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सामने बैठो, कहो, और सुनो || आचार्य प्रशांत (2019)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी मैंने संस्था की वेबसाइट में आपके लेख पढ़े। उसमें आपने बताया था कि लोग दुखी क्यों हैं। आपने कहा था कि लोग दुखी इसीलिए नहीं हैं कि दुख आवश्यक है, लोग इसीलिए दुखी हैं क्योंकि उन्हें अभी सुख की तलाश है। जो सुख को पकड़ता है, वो दुख को भी पकड़ता है। जिसे दुख वास्तव में छोड़ना होता है, वह सुख-दुख दोनों को ही फेंक देता है।

सुख-दुख के सन्दर्भ में आपने किसी और लेख में लिखा है, एक बार किसी व्यक्ति ने आपसे प्रश्न पूछा था कि दुख को छोड़ने के लिए सुख का त्याग भी करना पड़ेगा। आपने बताया था कि ऐसा करना है, तो व्यक्ति ज़िन्दा लाश बन जाएगा। आचार्य जी इन दोनों स्थितियों में आये विरोधाभास को समझाने की कृपा करें।

आचार्य प्रशांत: एक लेख में कुछ बोला था, दूसरे लेख में कुछ और कहा है। दोनों बातों के मध्य कई सालों का, कई मनों का, कई जीवनों का फासला है। जो बात जिससे कही गयी है, प्रथमतया उसी के काम की है। किसी भी वक्ता ने, किसी भी शुभेच्छु ने, किसी भी काव्य, किताब, ग्रन्थ ने कभी सत्य ही नहीं बोल डाला। इसका अर्थ ये नहीं है कि ज्ञानी हो कि गुरु हो कि ग्रन्थ हो, वो झूठ बोलते हैं। इसका अर्थ ये है कि सत्य शब्दों से बहुत आगे की बात है, नहीं बोली जा सकती। सत्य मात्र शब्दों के सीमित अर्थ में कभी समा नहीं सकता, तो जो कुछ बोला जाता है, लिखा जाता है, वो सत्य नहीं होते, वो नुस्खे होते हैं।

आपसे मैं जो कुछ कह रहा हूँ, आपको मैं जो कुछ दे रहा हूँ, वो भाँति-भाँति के सत्य नहीं हैं, वो दवाइयाँ हैं। सच न बोला जा सकता है, न दिया जा सकता है। ये जो बात आपसे कही जा रही है, ये भीतर के झूठ को काटने के लिए दवाई है, सच नहीं है। क्या मैं अभी सच बोल रहा हूँ? बिलकुल नहीं, क्या मैं अभी झूठ को काट रहा हूँ? बिलकुल। तो दवाई की दवाई से तुलना करना यही बताता है कि आपको अभी अपने लिए किसी खास दवाई की ज़रूरत है।

गणित के सूत्र थोड़े ही हैं जीवन के बारे में गहरे वक्तव्य, कि एक जगह लिख दिये गये तो दूसरी जगह भी उठाकर के जस-के-तस प्रयोग किये जा सकते हैं, ऐसा बिलकुल नहीं हो सकता। जिज्ञासु की, श्रोता की स्थिति के अनुसार, उसको दी जाने वाली दवा की गोलियाँ होती हैं बोधवाक्य। हाँ, जैसा कि आप जानते हैं, कि कुछ दवाइयाँ ऐसी होती हैं, जो बहुत लोगों पर एक साथ असर कर सकती हैं। जेनेरिक मेडिसिन (सामान्य दवा), जानते हैं न, डिस्प्रिन, वो बहुत लोगों पर एक साथ असर कर जाएगी। वो भी लेकिन सब पर असर नहीं कर सकती। कुछ लोग ऐसे हो सकते हैं, जो अगर डिस्प्रिन भी लें तो उनके लिए प्राणघातक हो जाए, और कुछ दवाइयाँ ऐसी होती है जो होती ही बहुत-बहुत खास, विशिष्ट रोगियों के लिए है, जैसे, इंसुलिन का इंजेक्शन।

लेकिन चाहे डिस्प्रिन हो चाहे इंसुलिन, एक बात तय है, एक दवाई सबके लिए नहीं होती। ये तो सम्भावना है कि कोई दवाई साठ-सत्तर-अस्सी प्रतिशत लोगों तक को फ़ायदा पहुँचा दे, लेकिन ऐसी कोई दवाई आज तक ईजाद नहीं हुई, जो सबको ही लाभ दे जाएगी। यहाँ तक कि विटामिन और मिनरल की गोलियाँ भी सबके लिए नहीं होतीं, भाई। विटामिन डी की गोली आप खाते हो आपको लगता है, विटामिन डी ही तो है, सबको ज़रूरत होती है। वो भी कुछ लोगों में टॉक्सिसिटी कर सकती है, ज़हर है कुछ लोगों के लिए विटामिन डी। बात समझ में आ रही है?

तो मुझे चिकित्सक कहना चाहो तो चिकित्सक कह लो, फार्मसिस्ट (औषध विक्रेता) कहना चाहो तो फार्मसिस्ट कह लो, लेकिन सच का विक्रेता तो मैं बिलकुल नहीं हूँ। ये बड़ी-से-बड़ी भूल है कि एक बात जो एक व्यक्ति को कही गयी है, उसे दूसरा व्यक्ति उठाकर जस-का-तस अपने जीवन में प्रयोग करने की कोशिश करे।

डिस्प्रिन जैसी कोई बात है, तो साठ-सत्तर प्रतिशत सम्भावना है कि सफलता मिल भी जाएगी, और अगर इंसुलिन जैसी बात है तो राम बचाए, फिर तुम्हारा क्या होगा तुम ही जानना। ‘डॉक्टर साहब ने अपने सारे प्रिस्क्रिप्शंस (नुस्खे)ऑनलाइन कर दिये। लोगों की चाँदी हो गयी।’ उन्होने कहा, ‘बढ़िया, अब हम घर बैठे डॉक्टर बन गये।’ अब कौन मेहनत करे उठकर जाने की, कौन मेहनत करे अपनी विशेष, व्यक्तिगत रिपोर्ट्स निकलवाने की? ‘डॉक्टर साहब का दिल बहुत बड़ा है, उन्होने अपने दस-पन्द्रह साल की प्रैक्टिस में जितने रोगी देखे हैं, सबके पर्चे, सबके प्रिस्क्रिप्शंस भली-भाँति ऑनलाइन कर दिये हैं। चलो रे! पर्चा पढ़ो, और दवाई उड़ेलो।’ डॉक्टर साहब ने ये भी लिख दिया है ऑनलाइन कि इस तरह की करतूत से हुई क्षति के लिए वो जिम्मेदार नहीं होंगे।

इतनी मेहनत कर लेते हो, सच-झूठ से सम्बन्धित दो लेख ढूँढने में, हज़ारों लेखों के बीच में से, उसमें से चौथाई मेहनत कर लो तो मेरे सामने आकर बैठ जाओगे। और फिर अगर तुम्हें उन लेखों में से ही उत्तर ढूँढना है, तो बाबा यहाँ काहे को आये हो? आज भी उन्हीं लेखों को पढ़ लेते न, क्या पता जो मैं अभी बोल रहा हूँ, ये बात भी उन्हीं लेखों में पहले ही लिखी हो। अगर तुम अपनी ही क्रियाओं को देखोगे तो तुम्हें विरोधाभास दिख जाएगा। अगर लेखों और विडियोज़ में ही सब कुछ मिल रहा है, तो यहाँ आये क्यों हो आज? जाओ वहीं से तृप्ति कर लो। मैं इनकार नहीं करता कि बहुत लोगो को विडियो देखकर, लेख पढ़कर लाभ हो जाएगा, पर याद रखिएगा कि वहाँ मामला डिस्प्रिन जैसा ही होगा। समझ में आ रही है बात?

कल रात श्रीमद्भगवद्गीता पर बड़ी चर्चा हुई। जैसी बात आप कर रहे हैं, उसको सुनकर के तो ये ख्याल आता है कि अर्जुन कहें कृष्ण से कि, पाँव कँप रहे हैं, शरीर तप रहा है, बड़ी दुविधा में हूँ, कुछ जान नहीं पड़ता क्या करूँ। और कृष्ण कहें कि, ऐसा कर जा और ऋग्वेद का फलाना अध्याय पढ़ ले। फिर अर्जुन कहें कि अरे वो तो देख लिया, पढ़ा, कुछ ज्यादा समझ में नहीं आता, तो कृष्ण कहें कि ऐसा कर कि सामवेद का फलाना उपनिषद् पढ़ ले।

भई वेदों में, उपनिषदों में तो पूरा ज्ञान समाया ही हुआ है, तो आमने-सामने बैठकर कोई नयी बात करने की ज़रूरत क्या है, और बिलकुल गीता में वास्तव में ऐसा तो कुछ कहा नहीं गया है, जो वेदान्त में उपलब्ध नहीं है, तो कृष्ण के लिए बहुत आसान होता कि भेज देते, ‘जाओ, लेख पढ़ लेना। ये बड़े-बड़े वेद हैं, जाओ उनको पढ़ लेना। क्योंकि सब बातें उनमें पहले ही कह दी गयी है, अब मुझसे ताज़ा-ताज़ा कुछ पूछने का कुछ औचित्य ही नहीं है।’ ऐसे नहीं होता है।

कोई उपलब्ध न हो जिससे वैसे बात कर सको जैसे अभी कर रहे हो, तो फिर ठीक है, मजबूरी है, किताब मिली, किताब से काम चला लिया। पर जब इतनी बार मौका मिलता ही है, यहाँ आ जाने का, बैठ जाने का और उसमें कोई रुपया-पैसा भी तुम्हारा नहीं लग जाना है। नि:शुल्क सुविधा रहती है, महीने में दो दफ़े कम-से-कम, तो काहे डाटा पैक के सहारे जी रहे हो। पैक की जगह पैर चला लिया करो, यहाँ आ जाया करो। द्वार खुले हैं।

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