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समभाव का अर्थ क्या है?
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: 'समभाव' का अर्थ है ऐसा भाव जिसके विपरीत ना जाना पड़े। कोई ऐसा भाव जो इतना आकर्षक हो, इतना विराट हो कि तुम्हें पूरा ही सोख ले अपने में। तुम्हें उससे हटकर के किसी और भाव की ज़रूरत ना पड़े। चलो समझो।

संसार में जो कुछ भी करते हो, उसको चलाए रखने के लिए तुम्हें उसके विपरीत की शरण में जाना होता है। जो पढ़ाई करते हैं वह बोलते हैं, "पढ़ाई बहुत हो गई अब ज़रा बाज़ार घूम कर आते हैं, खेल कर आते हैं।" पढ़ाई करनी है तो बाज़ार जाना पड़ेगा। तुमने किसी दिन दस-बारह घण्टे पढ़ाई कर ली या तीन-चार दिन ऐसे हो गए कि दस-बारह घण्टे काम कर लिया। तो फिर दूसरे दिन, चौथे दिन या दसवें दिन तुम यह कहते हो कि 'आज आराम' या कि 'आज थोड़ा कहीं पर मन बदल कर आते हैं, टहल कर आते हैं'। ठीक?

दुनिया में जो भी है वह यह आवश्यक कर देता है कि तुम उसके विपरीत के पास जाओ। क्योंकि दुनिया में कुछ ऐसा है ही नहीं जो तुम्हें पूरा-का-पूरा सोख ले, तुम्हें समा ले अपने भीतर। दुनिया में जो कुछ भी है सब छोटा-छोटा है। जो छोटा है, वो उबाऊ है। जहाँ कुछ छुटपन है, वहाँ घर्षण भी है। सच्चिदानंद परमात्मा समभाव का अर्थ हुआ उसकी सेवा में लग जाओ, उस काम को उठा लो, उस केंद्र से काम करो जहाँ तुम्हें किसी विपरीत की तलाश ही ना रहे जहाँ पर किसी विपरीत की आवश्यकता ही ना रहे। काम वह करो जिसके बाद तुम्हें मनोरंजन की ज़रूरत ही ना पड़े। यह ना कहो, "काम ज़्यादा हो रहा है, अब थोड़ा मनोरंजन भी तो चाहिए।" काम ही मनोरंजन हो जाए! काम में ही ऐसा आनंद है कि अब मनोरंजन किसे चाहिए? पर उसके लिए वह काम पहली बात आकर्षक होना चाहिए और दूसरी बात अनंत होना चाहिए। अनंत नहीं हुआ तो कभी ख़त्म होने लग जाएगा और ख़त्म होने लग गया तो उस काम से इतर तुम्हें 'कुछ और' करना पड़ेगा या कह लो कि 'विपरीत' करना पड़ेगा। और आकर्षक होना चाहिए, आकर्षक नहीं होगा तो कहोगे, "ऊब गए ऊब गए।"

समभाव का अर्थ समझ रहे हो? समभाव का अर्थ यही नहीं होता कि दुःख-सुख एक समान, सर्दी-गर्मी एक समान, धूप-छाँव एक समान। समभाव का अर्थ है- मन पर कुछ ऐसा छाया हुआ है, जिसकी पनाह में आने के बाद अब और कहीं जाने की ज़रूरत नहीं लगती। समता मिल गई है। अब ना विषमता बची है, ना ममता बची है, ना अहमता बची है। यह जीवन जीने के तरीके हैं। यह जीवन जीने की कलाएँ हैं और साथ-ही-साथ जीवन कैसा बीत रहा है यह उसकी कसौटी है।

तुम्हारा काम ऐसा है कि तुम्हें हर हफ्ते, दो हफ्ते, महीने में छुट्टी लेकर कहीं भागना पड़ता है। तुम्हारा काम ऐसा है कि तुम्हें हफ्ते के अंत में शराब की पार्टी करनी पड़ती है। तुम्हारा काम ऐसा है कि घर आ कर निढाल हो जाते हो, कहते हो, "आज बहुत काम हो गया चलो अब टीवी लगाओ!" और 'काम' से मेरा अर्थ है 'लक्ष्य जीवन का', 'केंद्र'। वही तो काम बनता है न? जो केंद्र पर है वही कर्म बनेगा। केंद्र ही तो कर्म का निर्धारण कर देता है न?

कृष्ण जो बात कह रहे हैं उसको अगर तुम धार्मिक और पवित्र वक्तव्य की तरह देखोगे तो उसका बहुत छोटा, आंशिक लाभ मिलेगा। और जो वह बात कह रहे हैं उसको ज़िंदगी की तरह देखोगे तो ज़िंदगी ऐसी खिल जाएगी कि विश्वास नहीं होगा तुमको।

समभाव का मतलब जानते हो?

कि समय ठहर गया।

समभाव जहाँ नहीं है, वहाँ तो घड़ी की टिक-टिक है, काम कब ख़त्म होगा? समभाव का अर्थ है- तुम समय से ही बाहर आ गए। जब ज़िन्दगी में एक ही चीज़ चल रही है, तो समय के बीतने का पता किसको चले? इतना डूब कर कर रहे हैं क्योंकि काम इतना आकर्षक और आवश्यक है कि समय का पता ही नहीं चलता। कब दिन होता है, कब रात होती है कौन जाने? कब मौत आ जाएगी कौन जाने? इसी मस्ती और ख़ुमारी में मर भी जाएँगे।

कैसे मरेंगे?

काम करते-करते।

कौन सा काम?

वह काम जिसे कर्मयोग कहा जाता है।

अब तुमको मृत्यु का डर नहीं और जिसको मृत्यु का डर नहीं वह मृत्यु के पार निकल गया न?

उसके ख्यालों में ही अब मौत नहीं।

उसके ख्यालों में अब क्या है?

काम।

सातत्य, कुछ ऐसा जो कभी ना टूटता हो। कुछ ऐसा जिसके प्रति निष्ठा कभी ख़त्म हो ही ना सकती हो।

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