कुछ भी संयोगवश नहीं हो रहा है, अगर गंदगी फैल रही है, टॉक्सिसिटी फैल रही है, बच्चे बर्बाद हो रहे हैं, मिस इंफॉर्मेशन फैल रही है, जनता का मानसिक स्तर गिर रहा है, लोग बेवकूफ़ होते जा रहे हैं और ज़्यादा, वो सबकुछ एक तरह की प्लांड कॉन्सपिरेसी (सुनियोजित षड्यंत्र) है। उसको तोड़ा कहाँ पर जा सकता है? उसको तोड़ा सिर्फ़ ग्रासरूट पर जा सकता है। वही काम आपकी संस्था करने की कोशिश कर रही है कि आम आदमी को जागृत करो, सिर्फ़ उसी तरीके से काम बन सकता है।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हाल ही में ऑस्ट्रेलिया में बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग पर प्रतिबंध लगाने वाला बिल पास हुआ, जिसमें इंग्लैंड भी रुचि दिखा रहा है। यदि भारत में ऐसा कानून लागू होता है, तो इसका बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और शिक्षा पर कैसा प्रभाव देखने को मिलेगा? ऐसे कानून के सकारात्मक प्रभाव होंगे या फिर ये बच्चों के डिजिटल विकास और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में बाधा बन सकता है? क्या ये कानून संतुलन बनाए रखेगा या नई चुनौतियाँ खड़ी करेगा?
आचार्य प्रशांत: देखिए, बहुत सारी चीज़ें हैं जो टेक्नोलॉजी कर सकती है। टेक्नोलॉजी जब बहुत सारा नुकसान कर सकती है, तो टेक्नोलॉजी ये भी कर सकती है कि पता लगाया जा सके कि कौन सोलह साल का है और कौन सोलह साल का नहीं है। तो पूरे तरीके से चौदह, पंद्रह, बारह, तेरह साल वालों को यूज़र जेनेरेटेड कंटेंट से वंचित कर देना ठीक नहीं है।
मॉडरेशन (यूज़र कंटेंट की निगरानी या स्क्रीनिंग करना) की ज़रूरत है, रेगुलेशन (नियमित व नियंत्रित करना) की ज़रूरत है, बैन की ज़रूरत नहीं है। क्योंकि इतना भी बच्चा नहीं होता है बारह साल वाला या पंद्रह साल वाला कि आप कहो कि तुम कहीं कुछ देख ही नहीं सकते। तो ठीक वैसे जैसे हमारे पास अब इतनी बड़ी आबादी हमारे डेढ़-सौ-करोड़ लोग हैं, उसमें से कुछ को छोड़कर बाकी सबको कर पाए न कि आधार दे दिया। और वो अपनेआप में कितनी बड़ी




