
प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर, सर, जैसे कामवासना एकदम से आती है, तो लगता है कि इससे चैन मिल जाएगा। तो उस समय तो हमें कुछ दिखाई नहीं देता, उस समय हम बिल्कुल डूबे रहना चाहते हैं, फिर आपकी बात भी ध्यान नहीं रहती, या कुछ भी ध्यान नहीं रहता। उस समय तो हम बिल्कुल उसमें डूब जाते हैं। उसके थोड़ी देर बाद जब चली जाती कामवासना, उसके बाद पता चलता है कि गलत किया, गिल्ट होता है, उसके बाद लगता है कि समय खराब किया, व्यर्थ की ऊर्जा खराब की।
तो यह चीज़ एकदम से एक बार समझ में आ गई, दो बार आ गई, तीन बार आ गई, हज़ारों बार हो जाती है यह चीज़, मतलब तब भी वह चीज़ समझ में नहीं आती सर। तो इसको रोका कैसे जाए? यह चक्र चलता ही रहता है।
आचार्य प्रशांत: जो समय और ऊर्जा खराब होते हैं, इसलिए थोड़ी खराब होते हैं कि तुम उसमें डूब जाते हो। यह खराब इसलिए होते हैं क्योंकि तुम उसमें तैरते हो, मज़े ले लेकर तैरते हो। जो डूब जाए, तो उसका समय बच जाएगा, एक झटके में डूबेगा, नीचे दलदल पाएगा, बिल्कुल पलट के वापस आ जाएगा, भग लेगा, समय बच जाएगा।
तुम डूबते भी कहाँ हो? तुम तो वैसे हो जैसे कई लोग घाट पर बैठ जाते हैं और एड़ियाँ पानी में डालकर छपक-छपक करते हैं, हौले-हौले, झीने-झीने मज़ा लेना। समय वासना में थोड़ी खराब होता है, समय रोमांस में खराब होता है। वासना में समय खराब करने का तुम्हारा स्टेमिना ही नहीं है।
तुम्हारा समय तो घंटों-घंटों, महीने-महीने तुम खराब करते हो रोमांस में। बारह बजे रात में फोन लगाया है, सुबह पाँच बजे तक, "बाबू, अच्छा, सो जाओ तो सोने के बाद की तस्वीरें भेजना।" लोग बोलते हैं कि समस्या कामवासना है। समस्या कामवासना नहीं है, खासकर जिस अर्थ में तुम कह रहे हो ना, समय की बर्बादी वगैरह, उसमें नहीं समय की बर्बादी होती, सचमुच नहीं होती, प्रकृति ने ऐसी बनाई ही नहीं है कि उसमें समय की बर्बादी हो। समय की बर्बादी होती है भावना लोक में, कल्पना लोक में। बैठे हुए हैं और अहा-हा......(कल्पना का चित्रण प्रदर्शित करते हुए।)
उसका तो एक ही तरीक़ा है—कोई सार्थक काम दो अपने आपको। सार्थक काम दो।
गुंजाइश ही नहीं बचेगी कि बैठकर गुब्बारे फुला रहे हो, उड़ा रहे हो, नीचे से ताक रहे हो—"गुलाबी गुब्बारा। पीला गुब्बारा।" और ये अनुभव भी किया होगा कि जिन दिनों में कोई ज़रूरी काम रहता है, उन दिनों में ये सब चीजें आकर्षित नहीं करती हैं। और कुछ करने को नहीं होता, फिज़ूल बैठे होते हो, तो और क्या करोगे? मनोरंजन — सबसे सस्ता मनोरंजन है इसमें कुछ खरीदना नहीं पड़ता। फैक्ट्री यहीं पर है माल की, यहीं बैठ गए, सोच रहे हैं —"आहा-हा। आनंद आ रहा है," गाने-वगैरह सारे। कैसेट लगा दिए, रूमानी गीत, ग़ज़ल, सब चल रहा है।
भारत में रोमांस ज़्यादा है, पश्चिम के मुक़ाबले। बताओ, क्यों? क्योंकि जैसे कहा ना कि जो गहराई में चले जाते हैं, उनको दिख जाता है वहाँ दलदल है, वो आज़ाद हो जाते हैं, वो समझ जाते हैं कि यह जो चीज़ है, पूरा जो ताल बना हुआ है, इसमें ऊपर-ऊपर से लग रहा है कि कुछ आकर्षक है साफ़ है। जैसे ही नीचे जाओ, तो नीचे सब गंदगी है।भारत में नीचे जाने पर वर्जना है, तो ऊपर-ऊपर छप-छप करके अपने आपको भ्रमित रख लेते हो। पश्चिम में वे तुरंत ही नीचे पहुँच जाते हैं, इसलिए रोमांस पर वहाँ अपेक्षतयः कम समय बर्बाद होता है।
यहाँ तो लड़की से बात करने से पहले, ढाई साल तक तो उसके बारे में सोचते हो। ढाई साल देखेंगे, उसके बाद बात करेंगे। और बात भी क्या होगी? "अ..." उसके आगे की बात तो गले में अटक जाएगी। ऐसे-ऐसे करके पंच-वर्षीय योजनाएँ चलती हैं। पाँच साल पहले ताड़ो, फिर एक शब्द बोलो, फिर किसी दिन जाकर कुछ बात कर पाओ। ऐसे पंद्रह साल बीत गए, तब तक उसका ब्याह हो गया। फिर पाँच साल रो कहीं पर।
प्रश्नकर्ता: हुआ है सर ऐसा।
आचार्य प्रशांत: हाँ।
अब ये समय की बर्बादी है, ना? ये राष्ट्रीय पेशा बन गया है हमारा। रोमांस, काल्पनिक गुब्बारे। इससे अच्छा जाकर सीधे बात कर लो। वो भी तुम्हारी ही प्रजाति की तुम्हारी ही उम्र की जीव है एक। इतना कुछ तुम्हें वहाँ खास या विशेष या आकर्षक मिलेगा ही नहीं कि फिर फँसे रहो। तुम्हारा कोई दोस्त-यार होगा, उस पर कोई लड़की मरती होगी तुम्हारा नहीं होगा, मान लो, किसी और का होगा। वो दोस्त है ना, एकदम एक नंबर का चिरकुट। और वो लड़की उस पर मरती है। क्यों मरती है? क्योंकि उसने आकर कभी ढंग से बात ही नहीं करी उस लड़के से। बात करना तो छोड़ दो, अगर वह उसके छह फीट के दायरे में भी आ जाए तो बदबू से ही भाग जाए और वो छह फीट के दायरे में भी नहीं आएगी। वो दूर बैठकर के सपन सलोने बिल्कुल सजा रही है, और सपन सलोने का तो कोई इलाज नहीं होता ना। दूर बैठकर किसी के बारे में गुलाबी सपने तुम पकाते रहो, कौन रोकता है?
इसलिए भारत में रोमांस ज़्यादा है, क्योंकि वर्जनाएँ ज़्यादा है। इसीलिए फिर यहाँ जवानी बर्बाद भी बहुत होती है।
जितनी दुनिया की टॉप कहानियाँ हैं आशिक़ी की; आशिक़ी नहीं, असफल आशिक़ी, बर्बाद आशिक़ी — वह सब की सब कहाँ से हैं? बताओ, देवदास डेनमार्क में हो सकता था? उस तरह का नमूना? सिर्फ भारत में ही संभव है। सोचो, कितना अजीब लगेगा — "आई ऍम देवदास फ्रॉम डेनमार्क।" हो ही नहीं सकता। "आई एम पारो फ्रॉम प्रशिया।" नॉट पॉसिबल।
जिससे बहुत आकर्षण हो, उसके पास जाकर परख लिया करो। परखने का कोई बहुत गड़बड़ मतलब मत निकाल लेना। दो बातें कर लो, इतने में ही नशा उतर जाएगा। दो बातें कर लो, थोड़ी देर के लिए भूल जाओ कि सामने वाले का लिंग क्या है। उससे इंसान की तरह दो बातें कर लो, नशा उतर जाएगा। हमारे यहाँ बात करने का तो चलन ही नहीं है, क्योंकि बात में तथ्य उभरकर आता है। हमारी संस्कृति कल्पना की है—तथ्य जानो ही नहीं।
आज भी दो-तिहाई लोग तो शादी तक भी अपने भावी साथी का तथ्य नहीं जानते, बात ही नहीं करी होती। और जब बात ना करी हो, तो हम काहे को बुरा माने किसी के बारे में? अच्छा ही अच्छा सोचो ना। बढ़िया, अपना वही सपन सलोने। किसी लड़की में ऐसा कुछ नहीं होता कि तुम फ़िदा हो जाओ उस पर। पूर्ण विराम। पूर्ण विराम। दुनिया में कोई लड़की आज तक ऐसी बनी ही नहीं है, कि वो तुमको बड़ी शांति या तृप्ति दे देगी। कोई नहीं है। और ना किसी लड़की के लिए कोई लड़का बना है, जो उसकी ज़िन्दगी के केंद्र पर बैठ जाए और उसके हृदय को बिल्कुल भर दे। ना ऐसी कोई लड़की है, ना ऐसा कोई लड़का है।
हाँ, ऐसी लड़कियाँ हैं, लड़के भी हैं—कल्पनाओं में हैं। उन्हीं कल्पनाओं में जीने की हमारी आदत बन गई है। भारत में आज भी रोमांस जिन्दा है, तो कहाँ जिन्दा है? मेट्रोस में थोड़ी जिन्दा है? छोटे शहरों और गाँवों में जिन्दा है। वहाँ बीस वर्षीय साधनाएँ होती हैं। "नाथ, तुमको कभी पता नहीं चलेगा पर चुप-चुप के चोरी-चोरी हृदय से मैं तुमको अपना पति स्वीकार कर चुकी हूँ।" उसको कभी पता भी नहीं चलेगा। ये चुप-चुप के चोरी से नाथ को हृदय ही हृदय में पति स्वीकार कर चुकी है। "नाथ, तुम्हारा खैनी खाता है, तुम्हें पता है ये? बस में पीछे लटक के जाता है। एक बार लटक के जा रहा था, पीछे से कुत्ते ने काटा है उसको।" ये दृश्य देखा है तुमने कभी? सोचो, इनके नाथ; प्राणेश्वर- राज्य परिवहन में बस में पीछे लटके हुए हैं और खुजली वाला, अधमरा कुत्ता उनके पिछवाड़े से लटका हुआ है। अब बताओ, रोमांस कहाँ गया? भाई, ये सब तुम्हें पता ही नहीं, क्योंकि तुम्हारे पास बस क्या है तुम्हारी? कल्पनाएँ।
ये लड़कियों के बारे में सोचते हैं, इनको ऐसे आता है कि जैसे कोई वो बिल्कुल परी है, देवी है, बादलों पर पाँव रख के चल रही है, पता नहीं क्या है। कभी गर्ल्स हॉस्टल के आसपास भटकना, या तुम्हारी कोई बहन वगैरह हो जो हॉस्टल में रहती है, उससे पूछना। जब एक-दूसरे से लड़ती हैं लड़कियाँ और कैट फाइट होती है—एक-दूसरे का मुँह नोच लेती हैं, बाल नोच लेती हैं और गाली-गलौज करती हैं—सारा नशा उतर जाएगा। तो कहना, "ऐसा कोई वीडियो बना दो बस एक बार। दो लड़कियाँ एक-दूसरे की माँ-बहन कर रही हैं।" ज़िन्दगी भर के लिए रोमांस तो उतरे। और वह तुम्हारी प्राणों की रानी है? और दूसरे को कह रही है, "अभी ते..."
अब ऐसा तो नहीं है कि ये सब तुम्हें सुनने को नहीं मिलेगा। सुनने को मिलेगा, पर तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। इससे बेहतर है कि पहले सुन लो। इतना बेवकूफ बनाना आसान होता है, ना? मेरे साथ का एक था, वह जाया करता था एलएचएमसी — लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज। वहाँ की एक लड़की, उससे डेटिंग चल रही थी।
उसको बोला, "मैं अभी रात में पहुँचा।"
लेट क्यों हो गई?
"एक्चुअली, वो आज हॉर्स राइडिंग मेरी बहुत देर तक चली।"
वो डॉक्टर है। वो ऐसे, "हॉ, हॉर्स राइडिंग।" तथ्यों से कोई लेना ही देना नहीं। कोई भी चटनी चटा दो, मानने को तैयार।
और यह आके बताए, "पता है, मैं उसको हॉर्स राइडिंग बोलता हूँ, मान लेती है। उसको लगता है, मैं बहुत अच्छा राइडर हूँ।"
मैंने कहा, "बेटा, वैसे ही, वो भी तो बहुत कुछ बताती होगी, जो तुम मान लेते होगे।"
जब काम भरा हो आँख में, सच नज़र नहीं आता है। और जब नज़र आता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
एक मुन्नू इधर, एक मुन्नू उधर, सर पे एलीमनी की तलवार, 498 A। फिर काहे को रोओगे? वो सब आशिक़ ही थे, जो फिर बाद में रोए कि "अरे, अरेरेरे! ये तो डायन निकली।" ना वह परी थी, ना वह डायन है। वह एक साधारण जीव है, जिसको तुम्हारी काम से भरी हुई आँखें कभी परख ही नहीं पाई।
ये बहुत साधारण प्रयोग है, ख़ुद ही सोच लेना। अपने बारे में तो सबको पता है, अपने बारे में तो गलतफ़हमी में बहुत नहीं हुए। सोचो, तुम्हारे जैसा आदमी भी किसी के सपनों का राजा हो सकता है। सोचो। जब तुम्हारे जैसा आदमी किसी के सपनों का राजा हो सकता है, तो फिर तुम्हारे सपनों की रानी भी कैसी हो सकती है? हो सकता, तुमसे भी गई-गुजरी हो।
हमारे तो कोई साथ का होता था, उसकी गर्लफ्रेंड वगैरह आती थी, इतनी हँसी छूटती थी कि इसकी....? इसको समझती क्या है? और वो उसको ऐसे देख रही है, बिल्कुल एडमिरेशन में—"माय अडोरेबल वन।" हमको पता है ना, यह क्या है? इसको अभी घुड़क दो तो बिस्तर के नीचे घुस जाए।