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सनातन धर्म क्या है? सनातनी किसे मानें? (पूर्ण सत्र) || आचार्य प्रशांत, कार्यशाला (2023)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: नमस्कार, सर। आज का सबसे पहला प्रश्न जो है वह सनातन के ऊपर है कि सनातन माने क्या? और ऐसा क्या है जिसको वास्तविक रूप में सनातन कहा जा सकता है?

आचार्य प्रशांत: देखिए, सनातन का अर्थ होता है वो जो काल की सीमाओं से के बाहर का हो। जिस पर समय का असर न पड़ता हो उसको कहते हैं सनातन। मन में जो कुछ भी है वो समय का ही दिया हुआ है। ठीक। और दुनिया में भी आप जो कुछ देखते हैं वो किसी समय पर शुरू हुआ था, किसी समय पर उसने जन्म लिया था और किसी समय पर उसकी समाप्ति है। ठीक है।

इससे हमें यह समझना होगा कि सनातन क्या नहीं होता।

जगत में जो कुछ है वह सनातन नहीं होता।

मन के विचार सनातन नहीं होते, भावनाएँ सनातन नहीं होतीं, रूप सनातन नहीं होते, परंपराएँ सनातन नहीं होतीं। क्योंकि ये सब कुछ कभी शुरू होतें हैं, कभी समाप्त होतें हैं, मन की ही उत्पत्ति होते हैं और जगत में ही स्थित होते हैं। जो कुछ भी यहाँ हो कि वहाँ हो, वो सनातन नहीं हो सकता। तो सनातन धर्म का फिर लक्ष्य यही होता है कि आपको उस सब के पार ले जाए जो मरणधर्मा है। जो कुछ भी मन में है या संसार, माने प्रकृति में है, वो सब मरणधर्मा है।

तो सनातन जो होता है उसको फिर कहते हैं सत्य। सत्य वह जो परिभाषा से ही नित्य है। नित्य माने जो कभी बदल नहीं सकता; न जन्मा है न मरेगा; न सोचा गया है न अनुभव किया गया है; कोई देखने की वस्तु नहीं है, कोई सुनने की बात नहीं है।

सनातन आत्मा है और सनातन धर्म का मतलब है मन को आत्मा की ओर ले जाना।

एकदम छोटी सी चंद शब्दों की परिभाषा है, इसको आत्मस्थ कर लीजिए एकदम।

सनातन मात्र क्या है?

आत्मा।

और सनातन धर्म क्या है मात्र?

मन को आत्मा की ओर ले जाना।

इतना कहने भर से काम नहीं बनेगा। जिन-जिन चीज़ों हो हमने नकारा, उनको भी अच्छे से अंदर आने दीजिए।

क्या नहीं है सनातन?

मन, विचार, परंपराएँ, प्रथाएँ, नाम-रूप, आकार, विचारधाराएँ, मत, संप्रदाय – ये कोई भी सनातन नहीं है, नहीं है, नहीं है।

कोई अगर इनमें से किसी को भी सनातन बोले, तो जान लीजिए कि आपको नित्य सत्य की जगह किसी मरणधर्मा बिंदु की ओर ले जाया जा रहा है। सनातन के नाम पर आपको कोई विचार दिया जा रहा है, तो विचार तो बदल जाते हैं। अगर आपको कोई रूप दिखाया जा रहा है, कोई बात बताई जा रही है, तो रूप तो? बातें तो?

श्रोतागण: बदल जाती हैं।

आचार्य: फिर से बताइए, सनातन क्या है? मात्र आत्मा सनातन है; आत्मा के अतिरिक्त कुछ नहीं सनातन है। उसी आत्मा के लिए जो दूसरे नाम हैं हम कभी कह देते हैं ‘ब्रह्म’, कभी ‘सत्य’ कह देते हैं। और अगर बिलकुल विशुद्ध अर्थों में लें, एकदम विशुद्ध अर्थों में, निर्गुण-निराकार-अगोचर अर्थ में लें तो राम, कृष्ण और शिव – ये भी आत्मा के ही नाम हैं। लेकिन ये आत्मा के नाम तभी हैं जब इनके साथ कुछ भी ऐसा न जुड़ा हुआ हो जो मन का हो या जगत का हो।

अगर आपने कृष्ण के साथ कोई किस्सा-कहानी, नाम-रूप आदि जोड़ दिया तो आपने फिर कृष्ण को सनातन नहीं रहने दिया। कृष्ण सनातन हैं निश्चित रूप से, पर कब? सिर्फ़ कब? जब उनमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे काल खंडित कर सके, जिस पर काल धब्बा लगा सके। और कहानियों की तो पैदाइश ही काल से होती है, वो तो सीधे ही काल के गोद में खेलती हैं। तो कृष्ण के विषय में यदि कहानियाँ हैं, तो क्या कहानियाँ सनातन हो सकती हैं?

इसीलिए बार-बार कहा करता हूँ, गीता के कृष्ण सनातन हैं, पौराणिक कृष्ण सनातन नहीं हैं।

समझ में आ रही है बात?

राम को लेकर भी इसीलिए तुलसीदास ने स्वयं ही कह दिया कि – चार राम हैं जिसमें से चौथे हैं सिर्फ़ जो सनातन हैं। राम के बारे में जो उच्चतम समझ हो सकती है उसी के राम सनातन हैं। बाक़ी वो जो आप व्यक्ति और व्यक्तित्व की सीमाओं में क़ैद कर देते हो श्रीराम को, वहाँ फिर आपने उनको सनातन होने से वंचित कर दिया।

वही बात शिव पर भी लागू होती है। जब निर्वाण षट्कम् में सब गुणों को नकार करके कहा जाता है शिवोहम्, तब शिव सत्य-सनातन हैं। पर शिव को लेकर आप जो ये सब शोर-तमाशा करते हो — नाच-गाना, उछल-कूद — वो आपने शिवत्व के साथ थोड़ा अन्याय कर दिया, आपने शिव को सनातन होने से पुनः वंचित कर दिया।

आत्मा मात्र सनातन है और आत्मा ही एकमात्र वैदिक सत्य है। क्यों? क्योंकि उसके बारे में कुछ भी प्रकृति से सम्बन्धित करके कहा ही नहीं जा सकता। आत्मा की परिभाषा ही यही है कि अगर प्रकृति को आधार बनाकर आत्मा के बारे में कुछ भी कहा तो वो बात ग़लत है।

प्रकृति में क्या होता है? (उदाहरण के लिए कुछ बोलिए)

जन्म होता है। (अभी किसी ने जन्म बोला) तो अगर आपने कह दिया कि आत्मा का जन्म हुआ, तो आपने किसी और की बात कर दी; वो आत्मा नहीं रह गयी। आत्मा के बारे में अगर कुछ कहना है जन्म से सम्बन्धित, तो आपको कहना पड़ेगा आत्मा अजात है। तो प्रकृति में क्या है? जन्म। तो आत्मा को लेकर क्या बोलना पड़ेगा? आत्मा अजात है। तो अब सनातन वाली बात हुई।

प्रकृति में और क्या होता है? पाँच-सात चीज़ें बोलिएगा, एक-एक करके बोलिए लेकिन।

श्रोतागण: परिवर्तन।

आचार्य: हाँ जी, परिवर्तन होता है। तो परिवर्तन की बात कर दी तो प्रकृति में है। समय का अर्थ ही है परिवर्तन। प्रकृति माने गति। परिवर्तन प्रकृति के खेमे में आ गया। तो सनातन के पाले में क्या कहेंगे हम?

श्रोतागण: नित्यता।

आचार्य: नित्यता। बहुत बढ़िया! अपरिवर्तनीयता, अचलता, अटलता। वहाँ कुछ बदलता नहीं है। जो है जैसा है, वैसा ही है। एक और बात बोलिए जो होती है।

श्रोतागण: विचार।

आचार्य: विचार। तो प्रकृति में विचार ही विचार चलते रहते हैं। जीव है, जीव विचार करता है। तो आत्मा के बारे में निसंदेह क्या कहना पड़ेगा? निर्विचार।

और बोलिए, प्रकृति में क्या है?

श्रोतागण: अस्थिरता।

आचार्य: अस्थिरता? वो परिवर्तन में आ गया।

श्रोतागण: आकार।

आचार्य: आकार। तो आकार आ गया प्रकृति के पाले में। तो आत्मा की बात करेंगे तो उधर निराकार है। कभी भी अगर सनातन को आकार से जोड़ा जाए तो आपको क्या कह देना है, ‘ये तुमने सनातन से थोड़ा नीचे की बात कर दी।‘ आकारों को लाते ही सनातन से चूक गये। होता होगा आपका आकारों से कुछ भला, हम उससे नहीं इनकार करते; मिलता होगा आपको आकारों से सुख, बिलकुल संभव है। लेकिन सनातन से आप वंचित रह गये जैसे ही आपने आकार की बात कर दी।

प्रकृति में और क्या होता है? बोलिए।

श्रोतागण: समय।

आचार्य: (इतने सारे एक साथ)।

आचार्य: समय होता है। बहुत बढ़िया। तो जब प्रकृति की बात होगी तत्काल काल की बात हो जाएगी। तो आपको जब सनातन की बात करनी है तो आपको क्या कहना पड़ेगा? अकाल। तो काल कहाँ है?

श्रोतागण: प्रकृति में।

आचार्य: और अकाल कहाँ है?

श्रोतागण: आत्मा या सनातन में।

आचार्य: और व्यक्ति फिर जब जाता है प्रकृति से सनातन की ओर तो ज्ञानी लोग कहते हैं, "एक अचम्भा देखिया मुआ काल को खाय।" काल को ही खा गया। आपके भीतर कुछ ऐसा है जो सनातन हो सकता है। फिर आप काल को खा जाते हैं, और वही इस जीवन का लक्ष्य भी है। प्रकृति में पैदा हुए हो, माने काल में पैदा हुए हो, लेकिन काल का अतिक्रमण कर जाना है। वो संभावना सिर्फ़ इंसान के पास होती है – आपको काल का अतिक्रमण कर जाना है। और क्या होता है प्रकृति में?

श्रोतागण: गुण-दोष।

आचार्य: गुण-दोष। गुण और दोष एक ही चीज़ के दो नाम हैं, ठीक है। वो हम अपनी नैतिकता के कारण कुछ गुणों को दोष कह देते हैं, अन्यथा सिर्फ़ गुण होते हैं प्रकृति में। तो गुण बोल देंगे तो ये हो गयी प्राकृतिक बात। और अगर सनातन की बात करनी है तो हमें क्या कहना पड़ेगा?

श्रोतागण: निर्गुण।

आचार्य: मात्र निर्गुण ही सनातन है, उसके अतिरिक्त कुछ नहीं है सनातन। फिर दोहराते हैं जो एकदम आरंभिक बात कही थी:

सनातन है?

श्रोतागण: आत्मा।

आचार्य: तो सनातन धर्म है?

श्रोतागण: मन को आत्मा की ओर ले जाना।

आचार्य: इस मन को आत्मा की ओर ले जाना। मन को आत्मा की ओर ले जाना माने मन और कहाँ रहता है अगर आत्मा की ओर ले जाना पड़ रहा है?

श्रोतागण: प्रकृति में।

आचार्य: मन प्रकृति में रहता है लगातार। इसका प्रमाण क्या है? मन लगातार सोच रहा होता है गुणों के बारे में, समय के बारे में, आकार के बारे में, जगह के बारे में; मन लगातार इन्हीं में तो उलझा रहता है न। मन में और कुछ सामग्री है? तो मन लगातार किसमें घूमता रहता है?

श्रोतागण: प्रकृति में।

आचार्य: तो मन को प्रकृति से उठाकर के आत्मा तक ले जाना – ये कहलाता है सनातन धर्म। और नहीं है कुछ सनातन ।

क्या संस्कृति सनातन होती है?

नहीं बाबा, नहीं। ये सब तो काल की लहरें हैं, उठती हैं और गिरती हैं। आप कितना भी चाह लो, संस्कृति प्रकृति में लगातार बदल रही है। आप कह भी दो कि वो सनातन है तो भी वो बदल रही है; तो वो सनातन कहाँ से हो गयी?

इस पर थोड़ा सा और एक क्षण लेकर विचार करिए और देखिए कि क्या-क्या प्रकृति में होता है। जो कुछ प्रकृति में होता है, हम वहीं बैठे रहते हैं। इंसान का यही तो दुख है न, यही बंधन है हमारा कि जो कुछ प्रकृति में हैं हम उसी में बैठे रहते हैं। हमारी सारी इंद्रियाँ ही ऐसी हैं जो जाकर के प्राकृतिक विषयों से चिपकी रहती हैं। और उस चिपकने में कोई नुकसान नहीं होता अगर उससे दुख न मिलता। पर उस आसक्ति में दुख है। उसी दुख के उन्मूलन का नाम धर्म होता है।

धर्म की परिभाषा बताइए:

जो जन्मगत दुख है, जो किसी और कारण से नहीं है बस इस कारण से है कि आप मानव हो — भाई, बहुत सारे और दुख होते हैं, उनके और बहुत कारण हो सकते हैं। एक दुख ये हो सकता है अभी कि मैं कोई चीज़ भूल गया उसका दुख है। वो दुख लेकिन सबको नहीं होगा, मैं भूला हूँ तो मुझको होगा। एक दुख ये हो सकता है कि मेरे पास पैसे नहीं हैं। आपके पास पैसे हैं आपको दुख नहीं है। तो वो दुख भी फिर वैश्विक नहीं है।

लेकिन एक दुख है जो होता ही होता है और सबको होता है, कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि आदमी है औरत है, बच्चा है बूढ़ा है, काला है गोरा है, भारतीय है रूसी है, आज का है आज से पाँच हज़ार साल पहले का है या बाद का है। एक दुख है जो सबको होता ही होता है – वो मानवगत दुख है, वो जन्मगत दुख है; आप पैदा हुए हो तो दुख है।

तो धर्म का क्या अर्थ है?

दुख से मुक्ति।

धर्म इसीलिए है कि आपको दुख से मुक्ति दिला सके। धर्म का और कोई नहीं उद्देश्य होता।

क्या आप ये कृपा कर पाएँगे मुझ पर, ये बात याद रख पाएँगे कि धर्म का और कोई उद्देश्य नहीं होता है? धर्म का उद्देश्य ये नहीं होता कि अपनी संख्या बढ़ाओ। मैं ये भी नहीं कह रहा हूँ कि धर्म का उद्देश्य होता है अपनी संख्या घटाओ। कुतर्क मत करिएगा, आजकल बाढ़ आयी हुई है। मैं ये भी नहीं कह रहा कि धर्म का उद्देश्य होता है कि विलुप्त हो जाओ।

लेकिन कोई पूछे धर्म क्या है, तो आप कहें धर्म का ये उद्देश्य है कि अपने मत का प्रचार-प्रसार करो—क्या ये परिभाषा सही है? कुछ बातें बिलकुल गणित के सूत्रों की तरह साफ़ होनी चाहिए, पत्थर की लकीर जैसी अमिट होनी चाहिए।

धर्म माने क्या?

मन पैदा ही अशांत होता है और जीवनभर अपनी अशांति में वृद्धि ही करता रहता है। मन को शांति की ओर, या कह दीजिए आत्मा की ओर ले जाना ही धर्म है। मन दुख में पैदा होता है; मन को दुख से मुक्ति की ओर ले जाना ही धर्म है। इसके अतिरिक्त कोई नहीं धर्म की परिभाषा होती है।

अच्छा, मन को दुख से सुख की ओर ले जाए तो वो क्या हुआ? वो तो आप प्रकृति की एक जगह से दूसरी जगह ले जा रहे हो। चूँकि सुख सनातन नहीं है, इसलिए मन को दुख से सुख की ओर ले जाना सनातन धर्म नहीं है।

सुख की ओर जाने में क्या गड़बड़ हो गयी? दुख तो हटा न, थोड़ी देर को सही, दुख हटा कि नहीं हटा? सुख की ओर जाते हो दुख तो थोड़ी देर के लिए हट ही जाता है लेकिन उसमें समस्या क्या हो गयी? जैसे दुख सनातन नहीं था वैसे ही सुख भी तो सनातन नहीं है। तो इसीलिए सनातन धर्म सुख की खोज का नाम नहीं हो सकता।

अगर धर्म के नाम पर आपको किसी तरह का सुख, मौज-मस्ती, मनोरंजन दिया जा रहा है तो क्या वो सनातन धर्म हो सकता है?

दुख से मुक्ति, जो भीतर दुखी ही बैठा हुआ है उसकी स्वयं से मुक्ति। मैं ख़ुद से ही आज़ाद हो जाऊँ – इसको सनातन धर्म कहते हैं।

क्या सनातन है? इस वक्त पर एक तो मैं कंठस्थ नहीं रख पाता हूँ। कितने ही श्लोक हैं जो मेरे मन में आकर तैर रहे हैं और कितनी ही बातें हैं। अब बोलना शुरू करूँगा तो धीरे-धीरे सब याद आ जाएगा। अब मरने पर बोलता हूँ कि सनातन क्या होता है:

वैद्य मरे, रोगी मरे, मुआ सकल संसार। एक कबीरा ना मरे, जाके राम आधार।। ~ कबीर साहब

ये सनातन की बात हुई। इसमें ‘सनातन’ शब्द कहीं नहीं है, पर समझने वालों को इशारा काफ़ी होता है न। कबीर साहब ने कभी नहीं कहा कि वो वेदान्त की बात कर रहे हैं, कभी नहीं कहा कि मैं उपनिषदों से कुछ उद्धृत कर रहा हूँ। पर मैं उनसे बड़ा वेदांती किसी को मानता ही नहीं।

श्लोकों को याद करना और बात-बात में दोहराना, ये थोड़े ही वेदान्त होता है! वेदान्त क्या है, जो आपको कहाँ को ले जाए? आत्मा की ओर। और आत्मा में स्मृति का कोई स्थान है क्या? क्या स्मृति सनातन होती है? जो कुछ याद है वो भी कहाँ से आया?

श्रोतागण: प्रकृति से।

आचार्य: तो याद रखना भी बड़ी बात नहीं है। याद आ गया, ठीक है; नहीं भी आ गया तो ये मत सोच लीजिएगा कि आप बड़े पंडित हो गये, रट-रुटा लिया इधर-उधर से तो आप सनातनी हो गये। ये रट्टामार सनातन धर्म नहीं चलता।

और अभी मरने पर याद करता हूँ, रुको।

श्रोता: ‘जिस मरने से जग डरे’।

आचार्य: हाँ,

जिस मरने से जग डरे, मेरो मन आनंद । कब मरीहौ, कब भेटिहौ, पूरण परमानंद ।। ~कबीर साहब

ये किस मरने की बात हो रही है?

प्रकृति के अंतर्गत जो मरण होता है जिसमें देह मर जाती है, जला देते हैं उसकी बात हो रही है? किस मरने की बात हो रही है? प्रकृति के प्रति मरने की, प्रकृति के भीतर मरने की नहीं। ये दो तरह की मृत्यु होती हैं। एक ये प्रकृति का क्षेत्र है, इसके भीतर ही पैदा हुए, इसके भीतर ही मर गये। और एक है प्रकृति के प्रति मर गये, आइ हैव डाइड टू मैटेरियल एग्ज़िस्टेंस (मैं भौतिक अस्तित्व के लिए मर चुका हूँ)।

“कब मरीहौ, कब भेटिहौ पूरण परमानंद”

ये सनातन धर्म है, कि प्रकृति से परे चले गये। अष्टावक्र कहते हैं न, कौन हो तुम? "बोधोअहम् प्रकृति परे:।" प्रकृति से परे जाना ही सनातन धर्म है। प्रकृति के भीतर उत्पात मचाना, कूद-फाँद करना, सुख की तरफ़ भागना, कभी बहुत गौरव का अनुभव करना, कभी ये करना, रस्में-रवायत, कर्मकाण्ड – ये सब सनातन धर्म नहीं है, एकदम नहीं है। ये बोलने के कारण बहुत विरोध मिल सकता है; मिलता हो तो मिले, जो सच्चाई है वो तो बोलनी पड़ेगी न।

और?

श्रोता: मरो हे जोगी मरो।

आचार्य: ‘मरो हे जोगी मरो’ – ये बाबा गोरखनाथ का है।

मरो हे जोगी मरो, मरो, मरण है मीठा । ऐसी मरणी मरो, जिस मरणी गोरख मर जीठा ।। ~ बाबा गोरखनाथ

वो मरनी मरो जिसको मरने के बाद गोरख जी उठा। और मरना कोई डरने की बात नहीं है, "मरो, मरण है मीठा।" अरे! बड़ी मीठी बात है, बड़ा आनंद है, बड़ा आनंद है। लेकिन ये बात साधारण आदमी से नहीं बोली जा सकती, तो उन्होंने वो बात बोली भी किससे है—जैसे कबीर साहब बोलते थे "सुनो भई साधो"—तो वो वहाँ पर कह रहे हैं, "मरो हे जोगी मरो।" कह रहे हैं, साधारण लोगों से बोलो तो ये मुँह ही नोच लेंगे! तो वो वहाँ पर बोलते हैं, "मरो हे जोगी मरो।" साधारण आदमी को नहीं बोल रहे हैं कि मरो हे गृहस्थ मरो! बोल रहे हैं, ‘नहीं बाबा, तुम्हें जो करना है कर, तू जी।‘ जोगी को बोल रहे हैं, ‘मरो।‘

ऐसे ही बोलते थे – "सुनो भई साधो"; पहले ही उन्होंने डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) लगा दिया कि साधो से बात कर रहे हैं, बाक़ियों से नहीं कर रहे हैं। बाक़ियों ने अगर सुन लिया और उनको चोट लग गयी तो हमारी ग़लती नहीं है। तुम से बोली ही नहीं थी, तुमने सुन काहे को ली!

हरि मरे तो हम मरे, और हमरी मरे बलाय । साँचे गुरु का बालका, मरे न मारा जाय ।। ~ कबीर साहब

हम आत्मा हो गये अब — आत्मा को ही हरि कह रहे हैं यहाँ पर — अब आत्मा यदि मरती होगी तो हम भी मरेंगे। एक तरह की चुटकी ले रहे हैं। नहीं तो "हमरी मरे बलाय," हमारी बला से मौत आये, हमें अब मौत नहीं आती। "एक कबीरा ना मरे," हमें नहीं अब मौत आती।

अब जब यहाँ पर बोल रहे हैं, "साँचे गुरु का बालका," यहाँ पर गुरु कौन है और बालक कौन है? जल्दी बोलिए। सनातन धर्म पर वापस जाइए क्या परिभाषा थी सनातन धर्म की? सनातन धर्म की परिभाषा दोहराइए।

श्रोतागण: जो मन को आत्मा की ओर ले जाए।

आचार्य: मन और आत्मा, दो ही आते हैं न उसमें? तो "साँचे गुरु का बालका," इसमें भी दो ही दिख रहे हैं।

तो गुरु माने?

श्रोतागण: आत्मा।

आचार्य: बालक माने?

श्रोतागण: मन।

आचार्य: "मरे न मारा जाय।” एक बार मन आत्मा का हो गया, अमर हो जाता है। और जब तक प्रकृति में रहेगा, रोज़-रोज़ मरेगा, तड़प-तड़प कर सौ बार मरेगा। ग़ालिब का है न, क्या?

श्रोतागण: ठहाका लगाते हैं।

आचार्य: ऐसे ही (मुस्कुराते हैं) क्या कहा है ग़ालिब ने रोज़-रोज़ मरने के बारे में? अब मुझे ही नहीं याद आ रहा।

श्रोतागण: हँसते हैं।

आचार्य: मुझे लगा इतने बैठे हैं किसी को तो याद होगा। "मौत तो एक दिन मुअय्यन है, नींद क्यों रातभर नहीं आती।" पता नहीं पूरा सही बोला है कि नहीं, पर ऐसा ही है कि रोज़-रोज़ मरते हो। मरना तो एक दिन है, पर नींद रातभर नहीं आती, प्रति क्षण लगता है मर रहे हो।

और दूसरी ओर वहाँ का जो आनंदघोष है वो सुनो, क्या? ‘साँचे गुरु का बालका, मरे न मारा जाय। हरि मरे तो हम मरे, हमरी मरे बलाय।‘ हम नहीं मरते। उसमें देखो जीवन में कैसी फिर उत्कंठा आ जाएगी, निर्भीकता आ जाएगी, कैसी असीमता आ जाएगी। कुछ नहीं रोक रहा है आपको।

और मरना माने यही नहीं होता कि देह मर गयी, प्राण उड़ गये। मरने का अर्थ होता है भीतर कुछ था; जो था अब नहीं है। और क्या है जो रहता है, फिर नहीं रहता है? जैसे आशा। आशा पर ही तो हम चलते हैं न। और आशा तो रोज़ टूटती है। आशा का टूटना ही मौत है। आप कुछ बनकर आशा करते हो। जो बनकर आपने आशा करी थी — सदा आशा एक ही होती है, मुक्ति की, तृप्ति की — वो आशा पूरी नहीं हुई फिर आपको कुछ और बनना पड़ता है; ये लीजिए ये पुनर्जन्म हो गया। ये सब वेदान्त की बातें हैं जो कि आम जनमानस में पड़कर बड़ी विकृत हो गयीं।

मूर्खों ने जो बिलकुल समझ लीजिए जैसे विज्ञान की टेक्निकल टर्म्स हों, उतनी शुद्ध, उतनी बारीक, उतनी सटीक चीज़ को न जाने जनमानस का, लोकभाषा का कैसा भरता सा, खिचड़ी सी बना दी। तो पुनर्जन्म बहुत सूक्ष्म बात है, बहुत आंतरिक बात है। पुनर्जन्म आप तभी समझेंगे जब पहले आप जन्म का मतलब समझते हों। लेकिन उन्होंने पुनर्जन्म का मतलब बता दिया कि फुर्र से यहाँ से एक उड़ती है और जाकर के कहीं घुस जाती है और ये होता है। और पूरे उस पर इतने किस्से-कहानी और आडंबर लिख दिये कि कोई इंतहा नहीं।

इसी तरीक़े से मन क्या है, यह समझना; सनातन क्या है, जो आज का प्रश्न ही है आपका, ये सब बिलकुल टेक्निकल टर्म्स हैं। जैसे कोई आपसे पूछे कि दो चार्ज्ड पार्टिकल्स के बीच में इलेक्ट्रोस्टेटिक फोर्स कितना होता है, तो आप ऐसे ही कुछ हवा-हवाई बात थोड़े ही करोगे कि एक आटे की गोली बना लो, उसमें थोड़ा तेल मिला दो और फिर फेंक के छत पर मारो। जितनी देर में नीचे गिरे उतने मीटर पर सेकंड का फोर्स है। ऐसे बोलोगे क्या? वह जो बात है, वह बिलकुल स्पेसिफिक (विशिष्ट) है जिससे इधर-उधर नहीं हुआ जा सकता, ठीक वैसे जैसे गणित में दो का सवा दो नहीं चलता।

आपको कोई समस्या दी जाए जिसका हल करने पर दो आना हो और आपका आये दो दशमलव शून्य एक; आपको कितने नंबर मिलते हैं? शून्य। ठीक ऐसे ही अध्यात्म होता है, उतना ही स्पेसिफिक, ऐसे दाएँ-बाएँ नहीं कर सकते। इसीलिए बोला गया है, आप ग़ौर करिएगा कि – "प्रेम गली अति सांकरी, जा में दो न समाय।" इसमें सांकरी का मतलब समझ रहे हो? दाएँ-बाएँ नहीं हो सकता। इसीलिए बोला गया है कि मुक्ति का मार्ग ऐसा है जैसे खड़ग की धार। खड़ग की धार समझ रहे हो? जैसे गणित, एकदम इक्विलिब्रियम (संतुलन) पर चलना है, ज़रा सा भी इधर-उधर नहीं हो सकते। कोई थोड़ा इधर-उधर की बात करे, जान लीजिए आध्यात्मिक आदमी नहीं है।

अध्यात्म का मतलब है बिलकुल सटीक बात करना। गॉसिप (गपबाज़ी) नहीं है अध्यात्म। हवा हवाई, जुमलेबाज़ी, चुटकुले सुनाना, कहानियाँ सुनाना, ये अध्यात्म नहीं है।

सनातन स्पष्ट हो रहा है? क्या सनातन नहीं है ये भी स्पष्ट हो रहा है? प्रश्न बताइए।

प्र१: आचार्य जी, प्रणाम। क्या ये कहा जा सकता है कि आत्मा ही अहम् वृत्ति के माध्यम से जगत के सभी प्राणियों में प्रकट हो रही है? इसी तरह से हमसे सम्बन्धित है क्या अहम् वृत्ति के द्वारा?

आचार्य: बहुत अच्छा प्रश्न है और बहुत अच्छी शुरुआत हो रही है इस दिन की। और मैं चाहूँगा आज ख़ूब लंबा चले। भागिएगा मत।

(श्रोतागण हँसते हैं)

आचार्य: देखिए, वेदान्त का जो मूल प्रश्न है, और जब मैं वेदान्त कहता हूँ तो फिर ऐसा लगता है जैसे मैं किसी विशिष्ट मत की बात कर रहा हूँ। विशिष्ट मत की बात नहीं है, वेदान्त वहाँ पहुँच जाता है जहाँ पूछने वाला ही बैठा हुआ है, उसके आगे आप नहीं जा सकते। तो वो कोई विशिष्ट मत नहीं है। वो आख़िरी बात है बिलकुल। ऐसी आख़िरी बात जिससे आगे जाया नहीं जा सकता क्योंकि बात करने वाला रहेगा तब तो अगली बात होगी न। मैं एक बात करूँ और उसके बाद मैं बचा रहूँ अगली बात करने को, तो न अगली बात होगी।

वेदान्त क्या करता है कि जब आप बात करते हो तो बात को पकड़ कर आप ही के अंदर डाल देता है। आप ही नहीं बचते हैं, अब अगली बात कौन करेगा? तो वेदान्त हो जाता है अपनेआप में आख़िरी बात। मैं आख़िरी बात वेदान्त को इसीलिए नहीं बोल रहा कि मैं एक विशिष्ट मतावलंबी हूँ। जैसे, होता है न फेनेटिक्स (कट्टरपंथी), बिगोट्स (कट्टर) जिसे अंग्रेज़ी में डॉग्मा (हठधर्मिता) बोलते हैं, कि भाई मैंने अपनी बात पकड़ ली है—सबको अपनी ही बात श्रेष्ठ लगती है। वह बात नहीं है बिलकुल भी।

जब बात करने वाला ही नहीं बचा तो अगली बात कौन करेगा। तो आपने पूछा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि आत्मा ही प्रकट होती हो अहम् वृत्ति के रूप में और फिर सब प्राणियों के रूप में? तो वेदान्त सीधे घुसता है प्रश्न पूछने वाले के भीतर। वेदान्त पूछता है – ये सब प्राणी जो हैं ये किसके लिए हैं? कौन कह रहा है कि प्राणी हैं भी? साधारण भाषा में बोलूँ तो एक बड़ी चतुराई छुपी हुई है वेदान्त के अंदर।

आप जैसे पूछोगे न ऋषि से कि मुझे थोड़ा बताइए इस खंभे के बारे में, तो आपने एक बड़ी असंप्शन (मान्यता) के साथ पूछा है, खंभे के बारे में आपकी एक मान्यता है। वो हमें पता नहीं चलता कि मान्यता है, पर वो होती है। और ऋषियों ने वह मान्यता पकड़ ली थी, ये उनकी सूक्ष्मता का प्रमाण है कि ये बात उन्होंने पकड़ ली थी कि आप चलते मान्यताओं पर हो।

जहाँ आपको ये भी लगता है कि आप बिलकुल निष्पक्ष होकर के कुछ कह रहे हो, वहाँ भी आपने एक पक्ष पकड़ रहा होता है। पक्ष से आशय है मान्यता। जब आप कहते हो कि यह खंबा है, इसके बारे में कुछ कहें, तो क्या मान्यता है आपकी?

श्रोतागण: खंभा है।

आचार्य: ये हुई न बात! आपकी मान्यता यह है कि खंभा है। और ऋषि कहते हैं, "थम, मैं आगे जाने ही नहीं दूँगा, कैसे पता कि है?" अब यह प्रक्रिया अंतर्गमन की शुरू हो गयी। आपने कहा, ‘ऋषिवर, खंभे के बारे में कुछ कहें,’ और ऋषिवर खंभे के बारे में कुछ कहेंगे ही नहीं, और मुस्कुराकर कहेंगे, ‘आ गया पकड़ में, अब ये नहीं जाने वाला।' क्योंकि आपने जब खंभे के बारे में पूछा न तो आपने पूछा है प्रकृति के बारे में। और ऋषि एक सूत्र जानते हैं कि प्रकृति में दो हमेशा एक साथ चलते हैं – दृश्य और दृष्टा; अपरा प्रकृति और परा प्रकृति। लेकिन आपको दिखायी इनमें से एक ही पड़ता है। दूसरा क्यों नहीं दिखायी पड़ता?

श्रोतागण: दूसरा हम स्वयं हैं।

आचार्य: बहुत बढ़िया! क्योंकि दूसरा हम स्वयं हैं। अपनेआप को कौन देख पाता है? अपनेआप को कौन देख पाता है? जैसे होता है न कि भाई गिनो यहाँ कितने लोग हैं, तो कई बार संख्या एक कम आएगी; क्यों कम आती है? अपनेआप को भूल जाते हो।

यही चीज़ अध्यात्म को विज्ञान की अपेक्षा विशिष्ट बनाती है। अगर दस हैं कमरे में तो विज्ञान नौ के बारे में अचूक बात बोलेगा, दसवीं की ओर वो देखता नहीं है। अध्यात्म का काम है बस उस दसवें को देखना, और अध्यात्म कहता है कि दसवें को देख लिया तो नौवें को ज़्यादा बारीकी से समझ पाओगे। जो दसवाँ है वह कौन है? वह मैं ख़ुद हूँ न।

तो खंभा है ये कैसे पता? अभी ये प्रक्रिया शुरू हुई है कि पूछने वाला बोले, "मेरी इंद्रियों ने बताया।"

तो ऋषि फिर तुरंत प्रमाण पर चले जाते हैं – एपिस्टेमोलॉजी (ज्ञानमीमांसा)। वो कहते हैं, ‘कोई और प्रमाण है कि खंभा है, तुम्हारी इंद्रियों के अलावा? कोई और प्रमाण है?’

कहते हैं, ‘नहीं, कोई और प्रमाण नहीं है, मैं ही प्रमाण हूँ कि यह खंभा है।‘

ऋषि कहते हैं, ‘देखो बेटा, जिसको आधार बनाकर किसी दूसरी चीज़ को प्रमाणित करा जाता है न, वह पैमाना सबसे पहले सच्चा होना चाहिए।‘

आप एक तराज़ू पर वज़न नापते हो सबसे पहले वज़न सही आये इसके लिए शर्त क्या होना चाहिए? कि तराज़ू सच्ची है। आप अपना वज़न नापते हो, जो वज़न नापने की मशीन होती है, सबसे पहले देखते हो न कैलिब्रेटेड ठीक से है कि नहीं। कोई उस पर खड़ा नहीं है तब भी वह ढाई किलो वज़न दिखा रही है, तो आपको तकलीफ़ हो जाएगी। फिर कहोगे, ‘कुछ खाया न पिया, ढाई किलो वज़न कैसे बढ़ गया।‘ क्योंकि आपने जो पैमाना, जो मानदंड चुना है, जो यार्डस्टिक है आपकी वही गड़बड़ है। अब खंभा है, इस बात का पैमाना आपने किसको बना रखा है?

श्रोतागण: अपनेआप को।

आचार्य: तो आप अपनेआप को ही सत्य बोल रहे हो? कह रहे हो, ‘मैं ही पैमाना हूँ, आइ एम द प्रूफ, आइ एम द यार्डस्टिक, आइ एम द बेंचमार्क।‘

ऋषि कहते हैं, ‘ये नहीं चलता, ये नहीं चलता। तुम कहाँ के भगवान हो गये, भाई? तुम अपनेआप को ही सत्य बोलने लग गये? तुमने कह दिया मुझे दिख रहा है तो ज़रूर है; ऐसे नहीं चलेगा।‘ बोलें, ‘और बहुत सारी ऐसी चीज़ें होती है जो एक व्यक्ति को प्रतीत होती हैं, माने अनुभव होती है, दूसरे को नहीं होती।‘

साधारण प्रकृतिस्थ व्यक्ति की पहचान यह है कि वह अपने अनुभवों को ही सत्य का निर्धारक बना देता है।

वह कहता है, ‘जो मुझे अनुभव हो रहा है वो सत्य है।‘ यह कहकर के उस बेचारे को पता भी नहीं है कि उसने घोषित कर रखा है कि अहंकार ही सत्य है।

ये समझ में आ गयी बात?

बाक़ी जितने मत हैं वो अहम् का नाम ही नहीं लेते, वो दुनिया की बात करते हैं। इतने सारे तो अपने धर्म देखे हैं, सारे ही धर्म लगभग ऐसे हैं जो कहते हैं दुनिया ऐसे बनाई गयी, एक ईश्वर है और ईश्वर के कई नाम होते हैं अलग-अलग धाराओं में। एक ही ईश्वर है और उसने दुनिया ऐसे बना दी।

वेदान्त इन सब से एकदम मूलभूत रूप से भिन्न है। वो कहता है, ‘थमो! दुनिया किसके लिए है? कौनसी दुनिया? दुनिया तुम्हारी है तो यह दुनिया बनायी भी तुमने ही है। किस ईश्वर की बात कर रहे हो, कौनसा गॉड है, कौनसा अल्लाह?’

इतना ही नहीं, वेदान्त जाकर के विज्ञान से भी भिड़ जाता है जब विज्ञान बात करता है बिग बैंग की। वेदान्त कहता है, ‘देखो किसी भी समय पर जो दृश्य है वह उस समय के दृष्टा के सापेक्ष होता है। दृश्य जो है, दृष्टा जैसा है उसके रेफरेंस (हवाला), उसके कॉन्टेक्स्ट (संदर्भ) में होता है। तुम मुझे बताओ, बिग बैंग को देखने वाली कॉन्शियसनेस (चेतना) तब कैसी थी? तुम कर क्या रहे हो, विज्ञानिकों, ग़लती कि तुम आज की कॉन्शियसनेस को ले रहे हो और तब के बिग बैंग की कल्पना कर रहे हो, जो बिलकुल एब्सर्ड (बेतुकी), ग़लत बात है यह।‘

नहीं समझे?

भाई, यह जो पूरी प्रक्रिया रही है काल की, एवोल्यूशन (विकास) की, इसमें कॉन्शियसनेस बदलती रही है न। तो किस समय पर दृश्य कैसा है, इसको एक ही है जो प्रमाणित कर सकता है, कौन? उस समय की चेतना। अब बताओ बिग बैंग के समय की चेतना कैसी थी? तुम बताओ, क्या आज जैसी थी? हमें अच्छे से पता है चेतना बदलती रही है।

ये जो इंसान है, आज इसकी जैसी चेतना है, क्या आज से दस लाख साल पहले ऐसी चेतना थी जब चिम्पांजी बनकर घूम रहे थे? तब दूसरी चेतना थी न। और दृश्य का निर्धारण तो करता है उस समय की चेतना। तो मुझे बताओ बिग बैंग के समय पर दृष्टा कैसा था? वैज्ञानिकों को वो पता नहीं तो वो बोल रहे हैं कि तुम बिग बैंग की बात कैसे कर रहे हो।

तुम आज की कॉन्शियसनेस को लेकर के तब के सीन (दृश्य) का निर्धारण कर रहे हो। सियर (दृष्टा) कब का है? आज का। और सीन कब का है? तब का। लेकिन तुम दोनों को ले रहे हो क्योंकि तुमको लग रहा है कि जो सीन होता है वह सियर के इंडिपेंडेंट होता है और तुम भूल कर रहे हो यहाँ पर।

वेदान्त की यही मूल बात है – उसने पकड़ लिया है कि दृश्य और दृष्टा आपस में गुथे होते हैं। जो तुमको दिख रहा है वह बदल जाता है जैसे ही तुम बदल जाते हो। तुम बदले नहीं कि जो तुमको दिख रहा है वह एकदम बदलने लग जाता है।

समझ में आ रही है बात ये?

दुनिया आपको जैसी दिखती थी आज से पंद्रह साल पहले वैसे ही दिखती है क्या? एक चिट्ठी आ जाती है, उसको पढ़ने के बाद दुनिया जैसी थी, दो पल में बदल जाती है कि नहीं बदल जाती है? बोलिए हाँ या ना। तो दुनिया क्या चीज़ है वह तो आप पर निर्भर करता है। दुनिया तो वैसे ही बदलती है जैसे आप बदलते हो।

अंगुलिमाल बुद्ध से मिलें; पाँच मिनट पहले दुनिया क्या थी, पाँच मिनट बाद दुनिया क्या हो गयी? क्या हो गयी? सब बदल गया, सब बदल गया। आप यहाँ बैठे हुए हो, कोई नशीली चीज़ ले लो, देखिए दुनिया सिर्फ़ अर्थ के संदर्भ में नहीं बदलती है, तथ्य ही बदलने लग जाएँगे। शराब पीकर गाड़ी चलाने पर दुर्घटना क्यों हो जाती है? दुनिया बदल जाती है, इसीलिए बाबा! डिवाइडर (हाथ से नकार का इशारा) नहीं दिखता है। दुनिया बदल गयी, डिवाइडर कहाँ है बताओ? डिवाइडर होता तो दुर्घटना कैसे हो जाती। दुनिया बदल गयी कि नहीं? क्या डिवाइडर चला गया था तथ्य के तौर पर? नहीं।

आप बदल गये, दुनिया बदल गयी। सिर्फ़ अर्थ के तौर पर ही नहीं, पदार्थ के तौर पर भी।

एक तो होता है कि द मीनिंग ऑफ द वर्ल्ड हैज़ चेंज्ड फॉर मी (मेरे लिए दुनिया का अभिप्राय बदल गया), है न? मीनिंग बदल गयी है। सिर्फ़ मीनिंग ही नहीं बदलती है, फैक्ट्स भी घूमने-फिरने लग जाते हैं।

मैं कितनी बार बोलता हूँ, अभी आप यहाँ पर जो नॉन ह्यूमन स्पीशीज़ (गैर-मानवीय प्रजातियाँ) हैं उनको ले आएँ। मुझे यहाँ पर बड़ा भला सा लग रहा है, शोर नहीं है। पर अभी यहाँ पर एक कुत्ता हो, उसके हिसाब से यहाँ पर बहुत आवाजें हैं। तो मुझसे अभी कोई पूछेगा साहब दुनिया कैसी है, मैं कहूँगा शांत है। और यहीं पर आप कुत्ते को ले आएँ, उससे पूछें दुनिया कैसी है, वो बोलेगा, ‘बहुत शोर हो रहा है।‘ बस बात इतनी सी है कि वह शोर हमें सुनायी नहीं पड़ रहा है क्योंकि हमारे कान सिर्फ़ बीस से बीस हज़ार हर्ट्ज के बीच में ही काम करते हैं; उसके आगे-पीछे काम ही नहीं करते।

ये आँखें हैं, ये चार हज़ार से आठ हज़ार आर्मस्ट्रांग के बीच में ही काम करती हैं, आगे-पीछे काम ही नहीं करतीं। ठीक है न? मैं यहाँ बिलकुल अंधेरा कर दूँ, बिलकुल अंधेरा। आप बिलकुल यहाँ अंधेरा रखते, उदाहरण दे रहा हूँ, एकदम अंधेरा, घुप्प। और मुझे यहाँ लेकर आते, मुझसे कोई पूछता यहाँ कितने लोग हैं, मैं कहता कोई भी नहीं है शायद। ठीक है? और फिर मुझे आप इंफ्रारेड विजन (अवरक्त दृष्टि) की कोई डिवाइस (यंत्र) दे देते, उससे अंधेरे में भी दिखने लगता है। दुनिया बदल गयी कि नहीं बदल गयी? मेरे बदलते ही दुनिया बदल जाती है न। एक की जो दुनिया है वह दूसरे की नहीं है। यह बात वेदान्त ने पकड़ रखी है।

यह बात समझ में आ रही है?

चुँकि दुनिया मुझ पर निर्भर करती है इसीलिए दुनिया में कुछ भी ऐसा नहीं हो सकता जो मुझमें पहले से ही नहीं है। समझाने के लिए ऋषि कहते हैं, ‘मुझे बताओ, अच्छे से बताओ, साफ़-साफ़ बताओ बच्चे, तुम्हारी छाया के पास ऐसा क्या है जो तुम्हारे पास नहीं है? दर्पण में तुम्हारे प्रतिबिंब के पास ऐसा क्या है जो तुम्हारे पास नहीं है? बोलो, बोलो क्या है?’ कुछ भी नहीं। लेकिन हम भूखे-प्यासे-मरे लोग, हम अपनी छाया में तृप्ति खोजते हैं। माने कहाँ तृप्ति खोजते हैं?

श्रोतागण: बाहर संसार में।

आचार्य: मेरे ही प्रतिबिंब का क्या नाम है?

श्रोतागण: संसार।

आचार्य: और हर आदमी संसार में ही खोज-तलाश रहा है कि नहीं, ये मिल जाएगा, वो मिल जाएगा। जिन्होंने दुनिया के चरित्र पर ग़ौर करा, संसार का बड़ा निष्पक्ष अवलोकन करा, उन्होंने कहा, ‘भाई, उधर (बाहर) जो कुछ है वह तो इधर (भीतर की तरफ़ इशारा करते हैं) से ही आ रहा है, उधर जो कुछ है वो तो इधर से ही आ रहा है। मैं गोदाम हूँ, वो दुकान है।‘ दुकान में क्या कुछ ऐसा हो सकता है जो गोदाम में नहीं है? लेकिन गोदाम का मालिक अपनी ही दुकानों में जाकर खोज रहा है कुछ नया मिल जाए; कुछ मिलेगा? कुछ मिलेगा?

तो फिर उन्होंने कहा कि तुम्हारी तलाश की दिशा ग़लत है। तुम्हारी तलाश की दिशा ही ग़लत है। दुख से मुक्ति चाहिए न? वही अध्यात्म का लक्ष्य है। दुख से मुक्ति तुम्हें वहाँ नहीं मिलेगी जहाँ तुम खोज रहे हो। वहाँ तुम्हें सिर्फ़ भटकाव मिलेगा, मुक्ति नहीं मिलेगी।

तुम सचमुच अगर अपने शुभचिंतक हो और मुक्ति चाहते हो तो तुम्हें इस प्रक्रिया को ही समझना पड़ेगा। समझने में मुक्ति है, बोध में मुक्ति है। समझ गये तो मुक्त हो गये। पाने से मुक्त नहीं होओगे। बोलिए, समझने से मुक्त होओगे। पाकर मुक्ति?

श्रोतागण: नहीं मिलती है।

आचार्य: समझकर मिल जाती है। जो समझ गया वह आज़ाद हो गया। जो अभी खोज रहा है वह फँसा रहेगा। इस तर्क की पूरी श्रृंखला में कहीं आपको कुछ गड़बड़ दिख रहा हो तो बोलते चलिएगा। नहीं तो एक बार बात सुन ली तो पर्याप्त होना चाहिए कि आप जब इस भवन से बाहर निकलें, तो आपको वही व्यक्ति नहीं होना चाहिए जैसा आया था। और वह तभी होगा जब आप अपनेआप को पूरी तरह आश्वस्त कर लें कि कहीं भी कुछ छूटा नहीं है, कोई कड़ी कमज़ोर नहीं है, लूज एंड नहीं है कोई। और आपसे बात कर रहा हूँ, आप प्रश्न करते रह सकते हैं। कोई मेरे पास लेक्चर जैसा है भी नहीं देने के लिए।

(प्रश्नकर्ता से पूछते हुए) आपने जो प्रश्न पूछा था वह स्पष्ट हो गया है जब आपने कहा था कि क्या आत्मा ही प्राणी बन जाती है? नहीं हुआ? ठीक है।

तो ये सारे जो प्राणी हैं ये किसकी दृष्टि में हैं? प्राणी के लिए ही प्राणी हैं न। जब तक आप अपनेआप को प्राणी मान रहे हो तो आपको चारों तरफ़ क्या दिखायी देंगे?

श्रोतागण: प्राणी दिखाई देंगे।

आचार्य: और जिस क्षण आप जान गये कि प्राणी होना ही एक भूल है, तो आपको कहीं कोई प्राणी दिखायी देगा क्या? आप पूछोगे, ‘क्या दिखायी देगा?’ जब तक आप प्राणी हो आपको कैसे बताएँ क्या दिखायी देगा। जब आप कहते हो कि ‘क्या आत्मा ही समस्त विविधताओं वाली प्रकृति बन जाती है?’ तो इसका उत्तर है कि ये आप पर निर्भर करता है कि आप कौन हो। अगर आप आत्मस्थ हो गये हैं तो आप प्रकृति के पार देखने लगते हो, विविधताएँ फिर आपको बहुत आकर्षित नहीं करतीं।

देखो, जो प्रकृति को जितना सच्चा मानेगा, वो विविधताओं में उतना ही लिप्त होगा न। देखो, इनका नीला है ऊपर कार्डिगन, और इन्होंने जैकेट डाल रखी है भूरे रंग की, उनका चश्मा बड़ा प्यारा है; इन्होंने बाल कितना सुंदर कटा रखे हैं – ये सब क्या दिखाई दे रही है मुझे?

श्रोतागण: विविधताएँ।

आचार्य: और किसी को याद आ गया कि, "हाड़ जले ज्यों लाकड़ी केश जले ज्यों घास ।" अब वह कैसे अंतर करेगा इनके बालों में, उनके गालों में, उनके कोट में, इनके कार्डिगन में? सब तो राख हो गया था, कहाँ अंतर बचा था कुछ। तो कैसे अंतर करोगे?

जिसको बात समझ में आने लगती है, फिर विविधताएँ, रंग, अलग-अलग, इंद्रधनुष उसको दिखने लग जाता है जैसे किसी वैज्ञानिक को दिखने लग जाए कि ‘तुम मुझे क्या दिखा रहे हो कि ये तलवार है और कह रहे हो शमशीर-ए-सुलेमानी, मुझे पता है न यह क्या है, स्टेनलेस स्टील है। और यह एक तलवार दिखा रहे हो मुझे, दूसरी ओर ज़ंजीर दिखा रहे हो मुझे, मुझसे पूछोगे मैं कहूँगा दोनों आयरन (लोहा) हैं।‘

यही उदाहरण अष्टावक्र इतनी बार देते हैं, वह बोलते हैं, सोने का कंगन होता है उसको गला दिया तो क्या है?

श्रोतागण: सोना।

आचार्य: और लहरें होती हैं और फेन होता है और बुदबुदें होते हैं, ये मिट गये तो क्या है? सागर। नाम-रूप-आकार क्षण भर के होते हैं, इनमें तुम कहाँ फँसे जा रहे हो। तो जब तक प्राणी की परिभाषा ही वही है जिसे विविधताएँ दिखायी दें, पहली बात; जो अपनेआप को इन सब विविधताओं से पृथक माने।

अब ये बात आपने नयी खोल दी, बैठिए, सुंदर है।

देखिए, पृथकता का क्या मतलब होता है? पृथकता का मतलब होता है अहंकार। नहीं तो इसमें (कॉफ़ी मग की ओर दिखाते हैं) और मुझमें अंतर क्या है? इसमें और मुझमें अंतर बस यह है कि मेरे देखे यह मैं-मैं नहीं बोलता और मैं बोलता हूँ 'मैं'। अन्यथा तात्विक दृष्टि से पंचभूत ये (मग) भी है और पंचभूत ये (स्वयं के शरीर की ओर इशारा करते हुए) भी है। बस ये (मग) ‘मैं-मैं’ नहीं बोलता। और ये जो 'मैं' है, ये इस काया के भीतर कहीं होता नहीं।

अहम् मिथ्या है यही तो सिखाया गया है न। माने इसको (मग को) लगता नहीं कि इसमें अहम् है। और इसको (स्वयं) लगता है कि इसमें अहम् है, इसको लगता है तो भी है तो मिथ्या ही! तो सच पूछो तो इसमें (मग में) और इसमें (स्वयं) कोई अंतर नहीं है।

प्राणी वह है जिसे तमाम विविधताएँ दिखायी देती है और जो अपनेआप को हर चीज़ से पृथक मानता है। पृथक मानने का मतलब ही होता है कि तुम आत्मा में नहीं हो, तुम अहंकार में हो; वरना पार्थक्य आता कहाँ से?

नहीं आ रही बात समझ में?

मैं पृथक कैसे हुआ? क्या ये (मग) बोलता है कि इससे (माइक से) पृथक है? क्या ये (माइक) बोलता है इससे (मग से) पृथक है? क्या कोई चीज़ अपनेआप को दूसरे से अलग घोषित करती है?

मेरी नज़र में मैं सबसे अलग हूँ। मैं क्यों सबसे अलग हूँ? क्योंकि मैं बोलता हूँ 'मैं'। लेकिन आप इस 'मैं' का जितना शोधन करते हैं, जितना इसके भीतर घुसते हैं कि 'मैं' क्या बला है, उतना पता चलता है कि ये तो है ही नहीं। तो अगर 'मैं' है ही नहीं तो मुझमें और इसमें (मग में) सचमुच कोई अंतर है क्या? कोई अंतर नहीं है न। जब कोई अंतर नहीं रह जाता तो आप आत्मस्थ हैं; जब तक अंतर है तो आप अहंकार हैं। आप अहंकार हैं। और जो अहंकारी होता है उसी के दो-तीन नाम होते हैं, एक नाम है प्राणी, एक नाम है जीव। अहंकार का ही दूसरा नाम है जीव; इसीलिए मुक्ति को कहा जाता है—जो उसका और खुला हुआ नाम है, व्यापक नाम है—जीवनमुक्ति।

जीवन मुक्ति का अर्थ ही यही है कि जीव जो अनुभव करता है लगातार, उसे कहता है जीवन। ‘जीव ही न रहूँ,’ यही मुक्त होने का नाम है – "न मे जीव इतिज्ञातवा जीवनमुक्त उच्यते।" ‘मैं जीव ही नहीं हूँ’ – यह जानने वाले को ही जीवनमुक्त कहते हैं। ठीक है। तो ये जो प्राणी घूम रहे हैं, ये हैं ही नहीं। और इसी को जानने को जीवनमुक्ति कहते हैं। ‘न मे जीव’ – मैं जीव नहीं हूँ; ‘इति ज्ञातवा" – ये जानने को ही; ‘जीवनमुक्ति उच्यते’ – जीवनमुक्ति कहते हैं। मैं जीव हूँ ही नहीं।

ये प्राणी क्या आत्मा को दिख रहे हैं? दोहराइए मेरे साथ, ये सारे प्राणी, इनको कौन सच्चा मान रहा है? अहंकार। तो आपने पूछा कि आत्मा प्राणी बन जाती है किसके लिए? जो आत्मस्थ होगा वह तो कहेगा ये जितने जीव हैं, ये वैसे ही हैं जैसे गंगा किनारे बहुत सारी बालू फैली हुई है उसके अलग-अलग कण हैं, अनंत कण हैं। अरे! उनमें अंतर क्या है? रेत के एक कण में और दूसरे कण में कोई अंतर है क्या? वैसे ही ये सब हैं। बस इनमें से हर एक ने रटंत लगा रखी है – मैं, मैं, मैं।

आपके ही प्रश्न का समानार्थी प्रश्न है – निर्गुण सगुण कैसे बन जाता है? निराकार साकार कैसे बन जाता है? बड़ा पुराना सवाल है, शास्त्रीय सवाल है। जैसे उन्होंने पूछा न कि आत्मा विविध होकर के, प्रकृति बनकर के सारे प्राणी अलग-अलग क्यों दिखायी देते हैं? वह मूल में यही प्रश्न है, शताब्दियों पुराना प्रश्न है कि ये निर्गुण सगुण कैसे बन गया। निराकार को क्या पड़ी थी साकार बनने की? जब आत्मा अपनेआप में परिपूर्ण है तो वह अहम् वृत्ति क्यों बन गयी? अद्वैत-द्वैत होकर क्यों दिखायी देता है? ये सब एक ही सवाल हैं।

तो उसका उत्तर भी एक ही होता है – तुमको लग रहा है ऐसा, हुआ नहीं है ऐसा। तुम पूछ रहे हो निर्गुण सगुण कैसे बन गया; तुम्हारे प्रश्नों में एक मान्यता है कि ऐसा हुआ है। ऐसा हुआ नहीं है, ऐसा तुमको लग रहा है। ऐसा तुमको क्यों लग रहा है क्योंकि तुम अपनेआप को जीव मानते हो। जब तक तुम अपने आपको जीव मानोगे तुम्हें यही लगेगा कि चारों ओर सगुण संसार है।

जैसे ही तुम्हारे भीतर से जीवत्व जाता है, वैसे ही तुमको प्रकृति में भी एकत्व दिखायी देता है।

और जब प्रकृति में एकत्व दिखायी देता है उसको अध्यात्म में कहते हैं समभाव। समभाव, एकत्व है, काला-गोरा, अच्छा-बुरा, हानि-लाभ। अब बताओ पृथकता कहाँ बची? और जब सबकुछ सेम टू सेम (एक सा) तो मैं भी और आप भी सेम टू सेम। क्या अलग बचा? और मैं और आप एक हैं, इसी भाव को दर्शाने के लिए फिर इस तरह की कहानियाँ भी कही गयी कि संत ऐसे हो जाते हैं कि चोट उसको लगती है और निशान इनकी पीठ पर आते हैं।

रामकृष्ण परमहंस की एक सुनी होगी आपने कथा कि दूर कहीं किसी को चोट लग रही थी और उनके लोगों ने देखा कि उनके पीठ पर निशान हैं। यह कोई तथ्यात्मक कहानी नहीं है कि आप कहें की फोटो दिखाओ कहाँ पर निशान हैं। यह एक प्रिंसिपल (सिद्धांत) को समझाने के लिए बात कही गयी है, यह कंसेप्चुअल क्लैरिटी (वैचारिक स्पष्टता) के लिए बात कही गयी है। वो यह है कि पृथकता मिट जाती है जैसे-जैसे ज्ञान का उदय होता है।

जब ज्ञान बढ़ता है तो अपने-पराये का भेद मिट जाता है। इसका मतलब यह नहीं कि आप खोजने पहुँच जाएँ कि सचमुच उनके निशान आये थे। सचमुच नहीं आ जाता निशान; कैसे आ जाएगा? प्रकृति के भी अपने नियम होते हैं, बाबा! उनका उल्लंघन कोई नहीं करता।

ये स्पष्ट हो रही है बात?

बोलिए, आगे बढ़िए।

प्र२: नमस्कार, आचार्य जी। इस बात से मुझे यह तो समझ आ गया कि हम सब तत्वतः तो एक हैं, हम सभी। लेकिन पृथकता एक चेतना के स्तर में दिखायी देती है कि सबकी चेतना का स्तर अलग-अलग है। तो तत्वत: तो मैं सब को एक ही समझ रही हूँ लेकिन फिर भी चेतना के स्तर से मैं पृथक ही देख पा रही हूँ।

आचार्य: चेतना का स्तर सबका अलग-अलग है, वो सत्य नहीं है, वो चुनाव है। वह सत्य नहीं है, वह चुनाव है। सत्य में निर्विकल्पता होती है और चेतना सब ने अपनी अलग-अलग पकड़ रखी है, ये एक विकल्प की, माने चुनाव की बात है। तो सबकी चेतना अलग-अलग तरह की, रूप-रंग की, आकार की, स्तर की है, ये बात सत्य की नहीं है।

सत्य के साथ कौनसा शब्द है? निर्विकल्प। और चेतना जो है सबकी अलग-अलग है। वेदान्त कहता है कि यह आपकी मर्ज़ी है। ये आपकी मर्ज़ी है, आपने चुना है। भाई, चेतना के स्तर अलग-अलग हैं इसी को दूसरे शब्दों में कह सकती हैं आप कि सब ने बंधन अलग-अलग चुने हैं।

मेरा आपसे अलग होना वास्तव में यही बात है कि आपके और मेरे बंधन अलग-अलग हैं। जैसे ही बंधन सारे हट जाते हैं, आपके बंधन न रहें, मेरे बंधन न रहें; तो हम-आप एक हो गये न। हमारे आपके जो भेद हैं, वो हमारे बंधनों के भेद हैं। ठीक। ये तो आपका चुनाव है कि आपने कौनसा बंधन चुना है; मत चुनिए। ये चुनाव है। तो वेदान्त आपको असीम शक्ति देता है, वो मजबूरी में विश्वास करता ही नहीं।

आप कुछ भी बोलेंगे कि आपकी ऐसी स्थिति है—पार्थिव स्थिति कि नहीं बात हो रही है, प्रकृति के तो अपने नियम हैं, उन्हें नहीं बदला जा सकता अभी हमने कहा। ठीक है। कोई ट्रक आकर आपके ऊपर चढ़ गया, वेदान्त यह नहीं कहता कि आपका चुनाव था कि आपकी हड्डियाँ टूट गयीं। यह नहीं बोल रहा वेदान्त। लेकिन आप हड्डी तो हो नहीं; आप कौन हो? चेतना। चेतना की क्या स्थिति है, यह आपके चुनाव की बात है, पूरे आपके अधिकार की बात है। वेदान्त आपको इतना बल देता है।

पूर्ण सशक्तिकरण का नाम है वेदान्त। कहता है, ‘तुम जो भी अनुभव कर रहे हो तुम्हारा चुनाव है, चाहो तो पल में बदल जाये।‘ दुखी हो? तुमने चुना है। भ्रमित हो? तुमने चुना है। जीव बने बैठे हो? तुमने चुना है।

इसीलिए वेदान्त यह नहीं कहता कि अनिवार्य है कि बहुत-बहुत समय लगे, दस-बीस साल लगें किसी बात को समझने में, मुक्ति में। अभी हाल के वर्षों के जो सबसे प्रखर वेदांती हैं, कृष्णमूर्ति, मैं उनको मानता हूँ। वो एक बड़ी विचित्र बात कहा करते थे, लोगों की समझ में ना आये। वो कहा करते थे, ‘अगर तुमने ठीक से सुनी है मेरी बात तो तुम बदल चुके हो। तुम्हें फिर न किसी उपाय की ज़रूरत है, न किसी अभ्यास की ज़रूरत है। अगर ठीक से सुन लिया है तो तुम बदल चुके हो।‘

वास्तव में आज थोड़ी देर पहले मैंने भी आपसे यही कहा था। वो थोड़ा ज़्यादा ज़ोर देकर कहते थे कि अभी ही बदल गये। मैंने इतना ही कहा कि आज शाम को निकलोगे तो बदले हुए निकलोगे। पर वो बात वही है कि भाई देखो कुछ अगर करना हो तो वक़्त लगता है। मैं आपसे कहूँ यहाँ से उठकर के आपको मुंबई जाना है तो वक़्त लगेगा न। पर मैं आपसे कहूँ कि जान लो कि कहाँ बैठे हो, इसमें क्यों वक़्त लगना चाहिए?

तो वेदान्त यह कहता ही नहीं है कि आपको कोई यात्रा करनी है, बहुत लंबी-चौड़ी मेहनत करनी है, मंज़िल बहुत दूर की है। वेदान्त कहता है कि तुम भटके हुए नहीं हो, तुम नशे में हो बस। तुम्हें कुछ पाना नहीं है, तुमने जो व्यर्थ पकड़ रखा है उसको तुम्हें छोड़ना है। अगर कुछ पाना हो तो समय लगेगा न? ये दुनिया है, दुनिया में कुछ भी पाने के लिए समय लगता है। जाओ, दौड़-धूप करो, मिले न मिले, मेहनत करी। पर कुछ है अनावश्यक जो पकड़ रखा है, तो उसको छोड़ने में वक़्त क्यों लगना चाहिए?

वेदान्त इसीलिए कहता है कि सत्य तुम्हारे पास पहले से है। अब इस बात को लोग समझ नहीं पाएँ। वेदान्त ने तो बस इतना ही बोला था कि सत्य स्वभाव है पहले से है। लोग इस बात को समझ ही नहीं पाएँ, उन्होंने कह दिया इसका मतलब है कि आत्मा तुम्हारे भीतर है।

देखो हुआ क्या है, जो ट्रेजेडी (त्रासदी) है उसको समझो। सत्य के लिए ‘आत्मा’ नाम है न वेदान्त में। और इतनी ऊँची बात है कि हमारे ही होने को सत्य कहा वेदान्त ने। कोई बाहर की चीज़ को नहीं कि आसमानों पर कुछ बैठा हुआ है, आसमान-वग़ैरा की बातें बच्चों की हैं वहाँ पर। सत्य क्या है? आत्मा। ये दो कितने अलग-अलग शब्द हैं लेकिन इनको कहा गया कि एक हैं – आत्मा ही सत्य है। सत्य वही है, तुम ही सत्य हो।

लेकिन जब कहा गया तुम ही सत्य हो, पर यह बात किसी ऐसे आदमी के कान में पड़ जाए जो देहभाव से ग्रस्त है—ऋषि ने कहा तुम ही सत्य हो, बस तुम्हारे ऊपर बेकार चीज़ों के छिलके हैं जिन्हें तुम्हें छोड़ना है। तुम्हें कुछ पाना नहीं है, तुम्हें बस छोड़ना है। तुमने ग़लत और व्यर्थ चीज़ों के अपने ऊपर छिलके डाल रखे हैं, जिन्हें बस छोड़ना है। कृष्ण भी वही बात अभी गीता में बोलते हैं, कहते हैं, ‘जैसे आग होती है, दिखायी नहीं देती, ऊपर क्या छा जाता है? धुआँ। तो ऐसा थोड़े ही न है कि आग नहीं है; आग है, पर कुछ और है जो छाया हुआ है। वही बात वेदान्त की है एकदम कि सत्य हो तुम लेकिन तुमने सौ बेकार की चीज़ें अपने ऊपर लपेट रखी है; तुम्हें उनको छोड़ना है।

अब ये बात सुन ली किसी देहभाव वाले आदमी ने कि सत्य तो तुम्हारे अंदर ही है, छिलकों के अंदर ही है। उसने कहा, ‘मैं तो हूँ शरीर और सत्य मेरे अंदर है।‘ इसका क्या मतलब है? उसका तर्क समझिए, उसने कहा कि आत्मा मेरे अंदर है। तो ऐसे लोगों ने आगे जाकर किताबें भी लिख दीं और बोल दिया आत्मा होती है, अंदर बैठी होती है। और वो चीज़ फिर चली आ रही है। पंडितों से पूछेंगे तो वो आत्मा का आकार भी बता देते हैं कि इतनी बड़ी आत्मा है!

(श्रोतागण हँसते हैं)

और मृतक के जाने के इतने दिनों बाद तक वह आस-पास टहलते रहती है। जो जगहें उसको पसंद थीं वहीं जाकर बैठती है। और इतनी छोटू सी है तो दरवाज़ा वग़ैरा बंद भी करो तो वो सरक आती है।

और ऋषि वहाँ बैठकर सिर धुन रहे हैं, कह रहे हैं, ‘क्या बताया था, क्या कर लिया इसने!’ और प्रकृति की विडंबना कुछ ऐसी है कि मूर्खता ज़्यादा तेज़ी से फैलती है। और जो चीज़ बहुत प्रचलित हो, उसको आप मानकर चलिए कि मूर्खता ही होगी। मूर्खता न होती तो इतने लोग उसमें विश्वास कैसे करते।

स्पष्ट हुआ?

प्र३: सर, मेरा प्रश्न यह है कि जैसे, कोई वैज्ञानिक है तो उसके लिए कुछ फैक्ट्स (तथ्य) एस्टैब्लिश्ड (स्थित) हैं जो कि भौतिक जगत में हैं, प्रकृति में हैं। तो सर, मेरा सवाल यह है कि जो हमें रीडिंग मैटेरियल (पठन सामग्री) मिला था, उसमें क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ की बात हुई थी। तो वैज्ञानिक को क्षेत्र में उतरना पड़ेगा चीज़ों को समझने के लिए। जैसे कोई गेंद है, उसका कुछ मास (द्रव्यमान) वग़ैरा है। तो मेरा सवाल यह है कि एक वैज्ञानिक क्षेत्र को समझते हुए क्षेत्रज्ञ कैसे बने?

आचार्य: बहुत अच्छा है, बहुत अच्छा!

प्र३: और सर, इसी से सम्बन्धित मैंने एक किताब पढ़ी थी, ‘गोडेल, एस्चर, बाख’ करके।

आचार्य: मैं नहीं जानता इस किताब को।

प्र३: मतलब गॉडेल एक मैथमेटिशियन (गणितज्ञ) था, एस्चर एक आर्टिस्ट (कलाकार) था और बाख म्यूजिशियन (संगीतज्ञ)। तो उस बुक के जो लेखक थे वो काफ़ी इंटरेस्टिंग थे, उन्होंने बताया कि ये बुक इन तीनों के बारे में है ही नहीं। ये बुक कॉन्शियसनेस (चेतना) के बारे में है। तो सर, मेरा सवाल यह है कि अल्टीमेटली कोई वैज्ञानिक अगर विज्ञान समझने की कोशिश कर रहा है, उसकी ज़िंदगी में वेदान्त कैसे उतरे? क्योंकि उसको प्रकृति से सम्बन्ध बनाने की ज़रूरत है।

आचार्य: असल में वैज्ञानिक वेदांती हो ही जाता है। वैज्ञानिक को मजबूरन, झक मार के वेदांती होना पड़ता है। उसी सवाल से शुरु करते हैं कि क्षेत्र में जो अपना दिन-रात ही गुजार रहा है जिसका काम ही है, पदार्थ की जाँच-पड़ताल करना, वो क्षेत्रज्ञ कैसे हो जाएगा?

असल में क्षेत्र माने पूरी प्रकृति और क्षेत्रज्ञ माने भीतर जो चेतना बैठी हुई है। क्षेत्रज्ञ माने आमता नहीं होता है। ठीक है?

तो ये कह रहे हैं कि अब एक वैज्ञानिक है वो दुनिया के फैक्ट्स में जीता है, प्रकृति की जाँच-पड़ताल कर रहा है तो वो क्षेत्रज्ञ कैसे बन जाये? फिर आगे उसी बात को कहा कि वैज्ञानिक वेदांती कैसे बन जाये। कैसे बन जाये? आप जब दुनिया को जाँचने-परखने निकलते हो न, तो ऊपर-ऊपर जब पहले आप कुछ क़दम लेते हो तो यह पता चलता है कि सारी डायवर्सिटीज़ (विविधताएँ) फॉल्स (झूठ) हैं, ये जो भेद हैं वो मिथ्या हैं। और आप इन्यूमरेबल एलिमेंट्स (अनगिनत तत्व) को घटा-घटाकर के कुछ चंद एलिमेंट्स पर आते हो।

आजकल पीरियोडिक टेबल (आवर्त सारणी) में कितने चल रहे हैं? मेरे समय में एक-सौ-छः थे बस। अभी एक सौ अठारह चल रहे हैं। थोड़ा और बढ़ गये हैं, ठीक है। पर फिर भी बहुत कम हैं, बहुत कम हैं न। दुनिया में चीज़ें कितनी दिखती हैं और वो भी तीनों स्टेट्स (अवस्थाओं) में हैं। तीनों क्या, अब चौथी स्टेट हमने पकड़ ली है। एक तो तीन स्टेट्स मैटर की उसमें भी इतनी सारी चीज़ें। यहीं पर गिनिए कितनी चीज़ें हैं।

तो विज्ञान पहले तो क्या करता है ये सारी जितनी विविधताएँ हैं, इनको कंडेंस (संघनित) करके इनको रिड्यूस (कम) करके इनको बना दिया एक-सौ-अठारह या एक-सौ-तीस, जो भी चल रहा है। उसके बाद उनके अंदर भी घुसता है। उसके अंदर घुसकर ये जितने एक-सौ-अठारह, एक-सौ-तीस हैं, ये कितने हो गये? आज से सौ साल पहले के विज्ञान पर जाओ, ये कितने हो गये? ये तीन हो गये।

फिर वो जो इलेक्ट्रॉन है वो भी पता चला कि वो कोई गेंद नहीं है वो कोई मास नहीं है। वो भी तोड़ा गया तो इलेक्ट्रॉन के भीतर भी और पार्टिकल्स (कण) निकल आये जो पता नहीं पार्टिकल्स हैं या वेव (तरंग) हैं या आधी-आधी बराबर की हैं ये सब हैं। वो सब करते-करते अब जब तुम एकदम एलिमेंट्री पार्टिकल्स पर पहुँचते हो एक वैज्ञानिक की तरह क्षेत्र का अनुसंधान करते हुए तो तुम्हें मालूम है क्या पता चलता है — तुम्हें पता चलता है कि वह जो तुम्हारे सामने पार्टिकल है वह अब्ज़र्वर डिपेंडेंट पार्टिकल (देखनेवाले पर निर्भर करने वाला कण) है। तो लो घूम कहाँ रहे थे? और घुसना किसमें पड़ गया? तो क्षेत्र की भी अगर आप ईमानदारी से जाँच-पड़ताल कर लो तो आप आध्यात्मिक ही हो गये।

सच तो यह है कि प्रकृति का निष्पक्ष और वैज्ञानिक अवलोकन एक आध्यात्मिक विधि है।

इसीलिए बार-बार कहा करता हूँ कि वैज्ञानिक नज़रिया रखो और दुनिया में जो कुछ चल रहा है — यह जगत चीज़ क्या है यह दुनिया बला क्या है — इसकी पूरी जानकारी रखो। क्योंकि दुनिया को अगर जानने निकलोगे, दुनिया की अगर छोर तक पहुँचना चाहोगे तो ख़ुद तक आना पड़ेगा। अब फिज़िक्स वहाँ पहुँच गयी है जहाँ कहती है, दैट दी अब्ज़र्व्ड फेनोमिना एट द एलिमेंट्री लेवल इज़ अ फंक्शन ऑफ़ द ऑब्जर्वर (मूलतया, प्राथमिक स्तर पर देखी गयी घटना देखने वाले से प्रभावित होती है)। और यह तो चलो एकदम पिछले दस साल की बात हो गयी। इस साल (२०२३) का जो नोबेल प्राइज़ गया है फिज़िक्स में उसमें भी ये बात निहित है। लेकिन और पचास-साठ साल पहले चले जाओ, हमें तो भी यह पता था कि आब्ज़र्वेशन इज़ चैन्जिंग दी अब्ज़र्व्ड फेनोमिना (अवलोकन प्रेक्षित घटना को बदल रहा है)।

और इसीलिए कहा गया था कि तुम पोजीशन (स्थान) और वेलोसिटी (वेग) दोनों को एकसाथ एकदम बारीकी से नहीं पता कर सकते। पूरी जो अनसर्टेंटी (अनिश्चितता) की बात थी, वह यही तो थी कि एक को पता करते हो उधर—और वो तुम्हारे आने से हुआ। माने जो कुछ चल रहा है वह इंडिपेंडेंट नहीं है ऑब्जर्वर के। यही बात तो वेदान्त बोल रहा था कि दृश्य इंडिपेंडेंट नहीं है दृष्टा के।

तो आप अगर वैज्ञानिक भी हो तो शुरुआत में आप भले ही यह कहो कि मुझे सेल्फ से मतलब नहीं है, मुझे तो बस संसार से मतलब है। विज्ञान की शुरुआत ऐसे ही होती है आई वांट टू अंडरस्टैंड द ऑब्ज़र्वेबल फेनोमेना (मैं अवलोकनीय घटना को समझना चाहता हूँ)। ‘मुझे तो साहब दुनिया को जानना है‘ – आप ऐसे ही शुरूआत कर लो। मैं तो बिलकुल आपको कहता हूँ कि शुरुआत ऐसे ही करो कि साहब दुनिया को जानना है। दुनिया को भी जानने निकलोगे और ज़िद पूरी है कि दुनिया को सचमुच जानना है, तो यही पाओगे कि दुनिया को जानने के लिए ख़ुद को जानना पड़ता है – यही तो वेदान्त है।

प्र४: प्रणाम, आचार्य जी। जैसे अभी बात हो रही थी कि अद्वैत क्यों द्वैत में घूमता है। तो कहा गया कि ऐसा है नहीं वास्तव में, हमें ऐसा लग रहा है। तो चूँकि हमें रहना तो इस दुनिया में ही है, तो इसका एक सॉल्यूशन बताया गया कि आपको सक्षीभाव की तरह इसको ऑब्जर्व करना है, देखना है। तो इसका वास्तविक अर्थ क्या है?

आचार्य: इसका वास्तविक अर्थ तो यही है जिस शब्द पर कल का सत्र समाप्त हुआ था। वो शब्द याद है किसी को? प्रेम।

सच के प्रति एक प्रेम होना चाहिए। जब सच के प्रति प्रेम होता है तो इंसान ख़ुद के प्रति ज़िद छोड़ देता है।

साक्षित्व का मतलब है ख़ुद को छोड़कर देखना। सच्चाई से ऐसा लगाव हो कि इंसान कहे, ‘अपनेआप को पीछे छोड़ सकते हैं यार; सच बताओ, हमें अच्छा लगे बुरा लगे, ये सब बातें बाद की हैं।‘ सच ऊपर है, हम नीचे हैं – यही साक्षित्व है। वो कोई भाव नहीं होता; ये भाव वग़ैरा में मत पड़ना। वो एक ज़िद होती है, एक संकल्प, एक इरादा होता है।

देखना तो है, पर कुछ बनकर नहीं देखना है। देखना तो है, पर खोजते हुए नहीं देखना है। देखना तो है, कुछ चाहते हुए नहीं देखना है। सुनना तो है, पर इस नीयत से नहीं सुनना है कि जो हम चाहते हैं बस वही सुनायी दे जाए, कुछ और सुनायी दिया तो सुनेंगे ही नहीं।

स्वयं से निरपेक्ष होकर प्रकृति का अवलोकन करने को साक्षित्व कहते हैं। पकड़ लो इसको अच्छे से।

स्वयं से निरपेक्ष होकर प्रकृति का अवलोकन — करने को भी नहीं — स्वयं से निरपेक्ष होकर प्रकृति का अवलोकन होने देने को साक्षित्व कहते हैं, लेटिंग इट हैपेन नॉट फोर्सिंग इट टू हैपेन (इसे घटित होने देना इसे घटित होने के लिए बाध्य नहीं करना)।

उदाहरण के लिए, मेरी आपसे बात हो रही है। अगर आप अपने अहंकार के माध्यम से सुन रहे हैं मुझे, अपनी हस्ती के माध्यम से — और अहंकार माने क्या होता है — अहंकार माने आपकी जो मान्यताएँ हैं, आप पहले से जो सोच विचार रखते हैं — उनके पर्दे के पीछे आप बैठ गये हैं और उनकी आड़ में आप मुझे सुन रहे हैं, तो आपको कुछ आधा-अधूरा सुनाई देगा। और जो सुनायी भी देगा उसमें घपला होगा; हेरा फेरी चार।

साक्षित्व क्या है?

प्रतिभागिता का अभाव। द विटनेस डज़ नॉट पार्टिसिपेट (प्रत्यक्षदर्शी शामिल नहीं होता)। और कभी भी ये जाँचने की कोशिश मत करना कि तुम साक्षी हो कि नहीं, क्योंकि साक्षी की परिभाषा ही यही है कि वो कुछ है नहीं। जब तक आप कुछ हो, तब तक आप साक्षी नहीं हो। साक्षी वो है जो सचमुच देख सकता है। जिसकी आँखों पर अहम् का पर्दा नहीं वो साक्षी है, वो सचमुच देख सकता है।

लेकिन आप कहो कि आपने साक्षी को देख लिया तो यह आपने गड़बड़ बात कर दी न। साक्षी तो अंतिम है। आप कह रहे हो कि आपको पता है कि आप साक्षी हो तो इसका मतलब है कि आप साक्षी को भी देख रहे हो। और साक्षी वह है जो सब को देखता है तो साक्षी को देखने वाला कौन धुरंधर पैदा हो गया। लेकिन लोग कहते हैं कि अभी देखो मैं बिल्कुल साक्षी हूँ। ये तुम साक्षी नहीं हो तुम प्रतिभागी ही हो, तुमने नाम धर लिया है साक्षी का।

तो साक्षी होने पर ध्यान नहीं देना है। वेदान्त की विधि नेगेटिवा की है, नकार की। साक्षी होना माने कुछ प्राप्त करना, किसी स्थिति में पहुँच जाना – यह बात ही गड़बड़ हो गयी न। तो साक्षी नहीं कहना है, कहना है अप्रतिभागी—अप्रतिभागी। क्योंकि साक्षित्व एक्टिव हो जाता है, एक सक्रिय कृत्य हो जाता है। ‘मैं साक्षी हूँ’ – ये आपने कुछ होने की बात कर दी। और वेदान्त कहता है जो कुछ हो उसको हटाओ ना। तुम पहले ही न जाने क्या थे एक नयी चीज़ और बन गये। क्या बन गये?

श्रोतागण: साक्षी।

आचार्य: तो गड़बड़ कर दी न, साक्षी और बन गये। पहले ही जो बने बैठे थे वही हटाओ, साक्षी बनने की बात थोड़े ही हो रही है। तो मुझे साक्षी नहीं होना है, मुझे होना है अप्रतिभागी। अब बात बनेगी क्योंकि प्रतिभागी तो हम हैं ही। अब बात बनेगी, अब ज़रा दिखाओ अपना दम और जहाँ-जहाँ हाथ पाँव फैला रखे हैं वहाँ से वापस समेट लो। तो भगवद्गीता कहती है?

श्रोतागण: अपनी इन्द्रियों को कछुए की तरह भीतर समेत लो।

आचार्य: ऐ शाबाश! सब एक-एक क़दम आगे चल रहे हैं आज। तो भगवद्गीता कहती है जो स्थितप्रज्ञ होता है, वह अपनेआप को कछुए की तरह वापस खींच लेता है यह है नॉन पार्टिसिपेशन। हू एम आइ? आइ एम ए नॉन पार्टिसिपेंट। (मैं कौन हूँ? मैं अप्रतिभागी हूँ)। “बाज़ार से गुज़रा हूँ, ख़रीददार नहीं हूँ।“

बाज़ार माने?

श्रोतागण: प्रकृति।

आचार्य: और ‘ख़रीददार नहीं हूँ,’ नकार की भाषा में बात करी न। तो कही होगी ये बात अकबर इलाहाबादी ने लेकिन वेदान्त की बात है ये। जहाँ कहीं भी नकार की भाषा में बात हो रही हो वहाँ वेदान्त आ गया। और जहाँ कहीं भी प्राप्ति, ये-वो, दुनियाभर का ताम-झाम और सगुण बात हो रही हो, भले ही कहते हों कि सनातनी हैं, वो किसी और धर्म के है, वो सनातनी नहीं हैं।

और जहाँ कह दिया कि “बाज़ार से गुजरा हूँ, ख़रीददार नहीं हूँ,” ये बात भले ही एक मुसलमान बोल रहा है लेकिन वह सनातनी है। तो ऊपर-ऊपर के ठप्पों पर मत चले जाना, भीतर की परख रखना।

साक्षित्व माने ख़रीददार न होना। बाज़ार है चारों तरफ़, ‘हाँ बढ़िया है, क्या रंग-रोगन है, देख रहे हैं, अच्छी बात है, बहुत अच्छी बात है; ख़रीददार नहीं हैं।‘ समझ में आ रही है बात ये? ख़रीददारी की मंशा न हो। ख़रीददारी की मंशा नहीं।

तो मतलब क्या मंशा ये है कि बाज़ार से कुछ भी लेकर नहीं आना है?

वो भी अप्रतिभागिता नहीं रही क्योंकि साक्षित्व का तो मतलब होता है कैसा भी संकल्प नहीं रखना है। संकल्प है भी तो बस एक – आत्मसंकल्प। संकल्प यही है कि मुझे इधर-उधर, किधर को भी झुकना नहीं है।

अब बाज़ार से निकल रहे हैं और कोई आकर ऐसे ही आपको दे गया कि ले लीजिए; तो साक्षी क्या करेगा? ले लेगा। न ख़रीदने का संकल्प है और न ही ये संकल्प है कि नहीं ही ख़रीदना है।

आप सब गीता से इतना तो याद रखते हो कि, "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।" उसकी जो दूसरी पंक्ति है श्लोक की, उसी श्लोक की दूसरी पंक्ति जानते हैं क्या कहती है? ‘न कर्म के भोग में रुचि है, न कर्म के त्याग में।‘ क्या बात है! ये वही श्लोक है, उसकी दूसरी पंक्ति की कोई बात ही नहीं करता। ‘न कर्म के भोग में रुचि, न कर्म के त्याग में।‘

बाज़ार से निकले थे; कुछ लेने का इरादा नहीं था, कुछ त्यागने का भी इरादा नहीं था। जो त्यागने वाली मूल चीज़ है वह पहले ही त्याग चुके हैं, अब और क्या त्यागें। कोई आकर बोले, ’आपने फ़लानी चीज़ त्यागी नहीं, आप अभी भी इसका भोग कर रहे हैं।‘ भाई, एक ही चीज़ होती है त्यागने लायक जीवन में, वो कब की त्याग दी; अब कुछ नहीं त्यागते। अब बताओ क्या ला रहे हो? जो भी है लाओ, कोई दिक्क़त नहीं।

ये बात मूढ़ों को समझ में नहीं आती। उनके लिए त्याग का यही मतलब है कि ‘अरे! देखो बाल नहीं त्यागे।‘ नहीं त्यागता। ये कोई त्यागने वाली बात है। कहते हैं, ‘ये (कोट की ओर दिखाते हैं) पहनकर घूम रहे हैं, त्यागो इसको।‘ नहीं त्यागता।

त्याग तो एक का ही करना है न, बाक़ी सारे त्याग तो झूठ हैं। बाक़ी सारे त्याग तो जो केंद्रीय और वास्तविक त्याग है उससे बचने का बहाना हैं। उसको पकड़ो, ‘जो ये झूठ-मूठ के त्याग कर रहा है। उससे पूछो, असली त्याग से बचने का ये सारा इंतज़ाम है न? असली त्याग तू करना नहीं चाहता इसलिए ये छोटे-मोटे, गंदे त्याग कर रहा कि ये नहीं करते, दिन में एक दफ़े खाना खाते हैं।‘ हम पाँच दफ़े खाते हैं, जाओ। नहीं त्यागते। मौज हमारी।

अरे! कई बार ऐसा भी होता है कि नहीं दो दिन मिलता तो भी कलपने नहीं लगते। और किसी दिन पाँच बार हो गया फिर भी ठीक है, अच्छी बात है। आप आयीं थी मिलने ऊपर एक बार, आपके साथ चाय पी लिये; अब ये दोबारा आ गयीं तो क्या करें, फेंक दें? काहे को फेंक दें, भाई? बोलें, ‘देखो ये क्या है, चाय! ये कोई अच्छी चीज़ होती है, इसकी लत लगाना?‘ नहीं त्यागते।

अरे! न लत लगी है और न ही त्याग का संकल्प है। किसी-किसी दिन ये कुछ नहीं करते, भूल जाते हैं, कुछ और कर देते हैं, (मज़ाक में कहते हुए) मक्खी डाल देते हैं। तो कोई बात नहीं, छः-छः घंटे का सत्र हो जाता है, मुँह में पानी भी नहीं डालते हैं। ठीक है, कोई बात नहीं है।

समझ में आ रही है बात ये?

अप्रतिभागिता – जो कुछ भी हो रहा है उसके प्रति एक निस्पृहता। इसके लिए ओशो एक बड़ा विशिष्ट, अनूठा शब्द इस्तेमाल करते थे, वो कहते थे एक कुंवारापन। वो शब्द उनके अलावा किसी ने नहीं इस्तेमाल करा। कहते थे, “कैसे भी हो जाओ ज़िंदगी में उम्र बढ़ जाए, कुछ हो जाए, भीतर एक कुंवारापन होना चाहिए।“ वो कुंवारापन बचा रहे। और उसी के गीत फिर संतों ने गाए हैं "दूसरो ना कोई।" “मैं कुँवारी हूँ” – मीरा कुँवारी हैं। इसीलिए जीसस को जन्म देने पर भी मैरी को कहते हैं वर्जिन। लोग मज़ाक उड़ाते हैं, कहते हैं, ‘बच्चा जन्म दे दिया, वर्जिन बोल रहे हैं।‘ वो किसी और चीज़ की बात हो रही है, शरीर की नहीं बात हो रही।

समझ में आ रही है बात ये?

देखो, जिस्म तो दुनिया ने दिया है, दुनिया ही ले भी जाएगी। दुनिया की चीज़ है, कुछ हो जाए, बहुत अफ़सोस नहीं करना चाहिए, शिकायत नहीं करना चाहिए। लेकिन भीतर कुछ है जो दुनिया का नहीं है, वो हमारा अपना है; दुनिया का हाथ उस पर न पड़ने दें। दुनिया से ऐसा नहीं कि हमें कोई शिकायत है या कोई लड़ाई है दुनिया से, बस न्याय की बात है। जो चीज़ जिसकी है उसी के पास रहे न।

ये हाथ-पाँव, कपड़े-लते, सम्बन्ध – ये सब दुनिया से आये थे, तेरी चीज़ है, ले जा बाबा, क्या करेंगे? किसी दिन कोई बीमारी हो जाती है, आदमी मर जाता है, क्या करेंगे? लेकिन जो भीतर की हमारी वस्तु है वो हमारी अपनी रहनी चाहिए। ये अन्याय की बात हो जाएगी कि उसको किसी ऐसे को सौंप दिया जिसकी वो है ही नहीं, है न?

ये दो तरह के अन्याय होते हैं। प्रकृति की चीज़ को अपना मानना भी अन्याय है। ये शरीर किसने दिया है? दुनिया ने दिया है। तो काल ने दिया है, काल वापस ले जाएगा; अपना मानना ग़लत बात हो गयी न।

अभी आपकी रिपोर्ट आ जाए आपको कैंसर है, आप छाती पीटने लगें। ये ग़लत बात है देखिए। ग़लत बात है न? आपने कुछ विशेष पात्रता तो नहीं दिखायी थी पैदा होने में। संयोग से पैदा हो गये थे। ऐसे ही संयोग से एक दिन रिपोर्ट आ गयी कि आपको कैंसर है, मर जाओगे छः महीने में; मर जाओ, अब क्या करोगे? उसमें रोने-कलपने की इतनी कोई बात नहीं। मुझे पता है सबको दुख होगा। मेरी रिपोर्ट आ जाए, मुझको ही धक्का लग जाएगा, बिलकुल होता है। लेकिन फिर भी एक चीज़ समझने की है और समझनी चाहिए।

तो एक तो ग़लती हम ये करते हैं कि दुनिया की जो चीज़ है उसे अपना मान लिया। कौनसी चीज़ दुनिया की है? शोहरत किसने दी आपको? रिश्ते-नाते, ये ज्ञान वग़ैरा भी सब कहाँ से मिला? नाम पहचान सब कहाँ से? तो ले गयी दुनिया तो ले गयी। दुनिया की चीज़ थी, ले गयी। कौनसा हम लेकर के आये थे। तो ये पहली ग़लती है जो नहीं करनी है, कि दुनिया की चीज़ को अपना मान लिया।

और दूसरी जो ग़लती है वो और बड़ी और भयानक होती है – जो चीज़ सचमुच हमारी है उसको हमने उसको दुनिया को सौंप दिया। जो सचमुच हमारी है न उसी को आत्मा कहते हैं। वो किसी के हवाले नहीं करना चाहिए। आप कितनी भी ख़राब हालत में हों, ज़िंदगी में कितनी भी मजबूरियाँ हों, आत्मा अपनी होनी चाहिए। कुछ आपके पास ऐसा होना चाहिए जो बाज़ार में बिकने के लिए नहीं है।

देखिए, बहुत सारी चीज़ें सबको बेचनी पड़ती हैं। ठीक है? उसमें पाखंड करने से कोई फ़ायदा नहीं। ज़िंदगी में ज़्यादातर ऐसा ही है जिसको चाहे-अनचाहे आपको तोलना पड़ता है। दुनिया की शर्तों पर खेलना पड़ता है, करना पड़ता है न? सीधी, बेझिझक बात।

बहुत सारे बेचारे हमारे मित्र हैं जो यहाँ आना चाहते थे लेकिन हमको दिख रहा है कि यहाँ पूरा यहाँ से लेकर वहाँ तक भरा हुआ है; उनको हम यहाँ पर कैसे आने दें? हमें भी बड़ा अफ़सोस होता है लेकिन फिर हमें उनसे कहना पड़ता है कि ‘देखो भाई तुम आ रहे हो, तुम संस्था का किसी प्रकार से सहायता नहीं कर पा रहे हो। न तो तुम वॉलिंटियरिंग (स्वयंसेवा) करते हो, न तुम जो हमारी अलग-अलग तरह की टीम्स हैं उनमें शामिल होते हो और अभी तुम्हारे पास हमें देने के लिए अनुदान भी नहीं है। तुम बताओ, हम तुमको बैठाएँगे कहाँ पर? पूरा तो भरा पड़ा है।

ये सब चीज़ें हैं जो अब दुनिया में हो तो करना पड़ता है, ठीक है। लेकिन फिर भी इस सब के बाद भी अगर आपके पास भीतरी एक अस्पर्शित बिंदु नहीं है तो बहुत बिकी हुई ज़िंदगी हो जाती है।

कुछ भीतर होना चाहिए जो बेशर्त हो बिलकुल, जिस पर फिर कोई शर्त नहीं लगेगी। और शर्त यहाँ तक नहीं लगेगी कि मौत भी आती हो तो भी उसको नहीं बेचने वाले। वो चीज़ अगर है आपके पास तब तो आप ज़िंदा हो, नहीं तो ऐसे ही टहल रहे हो बेकार। टहल भी नहीं रहे, लुढ़क रहे हो।

समझ में आ रही है बात ये?

प्र५: प्रणाम, आचार्य जी। जैसे कि अभी बात हुई तो उससे मैं ये समझ पा रहा हूँ कि वेदान्त एक उत्कृष्ट चेतना का ही उदाहरण है। क्या ठीक समझ पा रहा हूँ मैं?

आचार्य: (सहमति में सिर हिलाते हैं।)

प्र५: चेतना की हमने बात करी, अभी बिग बैंग की भी बात करी कि चेतना हर काल में बदलती रहती है। तो हम किसी एक के सापेक्ष में दूसरे की बात नहीं कर सकते। तो मेरा सवाल ये है कि हर काल में जब बदलती रहती है तो आगे इससे भी उत्कृष्ट होगी। हम ये ही मानते हैं कि आज जो है वो पीछे की तुलना में ज़्यादा उत्कृष्ट है। तो एक अपूर्ण चेतना में से कुछ भी बात निकलेगी, अगर हम किसी का विचार भी कर रहे हैं, अगर हम ये भी कह रहे हैं कि वो शिव नहीं है, ये नहीं है, ये भी तो एक मन से उपजा विचार है कि वो नहीं हैं। तो अपूर्णता में से फिर ये पूर्णता का भाव कहाँ से से आया?

आचार्य: एक इमारत है, उसका नाम है काल भवन। ठीक है। क्या नाम है?

प्र५: काल भवन।

आचार्य: उसमें निन्यानवे मंज़िलें हैं। काल के अनुसार चेतना अलग-अलग मंज़िलों पर स्थित होती है। लेकिन कालभवन में चेतना कितनी भी प्रगति कर ले, कितनी भी ऊर्ध्वगति कर ले, फिर भी अधिक से अधिक कहाँ तक पहुँचती है?

मुक्ति का अर्थ होता है आसमान। उस भवन से ही बाहर आ जाना। क्योंकि काल भवन का ही दूसरा नाम क्या होगा? प्रकृति भवन, क्योंकि काल ही प्रकृति है।

आप जो बोल रहे हो न कि चेतना तो काल में परिवर्तित होती रहती है। चेतना प्रत्येक काल में परिवर्तित होती है, बिलकुल होती है। चेतना भवन के अंदर ही सीढ़ियों से ऊपर-नीचे, ऊपर-नीचे कर रही है, ये सब चलता रहता है। इसी को बोल दिया गया पारंपरिक तौर पर कि सतयुग, द्वापर, त्रेता, कलियुग, ये सब, चेतना अपना वहाँ गोल-गोल घूम रही है।

और फिर एक चेतना है जो उस भवन से छलांग मारकर सीधे आसमान में उड़ ही गयी, उड़ ही गयी ऊपर, वेदान्त उसकी बात करता है।

प्र५: पर अभी भी तो दो भेद हो गये, एक वो जो वहाँ पर है और एक जो उड़ी।

आचार्य: हाँ, तो भेद है ही न। बद्ध में और मुक्त में तो भेद है ही न।

प्र५: पर आपकी और भी वीडियोज़ मैं देखता हूँ तो उसमें बताया है कि प्रकृति से मुक्ति का रास्ता प्रकृति के ही अंदर है।

आचार्य: हाँ, तो जब तुम इन्हीं सीढ़ियों से ऊपर जाते रहते हो, जाते रहते हो तो एक बिंदु आता है जहाँ पर एक बहुत अपूर्व, अद्भुत घटना घटती है कि तुम उड़ जाते हो। अभी जैसे वो प्रश्न आया था न कि वैज्ञानिक तो क्षेत्र का अनुसंधान करता है, क्षेत्र का अनुसंधान करते-करते तुम एक जगह पहुँच जाते हो जहाँ क्षेत्र को और जान ही नहीं पाओगे अगर क्षेत्रज्ञ को नहीं जानोगे। इसी तरह प्रकृति की ही ये जो इमारत है, चेतना का ये जो भवन है, इसमें तुम कितनी ऊँचाई हासिल कर लो अपनी निजी क्षमता से, अपनी व्यैक्तिक क्षमता से, उसके बाद एक बिंदु आता है जब उड़ान हो जाती है।

प्र५: धन्यवाद, सर।

आचार्य: समझ गये हो एकदम अच्छे से? रुक जाओ।

प्र५: जी, समझ गया हूँ। अभी थोड़ा चिंतन करूँगा तो और स्पष्ट हो जाएगा।

आचार्य: देखो, हमारा काम ये होता है कि अपनी मानवगत सीमाओं के भीतर हम अधिक-से-अधिक जो कर सकते हैं वो करें। आज से सात-आठ साल पहले एक जगह बात हुई थी, उसका वीडियो है ’नाइन्टी नाइन फ्लोर्स ऑफ कॉन्शियसनेस’, वो देखिएगा। वो ठीक उसी मुद्दे पर है जिसकी आप बात कर रहे हो।

पूर्णता मुझ अपूर्ण के लिए एक दिवास्वप्न से अधिक कुछ नहीं। और मुझसे ज़्यादा तुम करोगे पूर्णता की बात तो मैं पूर्णता को भी एक विचार, एक कॉन्सेप्ट, एक सिद्धांत बना लूँगा जो कि ज़्यादातर लोग बना लेते हैं। क्योंकि पूर्णता के बारे में पुराने लोगों ने इतना लिखा है, इतना कहा है कि उसमें तुम पाँच-सात दर्जन श्लोक याद कर लो, कहानियाँ याद कर लो, सिद्धांत याद कर लो।

प्र५: मिलावट होती जाती है।

आचार्य: बिना मिलावट वाले भी। जो शुद्ध हैं वो तुम याद कर लो। याद करना ही मिलावट है, भाई। तुम शुद्ध को भी अगर याद कर रहे हो तो तुमने उसमें मिलावट कर दी। शुद्धता याद रखने की वस्तु नहीं होती। तो तुम अपनी अपूर्णता के रहते पूर्णता तुम्हारे लिए बस एक ख़्वाब होगा, एक सिद्धांत होगा।

तो हमें करना क्या है? हमें पूर्णता के बारे में बहुत बातचीत नहीं करनी है। वेदान्त आपको बार-बार मना करता है कि जो आख़िरी है और असली है, उसके बारे में ज़्यादा मुँह चलाओ मत। अपनी सीमाओं के चलते अपना संकल्प दृढ़ करके जो अधिकतम कर सकते हो, वह करो।

तो मैं उसमें उदाहरण दिया करता हूँ कि जैसे कोई छोटा सा बच्चा हो — सत्य को इसीलिए बाप बोलते हैं न, बाप बोलने का कुछ कारण है — जैसे कोई छोटा सा बच्चा हो और उसको चाहिए चॉकलेट और बड़ी महंगी वाली उसको चॉकलेट चाहिए, इंपोर्टेड (आयातित)। बच्चा ग़रीब है, उसने बड़ी मेहनत करके कुछ सिक्के-विक्के जुगाड़े। कुछ ऐसे-वैसे करके कुल साढ़े पंद्रह रुपये वह इकट्ठा कर पाया, एक रुपया दो रुपया ऐसे जोड़-जोड़ के, अठन्नी-चवन्नी, पुराने समय की मान लो बात है। और चॉकलेट आती है सीधे-सीधे ढाई सौ रुपये की। और वह इतना सा (हाथ से ऊँचाई दिखाते हैं) है, गोलू।

वो चला जाता है और वह क्या जाने रुपया पैसा बहुत, उसको लगता है मैंने इतने सिक्के इकट्ठे कर लिए, ये तो चॉकलेट के वज़न से ज़्यादा ही है तो मिल ही जाएगी चॉकलेट इसमें। तो वह जाता है दुकानदार के पास और अपनी गुल्लक लेकर वहीं फोड़ देता है। कहता है, ‘ये है, चॉकलेट दो।‘ तो दुकानदार उसको चॉकलेट दे देता है।

क्यों दे देता है? क्योंकि उसने पूरा समर्पण कर दिया इसीलिए दे देता है। इसीलिए नहीं दे देता कि उसने जो दिया वो पर्याप्त है। तुम्हारे पास कभी भी पर्याप्त नहीं होगा आसमान को पाने के लिए। इस दंभ में तो रहना मत कि मैं इतनी तगड़ी साधना और तपस्या करूँगा और मैं इतना ज्ञान अर्जित करूँगा कि मुक्ति पा जाऊँगा।

मुक्ति जब भी मिलती है, जानने वालों ने कहा कि वह एक अनुकंपा की बात होती है। वो बस यूँही होता है वो एक अद्भुत अनुग्रह होता है। और वही अकेला चमत्कार होता है कि मिट्टी के जीव को आसमान की मुक्ति मिल गयी। ये हो कैसे गया! हो कैसे गया! हो ही नहीं सकता था, असंभव था। पंद्रह रुपये में उसे ढाई सौ की चॉकलेट मिल गयी। और चॉकलेट तो फिर भी ढाई सौ रुपये की थी, हमको तो जो मिलता है वो तो अनंत रुपये का होता है, अमूल्य होता है।

लेकिन क्यों मिला इस पर ध्यान दो। जो हमारे लिए काम की बात है, उस पर ध्यान दो। बच्चे ने जान लगाकर के कहा था ‘जो मैं अधिक-से-अधिक कर सकता हूँ, एक पैसा भी बचाकर नहीं रखूँगा। मुझे एक ऐसी चीज़ चाहिए जिसके लिए सर्वस्व न्योछावर करूँगा।‘

ये जो सर्वस्व लुटाने की चीज़ है न, वो असली है। किसी भी और चीज़ से ज़्यादा एक आज़ाद ज़िंदगी की चाहत रखनी पड़ती है। कहना होता है बाक़ी हर चीज़ क़ुर्बान कर दूँगा अगर ज़रूरत पड़ी तो। ये जो आज़ादी है, इसको नहीं छोड़ सकता। बंधन नहीं स्वीकार है। मार डालो अभी लेकिन दबी-कुचली ज़िंदगी नहीं जी सकता। तब जाकर के वो जो बाप दुकानदार बैठा हुआ है, वो बोलता है कि कर तो तू बहुत कम पाया लेकिन तेरी नीयत बड़ी प्यारी है। फिर वो ऐसे गोद में उठाता है और चॉकलेट थमा देता है; इसी को मुक्ति बोलते हैं।

प्र५: इसी से सम्बन्धित एक चीज़ और थी। जैसे अभी चर्चा हुई थी, आपने बोला था कि एक बंधन तो हर प्राणी को है, चाहे वह इस देश का हो, गोरा हो काला हो, रूस का हो, कहीं का भी हो, जीवन मात्र ही बंधन है, दुख है। तो अगर ये सभी के लिए है, बाक़ी तो दुख इन्डिविजूऐलिटी के ऊपर निर्भर कर गया। तो अगर जीवन मात्र ही दुख है तो क्या उसको दुख भी कहना ठीक होगा, अगर वो सभी के लिए है तो?

आचार्य: ठीक हो न हो, बुरा तो लग रहा है न। मैं उसको कह रहा हूँ, ‘हाँ ठीक, दुख नहीं बोलते हैं उसको अब से।‘

(श्रोतागण हँसते हैं)

आचार्य: चलो भाई, अब से दुख को दुख नहीं बोलेंगे। तो उससे क्या हो जाएगा?

प्र५: नहीं सर, वही शब्द हम इन्डिविजूऐलिटी के लिए प्रयोग कर रहे हैं और उसी को वहाँ पर कर रहे हैं।

आचार्य: तुम कुछ भी बोलो। तुम एक ऐसे अनुभव में हो जो तुम्हें छटपटाहट दे रहा है और अध्यात्म उसी छटपटाहट को संबोधित करता है। दुख के लिए, बिलकुल तुमने ठीक कहा, न जाने कितने हमने रंग-बिरंगे नाम रख दिये हैं। कौन बोलता है मैं दुखी हूँ। ऑल इज़ वेल, यतेंद्र जी (प्रतिभागी)? ऑल इज़ वेल। बोलेंगे क्या कि दुखी हैं?

मुझसे पूछो दुखी हो, कहूँगा, ‘मनहूस सुबह-सुबह क्या सवाल कर रहा है?’ यही तो बोलते हैं, ’ऑल फाइन, ऑल वेल , सब बढ़िया, चंगा सी,’ यही तो चलता है न? गुड मॉर्निंग ; कोई बोलता है ग्लूमी मॉर्निंग ? आसमान से अंगार बरस रहा हो, कुछ हो रहा हो लेकिन गुड मॉर्निंग ही चलता है। तो दुख कौन स्वीकारता है कि है। दुख को हमने बहुत नाम दे रखे हैं।

कर्तव्य क्या है? दुख का नाम है। महत्वाकांक्षा क्या है? दुख का नाम है। मोह क्या है? दुख का नाम है। लेकिन हम इन्हें दुख नहीं बोलते हैं न। तुम इन दुखों को दूसरा नाम दे भी दो तो भी दुख तो दुख है ही। तुम बोल भी दो कि ‘साहब, मुझमें कामना बड़ी तगड़ी है, मैं बहुत एम्बीशियस आदमी हूँ,' तो तुमने एम्बिशन बोल दिया, है तो वो दुख ही। और तुम उस दुख में तड़पड़ा रहे ही हो। तड़प थोड़े ही चल गयी उसको एम्बिशन बोल देने से। नाम बदल देने से बीमारी थोड़े ही चली गयी।

बस दुखी लोगों को बुरा बहुत लगता है जब उनको बोलो कि बेटा ये जो तुम कर रहे हो न, ये दुख का लक्षण है। कहेंगे, ‘ हाउ डेयर यू! (तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई!) मुझे दुखी बोल दिया। मैंने पूरी ज़िंदगी लगा दी है अपनेआप को ये साबित करने में कि मैं सफ़ल हूँ और तुम बोल रहे हो मैं दुखी हूँ।‘

साहब, ये आप जिसको अपनी सफलता बोल रहे हो न, देखो इसमें कितना डर छुपा हुआ है। लगातार आपको तनाव रहता है कि आपकी सफलता कहीं असफलता में न बदल जाए, रहता है कि नहीं रहता है? तो दुखी हो कि नहीं हो, वो मानेगा ही नहीं। वो कहेगा, ‘नहीं, ये कुछ और है, ये दुख नहीं है।‘ ठीक है, मत मानो।

वेदान्त ईमानदार लोगों के लिए है जो मानें कि हाँ, भीतर गड़बड़ है। अगर आप ये मानने को ही तैयार नहीं हो कि भीतर गड़बड़ है, तो फिर आप जैसे चल रहे हो ठीक चल रहे हो। ऋषियों को कोई झंझट थोड़े ही पड़ी है कि पीछा कर-करके कहेंगे कि आओ तुम्हारा इलाज करें? कहेंगे, ‘जो अपने रास्ते जा रहा है, जाने दो।‘

प्र६: नमस्ते, सर। सर, जैसे प्रकृति तब है जब अहम् है, तो आत्मा भी तब है जब अहम् है। तो ये तो वही बात हो गयी कि प्रकृति में भी मुझे नहीं मिल रहा है विश्राम। जैसे, मुझे वो उदाहरण याद आ जाता है – मैंने बहुत बार सुना है कि एक कुत्ते को हड्डी दी जाती है, वो अपने ही ख़ून को उसका रस समझ चबाता है। तो सर, मैं कैसे जानूँ कि मैं आत्मा को कॉन्सेप्ट बनाकर रस नहीं ले रहा हूँ? मतलब मुझे तो यही लग रहा है अभी भी कि आत्मा कुछ है और उससे मुझे रस मिलेगा।

आचार्य: इसी से बचना है। इसी से बचना है। आत्मा को एकदम भूल जाओ। भाई, वाणी जिसका वर्णन नहीं कर सकती, चक्षु जिसका दर्शन नहीं कर सकते, श्रोत्र जिसका श्रवण नहीं कर सकते, मन जिसका चिंतन नहीं कर सकता, कर्मेंद्रियाँ जिसको स्पर्श नहीं कर सकती, वो चीज़ है भी क्या? वैसा कुछ होता भी है? तो भूल जाओ न। ऋषियों ने इसीलिए तो बार-बार इतने सारे उस पर पहरे लगा दिये। इतनी सारी बंदिशें क्यों लगा दीं? ताकि तुम उसे भूल जाओ। याद क्या रखना है? अपने बंधन याद रखो। आत्मा, मुक्ति, सत्य – इनका नाम बार-बार लेने से कोई लाभ नहीं है।

प्र६: तो सर, इसमें मुझे दिखता है कि आदि शंकराचार्य और जो बौद्ध धारा थी माध्यमिक की, उसमें यही था कि आत्मा जैसे कुछ है ही नहीं, तो वो लड़ाई किसलिए हो रही थी?

आचार्य: एकदम एक बात है।

प्र६: तो वेदान्त एक स्टेप (क़दम) आगे क्यों गया आत्मा बोलने के लिए? एक इकलौता शब्द वेदान्त में मुझे आत्मा ही दिखता है जो निगेट (नकार) नहीं कर रहा किसी चीज़ का।

आचार्य: वो इसलिए क्योंकि अगर शून्यता भी है तो शून्यता को जाननेवाला तो कोई होगा न। वहीं पर भेद था बस, और कहीं पर भेद ही नहीं है। बुद्ध ने जितनी गहराई से वेदान्त को समझा है, उतनी गहराई से तो उस काल के ऋषियों ने नहीं समझा हो। बस अंतर ज़रा सा वहीं पर आ जाता है, वो अंतर भी मुझे लगता है ज़्यादा टर्मिनोलॉजी (शब्दावली) में ही है बस। और कहीं नहीं कोई अंतर है।

आप कहते हो शून्य है सब तो शंकराचार्य कहते हैं, “किसको पता चला? कोई तो होगा?” तो आत्मा। बस यहीं पर, और कहीं पर कोई अंतर नहीं है।

प्र७: आचार्य जी, आप इतनी गहराई से चीज़ों को स्पष्ट कर देते हैं कि तत्क्षण—जैसे आज आपने सनातन के विषय में जो परिभाषा और जो समझ बतायी, उसके बाद तत्काल ये महसूस होता है कि लगभग मुक्त हो गये। और ऐसा एहसास होता है कि आपके कहने मात्र से—जो कृष्णमूर्ति जी ने कहा था कि आप इसी वक़्त मुक्ति का अनुभव करेंगे। और आपने ये भी कहा कि शाम को आप जब जाएँगे तो यहाँ भी मुक्ति का अनुभव करेंगे।

तो मैं लंबे समय से वीडियो देख रहा हूँ और आपको बहुत गहराई से सुन रहा हूँ। लेकिन एक बात में लगातार एक परेशानी रहती है कि साथ ही आप कहते हैं कि आपको एक लंबी यात्रा करनी है जिसमें कि पूरा समर्पण चाहिए लगाकर, बच्चों की तरह — जिस बच्चे ने अपने पंद्रह रुपये इकट्ठे किये और उसको गॉड गिफ्टेड वो चीज़ मिली जो कि हमारे-आपके प्रयासों से नहीं मिलती। तो जब ये दो चीज़ आती हैं तो इसमें सदा एक अंदर से विद्रोह सा रहता है कि तत्काल मुक्ति भी है, और लगातार अनुभव के स्तर पर वो है। लेकिन फिर साथ ही दिल टूट जाता है...

आचार्य: बहुत अच्छे! बहुत अच्छे! आज तो।

प्र७: कि अनंत जन्मों तक वो चीज़ मिलेगी। तो ये एक चीज़ कई वर्षों से कॉन्ट्रडिक्शन (विरोधाभास) पैदा करती रहती है।

आचार्य: बहुत बढ़िया! देखिए, वैदिक काल से ही दो धाराएँ रही हैं – एक धारा कहलायी है ब्रह्मण धारा; ब्राह्मण नहीं, ब्रह्मण। और जो दूसरी धारा रही है वो कहलायी है श्रमण धारा।

एक धारा?

श्रोतागण: ब्रह्मण।

आचार्य: और दूसरी?

श्रोतागण: श्रमण धारा।

आचार्य: और इनमें बड़ी लड़ाई रही है। जो श्रमण धारा रही है वो अभिव्यक्त होती है, उदाहरण के लिए, बौद्ध और जैन पंथों में। और ब्रह्मण धारा के उदाहरण हैं सांख्य और वेदान्त, ये दोनों। उसमें आप जैन, बौद्ध और योग को भी जोड़ सकते हैं; जैन, बौद्ध और योग, वो तीनों आते हैं श्रमण में। और ब्रह्मण धारा में सांख्य और वेदान्त आते हैं।

अब इनमें लड़ाई रही है। ब्रह्मण धारा कहती रही है कि जान लो तो तत्काल मुक्ति है। जैसा कि आप ज़ेन कोआन वग़ैरा में नहीं सुनते हो? क्या सुनते है? कि एक बैठा हुआ था भिक्षु और ऐसे बैठा हुआ था, बैठा हुआ था और तभी बारिश हो रही थी और छप्पर से उसके सामने एक बूँद आकर गिरी। ऊपर से नीचे बूँद गिरी और वो सौ छोटे-छोटे टुकड़ों में बिखर गयी, ज़रा-ज़रा से जलकण बिलकुल छितर गये। और इतना देखते ही उसको बोध हो गया। ये ब्रह्मण धारा का उदाहरण है, कि तत्क्षण हो रहा है, उसी समय हो रहा है। बात समझ में आ गयी? जैसे कि बूंद छितर गयी नन्हें-नन्हें जलकणों में, वैसे ही उसका अहंकार छितर गया, टूट गया। हो गया, काम ख़तम।

और श्रमण धारा कहती है, ‘बेटा, ऐसे नहीं होता, श्रम करना पड़ता है। बहुत समय तक जान लगानी पड़ती है।‘ तो इस बात पर मूल भेद रहा है। फिर वही जो भेद है वो और ज़्यादा दार्शनिक विस्तार जब पाता है तो अलग-अलग तरह के सिद्धांतों का रूप ले लेता है और इस तरह हो जाता है।

तो इसमें असली बात क्या है? मेरे देखे असली बात ये है कि उस बिंदु तक पहुँचने के लिए कि जहाँ तत्काल मुक्ति हो जाए, बड़ा श्रम करना पड़ता है। तो जो सच्चाई है, वो दोनों को अपने में समेटे हुए है, ब्रह्मणवाद को भी और श्रमणवाद को भी।

हाँ, ये बिलकुल सही है कि अगर तैयारी पूरी हो तो मुक्ति तत्क्षण हो सकती है। लेकिन ये जो शर्त लगी है न कि तैयारी पूरी हो, ये बहुत बड़ी शर्त है। ऐसा बिलकुल हो सकता है कि आप यहाँ बैठे हो, आप सुन रहे हो और इसी क्षण भीतर — जिसको रमण महर्षि कहा करते थे हृदयग्रंथि — बिलकुल हो सकता है वो अभी खुल जाए। लेकिन वो अभी खुल सकती है अगर आप बहुत लंबी यात्रा करके आये हो तो।

जिसने तैयारी कर ली, जो एकदम छत के मुहाने पर जाकर खड़ा हो गया है, एज ऑफ द क्लिफ पर जो खड़ा हो गया है, उसके लिए तो ये है कि अब ज़रा सा धक्का, ए लिटिल नज , और वो उड़ जाएगा। लेकिन अभी जिसने यात्रा ही शुरू नहीं करी है, उसे मैं कहूँ कि इसी क्षण हो सकता है तो लगभग असंभव है। लगभग असंभव है।

तो दोनों बातें सही हैं, श्रम बहुत चाहिए वहाँ तक पहुँचने के लिए, लेकिन वहाँ पहुँचने के बाद कुछ पता नहीं कि कब हो जाएगा, कैसे हो जाएगा। जैसे कहते हैं न, वो तितली ने पंख फड़फड़ाए और उसकी वजह से कहीं भूचाल आ गया। ऐसा भी हो जाता है। आधुनिक भाषा में उसे कहते हैं कमिंग टू द टिप्पिंग प्वाइंट। चल-चलकर टिपिंग प्वाइंट तक तो आना पड़ता है श्रम करके, लेकिन उसके बाद कुछ है जो तत्क्षण हो सकता है, इंस्टेंटेनियसली हो सकता है। तो दोनों बातें हैं।

प्र७: जी, आचार्य जी, दोनों ही विचारधाराओं में समन्वय स्थापित करते हुए मुक्ति का क्षण आता है, ऐसा आपने कहा। लेकिन इससे ये स्पष्ट होता है कि हम जहाँ खड़े होते हैं, तो निश्चित ही जो श्रमण धारा है हम वहीं खड़े हुए हैं।

आचार्य: मैं तो बार-बार वही बोलता हूँ।

प्र७: तो अगर हम श्रमण धारा पर खड़े हुए हैं, तो आपकी जो पूरी शिक्षा रहती है, वो ये रहती है कि आप जिस स्थिति में जहाँ भी हो, उस स्थिति से थोड़ा ऊपर आप क्या कर सकते हो। पूरी ऊर्जा और पूरी ईमानदारी से मुक्ति के लिए केवल आपको उस पर कंसंट्रेट करते रहना है।

उसको समझाने के लिए आपने उदाहरण भी दिया बच्चे का कि उसने पंद्रह रुपये इकट्ठे किये, उसने पूरा प्राण लगा दिया कि पंद्रह रुपये तो इकठ्ठा कर ही सकता हूँ। उसी तरीक़े से हम सब को भी पूरा प्राण लगा देना है कि पंद्रह रुपये तो मैं इकट्ठे कर ही सकता हूँ। उसके बाद क्या होगा वो आपके हाथ में नहीं है। वो जो होगा वह दुकानदार के हाथ में है।

लेकिन वहाँ, आचार्य जी, ये समस्या पैदा हो जाती है कि जब वो जो पूरा प्राण लगाना है, जो पंद्रह रुपये इकट्ठे करने हैं, उसके लिए विभिन्न प्रकार के हमारे अध्यात्म में उपक्रम हैं। वो उपक्रम इस प्रकार से हैं भिन्न-भिन्न शाखाओं के माध्यम से कि प्राण लगाने की भी बहुत सारी प्रक्रियाएँ हैं। उसको आपने वीडियोज में बहुत ज़्यादा आपने विस्तार से बताया भी है।

लेकिन वहाँ ये बहुत बड़ा कंफ्यूजन रहता है कि हम प्राण लगाए चले जा रहे हैं, लेकिन उसका जैसे अन्य बता देते हैं कि आपको इतने घंटें मेडिटेशन करना है। वो कहते हैं कि आपको कृष्ण चेतना से जुड़ते हुए अपने जीवन को प्रकृति से दूर करते हुए, मंत्र के द्वारा अपनेआप को मुक्त कर लेना है।

और फिर गुरु कहते हैं कि ध्यान से आपको सत्य नहीं मिलेगा, वो आपको थकाने के लिए है। उसके लिए आपने प्रक्रिया भी अपनायी हुई है, रेस वग़ैरा लगाना और तमाम खेल-कूद वग़ैरा।

तो ये सब जब रहता है तो मेरा ये एक प्रश्न है कि थोड़ा जो हमको ऊपर उठना है, जो पंद्रह रुपये हमको इकट्ठे करने हैं, इसका कोई तो एक सेट पैटर्न (बनी-बनायी विधि) भी बताएँ कि वो क्या है। वैसे इसमें कोई सेट नहीं हो सकता लेकिन फिर भी।

आचार्य: थोड़ा सा चॉकलेट चख लीजिए। बस यही है। देखिए, विधियों को गढ़ना कोई बहुत बड़ी बात नहीं होती है। दस-बारह साल हो गये हैं, यह प्रश्न कितनी बार आया है कि कोई तो तरीक़ा बता दीजिए, कुछ तो करने के लिए दे दीजिए।

अब ऐसा तो है नहीं कि वह बड़ा मुश्किल काम है कि मैं बता नहीं सकता हूँ। बताने में मुझे कुछ कोई बड़ी समस्या दिखती होगी इसीलिए नहीं बताता हूँ न। नहीं बताता हूँ तो कोई कारण होगा न; नहीं तो बता देता, कितनी विधियाँ हैं। और न तो ऐसा है कि एकदम नयी ही विधि बताने की ज़रूरत है, पुरानी ही सैकड़ों विधियाँ उपलब्ध हैं, उन्हीं में से चुन-चुन कर या थोड़ा सा बदलकर, मॉडिफाइ करके आपको बता दूँ। आप भी प्रसन्न हो जाएँगे। नहीं बताता हूँ तो कोई कारण होगा न।

कारण ये है कि अगर आप में इतना प्यार ही नहीं है कि आप अपनी ओर से देख सकें कि मैं अधिकतम दे रहा हूँ, तो यह मुक्ति वग़ैरा तो आपके लिए बहुत दूर की कौड़ी रह जाएगी न। यह कौनसा आदमी है जिसको बताना पड़ेगा कि कितने घंटे प्यार करो? ध्यान तो प्रेम होता है और कोई आपको आकर बता रहा है कि देखो पौने तीन घंटे किया करो तो इतने से हो जाता है। मुझे कोई आकर ऐसे बताए तो थप्पड़ ही खाएगा। प्रेम है तो चौबीस घंटे है, नहीं तो नहीं है। कौनसा प्रेम है जो पौने तीन घंटे चलता है?

यही विधि होती है, भाई। बच्चे के पास क्या विधि थी? चख ली थी बस थोड़ी सी चॉकलेट और फिर प्यार आ गया था। आप मेरे पास आते हो, मैं आपको यहाँ पर थोड़ी सी चॉकलेट चखाता हूँ। और उसके बाद मेरी ये प्रार्थना होती है कि आपको इश्क़ हो जाए। कुछ को होता है, कुछ को नहीं होता; मैं क्या करूँ? यह भी आपके मर्ज़ी की बात है। मैं अधिक-से-अधिक यही कर सकता हूँ कि हर बार के साथ चॉकलेट को थोड़ा और स्वादिष्ट बनाऊँ, और प्यारा, मीठा बनाऊँ।

देखिए, प्रेम का कोई विकल्प नहीं होता। ये चालाकी, जोड़-तोड़, विधि, मेथड , ये जब एकदम मैं छोटा था तभी से समझ नहीं आये। मैंने कहा, ‘हम किसके साथ चालाकी कर रहे हैं? जिसको ऊपरवाला बोलते हैं हम उसके साथ चालाकी कर रहे हैं। हम कह रहे हैं कि मैं फ़लानी विधि टेक्निक (तरकीब) लगाकर तुम्हें पकड़ लूँगा। भाई, वो किसी के पकड़ में नहीं आता; वह सिर्फ़ आपके प्यार के पकड़ में आता है।‘

लेकिन आप इतने होशियार हो आप कहते हो, ‘ऐसे करूँगा, वैसे करूँगा, फिर न इस तरह का जल चढ़ा दूँगा और उसके बाद इस तरह का माला फेर लूँगा, फिर फ़लाना वाला फल खा लूँगा और इस तरह से मैं मुक्ति को बुद्धू बना दूँगा।‘ ये क्या है? ये क्या है?

सावन के महीने में फ़लाना पहाड़ चढ़ जाऊँगा मुक्ति मिल जाएगी! हम किसको बेवकूफ़ बना रहे हैं? हम किसको बेवकूफ़ बना रहे हैं? वो जो चीज़ है, सिर्फ़ उस संकल्प से मिल सकती है जो जानलेवा प्यार से उठता है, जानलेवा प्यार।

जानते हो पंद्रह रुपये में उसने क्या-किया शामिल कर दिया था? अपनी पेंसिल, अपना इरेज़र, हो सकता है उसने कहीं जाकर किसी से माँग भी लिए हों दस पैसे, बीस पैसे, चालीस पैसे। यह बात आपको कोई विधि थोड़े ही बताएगी? अनंत के प्रति प्रेम भी अनंत होना चाहिए न। और विधियाँ सारी क्या होती हैं? आधा घंटा, एक घंटा। ये जोड़-तोड़, यहाँ-वहाँ ख़ुराफ़ात, चालाकी का नाम ही तो विधि होता है। और क्या होता है?

प्रेम में उपाय चलते हैं क्या? प्रेम में तो कोई उपाय नहीं चलता। प्रेम में तो सीधा समर्पण होता है, भोलापन होता है। पर ये जो युग है यह चालाकी का है। भोलापन हमें समझ में ही नहीं आता।

आपको नहीं पता है क्या कि आपकी ज़िंदगी के बंधन कहाँ पर हैं? मैं कह रहा हूँ सीधे-सीधे उनको चुनौती दीजिए। और मैं नहीं कह रहा हूँ कि उन बंधनों को पूरा ही तोड़ डालिए। बिलकुल आप कह सकते हो कि सीमित व्यक्तित्व हूँ, अभी मुझ पर इस-इस तरह की दुर्बलताएँ छायी हुई हैं, मुझसे नहीं होता। मैं नहीं उसमें आपको दोष दे रहा। पर जितना अभी आपको लगता है आप में ताक़त है, यथाशक्ति तो प्रयत्न करिए। या उतना भी प्रयत्न नहीं करना चाहते? और नहीं करना चाहते तो फिर हमारी-आपकी बात कैसे होगी?

अनंत श्रम मैं भी नहीं कर सकता, अनंत प्रयास आप भी नहीं कर सकते। पर बाबा इतना तो करें जितना — और आपको जितना लगता है न कि आप कर सकते हैं, विश्वास करिए, आप उससे थोड़ा ज़्यादा ही कर सकते हैं। और वह जो थोड़ा ज़्यादा है वह आपसे कोई सिद्धांत नहीं करवाएगा, वो तो प्रेम ही करवाएगा। वो तो प्रेम ही करवाएगा। प्रेम में तो ऐसा होता है फिर आपसे कहा जाए कि तीन घंटे और आप छः पर भी न उठो। यह प्रेम की बात है न।

और सिद्धांत में जब कहा जाता है तीन घंटे तो आप डेढ़ घंटे के बाद से घड़ी देखना शुरू कर देते हो और कुछ झूठ-मूठ लगाकर पौने तीन पर उठ भी जाते हो। इन सिद्धांतों पर चलकर के किसको वो मिलेगा जो जीवन में शुद्धतम और उच्चतम है? वो सब मत करिए न।

देखिए, बच्चा जब रुपये इकट्ठा कर रहा था न तो उसने सोचा भी नहीं था कि ये पर्याप्त होंगे कि नहीं। अगर सोचता तो पंद्रह भी इकट्ठा नहीं कर पाता, क्योंकि ऊर्जा किधर को बिखर जाती? सोचने में। उसने सोचा भी नहीं कि इससे मिलेगा कि नहीं मिलेगा। उसने तो बस जान लगाकर अंधाधुंध जितना वह कर सकता है उसने करा। “सबरी के बेर” कहानी मात्र नहीं होते। इसलिए बोलता हूँ कि जब वेदान्त समझ में आने लगता है तो सारी कहानियाँ आपके लिए एकदम स्पंदित होने लगती हैं, धड़कने लगती हैं, उनमें दिल आ जाता है।

सबरी का दृष्टांत क्या बताता है आपको?

जितना तेरे बस में है तू अधिकतम कर डाल राम के लिए, उतना बहुत होता है। वो क्वांटिटी (मात्रा) के नहीं क्वालिटी (गुणवत्ता) के ग्राहक हैं।

गिलहरी का दृष्टांत क्या बताता है? क्या बताता है? वही बात जो सबरी से पता चलती है। अरे! भाई वह पैदा ही गिलहरी हुई है, वह कहाँ से चट्टान उठा ले बेचारी! लेकिन वह जितना कर सकती है उसने किया। कहीं नहीं ऐसा हुआ था कि गिलहरी सचमुच रेत ला रही थी, फिर मत कहिएगा कि आप भी आचार्य जी अंधविश्वास फैला रहे हो। मैं एलिगोरिकल (रूपक) तरीक़े से बता रहा हूँ। यह प्रतीक है और बड़ी सुंदर प्रतीक है।

सारी दिक्क़त तब होती है जब आप प्रतीक को तथ्य मानना शुरू कर देते हो। कितना सुंदर प्रतीक है न; वह गिलहरी है, वह जैसे भी अपना करती होगी, जो भी बोला गया, कल्पना की बात है कि पूँछ में उसने रेत उठा ली, जो भी करा है। और न यह हुआ है कि वहाँ पर ऊँगलियाँ फिरा दी थीं इसलिए उसके निशान हैं। वह बताने का तरीक़ा है। लेकिन जो बात बतायी जा रही है वह सौ करोड़ की बात है; उस बात से मत चुकिएगा।

जितना कर सकते हो करो और फिर देखो जादू होता है कि नहीं होता है। और तुलना मत करना कि दूसरा तो ज़्यादा करता है, हम कम ही कर पाये। आप ये देखिए कि आप अपनी स्थिति पर रहते हुए अधिकतम क्या कर सकते हैं। ये बहुत कठिन लग रहा है क्या कि आप उपाय-वग़ैरा माँगते हो? ये बात मैं जो बोल रहा हूँ, बहुत इंप्रैक्टिकल (अव्यावहारिक) लगती है? ऐसा है क्या?

अभी मैं कहाँ बैठा हूँ? इस कुर्सी पर बैठा हूँ। आप कहाँ पर बैठे हो? आप उस कुर्सी पर बैठे हो। मैं अधिकतम क्या कर सकता हूँ? कि मैं पूरा ध्यान लगाकर आप से बात करूँ। मैं अपनेआप को पीछे रख दूँ। मैं प्रयास करूँ कि यहाँ पर समय किसी तरह बर्बाद न हो; मैं जो ऊँची-से-ऊँची और शुद्धतम बात है वो आपसे बोलूँ। एक-एक शब्द पर मेरी सजगता रहे कि कुछ भ्रामक बात तो नहीं बोल दी। ये अधिकतम है जो मैं कर सकता हूँ, वही करना धर्म है। वही धर्म है न?

आप वहाँ बैठे हो, आप अधिकतम क्या कर सकते हो?

आप सुनो और जहाँ दिखायी दे कि कहीं पर कोई बात अटक रही है, खट से उसको पूछ लो। बस इतना ही होता है। असल में फिर संतों ने कहा है कि वो चीज़ इतनी सरल, इतनी सहज है कि जटिल मन को समझ में नहीं आती। हम ऐसे बोलते हैं, ‘सच का रास्ता टेढ़ा है, सच में जटिलता है।‘ नहीं, वहाँ तो मामला एकदम सीधा है। और बच्चे की तरह एकदम भोला है वहाँ मामला। हम टेढ़े-टपरे लोग हैं तो हमको सीधी बात समझ में ही नहीं आती। हमें लगता है सीधी बात जटिल हो गयी। नहीं है जटिल, सीधाई पर आओ तो।

भोलेपन से, निर्दोषिता से ज़्यादा क़ीमत किसी चीज़ की नहीं होती है। डरो मत।

ये जो सिद्धांत दुनिया ने भीतर बैठा दिया है कि अगर सीधे रहोगे तो मारे जाओगे, ये बेकार का सिद्धांत है, एकदम बेकार सिद्धांत है। सीधे खेलना सीखो। हम कौन हैं, हमें पता। मंज़िल क्या है, वो पता। हम ज़मीन पर हैं, ऊपर आसमान है – यही कुल खेल है हमारा। ऊपर की ओर जाना है तो सीधे उठेंगे न, ऐसे ये चकरी क्या लगाएँ? काहे को लगानी है चकरी? इसी को रमण महर्षि कहा करते थे — द डायरेक्ट पाथ। दो बिंदुओं के बीच में सीधी रेखा खींचो। नाक की सीध में चलना है, कोई इधर-उधर की बात नहीं करनी है।

और विधियाँ क्या करती हैं? इधर-उधर, गोल-गोल घुमाती हैं। काहे को समय ख़राब करना है विधियाँ लगाकर के? तुम यहाँ हो, वो उधर बैठा है जिससे प्रेम है, जाओ ना सीधे। या ये करोगे कि अभी थोड़ा सा न्यूयॉर्क हो करके, फिर वहाँ से मार्स (मंगल) हो करके फिर बैंकॉक के रास्ते वहाँ पहुँचूँगा, सामने? जाना यहाँ सामने था। पर यह तो फिर भी सामने जाने की बात है, अध्यात्म में तो जहाँ जाना होता है वो (भीतर की तरफ़ इशारा करते हैं) है। तो बताओ, कहाँ-कहाँ घूम कर आओगे यहाँ (भीतर की तरफ़ दिखाते हैं) जाने के लिए? बोलो न कितने लोकों का भ्रमण करना है यहाँ प्रवेश करने से पहले।

कितने द्वंद्व-फंद, कितने उत्पात, कितने तरीक़े के कार्यक्रम, अनुष्ठान, कर्मकाण्ड करने हैं, जबकि कुल लक्ष्य एक है – यहाँ (भीतर की तरफ़ दिखाते हैं) प्रवेश करना। बोलो? तो वो बात आपसे करता हूँ। उसमें जटिलता कुछ नहीं है, बस एक शर्त होती है – प्रेम। उसी प्रेम का दूसरा नाम है ईमानदारी। चाहिए तो मिलेगा। नहीं चाहिए, नहीं मिलेगा। नहीं मिल रहा है तो मुझको दोष मत दो। और जिन्हें चाहिए होता है वो गवाह होंगे, यही बैठे हुए गवाह होंगे कि उन्हें मिलना शुरू हो गया है।

और क्या मिलने की बात कर रहे हैं? कोई उसमें मिस्टिकल (रहस्यमय) या कुछ वो नहीं है कि हाँ रात में अमृत मिला करता है चुपचाप, सबको नहीं मिल रहा। सीधी सी बात है, ज़िंदगी ज़्यादा साफ़ दिखायी देने लगती है, डर कम लगने लगता है। बहुत सारी उलझनें व्यर्थ की दिखने लगती हैं। जिन चीज़ों में पहले जाकर के बहुत लिप्त थे, उलझे हुए थे उनसे अपना हाथ वापस खींचने लगते हो। सौ तरह के मुक़दमे चला रखे थे, उसमें कम-से-कम आधे तो ऐसे होते हैं जिसमें बोलते हो, ‘छोड़ो, नहीं लड़ना, नहीं चाहिए।‘ बस यही होता है ज़िंदगी का सुलझना और क्या होता है।

आध्यात्मिक मुक्ति माने क्या होगा? आपको लगता है कि कहीं फूल बरसेंगे। वो सब भी छवियाँ हैं जो बैठा दी गयी हैं। कुछ नहीं, यही है ज़िंदगी सुलझ जाती है, सहज हो जाती है, बिना बात के तनाव नहीं रहता, सही काम करने में डर नहीं लगता, अस्तित्व मात्र के प्रति प्रेम आ जाता है, हिंसा हट जाती है। मनुष्य क्या, किसी भी जीव को दुख दिया नहीं जाता। स्वाद बदलने लगता है, खानपान बदलने लगता है, ये सब होने लग जाता है। सारे तरीक़े के जो तुम्हारे चुनाव हैं वो बदलने लग जाते हैं। कहीं एक ज़्यादा बेहतर और साफ़-सुथरे इंसान बनने लग जाते हो। कुल यही है अध्यात्म। इसके अलावा कुछ नहीं है कि ये वो, दंद-फंद, कहानियाँ। क्या रखा है उसमें?

प्र८: नमस्ते, सर। बचपन से ही हम कबीरपंथ में रहे। फिर शादी हुई तो ससुराल वाले बोलने लगे कि अब भूल जाओ वो सब क्योंकि हम सनातन धर्म के हैं, तो तुम्हें सनातन धर्म को मानना है। अब शादी को पच्चीस साल हो गये। तो सनातन धर्म को देखते-देखते कभी कुछ हो रहा है, कभी कुछ हो रहा है, कभी मूर्तिपूजा हो रहा है। पर वह जो बचपन से सिखाया गया है कि "प्रेम जब आया सभी को रद्द किया, एक प्रीतम रह गया बाकी सब बह गया।"

तो मुझे अभी तक ये सब बहुत कंफ्यूजन क्रिएट करता है मूर्तिपूजा में जाना चाहिए कि नहीं। और ये जो मरते हैं, इतना बवंडर होता है; करने वाला तो अपनी करनी करके चला गया। और मुझे नास्तिक बोलकर काफ़ी टॉर्चर भी किया जाता है मेरा। तो ऐसे में मुझे क्या करना चाहिए?

आचार्य: मैं तो आपसे एक सवाल पूछता हूँ – आप सब कल साथ थे—और आप में से बहुत लोग गीता समागम में भी साथ हैं, नहीं भी है तो कल गीता सत्र चला हमारा, आपने सुना। ये जो बात है ये कृष्ण से ज़्यादा निकट की है, या जो मूर्ति है वह ज़्यादा निकट की है? यह बात किसकी है?

श्रोतागण: श्रीकृष्ण की है।

आचार्य: ये बात कहाँ से आयी?

श्रोतागण: श्रीकृष्ण से।

आचार्य: और मूर्ति कहाँ से आयी?

श्रोतागण: संसार से।

आचार्य: बस उत्तर मिल गया। यह बात जो गीता में लिखी है यह कहाँ से आयी है? यह बात कृष्ण से आयी है। और कृष्ण की मूर्ति कहाँ से आयी है? वो इंसान से आयी है। तो मैं गीता को पूजूँ या मूर्ति को पूजूँ?

श्रोतागण: गीता को।

आचार्य: और अगर मैं मूर्ति को पूज रहा हूँ तो वास्तव में किसको पूज रहा हूँ?

श्रोतागण: इंसान को, अपनेआप को।

आचार्य: दूसरा प्रश्न – गीताएँ, भगवद्गीता की बहुत सारी प्रतियाँ विश्वभर में हैं, वो प्रतियाँ क्या अलग-अलग बात कह रही हैं? क्या अलग-अलग श्लोक हैं उनमें? पर कृष्ण की इतनी मूर्तियाँ दुनियाभर में हैं, क्या वो सारी मूर्तियाँ एक सी हैं? इससे क्या साबित होता है, कि वो जो मूर्तियाँ हैं वो कहाँ से आयी हैं? वो कृष्ण की मूर्तियाँ हैं ही नहीं, वो तो इंसान ने गढ़ी हैं कल्पना कर-करके। एक इंसान की एक तरह की कल्पना है तो उसने एक तरह की मूर्ति बना दी। दूसरे ने दूसरे तरह से कल्पना करी, इसने दूसरे तरह की मूर्ति बना दी।

अगर असली है, खरा है तो वो कृष्ण का शब्द है जो हमें पता है कि कृष्ण से ही आया है। ठीक? या ऐसे कह दीजिए कि जिससे भी आया है ये शब्द, उसी का नाम कृष्ण है। कोई ये भी कह सकता है कि ये शब्द वेदव्यास से आया है तो वेदव्यास ही कृष्ण हैं। अरे! ये शब्द है अगर तो किसी से तो आया होगा न, जहाँ से भी ये शब्द आया है वो जगह पूजनीय है, मैं उसको पूजूँगा न। यह तो पक्का है कि मूर्ति तो भैया मुझसे ही आयी है, तो मूर्ति को कैसे पूजूँ?

ये शब्द मुझसे नहीं आया है ये मैं जान रहा हूँ। और ये शब्द ऊँचा है, इस शब्द में एक गुणवत्ता है यह मुझे दिखायी दे रहा है। प्रमाणित है ये शब्द ऊँचा है। इस शब्द से लाभ हो रहा है और इस शब्द में जो बात कही गयी है वह बोधगम्य है। ठीक? लेकिन वह जो मूर्ति है वह तो मेरा निर्माण है।

अगर हम वास्तव में सनातनी होते तो मंदिरों में गीता की प्रतियाँ रखी होतीं, ठीक वैसे जैसे गुरुद्वारों में गुरु ग्रंथ साहिब होते हैं और गुरुबाणी होती है। लेकिन नहीं, हमें गीता से मतलब नहीं है। हमें किससे मतलब है? तमाम तरह-तरह की।

और मूर्तियों का हाल तो मैं आपको बताता हूँ। यहाँ ऋषिकेश में आप जानते हैं, आप कैफ़े वग़ैरा में चले जाइए, वहाँ शिव का किस तरह चित्रण होता है? कि शिव एक विदेशी हैं जो बुलेट लेकर हिमालय पर घूम रहे हैं। देखा है? याद आ रहा है? और तमाम यहाँ पर ऐसा ही है। वो तो आप जैसे होते हो उसी हिसाब से आप मूर्ति बना लेते हो।

वह उसमें काला चश्मा भी पहना देते हैं शिव को। और यह नहीं कि उन्होंने मज़ाक करा है, वह विदेशियों ने अपने हिसाब से बड़ा अनुरूप चित्रण करा है। वो कहते हैं शिव ऐसे ही तो होंगे, एक मस्त सा बंदा है, वो पहाड़ों पर घूमता रहता है, मस्क्यूलर (गठीले शरीर वाला) है काफ़ी। और उसके पास वो सब भी दिखा देते हैं कि वीड (गाँजा) और ये सब भी रखा हुआ है, अपना मस्त बैठा हुआ है।

और वो अपनी ओर से अपमान नहीं कर रहे हैं। आप कहेंगे कि वो शिव को दिखा रहे हैं कि उनके पास भाँग-धतूरा-गाँजा-वग़ैरा और शिव अपना। और ये वो अपना बड़ा विस्तार से दिखाते हैं कि बगल में शिव की बुलेट खड़ी हुई है और शिव ऐसे अपना बैठे हुए हैं चश्मा लगाकर के और कुछ भी है, धतूरा-गाँजा जो भी उनका चल रहा है।

मूर्तियाँ सारी कहाँ से आती हैं?

श्रोतागण: इंसान के मन से।

आचार्य: लेकिन ये तो इंसान के मन से नहीं आयी है न भगवद्गीता? ये तो मुझे पता है, मैं देख रहा हूँ कि इसको पढ़ रहा हूँ तो मेरे मन के जाले हट रहे हैं। तो मैं पूजूँ तो किसको पूजूँ? इसलिए उन्होंने कहा था कि "पाथर पूजे हरि मिले तो मैं पूजूँ पहाड़, ता से तो चक्की भली, पीस खाए संसार।"

प्र८: एक प्रश्न और है। जैसे पाँच साल पहले सासु माँ निधन हुआ था तो जीवन में पहली बार मैंने गरुड़ पुराण सुना था। तब बहुत ज़्यादा मुझे कंफ्यूजन हुआ तो मैं उठ गयी और मैं काम में लग जाती थी। तो तब मैं बहुत ज़्यादा बदनाम हो गयी कि मतलब नास्तिक हूँ। तब पापाजी बेचारे बोलते रोज़, "देखो बेटा, मेरे जाने के बाद सबकुछ बहुत अच्छे से करना नहीं तो मेरा उद्धार नहीं होगा।" तो अब मैं मन से तो कुछ भी नहीं कर पाऊँगी, तो उनको जीते जी मैंने बोला, “पापाजी, आप कुछ भी करवा लीजिए, उसके बाद मुझसे मन से नहीं होगा।“ तो क्या मुझ पर कर्म चढ़ेंगे फिर?

(श्रोतागण हँसते हैं)

आचार्य: अब मैं क्या बोलूँ?

प्र८: मुझे लगता है कि पापाजी की बात मान नहीं पायी तो वो एक गिल्ट है और मुझे ख़ुद में यह बिलकुल भ्रम लगता है। तो मुझे क्या करना चाहिए? दुविधा है, सर।

आचार्य: पापा जी का दिल रखने के लिए वो जो कुछ चाहते हैं वह कर दीजिएगा। अपनी वसीयत में लिख दीजिए कि आपका कुछ ना हो।

(श्रोतागण हँसते हैं)

प्र८: थैंक यू सो मच। शुक्रिया। बहुत बड़ा कंफ्यूजन आपने दूर कर दिया। मैं आज ही डायरी पर लिख देती देती हूँ ख़ुद के बारे में।

आचार्य: हाँ, अपने बारे में तो आप सबको लिख देना चाहिए। देखो, मेरी स्मृति का भी अपमान मत करना ये सब करके। कम-से-कम मैं तो अवश्य लिख रहा हूँ। आप सब से भी यही आग्रह करूँगा कि लिखकर जाइए और कुछ पता नहीं होता बुलावा कब आ जाए, इसीलिए लिख ही डालिए जल्दी से। उसमें कोई स्टांप पेपर में नहीं लिखना होता है। ई-मेल वग़ैरा कर दीजिए अपने सब भाई-बंधुओं को। उसमें क्या है, आज ही कर दीजिए। ठीक है।

और पापा जी को भी जितना हो सके समझाइए। याद है न, "जियत न तरेउ मुये का तरिहो ।"

प्र८: समझाया, पच्चीस सालों तक समझाया। वो कहते हैं, बेटा, सब ठीक है।

आचार्य: तो ठीक है, वो जो चाहते हैं कर दीजिए।

प्र८: ठीक है। थैंक यू सो मच, सर।

प्र९: प्रणाम, आचार्य जी। आज जैसे सत्र के शुरू में आपने बताया था कि संसार से अगर मुक्ति पानी है वो संसार को पाने में नहीं होगी, वो प्रकृति को समझने से ही मिल सकती है मुक्ति। लेकिन जब मुक्ति ही पानी है तो संसार को समझना ही क्यों है, प्रकृति को समझना ही क्यों है? जैसे नेति-नेति करनी है तो संसार को समझकर क्यों छोड़ना है जब छोड़ना ही है तो?

आचार्य: तो छूटेगा ही नहीं। समझोगे नहीं तो छूटेगा नहीं न, चिपका रहेगा। बस यही है। अगर बिना समझे छूट सकता था तो चिपका ही क्यों होता? अज्ञान माने लिप्तता। नहीं समझा है तो चिपकोगे। छूटना है तो समझना पड़ेगा। बोध इसीलिए आवश्यक है।

प्र९: जैसे भक्तिमार्ग की हम बात करते हैं तो उसमें तो केवल भक्ति होती है, उसमें समझने को नहीं होता कोई कॉन्सेप्ट।

आचार्य: देखो, भक्ति माने प्रेम होता है। सत्य के प्रति प्रेम का अर्थ ही यही होता है कि तुम जानो कि तुम सत्य नहीं हो। भक्ति मार्ग माने प्रेम मार्ग। ठीक? सत्य से कैसे प्रेम कर लोगे अगर तुम ही सत्य हो? तुमने घोषणा कर रखी है, अहंकार यही तो बोलता है ‘मैं ही सत्य हूँ।‘ अगर मैं ही सत्य हूँ तो सत्य से प्रेम कैसा? फिर तो आत्म-प्रेम ही पर्याप्त है। और आत्म प्रेम तो सब में होता है, आजकल तो ख़ूब चलता है सेल्फ-लव कि मैं ही हूँ और आत्म-प्रेम पर्याप्त है। सत्य के प्रति प्रेम रख सको, इसके लिए आवश्यक है कि सबसे पहले अपनेआप को जानो कि तुम असत्य हो। तो भक्ति भी बिना जाने कैसे कर लोगे?

वो जिस को भगवान कहते हो, उसको यही कहते हो न कि दूर है और ‘काश! मैं भगवान के पास जाऊँ, वियोग मिटे।‘ भक्त यही तो रोता है दिन-रात कि भगवान दूर है और सब कुछ जो अच्छा है और उच्च है भगवान में आ गया। और भक्त क्या कहता है अपनेआप को? "मो सम कौन कुटिल खल कामी " वो सबकुछ जो निकृष्ट है वो मेरे पास है। और हे, दीनदयाल मुझे अपने पास बुला लो, मुझे अपने चरणों में स्थान दे दो। यही भक्ति का वक्तव्य है न। यह वक्तव्य देने के लिए सबसे पहले मानना तो पड़ेगा न कि तुम “कुटिल खल कामी हो?” वो कैसे पता चलेगा बिना जाने स्वयं को?

कोई बैठा है यहाँ पर जो अपनेआप को “कुटिल खल कामी बोलता हो?” कोई नहीं बोलता। सबको यही लगता है हम ठीक-ठाक ही हैं, थोड़ा-बहुत गड़बड़ है और थोड़ा-बहुत अच्छे भी हैं। आत्मज्ञान के बिना भक्ति हो कैसे सकती है? और अगर आत्मज्ञान के बिना भक्ति करोगे तो वही भक्ति होगी जो चलती है – अंधभक्ति, अंधश्रद्धा, पागलपन। ज्ञान और भक्ति एक ही होते हैं, एकदम एक होते हैं। जिन्होंने ज्ञानमार्ग, भक्तिमार्ग अलग-अलग बताया, वो समझते ही नहीं।

अगर भक्ति बिना ज्ञान की है तो वह एक बहुत सड़ा हुआ अंधविश्वास बन जाएगी।

और ज्ञान अगर बिना भक्ति का है तो वह भीतर बचा रहेगा एक गाँठ के रूप में, एक गुरुर के रूप में। अहंकार बचा रह जाएगा अगर ज्ञान में प्रेम नहीं है तो। ज्ञान को प्रेम चाहिए होता है, प्रेम को ज्ञान चाहिए होता है; दोनों एक दूसरे के बिना आगे जा ही नहीं सकते बहुत। दोनों ऐसे (कदम-दर-कदम) ही चलते हैं। एक थोड़ा सा आगे हो सकता है, पर उससे और आगे जाना है तो पीछे वाले के साथ होना पड़ेगा। दोनों ऐसे ही चलते हैं। दोनों अगर नहीं है तो पंछी उड़ान नहीं भर पाएगा। दो पंख चाहिए, ज्ञान-भक्ति एक साथ चाहिए।

नहीं होता है ऐसा कि ज्ञानी में प्रेम न हो और नहीं होता है ऐसा कि प्रेमी जान न जाए। ठीक है। तो प्रेममार्गियों से मिलो या भक्तिमार्गियों से मिलो और वो कहें कि ज्ञान तो बेकार की बात है, तो उनसे कहना, ‘बेटा, ज्ञान तो तुम में है ही नहीं क्योंकि ज्ञान तो बेकार की बात है न तुम्हारे अनुसार। मैं तुम्हें एक बात बताता हूँ, तुम्हें प्रेम भी नहीं है। तुम अपनेआप को भक्तिमार्गी बताते हो और ज्ञान का उपहास करते हो तो चलो ज्ञान तो हटा, ज्ञान का तो तुमने मखौल ही कर दिया; तुममें भक्ति भी नहीं है। क्योंकि भक्ति संभव ही नहीं है बिना ज्ञान के। आत्मज्ञान नहीं है तो भक्ति कैसे करोगे? क्यों करोगे?’

फिर तो बस यही है कि कोई छवि मिल गयी है और उस छवि को देखकर के एक बड़े कंडीशंड (संस्कारित) तरीक़े से भावविभोर हो रहे हो, आँसू बहा रहे हो, कह रहे हो, ‘अरेरे वाह-वाह-वाह।‘ क्या है ये? क्यों कर रहे हो ये? क्या है? सब कर रहे हैं इसीलिए कर रहे हो?

ये प्रश्न अपने पास पकड़कर रखना: भक्ति का अर्थ होता है—'भज' से आया है—एक विभाजन अनुभव करना। एक विभाजन का अनुभव करना। किन दो के बीच विभाजन अनुभव कर पाने को भक्ति कहते हैं? जो उच्चतम है और जो मैं हूँ। ये साफ़ देख पाना कि वो जो उच्चतम है मैं उससे बहुत विभाजित हूँ। भज—उसी से भक्ति निकला है। मैं उससे विभक्त हूँ। विभक्त समझते हो न, बँटा हुआ। भक्ति माने बँटा हुआ। भक्त माने जो बँटा हुआ है, जो दूर है, जो वियोग में है।

मैं ये स्वीकार कर पाऊँ, ये एक्नोलेज कर पाऊँ कि मैं उस ऊँचाई से दूर हूँ, उसके लिए सबसे पहले मुझे अपनी अवस्था का ज्ञान होना चाहिए न। नहीं तो मैं कैसे कहूँगा कि मैं उससे दूर हूँ। तो आत्मज्ञान के बिना भक्ति कैसे कर लोगे, पागल! नहीं बात जम रही?

दो उदाहरण दे रहा हूँ आपको। एक रामकृष्ण परमहंस का; उनको हम आमतौर पर क्या जानते हैं? भक्त हैं। और उनके वक्तव्य पढ़ो, अद्वैत की उनकी समझ देखो। उनकी आप कहानियाँ ही पढ़ लीजिए, वो जो पैरेबल्स ऑफ रामकृष्ण परमहंस है, आप उसको पढ़िए। और आप अवाक् रह जाएँगे कि एक आदमी जो तथाकथित गूढ़तम सिद्धांत हैं, उनको इतना सरल करके सामने कैसे रख सकता है! कैसे! कि "चील उड़ती रहती है लेकिन नज़र तो उसकी छोटे से मरे हुए चूहे पर ही रहती है न," ये कहकर के उन्होंने अहम् के, प्रकृति के बारे में सब बता दिया। अब ये भक्त हैं लेकिन इनके ज्ञान का कोई ठिकाना नहीं।

और दूसरा मैं आपको उदाहरण दे रहा हूँ कृष्णमूर्ति का। वो बच्चों के साथ बैठे हुए हैं, उनका आप वीडियो देखिएगा और बताइएगा कि उनमें ज्ञानी जैसा कुछ लग रहा है क्या। और वो बच्चे आ रहे हैं, उसमें एक जगह तो ऐसा होता है कि एक बच्चा आ रहा है—वो बूढ़े हैं एकदम, कम-से-कम अस्सी साल के उस वीडियो में—और वो बच्चा उनसे खिलवाड़ भी करने लग जाता है। एक को अपनी गोद में बैठा रहे हैं वो धक्का मार रहा है मुझे नहीं बैठना। ये सब चल रहा है। आप कहेंगे, ये आदमी एकदम ही बच्चा हो गया है बच्चों के साथ, प्रेमी हृदय, सरल, निश्छल। ज्ञानी में प्रेम न हो, कैसे हो सकता है ऐसा? और प्रेमी में ज्ञान न हो, ऐसा कैसे हो सकता है? ये दोनों एक ही हैं बाबा।

प्र१०: नमस्कार, आचार्य जी। मेरा प्रश्न सनातन धर्म पर जो डिस्कशन हो रहा था उससे सम्बन्धित है। उसमें आपने बताया कि मन, विचार और भावनाएँ, ये सभी सनातन नहीं हैं। ये बात मैं समझती हूँ जब वीडियोज भी देखती हूँ और आज भी काफ़ी स्पष्टता मिली। लेकिन जब परिस्थिति आती है तो ऐज़ अ वुमन (महिला होने के नाते) मुझे ऐसा लगता है कि ये सब चीज़ें मुझ पर हावी हो रही हैं। और मैं ये सब बिलकुल भूल जाती हूँ।

और एक दूसरा प्रश्न है इसी से सम्बन्धित कि कल यहाँ पर एक बैनर लगा था जिसमें लिखा था – "जहाँ संग्राम नहीं वहाँ राम नहीं।" और अभी मैं 'स्त्री’ पुस्तक पढ़ रही थी, उसमें लिखा था कि सहनशीलता, सहिष्णुता और त्याग ये बहुत बड़े गुण हैं स्त्री के लिए, सभी के लिए। अब मेरा प्रश्न ये है कि डेली लाइफ में, फैमिली लाइफ में, वर्क लाइफ में मैं कैसे भेद करूँ कि कहाँ मुझे संग्राम करना है और कहाँ पर मुझे त्याग करना है?

आचार्य: "जहाँ राम नहीं वहाँ संग्राम नहीं" है या कि "जहाँ संग्राम नहीं वहाँ राम नहीं" है?

प्र१०: जहाँ संग्राम नहीं वहाँ राम नहीं।

आचार्य: वो तो मुझे समझ में आता है। पर ये सबकुछ मैंने कहा है – सहनशीलता, सहिष्णुता, त्याग, ये सब स्त्री के लिए बड़े गुण हैं?

प्र१०: नहीं, स्त्री के लिए नहीं। आपने उसमें ऐसा लिखा है कि ये गुण हैं, इनको आप छोड़ मत दीजिए।

आचार्य: वो किसी संदर्भ में लिखा होगा, मैं तो बोलता हूँ कि चंडी बनो।

(श्रोतागण हँसते हैं)

आचार्य: मैंने कब बोल दिया कि—मुझपर आरोप हो यही लगते हैं कि आपने घर-घर में क्या करा दिया, क्रांति करा दी, झगड़े हो रहे हैं। मैं किसी को बोल दूँ सहनशील हो जाओ, ये कैसे होगा? मैंने नहीं बोला।

प्र१०: सर, मैं आपको एग्जांपल देकर समझाती हूँ कि मेरा सवाल क्या है। जैसे कुछ सिचुएशंस होती हैं जहाँ पर शायद मुझे विरोध करना चाहिए लेकिन मैं करती नहीं हूँ, वहाँ मैं मौन रह जाती हूँ। तो उस समय के लिए तो वो ठीक होता है लेकिन बाद में मेरा मन अशांत रहता है। और कई बार विचार और भावनाएँ बहुत ज़्यादा उस समय ओवरपॉवर (हावी) करती हैं।

आचार्य: इसका जो व्यावहारिक सूत्र होता है वो ये होता है कि एक हाइरार्की , एक वरीयता क्रम पता होना चाहिए मूल्य का, किस चीज़ का कितना मूल्य है। ठीक है। और सूत्र यह है कि बड़े पर छोटे को क़ुर्बान किया जा सकता है। बस ये है। कोई भी चीज़ छोटी है यह पता हो और पता हो कि अगर इसमें उलझे तो कोई बड़ी चीज़ का नुकसान हो जाएगा, तो वहाँ उस छोटी चीज़ की फिर उपेक्षा करी जाती है। इसीलिए अध्यात्म में उपेक्षा को भी एक बड़ी बात माना गया है; उपेक्षा करना सीखना होता है। लेकिन उपेक्षा के साथ एक शर्त जुड़ी हुई है – जो छोटा है सिर्फ़ उसी की उपेक्षा करी जा सकती है। ये ना हो कि केंद्रीय बात पर भी आपने उपेक्षा कर दी।

छोटे मुद्दों को छोड़ना, उपेक्षित करना, अनदेखा करना आना चाहिए। क्योंकि छोटी चीज़ों में अगर उलझे तो बड़ी चीज़ का नुकसान हो जाएगा। और दुनिया चाहती है कि आप छोटी बातों में उलझो। दुनिया चाहती है कि आप छोटे-छोटे मुद्दों में उलझो। वे छोटे मुद्दों में आपको इसलिए नहीं उलझा रहे हैं ताकि आप छोटी चीज़ में ही हार जाओ। छोटी चीज़ में अगर आप जीत भी गये तो भी बड़ी चीज़ में हार गये न। इसलिए छोटी चीज़ में नहीं उलझना चाहिए। लेकिन ये जो सारी बात कह रहा हूँ, ये लाभप्रद तब होगी जब पहले पता हो कि क्या छोटा क्या बड़ा है। आप समझ रहे हो?

नहीं तो होगा ये कि आप सहनशीलता के नाम पर आप किसी बड़ी और केंद्रीय चीज़ पर ही समझौता, कॉम्प्रोमाइज कर लोगे। वहाँ नहीं समझौता करना है, वहाँ तो भिड़ जाना है। ये बहुत स्पष्ट होना चाहिए कि कहाँ भिड़ जाना है और कहाँ पीछे हट जाना है। आजकल कोई दिन, कोई हफ़्ता नहीं बीतता जब कोई-न-कोई आ करके मेरे बारे में कोई-न-कोई बात कहीं-न-कहीं बोल न दे। ठीक है? कल वैसे ही एक बात आप भी उठा रहे थे।

वो चाहते ही यही हैं कि मैं उलझूँ। और मैं नहीं उलझूँगा। मैं उनको बहुत बड़ी जगह चोट दे रहा हूँ और मैं वहाँ चोट देना जारी रखूँगा। छोटी जगह पर अगर मैं उनसे उलझ गया तो वो छोटी लड़ाई तो मैं जीत लूँगा बड़े आराम से। कुचल देना उनको मेरे लिए कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है। झूठ को कुचलने में कितनी देर लगती है? लेकिन उस कुचलने वग़ैरा के खेल में जो मेरी ऊर्जा लग जाएगी और जो मेरा ध्यान भटकेगा, उसके कारण कहीं मैं बड़ी लड़ाई न हर जाऊँ। और वह बड़ी लड़ाई बहुत महत्वपूर्ण, बहुत संवेदनशील है। मैं अपना ध्यान उस पर से नहीं हटाना चाहता।

नहीं तो ये छोटी-छोटी चीज़ों पर मैं जवाब देते फिरने लग गया अगर तो फिर तो बड़ी दिक्क़त हो जाएगी न। तो इनकी उपेक्षा करी जाती है। लेकिन कोई दिन अगर ऐसा आया कि कोई नौबत खड़ी हो गयी जहाँ केंद्रीय जो मैं काम कर रहा हूँ उस पर ही घात हो रहा है, तब जवाब ज़रूर दूँगा। अभी मेरे केंद्रीय चीज़ पर घात करने की कोई स्थिति बनी नहीं है तो मैं क्यों जवाब दूँ।

जब युवा था तो उस समय पर आइन रैंड से परिचय हुआ था। तो उनके दोनों उपन्यास थे, वो मैंने एक धारा में एकदम जल्दी-जल्दी पढ़ डाले थे और एकदम दिमाग खनखना गया था, आनंद ही आ गया था। और टीनेज (किशोरावस्था) ही थी तब भी। दोनों क्या उनका तीनो, चारों, वी द लिविंग भी पढ़ डाले थे।

तो 'फाउंटेनहेड' में हावर्ड रॉर्क का चरित्र है जो बहुत कम बोलता है। आप नहीं पाएँगे कि वो बहुत लंबी-चौड़ी बातें कर रहा है, एकदम कर्ट (संक्षिप्त), ज़रा सा बोला, आगे बढ़ा। उसको जब बोला भी जाता कि कुछ बोलो तब भी वह नहीं बोलता, वह अपना काम करता है। उसका काम क्या है? वह कुछ बना रहा है, कुछ खड़ा कर रहा है। और अपने हिसाब से खड़ा कर रहा है, बहुत जान लगाकर खड़ा कर रहा है, उसको इश्क़ है अपने काम से। वह कोई जवाब ही नहीं देता।

एक टूही नाम का चरित्र है वो पूछता भी है, व्हाट डू थिंक ऑफ मी? और ये जो टूही है इसने अपनी ओर से रॉर्क का बड़ा नुक़सान कर रखा होता है उसके बारे में अखबार में उल्टा-पुल्टा छपवा रखा होता है। हर तरीक़े से इसको बदनाम करने की चेष्टा कर रखी होती है टूही ने। लेकिन टूही एक दिन उसको मिलता है और उसको पता है कि मैंने इसका बड़ा नुकसान कर रखा है तो ये कहीं मेरे बारे में ज़हर से भरा हुआ होगा, टूही की ऐसी उम्मीद होती है।

तो टूही उससे पूछता है, व्हाट डू थिंक ऑफ मी? (तुम मेरे बारे में क्या सोचते हो) तो रॉर्क बोलता है, ‘आई डोंट थिंक ऑफ यू।' (मैं तुम्हें नहीं सोचता हूँ)।‘ बस यही जवाब है मेरा – आई डोंट थिंक ऑफ यू। तुम हो कौन? तुम्हारे लिए मैं बड़ी चीज़ हूँ इसलिए तुम दिन-रात मुझे बदनाम करते हो। मेरे लिए मेरा काम बड़ी चीज़ है। मैं तुम्हारे बारे में सोचता ही नहीं हूँ। हू आर यू? (तुम कौन हो?) हटो सामने से। तुम्हें जानता ही नहीं मैं तुम कौन हो। लेकिन यही रॉर्क, जब इसको अदालत में घसीटकर ले जाते हैं तो ये स्पीच (भाषण) देता है और वो स्पीच कम-से-कम बीस पन्ने की है।

जब वो नौबत आएगी तो बोलेंगे न, क्योंकि वहाँ पर फिर ये निर्धारित हो रहा होता है कि इन्डिविजूऐलिटी (व्यक्तिकता) जैसी कोई चीज़ बचेगी कि नहीं बचेगी। फिक्शन (मिथक) ही है, पर फिक्शन में वहाँ पर ये तय होना होता है कि अमेरिका में इन्डिविजूऐलिटी बचेगी या सबकुछ बस भीड़ के हाथों सौंप दिया जाएगा। तो वहाँ फिर वो बोलता है। जब वैसी नौबत आएगी तो बोलिए, तब संघर्ष करिए; वरना उपेक्षा करिए।

यही चीज़ एटलस श्रग्ड में भी होती है। वहाँ पर जॉन गाल्ट है, वहाँ लगातार सवाल ही यही चलते रहता है, हू इज़ जॉन गाल्ट, हू इज़ जॉन गाल्ट? और जॉन गाल्ट ऐसा है कि सब छोड़-छाड़कर अलग हटा हुआ है। फिर एक मौका आता है जब वह बोलता है, और फिर वह सीधे नेशनल रेडियो पर बोलता है। और उसकी वो स्पीच मेरे ख़्याल से चालीस या पचास पन्ने की है, एक स्पीच।

चुप रहो न। जहाँ अभी कोर (केंद्र) पर ही हमला नहीं हो रहा है अगर तो चुप रहो, झेल जाओ। जिस दिन कोर पर हमला करोगे, उस दिन जवाब देखना। यही बात घरेलू सम्बन्धों पर भी लागू होती है। यही बात आपके व्यावसायिक सम्बन्धों पर भी लागू होती है। छोटे नुकसान हैं, पी जाओ। और पीने के पीछे तर्क सही है बिलकुल क्योंकि छोटी चीज़ में उलझे तो? (बड़ी चीज़ का नुकसान हो जाएगा।) ये स्पष्ट रखिए। छोटी चीज़ों को छोड़ते चलो, छोड़ते चलो।

श्रीकृष्ण का याद है न; शिशुपाल? कितनी गलियाँ खा गये थे? वो गलियाँ दिए जा रहा है, ये अपना ठीक है। बस जब अस्सी-नब्बे होने लग रहा था तो उसको बोले "बेटा, सावधान! थ्रेशहोल्ड के तरफ़ अब पहुँच रहे हो तुम। पर निन्यानवे बहुत होता है, सोचकर देखिए, वो भी भरी सभा में। भरी सभा में सबके सामने वो रुकने को ही तैयार नहीं हो रहा और वो भी निन्यानवे बार। ये पीते गये, ठीक है। तो निन्यानवे बार पीना आना चाहिए। निन्यानवे बार पीना आना चाहिए। ये नहीं कि किसी ने ज़रा सा कोच दिया और आपने प्रतिक्रिया कर दी। रिएक्टिवनेस (प्रतिक्रवाद) कमज़ोरी होती है; ये बात पकड़ लेंगे। रिएक्टिव नहीं होना है।

रिएक्टिव होने का अर्थ है, वेदान्त में प्रकृति हो जाना। प्रकृति में क्या चलते हैं? रिएक्शंस , प्रतिक्रियाएँ चलती हैं। पदार्थ आपस में प्रतिक्रिया करते हैं।

आप चेतना हो, आपको प्रतिक्रिया नहीं करनी है, आपको सोच-समझकर अपने बोध से काम करना है। तो प्रतिक्रिया और प्रतिसाद में रिएक्शन और रिस्पॉन्स में अंतर होता है।

जो आपसे हो गया क्योंकि आप क्रोधित हो गये किसी ने आपका बटन दबा दिया – वो कहलाती है प्रतिक्रिया।

और जो सत्य के प्रति आपके समर्पण से निकलता है – वो कहलाता है रिस्पॉन्स। रिएक्टिव नहीं होना है।

और अगर आप साथ हो, एक साफ़-सुथरी राह चलना चाहते हो तो ये ज़रूर होगा कि दुनिया आकर के बहुत कोचेगी, इधर-उधर से ताने मारना, ये करना वो करना। तुम बस चुप रहो। बोलेंगे, जवाब भी देंगे, ज़रूरत पड़ेगी तो शस्त्र भी उठाएँगे लेकिन तब जब केंद्रीय युद्ध छिड़ेगा। गीता भी किसी छोटी-मोटी मुठभेड़ में नहीं कही जाती, कि चौराहे पर चार लोग भिड़ गये तो कृष्ण वहाँ आकर गीता बताएँ!

(श्रोतागण हँसते हैं)

अरे! पहले महायुद्ध छिड़ने तो दो। ठीक है न। तो वो जो भरी उत्तर आना है हमारी ओर से वो भी तब आएगा जब महायुद्ध होगा, तब दे देंगे उत्तर। अभी चौराहे पर खड़े होकर गाली देने वालों से थोड़े ही उलझना है।

समझ में आ रही बात?

प्र११: प्रणाम, आचार्य जी। आचार्य जी, हमारी मृत्यु का एक परिणाम तो ये है कि हमारा शरीर चला गया। और एक परिणाम मेरे को ये दिखता है कि जब हमारी मृत्यु होती है तो मौत हमारे लिए इसीलिए नहीं रुकेगी कि हम और गुस्सा कर लें थोड़ी देर, या किसी से और प्रेम कर लें, या हमारे पास जो मौका था डर से उबरने का, एक और मौका हमें मृत्यु दे दे। मृत्यु इस चीज़ के लिए रुकेगी नहीं। तो क्या जब मृत्यु हो जाती है तो हम अपने रिश्तों के साथ-साथ ये सब भी छोड़ देते हैं हमारे डर, हमारी आसक्तियाँ, हमारे जितनी ज़िम्मेदारियाँ हैं सब पीछे छूट जाते हैं? तो क्या रोज़ हमारा डर से मरना ही असली जीवन है?

मतलब क्या मृत्यु ही जीवन है? इन आसक्तियों का मर जाना, इस डर का मर जाना ही एक असली जीवन है? और यही मृत्यु जीवन है तो इस जीवन का लक्ष्य क्या होना चाहिए? क्या एक बेहतर समाज इसका लक्ष्य होना चाहिए?

आचार्य: बस यही जीवन है। यही लक्ष्य है। इसके आगे कोई लक्ष्य नहीं है। जो रोज़-रोज़ का मरना है वो समाप्त हो गया तो लक्ष्य मिल गया; उसके आगे कोई लक्ष्य नहीं है फिर। लक्ष्य इसलिए नहीं है क्योंकि लक्ष्य के लिए लक्ष्येता होना चाहिए न जो लक्ष्य बनाए। जो लक्ष्य बनाए वही तो जीता है, वही तो मरता है। रोज़ तुम्हारे नये-नये लक्ष्य बनते हैं या नहीं बनते हैं? और लक्ष्य के साथ एक नया लक्ष्य बनाने वाला पैदा होता है।

तुमने आज एक लक्ष्य बनाया तुम तैयारी कर रहे हो, तुम्हें इंजीनियरिंग में जाना है, तो तुम्हारा क्या नाम है? लक्ष्येता का क्या नाम है? वो बोलते हैं जेईई एस्पिरेंट। वो एक है। लक्ष्य के साथ एक नया लक्ष्येता पैदा हो गया कि नहीं हो गया?

अब छः महीने बाद पता चला कि ये तो हो नहीं रहा, कैलकुलस भारी है। तो बोले, अच्छा ठीक है, मेडिकल की तैयारी करेंगे। तो अब तुम हो गये मेडिकल एस्पिरेंट। तो लक्ष्य बदलते ही लक्ष्येता बदल गया कि नहीं बदल गया? तुम क्या थे पहले, अब कुछ और हो गये न।

तो यही जो लक्ष्यों का खेल है, ये बंद हो जाता है; लक्ष्येता ही समाप्त हो जाता है। तो उससे बाहर आ गये, अंतिम लक्ष्य मिल गया। तो फिर क्या कोई और लक्ष्य बनता नहीं, होता नहीं? उसका चलता रहता है लेकिन उस लक्ष्य के साथ ये उम्मीद नहीं जुड़ी होती है कि उससे मुझे कुछ मिल जाएगा। फिर आदमी बस उसको ऐसे ही मौज में कहता है, ‘ठीक है, हो जाएगा तो अच्छा, नहीं भी हुआ तो पूर्ण तो हैं ही।‘ फिर उस कर्म में मस्त गुणवत्ता होती है क्योंकि उसमें ये डर नहीं होता न, कि ये काम नहीं हुआ तो न जाने क्या हो जाएगा। निष्कामता आ जाती है।

प्र११: तो अगर मृत्यु के बाद जो हम पीछे छोड़ जाते हैं...

आचार्य: पहले तो बोलते हुए चलो नहीं तो लोग समझेंगे नहीं कौनसी मृत्यु। शारीरिक मृत्यु या मानसिक मृत्यु, कौनसी मृत्यु की बात कर रहे हो?

प्र११: आसक्तियों की मृत्यु, मानसिक मृत्यु। मानसिक मृत्यु ही एक सही जीवन है इसका मतलब?

आचार्य: बस, बस बढ़िया!

प्र११: और इस मानसिक मृत्यु का ही परिणाम एक बेहतर समाज है?

आचार्य: हाँ, वो अपनेआप हो जाता है, स्वयं हो जाता है। बहुत बढ़िया!

प्र११: जी आचार्य जी, धन्यवाद।

प्र१२: प्रणाम, आचार्य जी। मेरा सवाल एक्सपिरियंसेस पर है। जैसे आप बताते हैं कि सारे एक्सपिरियंसेस झूठे होते हैं, तो इसमें मेरा प्रश्न ये है कि प्रैक्टिकल लाइफ (व्यावहारिक जीवन) में, आम ज़िंदगी में अनुभव होते ही रहते हैं लोगों के साथ या कुछ निर्णय ले रहे हैं उसमें। तो इसमें होता क्या है कि फिर मैं ख़ुद को डिवैल्यू करना शुरू कर देती हूँ कि मैं जो भी सोच रही हूँ या जो भी मुझे अनुभव हो रहे हैं, वो सब झूठे हैं। तो इस वजह से मैं कोई भी निर्णय नहीं ले पाती हूँ, कन्फ्यूज़्ड स्टेट में रहती हूँ।

आचार्य: तो कन्फ्यूश़न झूठा नहीं है?

प्र१२: तो सर, कोई निर्णय तो लेना ही पड़ेगा न।

आचार्य: ये तो एक इन्फॉर्म्ड डिसिश़न मेकिंग (सूचित निर्णय लेना) में बेसिक बात होती है कि डिसिश़न लिया गया और साथ में लिखा गया सबजेक्ट टू द फॉलोइंग कॉन्स्ट्रेंड एंड असम्प्शन्स (निम्नलिखित बाध्य धाराणाओं के अधीन)। निर्णय तो लेना ही पड़ेगा, पर निर्णय लेते वक्त ये ख़्याल रहा कि उसके साथ में बहुत सारी शर्तें और मान्यताएँ जुड़ी हुई हैं। ऐसे ही आगे बढ़ते हैं।

प्र१२: तो सर, मतलब एक्सपिरियंसेस को महत्व देना है परंतु...

आचार्य: भाई, महत्व नहीं मजबूरी की बात है। मुझे पता है कि मुझे जो दिख रहा है वो सही नहीं है; पर मैं करूँ क्या? मेरी आँख ख़राब हैं, चश्मा है नहीं, अब मैं इसको (मेज़ पर रखे पन्ने को) पढ़ रहा हूँ। अब मुझे पता है कि जो पढ़ रहा हूँ वो गड़बड़ है; पर करूँ क्या?

तो एक ओर तो मैं पढ़ना नहीं रोक सकता, तो माने अनुभवों को रोक नहीं सकते, जानते हुए भी कि जो अनुभोक्ता है वह भ्रष्ट है, उसे जो भी अनुभव होता है सब गड़बड़ ही होता है। सत्य से वह दूर है और कुछ भी वह भ्रम, कल्पना करे रहता है। तो एक ओर तो ये मजबूरी है कि भाई उस अनुभोक्ता के साथ ही काम चलाना है। लेकिन साथ-ही-साथ ये याद भी रखना है कि अपने देखे, अपने पढ़े पर मैं बहुत?

प्र१२: यकीन न करूँ।

आचार्य: यकीन न करूँ। सदा ये भीतर तैयारी रहे कि मैं झूठी साबित हो सकती हूँ। अड़ना नहीं है। प्रगति के लिए, बेहतरी के लिए लगातार तैयार रहना है। क्योंकि मुझे पता है भाई मेरा ही तो अनुभव था। उस अनुभव से निष्कर्ष निकाला; किसने निकाला? मैंने ही तो निकाला। और मैं कहाँ का तीस मार खाँ हूँ। मुझे तो पता है मेरी आँखें भ्रष्ट हैं तो अनुभव भी भ्रष्ट है। तो अगर कोई आया है, उससे कुछ बेहतर बता रहा है तो मैं ध्यान से सुन ही लूँ।

प्र१३: प्रणाम, आचार्य जी। मैं एक प्राइवेट स्कूल में केमिस्ट्री टीचर हूँ। और सामान्यतः ऐसा देखा जाता है अब जो नई जेनरेशन आ रही है, विशेषकर नौवीं से बारहवीं के जो स्टूडेंट्स होते हैं, वो ज़्यादातर एक दिखावे का और झूठ का जीवन जीते रहते हैं। और आपने जैसे बताया सनातन का मतलब होता है मन को आत्मा के तरफ़ लेकर जाना। तो उससे तो...

आचार्य: आत्मा के बारे में हम ज़्यादा बात नहीं करेंगे। तो सनातन का मतलब है मन को प्रकृति के पार ले जाना। दोहराइएगा उसी बात को, सनातन क्या है?

श्रोतागण: मन को प्रकृति के पार ले जाना।

आचार्य: मन को प्रकृति के पार ले जाना। प्रकृति सनातन नहीं है। सनातन क्या है? प्रकृति के पार का कुछ; उसी का नाम दे देते हैं आत्मा, सत्य। ठीक है। तो सनातन धर्म क्या है? ये हम दोहरा रहे हैं, रिवाइज़ कर रहे हैं बस। सनातन धर्म क्या है? मन को उधर ले जाना। सनातन क्या है ये याद रखिए, तो सनातन धर्म क्या है ये याद आ जाएगा।

अब चूँकि माहौल कुछ इस तरह का हो गया है कि लगातार सनातन, संस्कृति, धर्म ये सब चलता रहता है। आगे से ये सब शब्द जब भी सामने आये तो एकदम ठिठक जाइएगा और अपनेआप को पुनः स्मरण कराइएगा – सनातन माने मात्र आत्मा। और आत्मा माने क्या? कोई मेरी कल्पना नहीं, प्रकृति के परे जो है, जिसकी कल्पना करी ही नहीं जा सकती, जिसको नाम दिया ही नहीं जा सकता उसको कहते हैं आत्मा। आत्मा नाम देना भी जैसे एक व्यावहारिक मजबूरी हो। बस चले तो आत्मा नाम भी ना दें, बस चुप; उसको बोलते हैं आत्मा, प्रकृति के परे।

और सनातन धर्म क्या है?

मन को उधर ले जाना। क्यों? क्योंकि मन उलझा रहता है न प्रकृति के अंदर ही। मन को उधर (प्रकृति के पार) ले जाना यही सनातन धर्म है इसके अतिरिक्त सनातन धर्म और कुछ नहीं है।

प्र१३: तो ज़्यादातर वो झूठ का ही जीवन जीते हैं इसका मतलब हम उनको सनातनी नहीं मान सकते। तो ऐसा भी देखा जाता है कि उनका जो फ्रेंड सर्किल वग़ैरा भी है तो वो जातिगत है। कोई एक जाति का है तो उसी जाति का फ्रेंड भी बनाएगा। तो इस चीज़ को कैसे हम रोकें या कम करें? और कैसे उनको सनातन की तरफ़ लेकर आयें, सत्यता से उनका परिचय कराएँ?

क्योंकि आमतौर हमें स्कूल में एक प्रेस्क्राइब्ड सिलेबस (निर्धारित पाठ्यक्रम) दिया जाता है, वही हमें पढ़ाना होता है, हमारे पास टाइम भी लिमिटेड होता है। तो स्कूल में हम ज़्यादा इस तरह की बातें नहीं कर सकते। क्योंकि स्कूल की भी एक उम्मीद होती है हमसे और स्टूडेंट्स और उनके पैरेंट्स होते हैं, उनकी भी उम्मीदें होती है हमसे। तो उसके साथ-साथ हम बच्चों को इस तरफ़ कैसे लेकर आयें?

आचार्य: जो स्कूलों में मैं विधि लगाता था वो ये थी कि उनको फैक्ट्स (तथ्य) और अपीयरेंसेज (आभास) के बीच में अंतर बताना। और बताना भी नहीं, वो एक तरह की वर्कशॉप है जिसमें वो ख़ुद ही बताएँगे।

'कैसा लगा' और 'कैसा है'। क्या चीज़ है जो कैसी लग रही है उसके बनिस्बत वो चीज़ वास्तव में कैसी है। और जब मैं वास्तव कह रहा हूँ तो उसका मतलब ट्रूथ नहीं है, उससे आशय बस फैक्ट है, फैक्ट है। कि किस तरह से हमें इल्युजंस (झाँसे) होते रहते हैं। कैसे जो आम अनुभव हैं वो बस धोखे के अनुभव होते हैं। और इसमें बच्चों को मज़ा भी बहुत आता है, कि अच्छा देखो फिर से बुद्धु बन गये।

जैसे कि एक चित्र आते हैं उनके एक ख़ास नाम होता हैं साइकोलॉजी में—नहीं, ऑप्टिकल इल्यूजन तो हैं ही हैं—वो ख़ास तरह के चित्र होते हैं जिनको अगर अलग-अलग लोग देख रहे हैं तो उनको उन चित्रों में अलग-अलग चीज़ दिखायी देती है। उनके लिए एक ख़ास नाम होता है। तो वो है कि देखो तुम्हें क्या दिख रहा है और क्या है वहाँ पर। और कैसे अगर तुम्हारा मन बदल जाता है तो तुम्हें कुछ और दिखने लग जाता है।

उसमें छोटे-छोटे प्रयोग भी हो सकते हैं, उदाहरण के लिए—बहुत ही छोटा सा है, आप कहेंगे इसकी क़ीमत क्या है—एक क्लासरूम है कोई, ख़ाली पड़ा है। क्लासेज़ ख़त्म हो चुकी हैं। उसमें एक बच्चे से कह दीजिए बच्चे से कि जाकर दरवाज़े के पीछे छुप जा और दरवाज़ा बस उढ़का दो, लॉक नहीं करना। फिर यहाँ दो-तीन से बोलिए कि जाकर जल्दी से देखकर आओ वहाँ कोई है क्या। जाकर जल्दी से देखकर आओ वहाँ कोई है क्या। तो जाएँगे, या तो खिड़की से ही झाँककर देख लेंगे, कोई नहीं दिखा। या कोई अधिक-से-अधिक ये करेगा कि दरवाज़ा थोड़ा सा खोलकर देखेगा तो भी कोई नहीं दिखेगा क्योंकि वो दरवाज़े के पीछे है। और तुरंत आकर बता देंगे कि कोई नहीं है। जबकि वहाँ पर कोई है।

अब ये बहुत साधारण है लेकिन फिर भी ये चीज़ कुछ सिद्ध कर देती है। और इनका फ़ायदा ये होता है कि बाद में आप इन्हीं उदाहरणों को लेकर बोल सकते हैं। जब भी कोई बोले न कि मुझे पूरा पता है, तो तुरंत उनको बस ये बोलना है कि दरवाज़े के पीछे कोई था कि नहीं था। और उसको याद आ जाएगा कि ज़िंदगी धोखा कैसे देती है।

पूरा वेदान्त यही तो है – माया से बचना है। ब्रह्मज्ञान नहीं, माया का ज्ञान। ब्रह्म का कोई ज्ञान हो सकता है क्या? ब्रह्म तो अज्ञेय है, उस ज्ञान से आगे का। माया, माने प्रकृति – उसी का तो ज्ञान लेना है न। और प्रकृति में हम धोखा खाते हैं। इसी पर बार-बार उनसे डिस्कशन हो। वो ख़ुद ही बताएँगे न अपना कि सब लोग चलो अपनी-अपनी स्टूपिड स्टोरी सुनाओ। और सब हँस रहे हैं कि हर कोई बता रहा है कि कैसे बुद्धू बना। और एक बता रहा है उससे दूसरा सीख पा रहा है। ‘अच्छा, यहाँ पर मैंने ये किया, ऐसा निकला।‘

ऐसे ही रिलेशनशिप्स ; वो जो आप बोल रहे हो कि उल्टा-पुल्टा, नौवीं से बारहवीं तक। अच्छा बताओ, ‘रिलेशनशिप में क्या सोचकर गये थे, फ्रेंडशिप में क्या सोचकर गये थे और उसमें क्या निकलकर आ गया?’ आ! ऐसे ही शुरू कर लीजिए।

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