प्रश्नकर्ता : आपके एक वीडियो में सुना था कि कैसे पता लगे कि हम उसके क़रीब हैं, कि हमको कुछ प्राप्त हुआ है या नहीं हुआ है। तो उसमें आपने कहा था कि अगर चीज़ों को खोने से कम डर लगने लगे तो समझ लो उसके क़रीब हो, या बेवजह ही अगर ख़ुश हो तो समझ लो कि क़रीब हो। तो ऐसा तो होने लगा है, धीरे-धीरे ही सही, थोड़ा-थोड़ा ही सही। लेकिन अब इसके आगे क्या? इसके आगे क्या करना चाहिए कि और जाना जा सके इसको?
आचार्य : जो हो रहा है उसको होने दो। आख़िरी बात यही होगी कि आगे का ख़्याल जब खोने लगे तो समझ लो उसके क़रीब हो। जो उसके क़रीब आता जाता है, उसे आगा-पीछा भूलता जाता है। आगे क्या होगा, इसकी फ़िक्र करना छोड़ देता है। तो अभी जो हो रहा हो उसको होने दीजिए, उसका विरोध मत करिए, और उसके होने में भीतर जितनी बाधाएँ हों उनको हटाइए।
गाड़ी चल रही है इसका मतलब यह नहीं है सब ठीक-ठीक है। चल रही है, कुछ गति पकड़ रही है, कुछ रास्ता तय हो रहा है लेकिन अभी भी बहुत कुछ है जो ऊबड़-खाबड़ है, तेल-पानी ठीक नहीं है। जहाँ-जहाँ घर्षण है उसको कम करिए ताकि गाड़ी और तेज़ी से आगे बढ़ सके। जो कुछ थोड़ा-थोड़ा हो रहा है, फिर वो ज़्यादा-ज़्यादा होगा ।
प्र२: आचार्य जी, मैं पूछना चाहता था कि जैसे कभी कोई चीज़ टाइम पर करनी हो, जैसे सुबह उठना है या फिर कोई स्टडीज के रिलेटेड (पढ़ाई से संबंधित) ही है, कोई परीक्षा है तो आख़िरी समय पर ही करते हैं, कभी टाइम पर...दिल तो करता है पहले करें पर होता नहीं। इसका क्या है सोल्यूशन (समाधान)?
आचार्य: – बेटा वरीयता, प्रियोरिटी (प्राथमिकता) की बात है, तुम किस चीज़ को कितना मूल्य दे पा रहे हो। हम वही करते हैं हमें जो चीज़ कीमती लगती है। तो बैठ करके चुपचाप ध्यान से पूछो अपने आप से, ‘किस चीज़ की वाक़ई कितनी क़ीमत है?’ चाहो तो एक कागज़ कलम अपने सामने रख लो, लिख ही डालो।



