प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, जैसे इंसान अपने जीवन में अकेले भी कई सारे फ़ैसले लेता है। जैसे मैं पढ़ने के लिए समाज से और परिवार से काफ़ी लड़ रही हूँ। क्या ये सबकुछ अपनेआप ही हो रहा है या ये मेरी अपनी ही लड़ाई है? तो फिर संघर्ष करने से क्या मतलब है? या हथियार डाल देना ही सबसे बड़ी जीत होती है इस लड़ाई में?
आचार्य प्रशांत: बाबा, आपने हथियार डाले हुए हैं और आप दास हैं, इसलिए हथियार उठाना ज़रूरी है न। गीता में अर्जुन को क्यों लड़वा रहे हैं श्रीकृष्ण? अर्जुन को कह रहे हैं, ‘तुम्हारी वर्तमान स्थिति बन्धक की है, दास की है, इसलिए तुम्हें हथियार उठाना ज़रूरी है। तुम लड़ो, ताकि तुम मुक्त हो सको।’ अगर तुम मुक्त हो ही तो तुम्हें नहीं लड़वाऍंगे।
भाई, रंगमंच पर आप उलझे हुए हो, तमाम तरह की गाँठें बाँध ली हैं आपने, तो आपसे कहा जा रहा है, ‘हथियार उठाओ, गाँठें काटो।’ लेकिन जो दर्शक दीर्घा में वहाँ पर नीचे बैठा हुआ है, मस्त बैठा है, उसको थोड़े ही कहा जाएगा कि तू जाकर भिड़ जा। वो तो मुक्त है, उसे क्या करना है। हाँ, वो अलग मुद्दा है कि वो जो मुक्त है, वो अगर ये देखे कि मंच पर गड़बड़ हो रही है, तो वो करुणावश जाकर मंच की गड़बड़ को ठीक करना चाहेगा।
मंच पर क्या गड़बड़ हो रही है? कोई मुक्त है, वो वहाँ पर ऐसे बैठा हुआ है और मंच पर चढ़ गया है एक झुन्नूलाल और सब जो नर्तकियाँ हैं, उनके साथ छेड़छाड़ कर रहा है। तो वो जो वहाँ पर बैठे हुए हैं ज्ञानी, मुक्त, वो क्या करेंगे फिर? वो जाकर झुन्नूलाल को वहाँ से खींचकर नीचे उतारेंगे।
तो फिर ये उनका जगत के साथ रिश्ता बैठता है। इसको लिप्तता नहीं बोलते, इसको करुणा बोलते हैं। ये प्रेम है। वहाँ नीचे बैठे थे, वो स्वयं तो मुक्त हैं, पर देख रहे हैं कि वहाँ मंच पर तो गड़बड़ चल रही है। वो उनको ठीक से नाचने नहीं दे रहा, ख़ुद भी दुख पा रहा है। तो फिर कहते हैं, ‘इधर आ, इधर आ, आ बैठ जा यहाँ, गीता सुन, इधर सुन।’ तो फिर उसको वहाँ से मुक्त कराया जाता है।







