए हैं। लेकिन इन नौ महीनों में मैंने, एक्चुअली मैं…।

आचार्य प्रशांत: बहुत अंतर देखा है, बहुत बदलाव है, बहुत अच्छा लग रहा है।

प्रश्नकर्ता: इसीलिए आज तक ये सारी चीज़ें जो हम नॉर्मली सुनते हैं अवलोकन में, मैं वो चीज़ें नहीं बोल रही हूँ। मैं सिर्फ़ इतना बोलना चाहती हूँ, आचार्य जी, कि मैंने जब से आपको सुनना शुरू किया और वो दिन और आज का दिन कोई भी दिन ऐसा नहीं हुआ है कि मैंने नहीं सुनी चीज़ें और समझी। और उनमें से बहुत सारी चीज़ें मैं व्यक्तिगत रूप से जैसे हम बोलते हैं कि अभी हम बात कर रहे थे कि हम बहुत सारे लोग हैं, जो हमारे रोज़ के बंधन हैं, ये सारी चीज़। मैं उनसे फ्री हूँ, हो चुकी हूँ बहुत पहले।

आचार्य प्रशांत: मैं इतनी देर पहले क्या समझा रहा था? अपनी फ्रीडम कुछ होती है?

प्रश्नकर्ता: वही बोल रही हूँ। आचार्य जी, बोल तो लेने दो, थोड़ा सुन तो लो, प्लीज़।

मैं अब समझ चुकी हूँ ये चीज़, थोड़ा-थोड़ा मुझे समझ में आने लगा है कि अब मेरे लिए मेरा काम हो चुका। जो मुझे अपने लिए चाहिए लगता था कि हाँ ठीक है, मुझे ये चीज़ अचीव करनी है, ये करना है। अब मुझे जो बाक़ी के काम करने हैं, जो मैं अभी करना शुरू किए हैं मैंने, उसमें मुझको और आगे बढ़ना है और कर्म करने के लिए बहुत ज़्यादा हैं, मुझको दिखाई देते हैं। तो मैं उसको और ज़्यादा अच्छी तरह से बढ़ाने की कोशिश में ही हूँ और अपने आपको कैसे और अपग्रेड करना है, उसके ऊपर काम कर रही हूँ।

आचार्य प्रशांत: बार-बार अपने आप को कैसे अपग्रेड करना है। आप लोग मानोगे नहीं है न? मैं कितना भी कह लूँ, जन्माष्टमी के दिन भी प्रसाद बंट के रहेगा। क्यों आप मतलब खुलवाना चाहते हो?

प्रश्नकर्ता: ज़रूरी है मेरे लिए।

आचार्य प्रशांत: बैठिए, अच्छा। किसी ने अभी सवाल पूछा था कम्युनिटी पर कि “आचार्य जी, मैं बेहतर होने के लिए क्या करूँ?” तो उसको मैंने जवाब दिया था। मैंने नहीं PAF ने, कि दरिया बह रहा था और मैंने उससे जाकर के पूछा कि बताओ, मेरी प्यास का इलाज क्या है? उसने कोई जवाब नहीं दिया वो चुपचाप बहता रहा, और मैं उससे पूछता रहा, बताओ, मेरी प्यास का इलाज क्या है?

पिछले नौ महीनों में, संस्था के साथ बहुत सारी घटनाएँ, दुर्घटनाएँ घटी होंगी। हमें नहीं दिखाई देता कि कौन सामने आया था वहाँ पर। और मुझे अपना भी पता है कि मैंने जिनको प्रणम्य माना था, अपना माना था, हार्दिक माना था, उन पर कोई उँगली उठाता तो मैं क्या कर जाता। और फिर आप कहते हो कि मैं भरोसा करूँ। और इतना-सा कम समय है, साढ़े तीन बजे हमें रुकना पड़ेगा और आप चाहते हो कि हम ये बातें करें। मैं चाह नहीं रहा कि मैं आपसे ये सब बातें खोलूँ।

क्या बातें आपसे मैं खोलूँ, और कहाँ से शुरू करूँ, कहाँ पर रुकूँ? दिन भर तो हम संघर्ष करते हैं, और आप अच्छे लोग हो इसीलिए आपसे बात करने का कोई तुक नहीं है। आप बहुत-बहुत अच्छे लोग हो। आप अपनी ओर से जो कर सकते हो, आप कर रहे हो, धन्यवाद आपका। पर ये वो नहीं है जहाँ मैं आपको कह सकूँ कि आप कहीं पहुँच गए। हाँ, आप जो कर रहे हो, तुलनात्मक रूप से औरों से बहुत ऊपर की बात है, और इसके लिए आपको बधाइयाँ। आप तुलनात्मक रूप से लोकधर्मियों से बहुत ऊपर आ गए हो, निश्चित रूप से बधाई है आपको। पर ऐसा कुछ नहीं है कि मैं।

क्योंकि मैं दिन-रात अपनी भी जद्दोजहद देखता हूँ, और संस्था का भी संघर्ष देखता हूँ, और मुझे पता है हम बहुत अकेले हैं। फिर आप पूछ रही हैं, “मैं क्या करूँ? आपके सामने मैं खड़ा हूँ, आप पूछ रही हैं, “मैं क्या करूँ अपने आप को अपग्रेड करने के लिए?” वही बात है, दरिया से पूछ रही हैं, “प्यास कैसे बुझे?” जो कुछ भी हो रहा होता है संस्था में, वो रोज़ ही तो आपके सामने आ जाता है कम्युनिटी पर। तो क्या पूछ रही हो कि “मुझे और क्या करना चाहिए?” आ तो जाता है, करो, क्यों नहीं कर रहे हो? और रोज़ आता है, कि करो, क्यों नहीं कर रहे हो? मैं क्या बताऊँ?

बाहरी माहौल कैसा है, बहुत अच्छे से जानते हो। उस माहौल में हम छोटा-सा छोटा काम करने के लिए भी, यहाँ तक आपको लाने के लिए और ये करने के लिए, और देश में दूसरे हॉल्स में ये करने के लिए भी, पीछे कितनी जान लगानी पड़ी होगी और जोड़-तोड़ करनी पड़ी होगी, थोड़ा विचार कर लीजिए। आप सब सांसारिक रूप से सफल लोग हैं भाई, संसार को आप समझते हैं। तो क्या देख नहीं पा रहे होंगे, क्या-क्या करना पड़ा होगा? और हम जब वो कर रहे होते हैं, तो कौन सामनेआ गया होता है? हम कोई गुहार भी नहीं मारते कि सामने आओ, क्योंकि अभी आप ऐसे हो नहीं कि सामने आ पाओगे। हो जाओगे शायद, ये कोई आरोप नहीं लगा रहा हूँ।

नौ महीने आपके हुए हैं कुल, इतने में तो जन्म होता है। दूसरों के दो-तीन साल हुए हैं, वो अभी शिशु हैं, छोटे-छोटे। हो जाओगे धीरे-धीरे। लगेंगे दस-बीस साल या तीस-चालीस साल, जब भी लगेंगे। मेरे बाद मेरा काम आगे आप ही लोग बढ़ाओगे, पर अभी आप इस लायक नहीं हो। या हो भी तो बस धीरे-धीरे अभी पनप रहे हो। आप चाहो तो मैं आपका दिल रखने के लिए बोल दूँ, नहीं-नहीं, आप बिल्कुल लाठियाँ हो मेरी, बैसाखियाँ हो मेरी, कहो तो बोल दूँ? बोल दूँ?

दुनिया में जानते हो न सबसे बड़ी प्रॉपर्टीज़ किनके पास हैं? धर्म-गुरुओं के पास हैं। उतनी ज़मीनें और उतने पत्थर, क्योंकि आपका ही वर्ग, पढ़ा-लिखा वर्ग, सुसंस्कृत वर्ग, कमाने वाला वर्ग जाकर के वहाँ पर बस कहना होता है कि “अब यहाँ पर एक नया देवस्थल बनेगा।” और देखिए। आप समझ रहे हो, हम छोटे रिहायशी प्लॉट्स की बात नहीं कर रहे। हम हज़ारों-सैकड़ों की तादाद में जो आश्रम और सब गगनचुंबी इमारतें खड़ी होती हैं, हम उनकी बात कर रहे हैं। उसमें सिर्फ़ मंदिर ही नहीं, मंदिर, मस्जिद, चर्च, सब। वो सब आप ही लोगों के दम पर सब खड़ा होता है।

यहाँ हमारी हालत ये है, हो गया मुँह मीठा। सौ तरीके के रोज़ संस्था पर आक्रमण होते हैं। तब जो लोग बाहर निकल के कुछ कर भी रहे होते हैं, वो बेचारे गुहार कर-करके गला बैठा लेते हैं। कोई उठकर के सामने नहीं आता कि “करें, कुछ करें।” लेकिन आप कर भी नहीं सकते, इसीलिए मुझे इसमें कोई शिकायत नहीं है। आप अभी अपना ख़्याल रख लो उतना काफ़ी है।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मुझे गीता-सत्रों से जुड़े लगभग सवा साल हो गया है। तो मतलब ये दो सत्रों में मैंने मतलब चीज़ें सुनी थीं, तो उनको मिक्स करके मुझे थोड़ा विरोधाभास लगा। तो मैं पूछना चाह रहा हूँ कि एक सत्र में आपने बोला था कि जैसे कोई अपनी चेष्टा से, मतलब किसी को ख़ुद ही पता है कि क्या सुधारना है, तो अध्यात्म में आऊँगा, और फिर वो सुधार-सुधार के मैं निकल जाऊँगा। मतलब वो एक तरह से कर्मकांड हो जाएगा। तो एक तरह वो रहेगा कि उसको पता है कि कहाँ-कहाँ सुधारना है, तो मैं अध्यात्म में आऊँगा।

और एक दूसरी चीज़ है कि अगर कोई स्वीकार ही नहीं कर रहा है कि क्या सुधारना है, अगर मतलब स्वीकार ही नहीं कर रहा है कि सुधारने की ज़रूरत है, तो भी वो अध्यात्म में नहीं आएगा। तो ये थोड़ी विरोधाभास चीज़ें लग रही थीं तो।

आचार्य प्रशांत: मुझे पता नहीं, मैंने क्या बोला था। और मुझे तो अभी भी पता नहीं चला कि तुमने क्या बोला। लेकिन इसका इस्तेमाल करके मैं इस मुद्दे पर, कि “कौन आएगा,” इस मुद्दे पर दो-चार बात बोलता हूँ। समय भाग रहा है, जल्दी से दूसरे सवाल पर जाएँगे।

देखो, जिसको एकदम ही दिखाई नहीं दे रहा है, या देखना नहीं चाहता है कि उसकी हालत गड़बड़ है, उसको तो धकेल के या खींच के लाना पड़ता है। और इसके लिए तुम्हारे पास बहुत प्रेम होना चाहिए। लेकिन अगर तुम्हारे पास इतना प्रेम है; प्रेम। मोह, ममता, लगाव नहीं। तुम्हारे पास इतना प्रेम है, तो तुम अपनी ऊर्जा किसी ऐसे पर ही सर्वप्रथम क्यों लगा रहे हो जो आना ही नहीं चाहता?

भाई, मैं यहाँ पड़ा हूँ बहुत भूखा हूँ, और यहाँ पेड़ है जिस पर सेब लटक रहे हैं, मैं बहुत भूखा हूँ, और सचमुच तुम्हें मुझसे प्यार है, तो जो सबसे ऊपर और मुश्किल से पकड़ में आने वाला सेब होगा, तुम उसको तोड़ने के लिए चढ़ोगे या जो नीचे ही लटक रहा है, बिल्कुल लो हैंगिंग फ्रूट, उसको जल्दी से ले आओगे मेरे लिए?

श्रोता: जो नीचे है।

आचार्य प्रशांत: तो बिल्कुल उन पर भी सफल हुआ जा सकता है, जो तैयार नहीं हैं और अपना दुःख देखना ही नहीं चाहते, पर उनके लिए मेहनत बहुत करनी पड़ती है। और कई बार वो अपने आसपास के ही लोग होते हैं जो नहीं सुनने को राज़ी हैं। तो वहाँ फिर दो बातें हैं, एक तो ये कि निश्चित रूप से शुरुआत उन्हीं से कर लो जो आसपास वाले हैं। मानवता की बात है। इन्द्रियों से जो बिलकुल आगे ही बैठा दिखाई दे रहा है, सबसे पहले तो मैं इसी का उपचार करना चाहूँगा न। मानवता की बात है।

मान लो सब बीमार बैठे हैं, उपचार करना है तो यहाँ बैठी हैं, सबसे पहले इनके पास आऊँगा, “चलो दिखाइए नब्ज़, दिखाइए, दवाई खाइए।” अब उल्टा ये मुझे ही पलट के मारने लग जाएँ और मुझे दिख रहा है कि यहाँ पीछे जितने बैठे हैं, वो सब बेचारे भी कुछ चाह रहे हैं दवा-पानी। तो मैं यहीं पर उलझा रहूँ और इनसे पहलवानी करूँ कि जब तक तुम्हारे मुँह में गोलियाँ डाल नहीं दूँगा, आगे नहीं बढ़ूँगा, और वो मुझे दनादन दनादन मुक्के दे रही हैं, वो राज़ी नहीं हैं। पीछे वाला कराह रहा है कि “कुछ मुझे भी दे दो।” वो तैयार बैठा है लेने को, पर मैं यहीं जूझा हुआ हूँ। तो ये क्या है? इसे प्रेम कहूँ या स्वार्थ कहूँ?

निश्चित रूप से इनसे मेरा कोई स्वार्थ है कि मैं इन्हीं पे अटक गया करके आगे निकल जाऊँ न। हाँ, शुरुआत इन्हीं से कर लो, बिल्कुल करनी चाहिए क्योंकि निकटस्थ तो यही हैं, शरीर से निकट तो यही हैं। जो अपने ही घर में रहता है, अपना यार-दोस्त है। शुरुआत उसी से करोगे, पर उस पर अटक मत जाओ न जब दिखाई दे कि विरोध दे रहा है काफ़ी, समय लगा रहा है काफ़ी, तो उनके पास जाओ जो लो हैंगिंग फ्रूट्स हैं, जो सुनने-समझने को तैयार हैं, उनसे बात करो। बस ये है।

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मुझसे एक चूक हो रही है, अवलोकन से मेरा सेल्फ-क्रिटिसिज़्म बहुत बढ़ गया है, और वो एक पावर की तरह काम कर रहा है, जिसकी वजह से जो प्रेम की हम बात कर रहे हैं, मैं ख़ुद के एंटी हो रही हूँ, बहुत ही ज़्यादा। मैंने कभी भी मतलब दुनिया को रेयरली ब्लेम किया होगा, लेकिन मैं हर बात के लिए ख़ुद को इतना दोषी साबित करती रहती हूँ, फिर आगे के काम नहीं कर पाती।

आचार्य प्रशांत: यही तो प्रेम है न, ये आप ख़ुद को बताना भूल रही हैं बस, ये इतनी-सी चूक हो रही है। जिससे नाता नहीं होगा, आदमी उसकी कमियाँ भी क्यों निकालेगा? जिसका भला नहीं चाहोगे, बार-बार मेहनत करके उसके दोष क्यों उजागर करोगे? तो अगर आप सेल्फ-क्रिटिकल हो रही हैं, आत्म-आलोचना बढ़ रही है बहुत ज़्यादा, तो ये तो बहुत अच्छी बात है। इससे आत्म-प्रेम का पता चलता है, और

जो आत्म-आलोचक नहीं है, वो आत्मममुग्ध है। वो खो गया है अपने में, उसको प्रेम नहीं है अपने आप से, वो बस स्वयं में मदहोश है, बेहोश है।

अरे भाई, आप अगर अपने खोट बहुत खोज रहे हो तो इससे क्या पता चलता है? अपनी भलाई चाहते हो, यही तो पता चलता है न। आपने 25 सवाल किए, परिणाम आया परीक्षा का। आप कहाँ पहले देखना चाहोगे, जहाँ सब कुछ सही हुआ है या जहाँ कुछ गलत हुआ है?

प्रश्नकर्ता: जहाँ गलत हुआ है।

आचार्य प्रशांत: इससे क्या पता चलता है? आप में नफ़रत है अपने लिए? इससे पता चलता है आप में प्रेम है अपने लिए। तो आप अगर अपने ऊपर छोटी-सी छोटी गलतियाँ भी खोज रहे हो, छिद्रान्वेषण कहते हैं उसको, छोटा-सा छेद भी कहाँ है, वो भी खोज निकालूँगा। और ईमानदारी से सचमुच खोज रहे हो कि कहाँ है मेरी गलतियाँ, तो ये अपने लिए अच्छी बात है। तो ये अपने लिए आदमी जब कुछ भला चाहता है तभी अपनी खोट ढूँढ-ढूँढ के निकालता है, “गढ़ि गढ़ि काढ़ै खोट।” ये काम जो गुरु होता है, प्रेमी, उसी का होता है न। तो आप ख़ुद अपनी खोट अगर निकाल रहे हो, तो क्या बुराई है, अच्छी बात है।

प्रश्नकर्ता: धन्यवाद।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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