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सुधरने लगी हूँ तो लोग चिढ़ने लगे हैं || आचार्य प्रशांत (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: देखिए! जिससे जो सुख मिल रहा है, उसको पकड़े-पकड़े आप उससे मिलने वाले सुख से, दुख से मुक्त नहीं हो पाएँगे। दोहराऊँ? जिससे जो सुख मिल रहा है, उस सुख को पकड़े-पकड़े उससे जो दुख मिलता है उससे नहीं छूट पाएँगे। आप कह रही हैं कि आप अगर उनको कुछ समझाती हैं तो वो प्रतिक्रिया करते हैं, लड़ाई-झगड़ा।

उन्हें कैसे लगता है कि उन्हें हक है आपसे ज़ोर से, चिल्लाकर, हक के साथ धमका कर बोल देने का? वो हक उनको किसने दिया? वो हक उन्हें कौन दिये जा रहा है? और हम किसी को अपने जीवन पर अधिकार यूँ ही तो नहीं दे देते, उनसे कुछ लाभ मिल रहा होगा तो ही उन्हें अधिकार दे रखा है। उनसे आपको जो भी लाभ मिल रहा है सबसे पहले आप उससे हाथ धोइए। नहीं? और ये तो बात मात्र अध्यात्म की ही नहीं है, नैतिकता की भी है। किसी में अगर आपको दोष दिख ही गया है, तो सबसे पहले उससे मिलने वाले लाभ को रोकिए। नहीं?

आपका एक पड़ोसी है साहब, वो आए दिन आपको तोहफ़े देता रहता है। ठीक है? मस्त तोहफ़े देता है जैसे कि आमतौर पर कोई पड़ोसी देता नहीं, कभी कुछ, कभी कुछ। महँगे तोहफ़े। और आपको एक दिन पता चल जाता है कि ये सब काली कमाई के हैं। ये आदमी जो बगल में रहता है, घूसखोर है या अंडरवर्ल्ड से है, कुछ और है, जो भी है, उसकी कमाई गड़बड़ है। अब आप चाहते हैं कि उसको रोकें, या आप चाहते हैं कि उसकी पुलिस में शिकायत करें।

तो पहला आपका दायित्व क्या है, ये बताइए? पहली चीज़ आपको क्या करनी चाहिए? भविष्य में तो नहीं ही करेंगे, उससे पहले एक चीज़ और करनी होगी। जो अभी तक लिया है सबसे पहले वापस देकर के आइए। वरना तो ये बात ही बड़ी अनैतिक हो गयी न? कि जिसकी काली कमाई के तोहफ़े ले रखे हैं अब उसी की शिकायत पुलिस से करने जा रहे हो। सबसे पहले तो लौटा कर आइए।

और बात पुलिस को शिकायत ही करने की नहीं है, अगर आप उसको जाकर के कुछ समझाना भी चाहते हैं, तो समझाने की शुरुआत भी ऐसे ही होनी चाहिए, कि उसके दरवाज़े पर दस्तक दें, अन्दर जाएँ, बैठें, और बैग एक उसकी मेज़ पर रख दें, उस बैग में क्या होने चाहिए? वो सारे तोहफ़े जो उसने आपको दिये थे। वो सारे उसकी मेज़ पर रख दें। कहें, ये हमें आपको लौटाने हैं और आपके भले के लिए आपसे दो बातें करनी हैं।

कुछ लौटाया क्या अभी तक? लौटाना बहुत ज़रूरी है। अब आप कल्पना करिए कि उसने आपको जो कुछ दिया है आपने ले ही नहीं रखा है अभी आप में छुपी हुई उम्मीद ये भी है कि आगे भी कुछ मिल जायेगा। और इसके बाद आप पहुँच गए उसको ज्ञान देने, कि देखो वत्स, काली कमाई काम नहीं आती।

वो तो मुस्कुरा कर बस इतना कहेगा कि अरे! बाकी सब तो बातें ठीक हैं, ये मैं आपके लिए आज एक अँगूठी लाया हूँ, शाम को आपको देने ही आ रहा था, आप पहले ही आ गयीं। और आपके मुँह को वो अँगूठी से भर देगा। मुँह पर अँगूठी का ताला लग गया। अन्दर-ही-अन्दर वो मुस्कुरा रहा है, वो कह रहा है कि अगर आपको वाकई बुरी लगती होती मेरी कमाई, तो सबसे पहले आपने यहाँ पर आकर उसे लौटा दिया होता।

ये बाधा हम सबको आती है जब भी हम किसी को समझाने या परिवर्तित करने के लिए निकलते हैं। आपमें से बहुत लोग बोलते हैं, सबका यही कहना है। कि हमें कुछ बात समझ में आ गयी है, दोस्तों को बताते हैं, माँ-बाप को बताते हैं या पति-पत्नी को बताते हैं। वो सुनने को राज़ी नहीं होते। वो कैसे सुनने को राज़ी हो जाएँगे? देखिए, क्रमशः समझिए।

अगर आपको बात समझ में आयी होती, तो समझ में आने का प्रमाण क्या होता है? जीवन बदलता है। अगर जीवन बदला होता तो आपका उस व्यक्ति से रिश्ता भी बदला होता। रिश्ता बदलने का प्रमाण क्या होता है? कि रिश्ते में जो लेन-देन चल रहा है वो बदल गया होता। आप उससे जो ले रहे हैं, आप उसको जो दे रहे हैं, वो चीज़ बदल गयी होती। तो माने अगर आपको बात समझ में आयी होती, तो आप उस व्यक्ति से जो लेन-देन करते हैं वो बदल गया होता।

वो व्यक्ति एक बात भली-भाँति जान रहा है अपने अनुभव से, क्या? कि आप अभी भी उससे वो चीज़ें लिए ही जा रहे हैं जो आप हमेशा से लेते थे। ले वही सबकुछ रहे हो जो हमेशा से लेते थे लेकिन उसके सामने खड़ा होकर दावा क्या कर रहे हो? हमें तो उपनिषद समझ में आ गये हैं, हमारी तो ज़िन्दगी बदल गयी है।

वो मुस्कुरा रहा है भीतर-ही-भीतर, वो कह रहा है कितनी तुम्हारी ज़िन्दगी बदल रही है हम जानते हैं न। तुम अभी भी हमसे वही सारे लाभ उठा रहे हो, जो पहले उठाते थे। तुम्हारी ज़िन्दगी बदली होती तो हमारा-तुम्हारा रिश्ता नहीं बदला होता? वो तो बदला ही नहीं।

इसलिए आप किसी को भी बदलने में सफल नहीं हो पाते, क्योंकि लेन-देन बराबर जारी है। और देन जारी रहे तो उसमें भी आपत्ति नहीं, ये लेन क्यों जारी है? चलो किसी को कुछ दे रहे थे, निस्स्वार्थ भाव से अभी भी देते रहो, ले क्यों रहे हो?

कोई नहीं किसी पर चिल्ला सकता, कोई नहीं किसी पर हक जमा सकता, कोई नहीं किसी पर हाथ उठा सकता, आपने कभी-न-कभी अधिकार उसको दिया है और अधिकार तो हमेशा खरीदा ही जाता है। उसने अधिकार खरीदा है आपसे, कुछ आपको देकर के। क्यों बेच देती है इतनी आसानी से?

कुछ अधिकार ऐसे होते हैं जो सब ओंगो-पोंगो को नहीं बेचने चाहिए। आपको डाँट सके ये हक बस किसी बहुत हकदार आदमी को ही देना चाहिए। आपको दो बातें सुना सके, आपको अनुशासित कर सके, आपको सीख दे सके, इसका अधिकारी जो हो उसको ही हक दें, योग्यता देख करके।

पर हम योग्यता नहीं देखते, हम जेब देखते हैं। और जेब से मेरा आशय सिर्फ़ रूपया-पैसा नहीं है। रूपया-पैसा स्थूल जेब होती है, भाव इत्यादि इमोशन्स, ये सूक्ष्म जेब होते हैं। जिससे आपको फाइनेन्शियल सपोर्ट (आर्थिक सहायता) मिल रहा हो और जिससे आपको इमोशनल सपोर्ट (भावनात्मक सहयोग) मिल रहा हो। ले-देकर के हैं तो आप उस पर निर्भर ही न, चाहे स्थूल तरीके से, चाहे सूक्ष्म तरीके से? बैसाखी आर्थिक किस्म की हो या भावनात्मक किस्म की, बैसाखी, बैसाखी है।

कुछ तो आप उससे ले रही होंगी? अगर आपने वाकई कुछ लाभ लिया है, आप जो भी वीडियोज़ वगैरह देखती हैं, करती हैं, तो बस एक का सहारा लीजिए न, बाकी किसी का सहारा लेना छोड़िए। महिलाओं के सन्दर्भ में ये जो भावनात्मक आश्रयता होती है, ये खतरनाक हो जाती है। आप अगर कमा भी रही हों तो भी कहीं-न-कहीं ये भाव रहता है कि कोई होना चाहिए न मज़बूत कन्धे वाला। ये सूत्र याद रहेगा?

कोई छा नहीं सकता आपके ऊपर जब तक आपने उसे इजाज़त न दी हो। और जल्दी से ये मत कह दीजिएगा, नहीं हमने तो इजाज़त दी नहीं, वो फिर भी छा रहा है। आपने छुपी-छुपे दे दी होगी। आपने सूक्ष्म लेन-देन कर लिया होगा। और मैं ये बिलकुल नहीं कह रहा हूँ कि आपके ऊपर छाने की इजाज़त बिलकुल किसी को न हो। मैं कह रहा हूँ जो सुयोग्य हो उसको ही दीजिए।

अधिकारी का चयन बड़े विवेक से करिए। हर किसी की बात नहीं सुन लेते। कोई भी लल्लू-पंजू आया, डाँट कर चला गया। ऐसे कैसे? हो कौन तुम? इनको हक है डाँटने का, इनके (सामने रखी बोध-सामग्री की ओर इशारा करके) सामने तो जाइए, भीख माँगिए, गिड़गिड़ाइए कि तुम हमें डाँटो। और बाकी ये सब दुनिया वाले खड़े हो जाएँ तो एक मत सुनिए, कान ही मत दीजिए। समझ रही हैं?

आपने बात करी मीट ईटिंग (माँसाहार) की, लस्ट (हवस) की, जो इन चीज़ों में आपके सहभागी थे, वो हैं इस लायक कि आप उन्हें हक दिये हुए हैं अपने ऊपर चढ़ बैठने का?

अध्यात्म झुकने की, समर्पण की बात बहुत बाद में है, अध्यात्म का मतलब होता है पहले तनना, ऐसे (बाँहों के इशारे से समझाते हुए), बँधी हुई मुट्ठी, विद्रोह, नहीं झुकते, नहीं सुनेंगें, जाओ। ये अध्यात्म है। समर्पण तो आखिरी बात होती है, वो तो उच्चतम के सामने किया जाता है। ज़िन्दगी में हमारी कौन भरे हुए हैं? सब न्यूनतम और निम्नतम, इनके आगे समर्पण कर देना है क्या?

इनके आगे तो तन के खड़े हो जाना है, नहीं सुनते। कर लो जो कर सकते हो, क्या उखाड़ लोगे? समझ रही हैं? और नहीं तन कर खड़ी हो पाएँगी अगर दूसरों से स्वार्थ का रिश्ता है। ज़रूरतें कम करिए। दूसरों पर निर्भर रहना बिलकुल कम-से-कम कर दीजिए। जितना हो सके दीजिए, दुनिया को। और अगर दे नहीं सकते तो कम-से-कम लीजिए तो मत। बाँटते चलिए, बटोरते नहीं।

ये बहुत दो अलग-अलग तरीके होते हैं जीने के। एक रूपया न हो हाथ में तो भी बाँटते चलो, खाली जेब से बाँटते चलो, बटोरो नहीं। बटोरते वक्त ऐसे ही लगता है कि कुछ मिल गया। तुम्हें दिखाई ही नहीं पड़ता कि पीछे-पीछे, चुपके से, सूक्ष्म कीमत क्या अदा कर दी है, वो दिखाई नहीं पड़ती। हमें लगता है आज किस्मत अच्छी थी, बटोर लिया।

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