साउंड ऑफ साइलेन्स (Sound of Silence) का झूठ || आचार्य प्रशांत (2021)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम! हमने यूट्यूब पर कुछ प्रश्न आमंत्रित किए थे। उनमें से एक प्रश्न है जो मुझे सबसे ज़्यादा प्रासंगिक लगा है। लगभग पाँच-छ: लोगों ने इसी विषय पर हम से प्रश्न पूछा है। यह प्रश्न द साउंड ऑफ साइलेंस के बारे में है। यह मेडिटेशन (ध्यान) की एक क्रिया है जो आज के समय में बहुत प्रचलित है।
लोग कहते हैं कि जैसे 'अनहद नाद' अद्वैत की जो आवाज़ है उसको आप द साउंड ऑफ साइलेंस कहकर भी आज के समय में परिभाषित कर सकते हो।
तो कई मोटिवेशनल स्पीकर्स (प्रेरक वक्ता) हैं जो ऐसा ध्यान सिखा रहे हैं कि अगर आप अपने कान में कुछ देर इयरप्लग्स लगाकर बैठ जाएँ और बाहर की जितनी भी आवाज़े हैं — जैसे यह एक आवाज़ हो गयी, (दीवार को ठोकते हुए) ताली की एक आवाज़ हो गयी, (ताली बजाते हुए) मैं जो बोल रहा हूँ वह एक आवाज़ हो गयी — बाहर की जितनी आवाजें हैं उनको आप कान में ठेपी लगाकर अगर बंद कर दें, तो आपके मन में एक बहुत धीमी सी, सटल आवाज़ गूँजती रहती है 'शऽऽऽ' जैसे मानो एक वाइट नोइज़ (कोरा निनाद) हो। वह आवाज़ द साउंड ऑफ साइलेंस है, वही अनहद नाद है, वही ब्रह्म है और वही अद्वैत का सत्य है।
इस मेडिटेशन की क्रिया से बहुत लोग बता रहे हैं कि उन्हें डीएडिक्शन (नशामुक्ति) सिगरेट छोड़ने में, अपने मन को शांत करने में और कंसंट्रेशन (एकाग्रता) इत्यादि बढ़ाने में बड़ी मदद हुई है। तो द साउंड ऑफ साइलेंस जो है इसपर आपके क्या विचार हैं? यह मैं जानना चाह रहा था।
आचार्य प्रशांत: (कंधे उचका कर अस्वीकृति में सिर हिलाते हैं) तुम आँख बंद कर सकते हो; तुम्हें तब भी कुछ रोशनियाँ दिखाई देती हैं, उसको तुम बोल सकते हो



