स्वाभिमान' से बेकार कोई शब्द नहीं || आचार्य प्रशांत, वेदांत पर (2021)

आचार्य प्रशांत: तुम जो कुछ भी सोच रहे हो उसको सत्य मत मान लेना। तुम्हारी बड़ी दुविधा है, हम बहुत फँसे हुए लोग हैं। हम जो सोच रहे हैं उसके अलावा हमें कुछ पता नहीं होता। साथ-ही-साथ मैं कहे रहा हूँ, तुम जो सोच रहे हो उसे सच मत मान लेना। इसी चक्की में पिसना है, (दोहराते हुए) इसी चक्की में पिसना है।
जो तुम्हें लग रहा है उसके अलावा तुम्हारा कुछ अनुभव नहीं। जो तुम्हें जिस समय लग रहा होता है तुम्हारे लिए वही सच होता है; ऐसा ही है न? हमारे अनुभव ही हमारे लिए सत्य हो जाते हैं, ठीक है न? और मैं कह रहा हूँ, अनुभवों को सत्य मान नहीं लेना है।
इसी संघर्ष में लगातार लगे रहना है। ‘तो आचार्य जी, आपने तो बड़ा पिसाने वाला काम बता दिया’। “दो पाटन के बीच में साबुत बचा ना कोई”। यही तो बात है, इसी चक्की में पिसकर के मुक्त हो जाओगे।
एक तरफ़ है विचार और भावनाएँ; जो आ रही हैं, प्रकृति से। उनसे तुम इनकार नहीं कर सकते क्योंकि वो है, यहाँ है (शरीर में)। और दूसरी ओर उनको तुम हामी भी नहीं भर सकते क्योंकि तुम्हें अच्छी तरह पता है कि तुम प्रकृति से परे हो। तुम्हें इस शरीर में रहकर के भी इस शरीर से पराया होना है। ये बड़ी तपस्या कि बात है, इसी को तो मैं कह रहा हूँ; ‘चक्की के दो पाट हैं, उनमें तुम फँसे ही हुए हो, न तुम इधर के हो सकते हो न उधर के हो सकते हो, तुम बीच के हो’।
एक तरफ़ है प्रकृति और एक तरफ़ है आत्मा। न तुम पूरे तरीक़े से शरीर हो सकते हो, न तुम पूरे तरीक़े से विशुद्ध चैतन्य हो सकते हो। लेकिन हार नहीं माननी है, घुटने नहीं टेक देने है और घुटने टेके एक ही दिशा में जाते हैं कि तुम कहे दो कि चलो मैं अपनेआप को प्रकृति ही मान लेता हूँ।
घुटने कभी कोई ऐसे नहीं टेकता कि वो विशुद्ध चैतन्य हो गया। तो शरीर जो है वो उम्र भर सताता रहेगा और साथ-ही-साथ तुमको समर्पण की शर्तें बताता रहेगा। वो कहेगा, नहीं सताऊँगा, बस घुटने टेक दे। (दोहराते हुए) नहीं सताऊँगा घुटने टेक दे। तू नहीं सोएगा; मैं तुझे सताऊँगा, घुटने टेक दे; मैं तुझे आराम दिलाऊँगा, तू घुटने टेक दे। घुटने नहीं टेकने है बस!






