शान्ति का प्रयास ही अशांति है ॥ आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)

कहा चुनावै मेड़िया, चूना माटी लाय ।मीच सुनेगी पापिनी, दौरि के लेगी आय ।।-कबीर
वक्ता: आदमी जो कुछ भी करता है, वो करता किसी इच्छा के वशीभूत होकर ही है, और हर इच्छा आख़िर में परम की ही इच्छा है। लेकिन आप जो कुछ भी करते हैं, उस पर तुरंत ही माया कब्ज़ा कर लेती है। आपका बड़े से बड़ा प्रयास भी अंततः जिसकी तरफ जाने के लिये होता है, उसकी तरफ जाने की बजाय, उसके विपरीत मोड़ दिया जाता है।
हम जो कुछ भी करना चाहते हैं, पाना चाहते हैं, उसका आख़िरी लक्ष्य होता है कि शांति मिल जाएगी, चिंताओं से मुक्त हो जाएंगे, आनन्द में रहेंगे, और हम सोचते हैं कि कुछ ‘कर’ के हम वहां पहुँच जाएंगे जहां शांति है, मुक्ति है, आनन्द है। करा ही इसीलिये जा रहा है कि शांत हो सकें, पर जहां पहुँचना है, वहां तो कभी पहुंचते नहीं, तो शांति कभी मिलती नहीं। करने की प्रक्रिया हमें और अशांत कर जाती है।
खेल देखियेगा, आप सब कुछ कर इसलिए रहें हैं ताकि अंततः शांत हो सकें, अंततः आनंदित हो सकें, पर शांति, आनंद तो कभी मिलते नहीं। आपके सारे कर्तत्व से, आपकी सारी प्रक्रियाओं से, सारी कोशिशों से भी न शांति आ रही है, न आनंद आ रहा है। इतना ज़रुर है कि ये कोशिशें हमें गहरी अशांति से भर गईं हैं। परम तक पहुंचने की, और ना कहिये उसे आप ‘परम’, शांति ही कह लीजिये, शांति तक पहुंचने की हमारी सारी कोशिशें ही हम पर उल्टी पड़ गई हैं, हम पर भारी पड़ गईं हैं। क्या यही कहानी नहीं है हमारी?
आप जो भी कर रहें हैं, किसलिये कर रहें हैं? आपके क्या लक्ष्य हैं? क्या चाहिये? सुकून। और जो कर रहें हैं, वही कर-कर के सुकून दूर हुआ जा रहा है- यही माया का बड़े से बड़ा खेल है। वो आपको पहले तो ये बताती है कि सुकून दूर है, कुछ करो, और ज्यों ही आप करने में उद्यत होते हो, वो जो दूर था, वो और दूर हो जाता है। या ये कह लीजिये कि ज्यों ही करने में उद्यत होते हो, जो पास था, वो दूर हो जाता है।






