Navbharat Times
15 Aug '26

स्वतंत्रता दिवस: तलवार अभी भी सिर पर है

Acharya Prashant

21 min
116 reads
स्वतंत्रता दिवस: तलवार अभी भी सिर पर है
स्वतंत्रता केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि उन आंतरिक कारणों से भी मुक्ति है जो समाज को परतंत्र बनाते हैं। भारत की लंबी गुलामी यह प्रश्न उठाती है कि क्या उसकी मूल दुर्बलताएँ समाप्त हुई हैं। लोकधर्म, अंधविश्वास, जाति, कर्मकांड, तथ्य और ज्ञान की उपेक्षा तथा जोखिम से भय आज भी बाधा हैं। सच्ची स्वतंत्रता के लिए आत्मपरीक्षण, ज्ञान, साहस और सतर्कता आवश्यक हैं। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

Originally published in Navbharat Times on 15 August '26

पंद्रह अगस्त के अवसर पर मंच सजते हैं, तिरंगे लहराते हैं, रैलियाँ निकलती हैं, देशभक्ति के नारे गूँजते हैं। गाँव से लेकर तहसील, ज़िले और राजधानी तक उत्सव का आलम रहता है, हर घर तिरंगा, भाषण, संकल्प। इस दिन का अपना भाव है, और वह उचित है; किसी राष्ट्र का यह स्मरण कि वह स्वतंत्र है, कोई छोटी बात नहीं। पर जब उत्सव का यह शोर थमता है, तो इस सन्नाटे में एक प्रश्न उठाना ज़रूरी है, जो हर बार इसी शोर में दब जाता है।

भारत हो या दुनिया का कोई भी अन्य देश, जब उसकी स्थापना होती है, तब उसकी स्थिति क्या होती है, स्वतंत्र या परतंत्र? ज़रा और निकट से देखिए, एक इंसान है, उसकी स्वाभाविक स्थिति क्या है, मुक्ति या ग़ुलामी? आज़ादी या कैद? स्वाभाविक स्थिति तो मुक्ति ही है। कोई भी मनुष्य किसी का ग़ुलाम पैदा नहीं होता। ग़ुलामी वह नहीं जिसमें हम पैदा होते हैं; स्वतंत्रता वह है जिसके लिए हम पैदा होते हैं। एक तड़प ऐसी है जो किसी मनुष्य को कभी सिखानी नहीं पड़ी, वह है मुक्त होने की तड़प।

जानवर जंगल में स्वतंत्र है, पक्षी आसमान में स्वतंत्र है। आप पक्षी को पकड़कर पिंजरे में डालते हैं, तब वह परतंत्र होता है। परतंत्र बनाना पड़ता है, वह जन्म से परतंत्र नहीं होता। इसी तरह राष्ट्र की भी स्वाभाविक स्थिति स्वतंत्रता ही है। स्वतंत्रता की माँग अस्तित्वगत है, सबसे गहरी और सबसे पहली; मुक्ति व्यक्ति की अंतरतम पुकार है, और स्वतंत्रता राष्ट्र की।

तो स्वतंत्रता दिवस पर हम जो मनाते हैं, वह ज़रा विचित्र लगता है। स्वतंत्रता तो नैसर्गिक है, दी हुई है। ज़्यादा ईमानदार और ज़्यादा उपयोगी प्रश्न यह है कि जब जन्म से सब कुछ आज़ाद ही है, तो फिर आगे चलकर यह ग़ुलामी नाम की चीज़ कहाँ से आ गई? क्या भारत सदा से ग़ुलाम था? नहीं। तो ग़ुलामी कहाँ से आ गई? वही प्रश्न असल में पूछना चाहिए।

इसीलिए मैं चाहूँगा कि स्वाधीनता दिवस को हम आत्म‑अवलोकन दिवस की तरह मनाएँ। स्वतंत्रता के लड्डू तो खा लिए, अब यह पूछें कि परतंत्रता आई कैसे थी, और क्या वह सचमुच चली भी गई है या आज भी हमारे ऊपर तलवार की तरह लटक रही है।

हज़ार साल की अनहोनी

यह ग़ुलामी कोई दस, बीस, पचास साल की बात नहीं। लगभग हज़ार साल, कभी कोई हिस्सा, कभी पूरा ही हिस्सा दूसरों के आधिपत्य में रहा। जो कोई आ सकता था, सब आए। यूरोप से पुर्तगाली आए, फ़्रांसीसी आए, डच आए, अंग्रेज़ आए। जो नहीं आए, वे वही थे जो भौगोलिक कारणों से आ ही नहीं सकते थे। पास से अफ़ग़ान, ईरानी, तुर्क, अरब आए। और एक बात इससे भी पुरानी: शक और हूण जब आए थे, इस हज़ार साल के शुरू होने से भी सदियों पहले, तो वे या तो खदेड़ दिए गए या यहीं समा लिए गए; स्कंदगुप्त ने हूणों को सीमा पर ही तोड़ दिया था। एक समय था जब यह भूमि किसी आक्रमण का उत्तर दे सकती थी। सहस्राब्दी के मोड़ के बाद जो बदला, वह यह कि हार अपवाद न रहकर नियम बन गई। यही वह बदलाव है जिसे समझाया जाना ज़रूरी है।

अंग्रेज़ों के रहते जापानी चेन्नई तक बम गिरा गए, अंडमान‑निकोबार और बर्मा की तरफ़ से भी यह दबाव हम जानते हैं। एक्सिस राष्ट्रों ने तो नक़्शे पर उपमहाद्वीप के बीच अपनी लकीर पहले ही खींच ली थी, पश्चिम का हिस्सा जर्मन अधीन, पूर्व का जापानी; भारत का बँटवारा बर्लिन और टोक्यो में तय हो चुका था, और इसमें भारत से पूछने का तो सवाल ही नहीं था। आज़ादी के बाद भी चीन सीमा में घुस आया और ज़मीन हड़प कर चला गया।

कोई चीज़ एक बार हो, दो बार हो तो आप कह सकते हैं, संयोग है। कोई चीज़ हज़ार साल तक लगातार हो तो क्या वह संयोग कहलाएगी, या उसके पीछे कोई गहरी संरचना होगी? इतने अलग‑अलग दिशाओं से, अलग‑अलग राष्ट्रीयताओं के लोग बार‑बार आते रहें और हमें हराते रहें, यह केवल दूसरों की चालाकी का मामला नहीं हो सकता। इसके पीछे कोई ढाँचागत कारण है, कोई आंतरिक दुर्बलता है, जो हमें हमेशा शिकार बनने पर विवश करती रही।

और उससे भी बड़ा प्रश्न यह है, जो कारण हज़ार साल तक मौजूद रहा और हमें ग़ुलाम बनाए रखता रहा, क्या वह अस्सी‑पचहत्तर साल में पूरी तरह चला गया होगा? सन् 1947 से अब तक सौ साल भी नहीं बीते। जो चीज़ हज़ार साल तक टिक सकती है, वह इतनी जल्दी कैसे गायब हो जाएगी? अगर वह आज भी मौजूद है, तो ख़तरा आज भी बराबर का है, तलवार अभी भी सिर पर है।

हमें यह कहना बड़ा अच्छा लगता है कि अंग्रेज़ आ गए, हम तो भोले‑भाले लोग थे, उन्होंने फूट डालकर हम पर राज कर लिया। लेकिन फूट इतनी आसानी से कहाँ डाली जा सकती है? जहाँ सत्य होता है, जहाँ प्रेम होता है, जहाँ धर्म होता है, वहाँ इतनी सहूलियत से फूट नहीं डाली जाती।प्लासी की लड़ाई सीधे‑सीधे घूस देकर जीती गई। यह लड़ाई जीती हुई नहीं, खरीदी हुई मानी जाती है, अंग्रेज़ों ने सचमुच, जैसा कहा गया है, “द ब्रिटिश बॉट द बैटल ऑफ़ प्लासी।” जिसने अपने ईमान, अपने धर्म, अपने राष्ट्रहित को रिश्वत के बदले बेच दिया, वहाँ फूट बाहर से नहीं, भीतर से आई थी। बक्सर की लड़ाई में तीन भारतीय राजा अंग्रेज़ों के विरुद्ध एक साथ खड़े थे, पर उनके बीच स्वार्थ, मनमुटाव और परस्पर अविश्वास इतना था कि वे सचमुच एक नहीं हो सके। तीनों ही अपना‑अपना स्वार्थ देख रहे थे, राष्ट्र, धर्म, सत्य से किसी को मतलब नहीं था। अंग्रेज़ों ने फिर हराया, और हम आज भी कहते हैं, उन्होंने फूट डालकर जीत ली। जबकि सच यह है कि जहाँ लोकधर्म का स्वार्थी अहंकार बैठा हो, वहाँ फूट डालना किसी बाहरी के लिए बहुत आसान होता है।

और यह बात साफ़ कह देना ज़रूरी है, आगे जो आता है उससे पहले: यह किसी बाहरी की शिकायत नहीं है। इसी भूमि ने उपनिषद रचे; इसी ने, सबसे पहले, यह पूछा कि पूछने वाला कौन है। इसकी हवाओं में आज भी उन ऋषियों की स्मृति है जो किसी प्रश्न से नहीं डरते थे और किसी डर को नहीं पूजते थे। पीड़ा ठीक यही है कि जो सभ्यता कभी आत्म‑जिज्ञासा के शिखर पर खड़ी थी, उसने कहीं रास्ते में प्रश्न की आग से ज़्यादा कर्मकांड का आराम चुन लिया। जिससे प्रेम न हो, उसका शोक कोई नहीं करता। आगे जो है, वह शोक है, उपहास नहीं। तो इसका कारण क्या है? राजनैतिक तो नहीं हो सकता, कोई राजनैतिक कारण इतने दिनों तक नहीं टिकता। संयोगी नहीं हो सकता, यह हम देख चुके। वह कारण सांस्कृतिक है, कोई ऐसी चीज़ जो दुर्भाग्यवश भारत की हवाओं में घुल गई है और संस्कृति बनकर बैठ गई है, जिसे हम पवित्र मानकर उससे चिपके हुए हैं।

मैं उसे लोकधर्म कहता हूँ। लोकधर्म कोई बाहर की शक्ति नहीं; यह हमारा अपना अहंकार है, जो रीति, परंपरा, रिवाज़ और कल्पना की शक्ल में जमकर बैठ गया है। यह वो धर्म जैसा दिखने वाला ढाँचा है जो श्रुति से कटे हुए स्मृति‑ग्रंथों, पुराणों और कर्मकांड पर टिका है, पर वास्तविक धर्म, उपनिषदों का श्रुति‑धर्म, अद्वैत, सत्य और स्वतंत्रता, से दूर है।

सनातन व्यवस्था में नियम साफ़ है कि स्मृति‑ग्रंथों की वही बात मानी जाएगी जो श्रुति से मेल खाती है। जो बात श्रुति से मेल नहीं खाती, उसे अस्वीकार करना पड़ता है। लोकधर्म श्रुति से अनभिज्ञ है, वह पुराणों, जाति‑क्रम, कर्मकांड और लोक‑मान्यताओं को ही अंतिम सच मान बैठा है। जिसके धर्म की जड़ ही कल्पना और डर में हो, वहाँ तथ्य की, प्रश्न की, स्वतंत्र विचार की क्या कीमत होगी, यह देखना ज़रूरी है।

ग़ुलामी की सदियों को सबसे ऊँचे स्वर में गिनने वाले अक्सर उसी लोकधर्म के सबसे निष्ठावान रखवाले होते हैं, जिसने वह ग़ुलामी लाई। वे आक्रांता से बदला लेंगे, और जिस दुर्बलता ने उसे न्योता दिया, उसी को पूजते रहेंगे। साल गिनना आसान है; मुहूर्त, जाति‑क्रम और कुंडली पर प्रश्न उठाना, यही है जो किसी का अहंकार होने नहीं देता।

जातियों के आधार पर बुरी तरह खंडित एक ऐसा समाज, जहाँ हथियार उठाना महज़ चंद लोगों का जन्मसिद्ध अधिकार घोषित कर दिया गया, वह पूरे समाज का साझा कर्तव्य कभी नहीं बना। एक बड़े वर्ग को हिदायत दे दी गई: तुम केवल सफ़ाई करो, मज़दूरी करो या खेत जोतो; राष्ट्र की रक्षा तुम्हारा धर्म नहीं। हर जाति के लोग लड़े ज़रूर, जब‑जब सेनाओं को उनकी ज़रूरत पड़ी, पर समाज ने उन्हें यह कभी नहीं बताया कि देश की रक्षा उनका अपना पवित्र दायित्व है। लड़ना अधिकांश के लिए नौकरी बना रहा और कुछ के लिए जन्मसिद्ध हक़; धर्म वह लगभग किसी के लिए नहीं बना। जिस भूमि में रक्षा साझा कर्तव्य न होकर एक जाति का पेशा हो, वहाँ रक्षा हमेशा भाड़े के लोग ही करेंगे, और भाड़े के लोग ख़रीदे जा सकते हैं। प्लासी ने दिखा दिया कि भाड़े के लोगों की क़ीमत क्या होती है। और जब जनसंख्या के अधिकांश हिस्से को सैनिक, वैज्ञानिक, नीतिनिर्माता बनने के अधिकार से ही बाहर कर दिया गया हो, तो सेना में सबसे काबिल लोग कहाँ से आएँगे? जहाँ योग्यता के आधार पर व्यवस्था ही नहीं, वहाँ राष्ट्र का बल कैसे जमेगा?

हम कहते हैं कि श्रीकृष्ण हमारे आदर्श हैं। आदर्श का अर्थ होता है कि जैसे वे जिए, वैसे हम जिएँ; जो उन्होंने कहा, उसे समझें, मानें, जीवन में उतारें। अगर यह सच होता, तो गीता हमारे जीवन में उतर चुकी होती।

गीता रणक्षेत्र में कही गई है, वहीं जहाँ निर्णय जीवन‑मृत्यु, जीत‑हार, सिंहासन और साम्राज्य के बीच होता है। गीता कहती है, युद्धस्व। जीत‑हार की चिंता नहीं; सिंहासन की परवाह नहीं; पर जो सही है, वह कर, निष्काम होकर कर। धर्म के लिए जूझना है, परिणाम की फ़िक्र किए बिना।जिसने सचमुच गीता को अपने जीवन में उतारा होगा, वह युद्ध में इतनी आसानी से हल्का कैसे पड़ जाएगा? वह कहेगा, मर सकते हैं, पर हार नहीं मानेंगे; मुट्ठी भर लोगों को अपने ऊपर छा जाने नहीं देंगे। पर यह तभी कहा जा सकता है जब भीतर धर्म मौजूद हो। पीड़ा अपमान नहीं है; हर जाति, हर राष्ट्र पीड़ा झेलता है। अपमान है प्रतिरोध छोड़ देना, क्योंकि पीड़ा का प्रतिरोध ही इस बात का चिह्न है कि भीतर कुछ अब भी ग़ुलामी से इनकार करता है। भारत की विफलता यह नहीं थी कि उसने हज़ार साल पीड़ा झेली, बल्कि यह कि उसने बार‑बार उस पीड़ा से समझौता कर लिया, उसके लिए मुहूर्त ढूँढ़ लिया, कर्मकांड ढूँढ़ लिया, एक नियति ढूँढ़ ली। हमने इतनी आसानी से हार मान ली, क्योंकि भीतर ही भीतर हम जानते थे कि हमारे जीवन में धर्म तो वैसे भी मौजूद नहीं है।

हम धार्मिक देश नहीं हैं; हम लोक‑धार्मिक देश हैं। हमने धर्म के नाम पर डर, अंधविश्वास, विभाजन और स्वार्थ को मान लिया, इसलिए हमें अपनी हार स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं हुआ। यही भीतर की बेईमानी है, जो तथ्य से मुँह चुराती है और प्रश्न से डरती है।

लोकधर्म, ज्ञान और नई गुलामी

जिस काल में यूरोप की ताक़तें समुद्र में अपनी ठीक‑ठीक स्थिति खोज रही थीं, उस काल में भारत क्या कर रहा था? समुद्र में अपनी जगह जानने के लिए लैटिट्यूड और लाँगीट्यूड दोनों चाहिए। लैटिट्यूड तो सूझ‑बूझ और सरल यंत्रों से मिल जाता था; लाँगीट्यूड नहीं मिलता था, और उसके बिना यह पता ही नहीं चलता था कि आप हैं कहाँ। इसे हल करने के लिए उन्होंने वर्षों शोध किया, जानें गँवाईं, और अंततः वह यंत्र बनाया जो समुद्र में सही लाँगीट्यूड बता सके, ग्रीनविच जैसी प्रयोगशालाओं की मेहनत का परिणाम। यही यंत्र उन्हें भारत तक पहुँचाने में सहायक बना।

जब वे ऐस्ट्रॉनमी में तेजी से आगे बढ़ रहे थे, तब भारत ऐस्ट्रॉलॉजी, मुहूर्त और घंटा‑घड़ियाल में उलझा हुआ था, और आज भी उलझा हुआ है। दुनिया विज्ञान में आगे बढ़ रही है, हम कुंडली निकालने में आगे बढ़ रहे हैं। यह वही ज्योतिष है जिसने हमें पीछे धकेला; भारत ने ऐस्ट्रॉनमी पर ध्यान दिया होता तो इसकी रक्षा‑समर्थता और नौसैनिक शक्ति कुछ और होती।

इसी दौर में यूरोप में रेनैसांस हुआ, विचार की स्वतंत्रता का पुनर्जागरण। वहाँ विश्वविद्यालय खुल रहे थे, शोध के लिए अनुदान बढ़ रहे थे, नई तकनीकें बन रही थीं। यहाँ जनता का पैसा ज़्यादातर मक़बरों, मीनारों, भव्य मंदिरों और कर्मकांड में जा रहा था। पिछले आठ‑दस सौ साल में आपने कितने नए विश्वविद्यालय देखे, कितनी शोध‑संस्थाएँ देखी हैं, यह भी एक प्रश्न है। तारीख़ें याद कीजिए। बोलोन्या में 1088 तक पढ़ाई हो रही थी, ऑक्सफ़ोर्ड में 1096 तक; नालंदा क़रीब 1193 में जला दिया गया, और सात सौ साल तक उसकी जगह कुछ नहीं उठा। आग तो आक्रांता ने एक बार लगाई; पर सदी‑दर‑सदी उसे दोबारा न बनाना, यह भारत का अपना किया था। और यह आदत आज भी क़ायम है: आज भी भारत अपनी जीडीपी का बमुश्किल 0.84 प्रतिशत शोध पर ख़र्च करता है, जबकि चीन 2.6 प्रतिशत और दक्षिण कोरिया पाँच प्रतिशत से भी ज़्यादा।

यूरोपीय ताकतों की बंदूकें, जहाज़, वाहन, त्रिकोणमिति, कार्टोग्राफी, सब हमारी तकनीक से बहुत आगे थे। बुद्धि भारतीयों की कम नहीं, बुद्धि पर लोकधर्म चढ़ा हुआ है। पैसा विश्वविद्यालयों, प्रयोगशालाओं, शोध में जाने के बजाय कर्मकांड, चढ़ावे और दिखावे में गया। जहाँ ज्ञान की कद्र नहीं, वहाँ गुलामी नहीं आएगी तो और क्या आएगी।

एक नाम आपने सुना होगा, मैकॉले। अंग्रेज़ों के ज़माने का। उसने एक ऐसा व्यंग्य किया कि उसकी चोट आज भी महसूस होती है। उसने कहा था कि इस देश की भाषाओं में किसी भी विषय पर एक भी ऐसी किताब नहीं जो यूरोप की अपनी किताबों के आगे ठहर सके। हमारे ऐस्ट्रॉनमी और ऐस्ट्रॉलॉजी पर उसने हँसी उड़ाई, कहता था कि भारत के वैज्ञानिक स्तर पर इंगलैंड की बोर्डिंग स्कूल की लड़कियाँ भी हँसेंगी।

हमारी चिकित्सा पर उसने तंज किया कि जिसे यहाँ दवा‑दारू कहा जाता है, उसे इंगलैंड का एक लुहार भी सुने तो कहेगा, यह क्या है? एक लुहार तक को तुमसे ज़्यादा ज्ञान है। हमारे भूगोल पर उसने हँसी उड़ाई कि यहाँ पढ़ाया जाता है कि कहीं शीरे के सागर हैं, कहीं मक्खन के। वह अपमान कर रहा था, और अपमान करने का हक़ उसे थमा दिया गया था। पर क्या हम इनकार कर सकते हैं कि हमने अपनी दुर्दशा ख़ुद कर रखी थी, इसीलिए किसी बाहरी को हम पर व्यंग्य करने का हक़ मिल गया? मैकॉले ने जानबूझकर लड़कियाँ कहा, यह दिखाने के लिए कि इंगलैंड में लड़कियाँ भी इतना पढ़ती हैं कि तुम्हारे बड़े‑बड़े पंडितों और वैद्यों से ज़्यादा जानती हैं।

आज भी नई पीढ़ी, स्त्री‑पुरुष सभी, ज्योतिष ऐप्स पर जा‑जाकर कुंडली बनवा रही है। भारत में स्त्रियों की लेबर फोर्स में भागीदारी आज भी चीन से बहुत नीचे है, और शहरों में, जहाँ न खेत का बहाना है न खलिहान का, बमुश्किल हर पाँच में से एक शहरी महिला ही श्रम‑बल में है। वहाँ महिलाएँ निकलकर काम कर रही हैं, राष्ट्र बना रही हैं, यहाँ बड़ी संख्या में महिलाएँ रसोई और बिस्तर के भीतर कैद हैं, परिवार निर्माण में लगी हैं, राष्ट्र निर्माण में नहीं। जब एक देश के पचास फ़ीसदी नागरिकों को आप घरेलू कैद में रख देते हैं और दूसरा राष्ट्र अपनी स्त्रियों‑पुरुषों सबको मैदान में उतार देता है, तो आगे कौन निकलेगा, यह पूछने की ज़रूरत नहीं।

मैकॉले मर नहीं गया; मैकॉले आज भी ज़िंदा है। वह हज़ार तरीकों से आज भी हम पर व्यंग्य कर रहा है, और यह हक़ उसे, बहुत अफ़सोस की बात है, हमने ही दिया है।

गुलामी केवल ज़मीन पर कब्ज़ा करके होती हो, ऐसा भी नहीं है। पहले यह होता था कि किसी को ग़ुलाम बनाना है तो उसकी ज़मीन पर चढ़ जाओ, उसकी राजसत्ता पर कब्ज़ा कर लो। आज आप दौलत के निकास, सौदे, व्यापारिक संधियों, सेवाओं की आउटसोर्सिंग और ज्ञान‑तकनीक की असमानता से भी किसी समाज को अधीन कर सकते हैं।

जब भारत राजनीतिक रूप से अधीन था, तब हम जानते हैं कि दौलत का भारी निकास हुआ था। आज राजनीतिक अधीनता नहीं, पर दौलत का निकास आज भी हो रहा है, बाक़ायदा समझौतों और सौदों के ज़रिए। विकसित देश प्रति‑व्यक्ति के मान से कई गुना ज़्यादा अमीर हैं, उत्पादन का गंदा और प्रदूषित हिस्सा अक्सर विकासशील देशों में होता है। यूरोप की फ़ैक्ट्री और सेवाएँ जितना उत्सर्जन दिखाती हैं, उसमें वह उत्सर्जन शामिल नहीं होता जो उन्होंने कहीं और करवाया है। जब उसे जोड़ते हैं, तो यूरोप का असली कार्बन फ़ुटप्रिंट उसके अपने बहीखातों से कहीं आगे बढ़ जाता है; उसके कुछ देशों में तो उपभोग का आधा या उससे ज़्यादा फ़ुटप्रिंट किसी और की ज़मीन पर पैदा होता है। गंदा काम दूसरे देश करेंगे, धुआँ और प्रदूषण वहाँ झेलेंगे, और साफ‑सुथरा माल यूरोप के नागरिक उपयोग करेंगे। यह है नई किस्म की गुलामी।

पहले गुलामों को जहाज़ों में बेड़ियों में भरकर ले जाया जाता था। आज आप एम्बेसी में लाइन लगाकर वीज़ा लेते हैं, ख़ुद को दास की तरह पेश करते हैं, दास हाज़िर है मेरे आका, बताइए क्या सेवा करूँ। आप उनकी अर्थव्यवस्था में टैक्सी चलाते हैं, कम स्तर के काम करते हैं, वे उच्च-स्तरीय कार्य, शोध, नई तकनीक और नए ज्ञान का सृजन करते हैं। हम बर्तन घिसते हैं, वे इतिहास लिखते हैं।

भारत के पास कच्चे तेल और कुछ रेयर अर्थ मटीरियल को छोड़कर बहुत कुछ है, फिर भी अहम तकनीकों के लिए हमें आज भी दूसरों का मुँह ताकना पड़ता है। रक्षा‑तकनीक के सबसे केन्द्रीय इंजन, फ़ाइटर जेट के इंजन तक हम आयात करते हैं। अपना इंजन बनाने की परियोजना 1989 में मंज़ूर हुई थी; दो हज़ार करोड़ रुपये से ज़्यादा और साढ़े तीन दशक बाद भी, ऐसा कोई इंजन नहीं जो किसी फ़ाइटर को उड़ा सके, और तेजस एक अमेरिकी इंजन के भरोसे उड़ता है। दुनिया सिक्स्थ जनरेशन फ़ाइटर जेट पर पहुँच रही है, हमारे पास फ़ोर्थ जनरेशन का भी अपना इंजन नहीं। जिस इंजन में ईंधन जाएगा, वह ईंधन भी आयातित है। युद्ध शुरू होगा और किसी दिन आपूर्ति रोक दी गई, तो हम क्या करेंगे।

एआई हमारे सामने एक बड़ा मौका बनकर आई थी; वह मौका भी लगभग हमने गंवा दिया। अत्याधुनिक मॉडल अमेरिका और चीन ने बनाए; दुनिया के अग्रणी एआई मॉडलों में से एक भी भारत से नहीं आया। हम लोकधर्म के कहने पर सुरक्षा के खोल में दुबके रहे, रिस्क लेने से, नए प्रयोग से डरते रहे।

खेती में भी यही हाल है। हम खुद को कृषि‑प्रधान देश कहलाने पर गर्व करते हैं। और इस क्षेत्र में हमारी असल उपलब्धियाँ क्या हैं? भैंस के मांस, यानी कैराबीफ़, के निर्यात में हम दुनिया के सबसे बड़े देशों में गिने जाते हैं, और हमारे शहर दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में ऊपर भरे पड़े हैं। बड़े इनोवेशन अक्सर कहीं और हुए हैं: इज़राइल ने बंजर ज़मीन पर नए तरीकों से खेती के मॉडल बनाए, धान उगाने की जापानी विधि ने खेती की समझ बदल दी। भारत में पूसा जैसे संस्थानों ने नई किस्में और बीज ज़रूर दिए हैं, पर बड़े ब्रेकथ्रू बहुत कम हैं। यह सब हमने स्वयं अपने साथ किया है, यह किसी और की साज़िश नहीं है।

लोकधर्म हमें खतरे नहीं उठाने देता; हमें जोखिम लेने से रोकता है। वह कहता है, जैसा सबने करा है, तू भी वही कर; जो पीछे से चला आ रहा है, वही श्रेष्ठ है; उसे दोहराते रहो। जब जीवन का सेंट्रल निर्देश ही नकल हो, तो सृजन कहाँ से आएगा।

एआई हो, रक्षा‑तकनीक हो, कृषि हो, विश्वविद्यालय हों, हर जगह हमारी तयशुदा प्रतिक्रिया यह है कि कोई और करे, हम उसकी नकल कर लें, लाइसेंस ले लें, ख़ुद क्यों बनाएँ। यही हमारी राष्ट्रीय आदत बन गई है। लोकधर्म का सुर कहता है, सुरक्षा सबसे बड़ी बात है; जैसे अतिसुरक्षात्मक माँ होती है, बच्चे को बाहर जाने से रोकती रहती है, पल्लू के नीचे छुपा लेती है। ऐसा समाज अपने युवाओं, अपने वैज्ञानिकों, अपनी स्त्रियों को प्रयोग की छूट नहीं देगा, तो तेजस्वी राष्ट्र कैसे बनेगा।

इन दिनों एक ख़बर आई थी, मध्य प्रदेश के एक मंदिर में स्वतंत्रता दिवस का धार्मिक आयोजन 15 अगस्त को नहीं, 11 अगस्त को हुआ, क्योंकि मंदिर के पंचांग के हिसाब से स्वतंत्रता की सच्ची तिथि उसी दिन पड़ती थी। एक ओर कैलेंडर का तिरंगा, दूसरी ओर मुहूर्त का तिरंगा। और यह कोई गाँव की सनक भर नहीं है; देश के अपने शेयर बाज़ार हर दिवाली एक विधिवत मुहूर्त ट्रेडिंग सत्र के लिए खुलते हैं, राष्ट्र का आर्थिक हृदय अपना बहीखाता पंचांग से बैठाता है। यही तो हमारी दशा है। ट्रेन भले ही शाम सात बजे आती हो, पर आप स्टेशन रात दस बजे जाएँगे, क्योंकि आपका हिसाब‑किताब कहेगा कि अब मुहूर्त है।

15 अगस्त तथ्य है, इतिहास है। पर तथ्यों के लिए हमारे पास कोई सम्मान ही नहीं है। मेरी धारणा, मेरी मान्यता, मेरी कल्पना, मेरा ज्योतिषी, मैं उसी पर चलूँगा। जो देश तथ्य को कीमत नहीं देता, वह ज्ञान को कीमत नहीं देगा; और जो ज्ञान को कीमत नहीं देता, उसकी परतंत्रता में कोई अचरज नहीं।

आज की युवा पीढ़ी भी ज्योतिष से जुड़े मोबाइल ऐप्स पर घुसी हुई है; हज़ारों करोड़ का बाज़ार इन ऐप्स का घूम रहा है। वही ज्योतिष जिसने हमें अतीत में पीछे धकेला, वही आज भी हमारे भीतर बैठे डर और अहंकार को पोस रहा है। लोकधर्म आज भी हावी है; उसकी पकड़ कम नहीं हुई, बदलकर नई शक्लों में सामने आई है।

स्वतंत्रता नहीं, सतर्कता का दिन

तो इस स्वतंत्रता दिवस पर मेरा निवेदन बस इतना है, उत्सव मना लेने के बाद की इस शांति में एक बार नज़र भीतर घुमाइए। क्योंकि जो तलवार हज़ार साल हमारे सिर पर लटकी रही, वह अभी हटी नहीं है। ख़तरा बराबर का है, ख़तरा अभी बाक़ी है, और उस ख़तरे का कारण आंतरिक है। सबसे बड़ा दुश्मन हमारे ही भीतर बैठा है, यहाँ बग़ल के घर में नहीं, हमारे ही दिल में, हमारे ही लोकधर्म में।

वह बाहर से नहीं आएगा; वह भीतर की उस बेईमानी में है जो तथ्य से मुँह चुराती है, प्रश्न से डरती है, श्रुति को छोड़कर कल्पना पर चलती है, ज्ञान की जगह कर्मकांड पर निवेश करती है, और आधी आबादी को रसोई में कैद रखकर गर्व करती है।

इसीलिए, स्वतंत्रता का यह उत्सव भले एक दिन का हो, पर सतर्कता का कोई एक दिन नहीं होता। उत्सव अपनी जगह है; सतर्कता आज से और उसके आगे भी। यह किसी घोषित परिणाम की बात नहीं, किसी विजय‑तमगे की बात नहीं; यह एक दिशा का संकेत है।

संभल जाइए, चेत जाइए। बाक़ी, दिशा भीतर की है, मंज़िल की कोई घोषणा नहीं। स्वतंत्रता को उत्सव की तरह नहीं, उत्तरदायित्व की तरह जीना होगा; नहीं तो तलवार सिर पर ही रहेगी, और अगली गुलामी पुरानी से अलग, पर उतनी ही घातक होगी।

Originally published in Navbharat Times on 15 August '26

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
Comments
LIVE Sessions
Experience Transformation Everyday from the Convenience of your Home
Live Bhagavad Gita Sessions with Acharya Prashant
Categories