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समर्पण माने क्या? || आचार्य प्रशांत (2015)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
16 min
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वक्ता: सवाल ये है कि समर्पण कैसे?

समर्पण तुम किस चीज़ का करते हो? समर्पण का अर्थ क्या है?

समर्पण का अर्थ होता है किसी चीज़ की मूल्यहीनता को जान लेना |

समर्पण ऐसा है, जैसे पेड़ से पत्ते का झड़ जाना | उसकी अब कोई उपयोगिता, कोई सार्थकता नहीं है, तो वो गिर जाता है| यदि और ज़्यादा तीखा उधारण लेना चाहते हो, तो समर्पण ऐसा है जैसे तुम्हारे हाथ में जलता हुआ कोयला हो और तुम उसको छोड़ दो | समर्पण की छवियों से बंध कर मत रह जाओ | हमारे मन में समर्पण की कुछ ऐसी छवि है कि कोई गुरुदेव है और जा कर के उनको चरणों में नमन कर दिया, समर्पण कोई ऐसी बात होती है | तुमने कहानियों वगैरह में पढ़ा भी यही है | फिल्म-इत्यादि में भी यही देख लिया है कि समर्पण का अर्थ होता है कि कोई व्यक्ति है या कोई विचार है, उसके सामने जा कर के नमन कर दिया और भाषा हमारी कुछ ऐसी सी फुहड़ है कि जब डकैत पुलिस के सामने हथियार रखते हैं तो उसको हम कहते हैं: आत्म-समर्पण| कि चंबल में सभी डकैतों ने पुलिस के सामने आत्म-समर्पण कर दिया, तो मन में अब वहीँ सब छवियाँ बैठी हुई हैं कि समर्पण के बाद जेल | जब तक समर्पण नहीं है, तो हाथ में बन्दूक है| समर्पण के बाद तो कुछ नहीं | इज्ज़त भी गई, हथियार भी गया, कुछ नहीं बचा !

समर्पण वैसा नहीं है| समर्पण का अर्थ बस वही समझना कि पेड़ से पत्ते का झड़ना या तुम्हारे हाथ में गरम कोयला है और तुम्हें दिख रहा है कि व्यर्थ की चीज़ है, नुक्सान दे रही है, तो तुम क्या करते हो? छोड़ देते हो| और फिर क्या परवाह करते हो कि कहाँ गया? अरे! जहाँ भी गया, जाए, मेरा पिंड छूटा|

दो बातें समझना | न तो तुम ये कहते हो कि कैसे छोड़ें? कैसे पकड़ें,, ये तो पूछ सकते हो | पकड़ने के कई तरीकें होते हैं | मुट्ठी बांध के पकड़ो, जेब में रख के पकड़ो, मुंह में रख के पकड़ो, कहीं और रख के पकड़ो| सर पर रख लो, मूंछ में बांध लो|

पकड़ने के लाख तरीके होते हैं | छोड़ने का तो एक ही तरीका होता है, क्या? छोड़ दिया |

तो ये प्रश्न बिलकुल अवैध है कि समर्पण कैसे? इसकी वैधता तभी तक है, जब तक तुमको जलन नहीं हो रही हाथ में| जब तक तुम्हारा हाथ जल नहीं रहा, सिर्फ़ तभी तक तुम ये सवाल पूछ सकते हो समर्पण कैसे? समर्पण तो सहज त्याग है| जब उसका समय आ जाता है, तो फिर वहां प्रश्न की सम्भावना नहीं रहती कि समर्पण कैसे करूँ? हो जाता है, छोड़ देते हो| और उसके लिए कोई गुरुजी नहीं चाहिए कि गुरु जी के चरणों में जा कर के समर्पित होना है| वो तो बस छोड़ देना है| पहली भूल ये कि पूछा, “समर्पण कैसे?” हम उसके साथ जुड़ी एक और भी भूल कर देते हैं, हम पूछते हैं “समर्पण किसको?”

जब तुम कहीं जाते हो और अपनी गाड़ी पार्क करते हो, तब तुम अपनी गाड़ी छोड़ते हो और रसीद ले लेते हो क्यूंकि तुम्हारा इरादा होता है कि मैं वापस आकर के गाड़ी दोबारा लूँगा| ठीक? पर तुम कहीं कचरा फेकने जाते हो, तो क्या तब भी रसीद लेते हो? तब तुम्हें इस बात से कोई प्रयोजन ही नहीं होता न कि कचरा कहाँ गया और किसको दिया| अरे! जहाँ गया, सो गया, हम मुक्त हुए| गाड़ी की रसीद तुम इसलिए लेते हो क्यूंकि गाड़ी से तुम मुक्त नहीं हुए हो, तुम्हें वापस चाहिए| तो जब तुम पूछते हो कि समर्पण किसको, तब भी तुम्हारा भाव यही है| तुम अभी मुक्त नहीं हुए हो, तुम्हें वापस चाहिए इसीलिए तुम उसको ठीक जगह पर रख़ना चाहते हो| तुम्हें आश्वस्त होना चाहते हो कि जिसको अहंकार दिया है, वहां अहंकार सुरक्षित रहेगा| पार्किंग में गाड़ी सुरक्षित है तो इसीलिए बार-बार तुम्हारे सामने ये सवाल आता है कि “समर्पण किसको?” तुम देख भी नहीं पाते कि कितनी बेवकूफ़ी का, और कितनी बदनीयती का सवाल है ये| जिसे समर्पण करना होगा, वो पूछेगा कि समर्पण किसको? वो पूछेगा क्या? जो देख ही लेगा कि ये गाड़ी व्यर्थ है, कि, ‘’इसमें अगर अब बैठूँगा, तो प्राणघातक हो सकता है मामला और इसकी दो टके की कीमत नहीं|’’ वो उसकी रसीद थोड़ी न लेगा| वो तो कहेगा कि, ‘’छोड़ दी जिसको लेनी है, अब ले जाओ और नहीं लेनी है, तो न ले जाओ| पड़ी रहे| हमारी बला से! हमारा पिंड छूटा इतना काफ़ी है|

समर्पण किसी को नहीं किया जाता| समर्पण मात्र समर्पण है ; छोड़ दिया| अब किसी का अभाग होगा कि जिसको तुम छोड़ो, वो उसको उठा ले| उसकी परवाह तुम क्यूँ कर रहे हो? तुमने घर से कचरा बहर फेंका और कोई इतना बेवकूफ है कि वो कचरा खुद ले कर चला जाए, तो तुम क्यों हैरान होते हो? वो तो उस बेचारे का दुर्भाग्य है| वो तो करुणा का पात्र है| तुम्हारे मन में बात आ रही थी| तुम्हे साफ़ दिखाई दे रहा था कि जीवन में जो तुम सोचते चले आए हो, वो हो सब उल्टा-पुल्टा रहा है और तुमने ये बात सिर्फ़ कह दी| तुमने कह दी, किसी ने सुन ली| तुमने कहा तुम निर्भार हो गए| तुम हलके हो गए, ठीक| उसने सुना| और अगर वो बेवकूफ है, तो उस बात का इस्तेमाल करेगा, अपने अहंकार को बढ़ाने के लिए| वो कहेगा, ‘’ये बेवकूफ है और इसकी तुलना में ‘मैं’ होशियार हूँ|’’ उसने करा क्या है? तुमने अपना कचरा छोड़ दिया और उसने तुम्हारे कचरे को उठा लिया | लेकिन हमारे साथ जब ये होता है, तो हमें लगता है कि हमारा नुकसान हो गया | हम कहते हैं, ‘’अरे! देखो, उसे मेरे मन की बात पता चल गई अब वो मुझ पर हावी हो जाएगा |’’ अगर वो तुम पर हावी हो रहा है, तो वो उसका अभाग है, तुम समझ क्यूँ नहीं पाते इस बात को?

यहाँ पर कई लोग हैं, वो अपने मन की बात नहीं कह पाते हैं| वो हल्के हो ही नहीं पाते| वो कहते हैं कि “हम बता देंगे, तो जिसको पता चलेगी वो हमारी बात का इस्तेमाल करेगा हम पर हावी ही होने के लिए| ‘’अगर मैंने बता दिया, तो बाद में कहीं वो मुझे ताने न मारे |” अगर वो ताने मरता है तो ये उसका दुर्भाग्य है कि तुमने वो गन्दगी त्यागी और उसने वो गन्दगी उठा ली | तुम क्यूँ चिंतित होते हो? तुम तो त्यागो | बड़े मूर्ख हो, तुम अगर तुम इस डर से अपनी गन्दगी नहीं त्यागते कि कहीं कोई उसको उठा न ले| तुम सोचो तुम कर क्या रहे हो? तुम अपनी गन्दगी ढोए जा रहे हो, मुक्त नहीं हो पा रहे, इस डर से कहीं दूसरा न उठा ले| तुम इतने बड़े शुभचिंतक या प्रेमी तो नहीं हो, सिर्फ़ अहंकारी हो| दूसरे के प्रति इतना प्रेम नहीं है, तुममें कि मेरी गन्दगी वो न उठा ले तो इसलिए मैं नहीं त्यागूँगा| कई बार इस वजह से भी नहीं त्यागनी चाहिए| ये बात भी ठीक है|

कुछ लोग इतने बीमार होते हैं कि उनके सामने अगर तुम बीमारी रख दो, तो वो उसे झटपट ग्रहण कर लेते हैं| तुम जानते हो बीमार लोगों की ज़्यादा सम्भावना होती है और बीमार हो जाने की| अगर तुम्हारी बीमारी गहरी है, अगर तुम्हारा प्रतिरक्षा तंत्र ही कमज़ोर हो गया है, तो तुम्हें दस बीमारियाँ और घेरेंगी| बीमार, और ज़्यादा बीमार हो सकता है| तो इसीलिए कई बार ये करना पड़ता है कि जो बीमार हो, उसके सामने और बीमारी न रखी जाए, वो उसको इस्तेमाल कर लेगा अपनी बीमारी और बढ़ाने के लिए | तो वो बात अलग है, वो बात प्रेम की बात है| पर सामन्यतः तुम्हें कोई झिझक नहीं होनी चाहिए, अपना बोझ कम करने देने में | तुम मुक्त हो जाओ, तुम हल्के हुए| तुम अपनी ओर से साफ़ हो गए| अब कोई उस गन्दगी को चाटे, तो ये उसका कर्मफल है | तुम हैरान मत होना | तुम मत कहना कि, ‘’देखो मेरी कीमती गन्दगी चाट गया और पैसे भी नहीं दिए मुझे”| अरे! चाट गया तो चाटने दो| प्रकति में हर तरह के जीव होते हैं| गिद्द होते हैं, जो मरे जानवरों का मांस खाते हैं, सफाई होती है उससे | सुअर होते हैं जो तुम्हारी विष्ठा चाटते हैं| सफाई होती है उससे| तुम क्यूँ हैरान हो?“ देखो मैं अपनी कीमती विष्ठा और ये सुअर, मुफ्त में खा गया|” कई लोग सुअर खाते हैं| क्या पता इसी कारण खाते हों कि, ‘’वसूलेंगे| तूने भी तो खाई थी और जो तूने खाया, वही मैं खा रहा हूँ|”

अब इससे जुड़ी तीसरी बात पर आते हैं| हमने कहा कि समर्पण करते वक़्त, ये बिलकुल नहीं देखना है कि, ‘’मैं जो छोड़ रहा हूँ, वो कहाँ जाएगा?’’ ठीक है| मैं मुक्त हो गया बस इतना बहुत है पर इससे से एक जुड़ा हुआ मुद्दा, ज़िम्मेदारी का है| बात करते-करते ये बात भी सामने आई थी कि अगर गलत व्यक्ति के सामने तुमने अपनी गन्दगी रख दी, तो तुम तो मुक्त हो जाओगे लेकिन वो बीमार हो जाएगा| हममें से अधिकांश लोग बीमार ही हैं| तुम किसी के सामने जाकर के अपने राज़ उद्घाटित करो, तो हो सकता है कि तुम तो मुक्त हो जाओ लेकिन वो, बीमार हो जाए|

इसके लिए भारत ने एक बहुत अच्छी विधि सोची| भारत ने कहा कि तुम जाकर पेड़ को बताओ| तुम जाकर नदी में धो आओ| तुम आकाश से कह दो| विधि तो अच्छी थी, पर उसमें एक बात रह गई| विधि बाकि अन्य विधियों की तरह मृत थी और जो भी मृत विधि होगी, उसको अहंकार इस्तेमाल कर लेगा अपने प्रयोजनों के लिए| तो तुम गए और पेड़ से कह आए और पेड़ बेचारा तुम्हारी भाषा में, तुमसे कोई बात नहीं कर सकता| पेड़ तुम्हारे मुंह पर न कह पाएगा कि तुम झूट बोल रहे हो| तुम समर्पण के नाम पर भी धोका ही दे रहे हो| तुम नदी में जाओगे और कहोगे कि, ‘’मैं गया हूँ अपने पाप धोने के लिए, जो भी मेरे मन में था उसे हल्का करने के लिए’’ और तुम वहां कुछ नहीं करोगे सिर्फ़ नहा करके, पर्यटन कर के आ जाओगे| पाप धोने गए थे और पर्यटन कर के आ गए| कई लोग ऐसा करते हैं| हमारे कैंप होते हैं, उसका प्रयोग बहुत बार पर्यटन के लिए भी हो जाता है| विधियों में हमेशा ये दिक्कत होती है|

तो इस विधि से उच्चतर विधि का नाम होता है गुरु| उस विधि को समझने के लिए शिव का नीलकंठ नाम है, उसको समझना पड़ेगा| गुरु कौन है, उसके दो लक्षण समझिएगा| वो बीमार नहीं है| आप उसके समक्ष अपना कर्मफल उढ़ेल के रख देंगे, पर वो उस कर्मफल से प्रभावित नहीं होगा| वो उस कर्मफल को अपना बोझ नहीं बना लेगा| नीलकंठ की कहानी जानते है न?

सागर मंथन हुआ, तो उसमें से बहुत सारा ज़हर निकला और ज़हर इतना कटु, इतना तीव्र था कि उसके होने मात्र से प्रलय जैसी स्थिति आने लगी| विकराल ज़हर, बड़ी मात्रा में| तो समस्या उठी कि इस ज़हर का किया क्या जाए? देवताओं ने और दानवों ने मिल कर के सागर मंथन किया था| अब समस्या उठी की इतना जो ज़हर निकल आया है, इसका किया क्या जाए? जब भी सागर मंथन होगा उसमें से अमृत से पहले ज़हर निकलेगा| ये जो सागर है, ये हमारे मन का सूचक होता है| मन को जब भी मथोगे, उसमें अमृत आखिर में निकलेगा क्यूंकि आत्मा आखरी है| पहले तो ज़हर ही निकलेगा, बिलकुल| हलाहल ज़हर| तो ज़हर निकला, इसका क्या किया जाए? बात पूरी सांकेतिक है, समझो| मन को मथा, ज़हर निकला, क्या किया जाए? कहीं तो इसको रखना पड़ेगा| जहाँ रखें, वहीँ खतरा क्यूंकि जहाँ रखो, वहीँ उस ज़हर से प्रलय आ जाएगी | अंततः वो उस ज़हर को लेकर के शिव के पास गए| शिव वो, जिसने उस ज़हर को पी लिया| कहा लाओ ठीक है| ‘’तुम लोग कुछ नहीं कर पा रहे, मुझे दे दो, मैं पी लूँगा|’’ पी लिया और ऐसा पिया कि, ‘’पी भी लूँ और मुझे कोई असर भी न हो|” तो वो जो पूरा ज़हर था, उसे अपने गले में रख लिया| तो वो नीलकंठ कहलाते हैं| ज़हर से उनका गला नीला हो गया|

कहानी, पर कहानी क्या इंगित कर रही है इसको समझिए| गुरु ऐसा ही होता है| वो तुम्हारा ज़हर ले भी लेगा और उस ज़हर से अप्रभावित भी रह जाएगा| वो पूरा ले लेगा कि, ‘’लाओ दो| जो कुछ है दे दो और वो नदी भी नहीं है कि तुम से बात न कर सके, दूसरी चीज़| वो नदी भी नहीं है, जो तुमसे बात न कर सके वो पत्थर भी नहीं है की जिसकी भाषा तुम समझ न पाओ | तो अगर तुम उसके सामने झूठ बोलोगे और समर्पण की जगह कोई और नाटक करोगे तो वो तुम्हारे कान पकड़ेगा| नदी तुम्हारे कान नहीं पकड़ेगी| नदी को तो तुम मैला कर आते हो, गुरु को मैला नहीं कर पाओगे| गुरु के सामने समर्पण नहीं किया जाता, गुरु समर्पण की एक विधि भर है| मन से ये छवि बिलकुल निकाल दो की कहीं पर गए और दंडवत करो, इन सब का नाम समर्पण है| ये बेकार की बाते हैं कि किसी के सामने हाथ जोड़ कर के खड़े हो गए या पाव छू रहे हो, आदर सम्मान की बात कर रहे हो, कि ये समर्पण है| ये नहीं समर्पण है!

समर्पण तो बड़े प्रेम की बात होती है| समर्पण के लिए बड़ी श्रद्धा चाहिए और उसके लिए सुयोग्य पात्र भी चाहिए| तुममें इतनी इमानदारी हो अगर अपने प्रति, झूठ नहीं बोल रहा हूँ, छोड़ने का समय आ गया है, तो यूँ ही छोड़ दोगे जैसे हाथ से जलता हुआ कोयला| कहीं भी छोड़ दो तुम, चलते फिरते| गया तो गया| व्यर्थ था, मूल्यहीन था| ‘’हमें उसका विचार ही क्या करना?’’ मन तुम्हारा ऐसा हो कि इसके सामने छोड़ दूंगा, कोई दिलासा चाहिए, तो तुम नदी, पहाड़, पत्थर, कुछ खोज लो, उसके सामने छोड़ आओ| लेकिन यदि मन में अभी चतुराई हो, तो फिर तुम्हें एक व्यक्ति चाहिए होगा मात्र एक विधि के तौर में| मात्र एक विधि के तौर में| व्यक्ति किस कारण से चाहिए होगा, समझ रहे हो न? वो तुम्हारे कान पकड़ सकता है, ठीक इसीलिए चाहिए होगा | तुम उससे झूठ नहीं बोल पाओगे| धोखा नहीं दे पाओगे| तुममें अगर चालाकी हो, तो तुम्हें कोई ऐसा चाहिए, जो कि तुमसे थोड़ा ज़्यादा चालाक हो| जो कि तुम्हारी चालाकी को खूब समझता हो, लेकिन जो अन्दर से ऐसा साफ़ हो कि कोई चालाकी उस पर हावी न हो पाए, उस पर धब्बा न लगा पाए| वो नीलकंठ जैसा ही रह जाए की सब ले भी लिया पर फिर भी प्रभावित नहीं हुआ| ज़हर तो पी लिया, पर ज़हरीला नहीं हुआ| ज़हर खूब पीया पर हम ज़हरीले तब भी नहीं हो गए| तो तुम देख लो कि तुम किस श्रेणी में हो|

मैंने दो तीन बातें कहीं: पहली बात समर्पण के बारे में कि कैसे और किसके समक्ष, ये दोनों प्रश्न वासत्व में वैध नहीं है, दूसरा समर्पण किसी कीमती चीज़ का नहीं किया जाता| जो कीमती है, उसे तुम क्या समर्पित करोगे| वो तो सदा तुम्हारे साथ है| जो असली है, कीमती है, मूल्यवान है, वो तो तुम्हारा केंद्र है| तुम्हारी आत्मा है| उसका समर्पण नहीं होता| समर्पण सदा किसका होता है? अहंकार का| और अहंकार क्या है? कचरा, मूल्यहीन| उसको बस छोड़ देना है| उसको बस यूँ ही छोड़ दो| लेकिन अगर कोई विषय चाहिए छोड़ने के लिए, तो जाकर किसी मूर्ति के समक्ष छोड़ दो| बढ़िया है, कोई दिक्कत नहीं है| किसी मंदिर में छोड़ आओ| नदी,पेड़, पशु, कहीं भी छोड़ आओ| लेकिन अगर मन में चालाकी है, तो फिर तुम्हें तुम्हारे ही जैसा सजीव कोई व्यक्ति चाहिए| याद रखना उस व्यक्ति की उपयोगिता मात्र विधि के रूप में है; समर्पण तुम्हें करना है| वो व्यक्ति, मात्र उस समर्पण का ज़रिया है| एक तरह का मददकर्ता है|

और हमने बीच में ऐसा भी कहा था की व्यक्ति ऐसा मत ले लेना जो खुद बीमार हो क्यूँकी बीमार को यदि बीमारी परोस दी, तो वो और बीमार हो जाएगा| व्यक्ति ऐसा चाहिए, जो मूलतः स्वस्थ हो ताकि तुम जब अपनी बीमारी उसके सामने रखो, तो वो उसको झेल पाए| पुराने समय में गुरु जब दीक्षित करते थे, अपने शिष्यों को तो उन्हें एक चेतावनी देते थे| वो कहते थे कि शिष्य जल्दी मत बना लेना किसी को भी| किसी को शिष्य बनाना बड़ा खतरनाक काम है क्यूंकि शिष्य का सारा कर्मफल गुरु पर आ जाता है| शिष्य तो मुक्त हो गया| उसने तो अपना कर्मफल छोड़ दिया| अब वो सारा कर्मफल गुरु पर आ जाता है| गुरु होना ऐसा ही है कि जैसे किसी का ज़हर अब तुम्हें पीना है| गुरु होना आदर और पदवी और सम्मान की बात नहीं है| गुरु होने का मतलब होता है कि वो तो अब अपना मैल साफ़ कर देगा, तुम ज़रिया बन गए उसकी सफ़ाई का| पर अब उसका सारा मैल, तुम्हारे पास आएगा| वो अपने कर्मफल से मुक्त, वो सारा फल अब तुम्हें भुगतना है| तो कहा जाता था कि जल्दी से शिष्य न बना लेना किसी को| तभी बनाना, जब उसका ज़हर पी पाने की पात्रता हो तो, नहीं तो शिष्य तो हो सकता है कि मुक्त हो जाए, तुम कहीं के नहीं रहो| शिष्य तो अपना नहा, धोकर चल देगा| तुम दूषित हो जाओ| बात आ रही है समझ में?

शब्द-योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

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