स्वतंत्रता केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि उन आंतरिक कारणों से भी मुक्ति है जो समाज को परतंत्र बनाते हैं। भारत की लंबी गुलामी यह प्रश्न उठाती है कि क्या उसकी मूल दुर्बलताएँ समाप्त हुई हैं। लोकधर्म, अंधविश्वास, जाति, कर्मकांड, तथ्य और ज्ञान की उपेक्षा तथा जोखिम से भय आज भी बाधा हैं। सच्ची स्वतंत्रता के लिए आत्मपरीक्षण, ज्ञान, साहस और सतर्कता आवश्यक हैं।
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Originally published in Navbharat Times on 15 August '26
पंद्रह अगस्त के अवसर पर मंच सजते हैं, तिरंगे लहराते हैं, रैलियाँ निकलती हैं, देशभक्ति के नारे गूँजते हैं। गाँव से लेकर तहसील, ज़िले और राजधानी तक उत्सव का आलम रहता है, हर घर तिरंगा, भाषण, संकल्प। इस दिन का अपना भाव है, और वह उचित है; किसी राष्ट्र का यह स्मरण कि वह स्वतंत्र है, कोई छोटी बात नहीं। पर जब उत्सव का यह शोर थमता है, तो इस सन्नाटे में एक प्रश्न उठाना ज़रूरी है, जो हर बार इसी शोर में दब जाता है।
भारत हो या दुनिया का कोई भी अन्य देश, जब उसकी स्थापना होती है, तब उसकी स्थिति क्या होती है, स्वतंत्र या परतंत्र? ज़रा और निकट से देखिए, एक इंसान है, उसकी स्वाभाविक स्थिति क्या है, मुक्ति या ग़ुलामी? आज़ादी या कैद? स्वाभाविक स्थिति तो मुक्ति ही है। कोई भी मनुष्य किसी का ग़ुलाम पैदा नहीं होता। ग़ुलामी वह नहीं जिसमें हम पैदा होते हैं; स्वतंत्रता वह है जिसके लिए हम पैदा होते हैं। एक तड़प ऐसी है जो किसी मनुष्य को कभी सिखानी नहीं पड़ी, वह है मुक्त होने की तड़प।




