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शादी और बलात्कार || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
25 min
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। वर्तमान में एक मुद्दा बहुत ही चर्चा का विषय बना हुआ है कि मैरिटल रेप (वैवाहिक बलात्कार) को अपराध माना जाना चाहिए या नहीं। अभी तक ये अपराध की श्रेणी में नहीं आता है। उच्चतम न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि भारत में अगर मैरिटल रेप को अपराध माना जाएगा तो इससे विवाह की व्यवस्था ख़राब हो सकती है। इस विषय में आपका स्पष्टीकरण चाहती हूँ।

साथ ही, अगर ये कानून भारत में आता है तो, भारत जैसे बड़ी आबादी वाले देश में अगर इसको अमल में लाया जाता है तो इसके दुरुपयोग की संभावना बहुत ज़्यादा बढ़ जाती है। इस विषय में आपका मार्गदर्शन चाहती हूँ, धन्यवाद आचार्य जी।

आचार्य प्रशांत: देखो वही बात है कि कोयले की खदान हो या काजल की कोठरी, उसमें घुस जाओ और फिर शिकायत करो कि तन पर कुछ काला-काला सा लग गया और हमारे साथ बड़ा अत्याचार हुआ है।

आप जिस व्यवस्था में प्रवेश करते हैं विवाहोपरांत, उस व्यवस्था के मूल सिद्धांत या नियम क्या हैं? उसमें तो ये मान ही लिया गया है कि एक का शरीर दूसरे के लिए है, दूसरे का पहले के शरीर पर पूर्ण अधिकार है, संप्रभुता है। ये तो इस व्यवस्था के नियमों में पहले से ही शामिल है और प्रकट भी है; इतना प्रकट है फिर भी आपको पता नहीं था क्या?

न्यायालय स्वयं ही विवाह को लगभग पूरी तरह यौन सम्बन्धों पर आधारित करके परिभाषित करते हैं। कंज़्यूमेशन ऑफ़ मैरिज , माने विवाह की पूर्णता मानी ही तब जाती है जब स्त्री और पुरुष में यौन सम्बन्ध स्थापित हो जाए। और ये कोई मैं सामाजिक या सांस्कृतिक बात नहीं कह रहा हूँ, ये कानूनी बात है।

इतना ही नहीं है, यदि आप न्यायालय के समक्ष ये प्रमाणित कर दें कि पिछले कुछ महीनों से आपका आपके साथी से शारीरिक संबंध नहीं रहा है, साथी की अनिच्छा के कारण — संयोगवश नहीं, साथी की अनिच्छा के कारण — तो ये पर्याप्त कारण माना जाता है आपको तलाक दिलवाने का; न्यायालय स्वयं ही कहता है कि संबंध-विच्छेद अब उचित है क्योंकि आप दोनों में शारीरिक संबंध नहीं है।

न्यायालय ये नहीं पूछता, ‘आप दोनों में भावनात्मक संबंध है अभी? अगर है तो तलाक नहीं हो सकता।‘ न्यायालय ये भी नहीं कहता कि आप दोनों में आर्थिक संबंध है अभी, एक-दूसरे की आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति कर रहे हो तो भी संबंध-विच्छेद नहीं हो सकता। आप दोनों में सौ तरह के और संबंध हो, लेकिन आप शारीरिक संबंध बनाने से इंकार करते हैं तो न्यायालय स्वयं स्वीकृति दे देगा, कि छोड़िए ये तो तलाक हो गया। ये बात आपको शादी करने से पहले नहीं पता है क्या?

आप कह रहे हैं मैरिटल रेप । ठीक है, आपकी इच्छा नहीं है शारीरिक संबंध की, आप अपने साथी को इंकार कर देते हो; आप उसे कितनी बार मना करोगे? आप उसे मैरिटल रेप की घुड़की दे सकते हो, हो सकता है आप स्वयं एक वकील हों — स्त्री हो सकता है कि स्वयं एक वकील हो, वो कह सकती है कि मुझे स्पर्श करा तो मुक़दमा कर दूँगी; पर कितनी बार बोलोगी? बहुत ज़्यादा बार बोल दिया तो वही न्यायालय कहेगा कि तलाक ले लो। न्यायालय कहेगा, 'जब तुमको संबंध रखना ही नहीं है, तो तुम शादीशुदा हो क्यों, चलो तलाक लो,’ ये बात स्वयं न्यायालय कहेगा।

तो ये तो कोयले की खदान है, जैसा आरंभ में ही कहा, जिसमें आप प्रवेश करते हो दूसरे को अपने ऊपर शारीरिक हक देकर के; वो देने में आपको इतनी आपत्ति है तो किसने कहा था कि कूद-कूदकर शादी करो? या क्या सोचा था कि शादी करके हम दोनों अब अच्छे दोस्त बनेंगे, साथ-साथ बैठकर एक ही थाली से खाया करेंगे? एक फ़िल्म में था कि उससे (विवाह से) प्यार बढ़ता है - ये सोचा था? उसके (विवाह के) मूल में बिस्तर है, और कुछ नहीं। आप कितना भी बोलते रहो कि पवित्र रिश्ता, इत्यादि, इत्यादि; वो एक सीमा तक ही पवित्र है, भूलिए नहीं कि उसके आधार में क्या है।

हाँ, कई अन्य प्रकार के रिश्ते हो सकते हैं जो उससे भी ज़्यादा अपवित्र हों, ये मैं बिलकुल मानता हूँ, लेकिन आप कहेंगे कि विवाह का रिश्ता तो अति पवित्र रिश्ता है, तो ऐसी कोई बात नहीं है! ये वो संबंध है जिसमें एक स्त्री और एक पुरुष शारीरिक संपर्क के लिए ही मुख्यतः एकसाथ जुड़ते हैं - ये नंगा सच है, जिसे यदि हम मान लें तो हमारे वैवाहिक जीवन की जटिलताएँ शायद थोड़ी कम हो जाएँगी। जटिलताएँ फिर इसलिए भी कम हो जाएँगी कि आपकी जो उम्मीदें हैं आपके साथी से, वो थोड़ा धरातल पर आ जाएँगी।

एक बार ये आप मानिए कि आप उस दूसरे व्यक्ति से शारीरिक तल पर ही जुड़े हो, उसी का नाम विवाह है, तो कम-से-कम भीतर जो भीतर ये उम्मीद रहती है कि वो मेरा भावनात्मक तल पर खयाल रखेगा, आत्मा से आत्मा का मिलन हो जाएगा, कम-से-कम उस तरह की उम्मीदें तो नहीं रखोगे न; फिर साफ़-साफ़ पता होगा कि एक अनुबंध हुआ है शरीर को लेकर, कॉन्ट्रैक्ट है।

मैं बिलकुल नहीं कह रहा हूँ कि इस अनुबंध में मात्र शरीर ही शामिल है, और भी बातें हैं बिलकुल। उदाहरण के लिए, न्यायालय स्वयं कहता है कि पति को अपनी पत्नी का आर्थिक खयाल भी रखना होगा, और अगर पत्नी कमाती है तो उसको पति का खयाल रखना होगा। इतना ही नहीं, यदि तलाक भी हो जाता है तो उसके बाद भी एलिमनी (निर्वाह निधि) देनी पड़ती है। तो और भी आयाम हैं इस रिश्ते के — आर्थिक आयाम भी है, भावनात्मक आयाम भी है — वो मैं बिलकुल स्वीकार कर रहा हूँ, मैं उन आयामों से इंकार नहीं कर रहा। मैं कह रहा हूँ कि इतना मान तो लीजिए सबसे पहले, कि तमाम अन्य आयामों के होते हुए भी जो मूल बात है वो शारीरिक है।

अगर हममें ज़रा भी ईमानदारी होगी तो हम ये बात मान लेंगे न, या नहीं मानना चाहते? पर हमारे दोगलेपन और पाखंड की कोई सीमा नहीं। जब हम शादी करते हैं तो शायद ही कोई होगा जो कहेगा कि भाई जवानी छा रही है, शारीरिक माँगें हैं, इसलिए हम विवाह करने जा रहे हैं। ख़ासकर महिलाएँ तो बिलकुल नहीं मानेंगी, वो कहेंगी, ‘छि-छि! इतनी गन्दी बात! हम बोल ही नहीं सकते अपने मुँह से!‘ कर सकते हो, बोल नहीं सकते? जीवन-भर यही करते हो, बोला नहीं जाएगा?

बिलकुल होता है कि और भी चीज़ें होती हैं, विवाह के उपरांत एक मित्रता भी स्थापित हो सकती है स्त्री-पुरुष में; और कई चीज़ें हो सकती हैं, होती भी हैं कई बार, लेकिन फिर भी मत इंकार कीजिए कि उसका आधार तो शारीरिक ही है।

विवाह की वेदी पर स्त्री को पता चल जाए कि पुरुष नपुंसक है, विवाह होगा? बहुत बढ़िया बंदा है, अव्वल दर्ज़े का कवि है, उसकी बौद्धिकता बिलकुल असीमित है, किसी ऊँची यूनिवर्सिटी में शोध कर रहा है, लेकिन नपुंसक है; विवाह करेगी स्त्री? या कि पुरुष को पता चल जाए कि ये जो महिला है बगल में, ये फ्रिजिड (उदासीन) है, या इसकी किसी तरह की कोई रुचि नहीं है सेक्स में; विवाह होगा? तो खेल सीधा है न!

और जब इसी आधार पर विवाह होता है, तो अब मुझे बताइए, पुरुष अपनेआप को स्त्री पर बलात् क्यों ना आरोपित करे? फिर आप कहते हैं कि मैरिटल रेप है। पुरुष भी सकते में आ जाता है, कहता है, ‘नहीं, पर शादी तो इसीलिए करी थी ना, अब ये रेप कहाँ से आ गया बीच में, अब रेप क्यों बोल रही हो? ये रेप कैसे हो गया? शादी ही तो इसीलिए करी थी, यही तो सिद्धांत था, इसमें रेप क्या है?’

और फिर न्यायालय भी इसीलिए असमंजस में पड़ जाता है, जैसा आपने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने भी कहा कि पहली बात तो बड़ा मुश्किल है इसको स्थापित करना — मुझे नहीं मालूम उच्चतम न्यायालय ने इन्हीं शब्दों में कहा है कि नहीं, पर भाव शायद कुछ ऐसा ही है — कि पहली बात तो सप्रमाण इस तरह के बलात्कार को प्रमाणित करना मुश्किल है; दूसरी बात, अगर इसको मान लिया जाए तो इससे जो पूरी विवाह-व्यवस्था है वही चरमराने लग जाएगी।

और मैं सहमत हूँ उच्चतम न्यायालय से, विवाह-व्यवस्था निसंदेह मैरिटल रेप को क्रिमिनलाइज़ (अपराधीकरण) करने से चरमराने लग जाएगी, क्योंकि उस व्यवस्था में यौन संबंध ही तो आधारभूत है। हाँ, आपकी बुद्धि थोड़ी साफ़ होने लग जाए, आपके जीवन में कुछ अध्यात्म आ जाए, और विवाह के बाद आप कहो कि मुझे अब अपनी पत्नी से अपने संबंध को किसी ऊँचे तल पर ले जाना है, तो वो बिलकुल अलग बात है; ऐसा हो भी सकता है, और हुआ भी है।

और मैं चाहता हूँ कि वैसा प्रयास किया भी जाए, कि विवाह के बाद आप कहें कि ठीक है, जैसा भी नाता था, जुड़ गए, शारीरिक संसर्ग कर-करके बच्चे भी पैदा कर दिए, लेकिन अब हम दोनों अपने रिश्ते को थोड़ा ऊँचाई देते हैं, बिस्तर से उठाकर मंदिर में ले आते हैं। ये निसंदेह करा जा सकता है, करा जाना चाहिए; लेकिन फिर भी शुरूआत तो शयनकक्ष से ही है न, पूजाकक्ष से नहीं।

अब इसका समाधान क्या है? समाधान तो बात सीधी है - जो इस व्यवस्था में प्रवेश कर रहे हों वो इन चीज़ों के लिए तैयार रहें। और आघात एक ही तरफ़ से नहीं होगा — जब आप मैरिटल रेप की बात करते हो तो उसमें छवि यही उठती है कि पुरुष अपनेआप को स्त्री पर ज़बरदस्ती थोप रहा है; वो दूसरी तरफ़ से भी होता है, और कई बार आवश्यक नहीं है कि शारीरिक तल पर ही हो, भावनात्मक तल पर भी हो सकता है।

हार्ड सेक्स , सॉफ़्ट सेक्स दोनों चीज़ें होती हैं; पुरुष की ओर से हार्ड होता है, स्त्री की ओर से सॉफ़्ट होता है। पर स्त्री भी जब अपनेआप को पुरुष पर थोपे, तो वो भी एक तरह का रेप ही है, भले ही सॉफ़्ट । और उसका कोई समाधान मेरी दृष्टि में तो नहीं है। हाँ, कुछ जो आप एहतियात बरत सकते हैं वो ये है कि आप विवाह से पहले देख लीजिए कि आपका साथी आपके पास आना ही क्यों चाह रहा है, उसको आपमें क्या अच्छा लग रहा है।

पर तब तो आप बहुत प्रसन्न हो जाती हैं, जब वो आपके चेहरे की तारीफ़ कर दे तो। तब तो ये सर्वविदित बात है कि सुंदर लड़कियों की शादी ज़्यादा आसानी से हो जाती है, कम दहेज में हो जाती है, उन्हें ज़्यादा बेहतर लड़के मिल जाते हैं। तो जब अपनी सुन्दरता के दम पर ही विवाह करा था, तो पता नहीं था क्या कि अब बलात्कार ही होगा? या क्या सोचा था, कि रानी बनने जा रही हो?

पर ये इतनी छोटीसी बात खोपड़ी से एकदम उड़ जाती है, माया का कमाल है। जब अपने रूप-लावण्य पर इतराते हैं हम, तो क्या हम अपने शरीर को ही प्रमुख संसाधन नहीं बना रहे? बताइएगा! जो आपका शरीर ही देखकर आपके पास आया है, वो मौका पाते ही आपके शरीर को नोचेगा-खसोटेगा या छोड़ देगा?

तो एक ओर तो मेरी सहानुभूति रहती है उनके साथ, विशेषकर महिलाओं के साथ, जिनके पति उनके साथ ज़बरदस्ती करते हैं; और दूसरी ओर, मैं उनसे पहले जवाब भी माँगना चाहता हूँ। मैं सहानुभूति तो तुम्हें बाद में दूँगा, पहले तुम जवाब दो कि इस रिश्ते में प्रवेश क्या सोचकर करा था।

अगर प्रेमविवाह करा होगा तो एक लंबा-चौड़ा अंतराल चलता है जिसमें विवाह-पूर्व संबंध रहते हैं, कोर्टशिप दो साल-चार साल चलता है। आयोजित विवाह भी आजकल होते हैं तो पहले बातचीत तो होती ही है कुछ महीने, फिर होते हैं। वो जितना भी अंतराल था, चाहे दो महीने का, चाहे दो वर्ष का, उसमें बिलकुल परख नहीं पाईं कि पतिदेव किस पाशविक प्रवृत्ति के हैं?

नहीं; परख क्यों नहीं पाए? क्योंकि तब बड़ा अच्छा लगता था, जब ज़ुल्फ़ों की तारीफ़ हो जाती थी, आँखों की तारीफ़ हो जाती थी, फ़िगर की तारीफ़ हो जाती थी। और जो आपके फ़िगर की तारीफ़ कर रहा है, आपको समझ नहीं आ रहा है कि वो क्या करने वाला है? आप फूलकर कुप्पा हो रही हैं, और फिर कह रही हैं, ‘मेरा तो मैरिटल रेप हो गया!’

और उसी से कहा था कि मेरे लिए बढ़िया वाली लौंजरी (छोटे कपड़े) लेकर आना, और हॉट कपड़े, हॉट पैंट्स, ये, वो; सत्तर चीज़ें उसी से (मँगवा रही हैं), ये कर क्या रही हैं? कामोत्तेजना का सारा सामान भी उसी से मँगवा रही हैं — मैं नहीं कह रहा कि सब महिलाएँ ऐसा कर रही हैं, कुतर्क मत करने लगियेगा, एक उदाहरण के तौर पर कह रहा हूँ।

घूमने जाते हैं कहीं पर, तो ख़ुद ही हॉट बन-बनके जा रहे हैं; और आप जितना हॉट बन रही हैं, उसको उतना आनंद आ रहा है। दिनभर आप उसके बगल में शोला बनकर घूमती रहीं, और रात में चिल्लाएँगी कि मैरिटल रेप ? आप वाकई इतनी नासमझ हैं? और वो भी कह रहा है, ‘जो दिनभर मुझे तपाया है, तो कुछ तो मुझे शीतल होने दो अब।‘

और ये बात न अकस्मात है, न अपवाद है, ये बात आधारभूत है, फ़ंडामेंटल है मैरिज के इंस्टीट्यूशन में। तो जो लोग शादी करने जा रहे हों, विशेषकर महिलाएँ, वो इस चीज़ के लिए तैयार रहें, ये लूट-पाट, नोच-खसोट तो होगी-ही-होगी वहाँ पर। अरे छोड़ दो कि शादी के बाद होगी, शादी से पहले हो जाती है, प्रेमी-प्रेमिकाओं में हो जाती है, लिव-इन में हो जाती है। और शादी में तो आपको कानूनी लाइसेंस मिल जाता है, वहाँ कैसे नहीं होगी?

आप अगर बात की थोड़ा गहराई में जा रहे होंगे तो आपको दिख रहा होगा कि इस पूरे मुद्दे का फिर और गहरा संबंध हमारे देहभाव से है। चूँकि हम अपनेआप को देह समझते हैं, इसलिए हम दूसरों से रिश्ता भी देह के तल का ही बनाते हैं। हाँ, देह के तल पर जो रिश्ता बन रहा है, उसमें कुछ दो-चार और शाखाएँ फूट आएँ, ऐसा बिलकुल हो सकता है, लेकिन उस रिश्ते की — ये में चौथी-पाँचवी बार कह रहा हूँ — उस रिश्ते की बुनियाद तो देह ही होती है।

हाँ, ये बिलकुल हो सकता है कि पति-पत्नी साथ हैं, दो बच्चे हो गए, अब बच्चों से पति को भी मोह है और पत्नी को भी मोह है, तो बच्चों के कारण वो रिश्ता आगे चल रहा है; ये हो सकता है कि बाद में ऐसा हो जाए, लेकिन फिर भी बुनियाद तो देह थी।

और यही वजह है कि जब देह ढलने लग जाती है तो रिश्ता भी फिर ठंडा पड़ने लग जाता है, विवाह के दो-चार साल बाद संबंध में उतनी गर्मी रह नहीं जाती। ये मत समझिएगा कि पतिदेव बेवफ़ा हो गए; वो बेवफ़ा नहीं हो गए, अनुबंध, माने कॉन्ट्रैक्ट की मियाद (अवधि) पूरी हो गई। उस अनुबंध की शर्त ही यही थी कि मैं कामुक, तुम हॉट , आ मिला हाथ; या जो कुछ भी। अब आप हॉट रह नहीं गईं हैं, उसने इधर-उधर जाकर विवाहेत्तर संबंध स्थापित कर लिया, एक्स्ट्रा-मैरिटल ; फिर आपको बड़ा झटका लग जाता है, कि अरे, पतिदेव अब इधर-उधर मुँह मार रहे हैं।

ये तब नहीं पता था जब रिश्ता शुरू हो रहा था? पर नहीं, जब रिश्ता शुरू हो रहा होता है उस वक्त तो भावनाओं और वासनाओं का ज़ोर ऐसा हावी होता है कि कुछ समझ में नहीं आता; टिक-टॉक की दुनिया, रूमानी, गुलाबी। सबको किसी-न-किसी की जान-ए-जिगर, जान-ए-तमन्ना बनना है, लो अब बन लो जान-ए-जिगर, जान-ए-तमन्ना; फिर कहते हो कि मैरिटल रेप हो गया।

तब बड़ा आनंद आता था, वो कहता था कि मेरी चाय ज़रा पहले तुम एक चुस्की ले लो। मासूम बनकर पूछती थीं, ‘क्यों, क्यों?’ वो बोलता था, ‘मीठी हो जाएगी, तुम्हारे होंठ शहद जैसे हैं;‘ और ऐसा लगता था कि बिलकुल नूर-ए-नज़र! अब वो उन्हीं होठों पर रात में टूटेगा तो ताज्जुब क्या?

कोई पुरुष आपसे पूछता है कि अपना ज्ञान बताओ? दुनिया-भर में इतनी बातें, इतने मुद्दे चल रहे हैं, वर्तमान शताब्दी मानवता के इतिहास में सबसे वीभत्स और दर्दनाक कालों में से है। इस समय जहाँ हम बैठकर जिस हवा में साँस ले रहे हैं, उसमें कार्बन-डाइऑक्साइड का जो स्तर है वो पिछले बीस लाख सालों में इतना ऊँचा कभी नहीं था। आप और आपकी प्रियतमा आमने-सामने बैठे हुए हैं, दोनों साँस तो ले रहे हो न? आँखों की गहराई और होंठों की मिठास से आगे चलकर के कभी ये बात भी करी है कि वैश्विक-तापन क्या है, ये जलवायु-परिवर्तन क्या है?

तब लगता है कि ऐसी बातें थोड़े ही करी जाती हैं, ये तो डेट है, डेट पर तो दूसरी तरह की बातें होती हैं न! कौन तब पूछने जाता है कि तुम्हारी चेतना का स्तर कैसा है, ज्ञान की गहराई कैसी है, कुछ करुणा तुममें है या नहीं है; कौन पूछने जाता है? रिश्ते बनते हैं, दोनों में से यदि कोई एक माँस खाता हो, तो ऐसा नहीं होगा कि अब दोनों ही माँस नहीं खाते रिश्ते के बाद। दोनों में से कोई एक माँस खाता हो, रिश्ता बन गया, दूसरा भी माँस खाना शुरू कर देगा। ऐसे होते हैं हमारे रिश्ते - माँस; चाहे जानवर का हो, चाहे मनुष्य के शरीर का।

आप यदि ये उम्मीद कर रही थीं कि मैं कहूँगा, ‘नहीं-नहीं, शादी का रिश्ता न, बड़े तमीज़ से चलाना चाहिए, सारे मर्दों को अच्छा बच्चा बनकर रहना चाहिए, मैरिटल रेप नहीं करना चाहिए,’ तो मैं ऐसा बोल दूँगा, पर दुनिया का कोई पुलिस या कोई गुरु बिस्तर पर आकर के मर्द को रोक तो नहीं सकते न? आपके शयनकक्ष में आकर कोई निगरानी तो करेगा नहीं!

आपको इससे ही अगर सांत्वना मिल जाती हो कि घोषित कर दिया जाए कि सारे मर्द बलात्कारी हैं, तो करे देते हैं घोषित, कि मर्द सारे जानवर होते हैं, कामुक, पाशविक, बलात्कारी हैं ये सब, इनकी भर्त्सना करो। तो कर देते हैं भर्त्सना, चलिए सब मिलकर एक सामूहिक निंदा प्रस्ताव पास करते हैं; उससे क्या हो जाएगा?

एक अपनी ही देह इतना बड़ा बोझ होती है, होती है कि नहीं होती है? किसी दूसरे की देह को ज़िंदगी में क्यों आमंत्रित कर लेते हो भाई? दूसरे को जीवन में लाना भी है तो रौशनी की तरह लाओ, जिस्म की तरह क्यों लाते हो? अपनी ही देह की गन्दगी से वाक़िफ़ नहीं हो क्या, जो दूसरे की गन्दगी भी घुसेड़ ली? और फिर रोते हो; पुरुष रोते हैं कि स्त्री मेरा शोषण कर रही है, स्त्रियाँ रोती हैं कि पुरुष मेरा बलात्कार कर रहा है, और बच्चे रोते हैं कि हमें पैदा क्यों कर दिया।

मैंने पाया है कि दो चीज़ें होती हैं जो इंसान के जीवन को नर्क बनाती हैं — सब युगों में ऐसा था, आज के समय में विशेषकर है — पहला, आजीविका का ग़लत साधन, ग़लत नौकरी, और दूसरा, ग़लत विवाह। और अधिकांशतः ये दोनों ही ग़लत होते हैं हर आम आदमी के जीवन में, उसकी नौकरी भी ग़लत होती है — नौकरी में सब शामिल है - व्यवसाय, पेशा, धंधा, जो कुछ भी करते हैं। तो दिन-भर जो आप नौकरी कर रहे होते हैं वो भी उल्टी-पुल्टी होती है, जो आपके मन को बिलकुल गंदा करके रखती है, चेतना का दमन; और जो विवाह कर रखा होता है उसका तो कहना ही क्या!

और इन दोनों में भी जो चीज़ बिलकुल ही ख़त्म कर देती है इंसान को, पूरे जन्म के लिए ख़त्म कर देती है — नौकरी तो फिर भी बदल सकते हो, किसी भी क्षण सोच लेते हो कि अब कुछ नया व्यवसाय या पेशा शुरू करना है, साथी नहीं बदल पाते — तो जो दूसरी चीज़ है, ग़लत विवाह, ये इंसान को कहीं का नहीं छोड़ती! ग़लत शादी हो गई, माने पूर्ण विराम, द एंड; गया, या गई, खेल ख़त्म, अब कुछ नहीं हो सकता। अब जियोगे तीस, पचास साल, और जितना जीना होगा जियोगे; जीवन नहीं होगा।

तो प्रयास ये करिए देवी जी कि मैरिटल रेप की नौबत ही ना आए। उस गली जाना क्यों जहाँ व्यभिचार ही नियम है? एक गली ऐसी है जहाँ पहले से एक बोर्ड , एक तख़्ता, पूरा बड़ा बैनर लगाकर लिख दिया गया है कि इस गली में प्रवेश करोगे तो व्यभिचार का शिकार बनोगे। तुम उस गली में जानते-बूझते प्रवेश करो, और फिर शोर मचाओ, 'मेरे साथ तो कुकर्म हो रहा है', तो बताओ दोष किसका?

थोड़ा-सा मतलब बिलकुल ज़मीन की फिर से बात करते हैं एकबार, ताकि होश एकदम..। आप जवान हैं अभी, ठीक है? आप पच्चीस, तीस या पैंतीस साल के हैं, जिस दरमियान शादी होती है। आप जवान हैं, आपकी वासना उफ़ान लिए हुए है, और आपके जीवन में एक व्यक्ति डाल दिया गया है और धर्म ने और कानून ने आपको पूरी स्वीकृति दे दी है — स्वीकृति से आगे अनुज्ञा दे दी है, लाइसेंस थमा दिया है — ये बोलकर के कि ये व्यक्ति तुम्हारे जीवन में लाया गया है काहे के लिए, सेक्स के लिए। आप क्या करोगे उस व्यक्ति के साथ, पूजा करोगे उसकी? क्या करोगे? उसे मॉर्निंग वॉक पर ले जाओगे? दही-बताशे खिलाओगे? क्या करोगे?

वो व्यक्ति आपके जीवन में क्यों लाया गया है? हिचक हो रही है स्वीकार करते हुए न, गंदा लग रहा है, ‘छि! आचार्य जी, आपने तो इतनी पवित्र चीज़ को इतना गिराकर के बता दिया।‘

(हँसते हुए) मुझे गिराने की क्या ज़रूरत है, मेरा कोई लेना-देना ही नहीं!

आप एक जवान आदमी हैं या जवान औरत हैं, और आपके जीवन में एक दूसरा व्यक्ति ला दिया गया है इसी काम के लिए, तो आप और क्या करने वाले हो? यही तो करोगे; और फिर चिल्लाओ, ' रेप , रेप '।

नहीं, दिक्कत जितनी धर्म की और कानून की है, उतनी ही हमारी रूमानी कल्पनाओं की है, विशेषकर महिलाओं को ये मानते हुए बड़ी तकलीफ़ होती है कि रिश्ता कामवासना पर आधारित है। वो कहेंगी, ‘नहीं-नहीं, ये तो सात जन्म का साथ है, शोना तो मुझे अपने छोटे भाई जैसा लगता है।‘

(व्यंग्यात्मक लहज़े में) अच्छा!

बेईमानी की इंतेहा है न? मानती भी नहीं हैं कि खेल पूरा सेक्सुअल है।

एक प्रयोग कर लीजिएगा डेट वगैरह पर, या जो शादीशुदा हैं, ऐसे अपने पतिदेव से किसी बौद्धिक मुद्दे पर आधे घंटे बात करके दिखा दीजिए, किसी मुद्दे पर; ठरकी किस्म का होगा तो आधा घंटा होने से पहले ही आप पर कूद पड़ेगा, और अगर ऊबा हुआ होगा तो आधा घंटा पूरा होने से पहले सो जाएगा। दो ही काम होंगे, या तो जम्हाइयाँ लेते हुए वो सो जाएगा, कि आज ये कौनसी बातें करने लग गई, इंटेलेक्चुअल

‘भई, हमारा-तुम्हारा रिश्ता सेक्सुअल है, इंटेलेक्चुअल नहीं है। इंटेलेक्चुअल बातें मैं बाहर जाकर करूँगा, दोस्तों से करूँगा, कहीं और करूँगा, तुमसे थोड़े ही करना है! तुम्हें मैं घर इसलिए थोड़े ही लेकर आया हूँ कि तुमसे इंटेलेक्चुअल बातें करूँ, तुमसे तो दूसरी वाली बातें करनी हैं। तुम अभी ग़लत लेन में चल रही हो, लेन बदलो।‘

और ये जो बड़ी मीठी और गहरी भावुकता होती है न स्त्रियों की ओर से, ये कुछ नहीं है, ये प्रच्छन्न कामुकता ही है, कोवर्ट सेक्सुअलिटी । पुरुषों की कामुकता प्रकट होती है, तो वे सीधे बोल देते हैं कि कपड़े उतारो। स्त्रियों पर नैतिकता और प्रकृति का कुछ पहरा होता है, सामाजिक नैतिकता, तो वो खुले में नहीं बोलेंगी कि कपड़े उतारो, तो वो फिर भावुकता दिखाती हैं बार-बार, ‘कैसे हो? खाना खा लिया?’

सारी बातें वो करेंगी देह के बारे में ही। अब खाना कहाँ खाया जाता है, चेतना में? तो ऐसा लगता है फिर कि पुरुष तो कामुक हो रहा है, स्त्री सिर्फ़ भावुक हो रही है। वो भावुक नहीं हो रही है, वो जो भावुकता है वो भी हिडेन सेक्सुअलिटी ही है, ये नहीं समझ में आती आपको बात।

तो अब बताइए, अतिशय कामुकता का इल्ज़ाम क्या हम सिर्फ़ पुरुष पर लगाएँ?

यहाँ बहुत सारे आध्यात्मिक और बौद्धिक युवाजन भी बैठे हुए हैं, इनसे पूछ लेना। इनसे कहना, ‘दिल पर हाथ रखकर बताओ, तुम बहुत होगे बौद्धिक किस्म के, आध्यात्मिक किस्म के, लड़की कैसी चाहिए?’ इनमें ज़रा सी भी ईमानदारी होगी न, तो जवाब देंगे, ' हॉट ।‘ कहेंगे, ‘आधी बुद्धि हो, चलेगी, हॉट होनी चाहिए। बल्कि जितनी आधी बुद्धि की हो, उतना अच्छा, क्योंकि हमें उसके खोपड़े से वैसे भी कुछ मतलब रखना नहीं है!’

दो-चार तो पहले ही मुस्कुरा रहे हैं, बोल रहे हैं, ‘ये सब जानते हैं।‘

और फिर जो आधी बुद्धि वाली होती हैं वो और इतराती हैं, और उनको देखकर के बेचारी जो ढंग की लड़कियाँ होती हैं उनमें हीनभावना आ जाती है। वो कहती हैं, ‘हम पढ़ने में अच्छे हैं, हम लिखने में अच्छे हैं, हमने ज़िंदगी-भर मेहनत करी, हम हर क्षेत्र में अग्रणी हैं, हम खेलने-कूदने में भी अच्छे हैं, लेकिन कोई लड़का हमारी ओर देखता ही नहीं। और वहाँ वो घूम रही है टेन टु दि पावर माइनस फाइव आई.क्यू. वाली, और उसके पीछे दस की कतार हमेशा लगी रहती है लौंडों की। क्यों? क्योंकि वो हॉट है।‘

अच्छे से समझ लीजिएगा ये बात - लड़कों को बौद्धिक लड़कियाँ नहीं चाहिए। बुद्धिमान हो जाती है लड़की, तो लड़के के लिए ख़तरा बन जाती है; कुछ होंगे अपवाद, सौ में एकाध, अपवादों की गिनती मत करिएगा, मैं जो मोटी-मोटी बात है वो बता रहा हूँ। कुछ तो खुलेआम बोलते हैं, ‘मुझे ज़्यादा दिमाग चलाने वाली चाहिए ही नहीं, माल होनी चाहिए।‘

और मुझे इतना दुख होता है, लड़की मेहनत कर रही होगी, कहीं पर ईमानदारी की नौकरी कर रही होगी, और अपने घर में अपनी बहनों और भाभियों को देखेगी कि वो कुछ नहीं करती हैं लेकिन घर में रूप की रानी, महल की बेगम बनकर बैठी हैं।

और फिर ये जो मेहनतकश लड़की है, इसका भी आत्मविश्वास डोलने लगता है। ये कहती है, ‘मैं इतनी मेहनत करती हूँ, सुबह से शाम तक खटती हूँ, कई बार धूप में भी निकलती हूँ, दुनिया की धूल-गर्द झेलती हूँ, तब जाकर मुझे एक सीमित आमदनी होती है। और ये घर में आकर के बैठ गई हैं और उनकी कुल पात्रता ये है कि हॉट हैं, फ़िगर अच्छा है, गोरी-गोरी हैं, मुलायम-मुलायम हैं, तो इन भाभियों के आगे हमारे भईये अपनी पूरी तनख्वाह लाकर के बिछा देते हैं और वो घर में रानी बनकर बैठती हैं।‘

वो रानी बनकर बैठती हैं और खूब इतराती हैं, ‘देखो हम तो..’। इतरा लो जितना इतराना है, लेकिन फिर शिकायत करने मत आना मैरिटल रेप की।

जो स्वतंत्र नहीं, जो स्वावलंबी नहीं, जिसकी चेतना कर्म करने से पहले कुछ विचार नहीं करती, जो इतना भावुक है कि विवेक-शून्य है, उसका बलात्कार होकर रहेगा। अपनी भलाई अपने हाथ होती है। आपको बुद्धि भी मिली है, आपको शरीर भी मिला है, ये आपको तय करना होता है कि आपको किसका इस्तेमाल ज़्यादा करना है। ‌ महिलाओं से आग्रह कर रहा हूँ, आपको बुद्धि भी मिली है और शरीर भी, ईमानदारी से अपनेआप से पूछिए कि आप अपनी ज़िंदगी किसका इस्तेमाल करके चलाना चाहती हैं - बुद्धि का, बोध का, चेतना का, या देह का।

आप कोई भी निर्णय कर सकती हैं, लेकिन यदि देह के पक्ष में निर्णय करें तो फिर शिकायत मत करिएगा कि एक भेड़िया है जो रोज़ रात को टूटता है मेरे ऊपर। वो भेड़िया नहीं हुआ फिर — सुनने में गंदा लगेगा, लेकिन सच का तकाज़ा है, बोल दूँ — वो ख़रीददार हुआ, उसने ख़रीदा है; माल उसका है, वो उस माल का मनचाहा भोग कर रहा है।

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