प्रश्नकर्ता: उपनिषदों के ऋषि कहते हैं कि परमात्मा अति सूक्ष्म या अति वृहद है और हमारे हृदय में स्थित है। इस बात का प्रमाण क्या है, और उन्हें कैसे पता?
आचार्य प्रशांत: इस बात का कोई प्रमाण नहीं होता कि वो सूक्ष्म से सूक्ष्म या बृहद से बृहदतर है। इस बात का भी कोई प्रमाण नहीं होता कि वो हृदय में स्थित है। उसके होने का ही कोई प्रमाण नहीं होता, उसको अप्रमेय कहा जाता है।
अप्रमेय माने जिसको प्रमाणित नहीं किया जा सकता; जिसको किसी अन्य साधन का प्रयोग करके प्रमाणित नहीं किया जा सकता, उसको सत्य कहते हैं। लेकिन प्रमाण इस बात का ज़रूर मिल सकता है तुम कितनी भी सूक्ष्म गहराइयों में चले जाओ विचार की, संसार की, तुम ठहर नहीं पाते। और इसका प्रमाण क्या है? इसका प्रमाण तुम खुद ही हो।
तुम कितने भी विस्तार में दौड़-धूप कर लो, यहाँ चले जाओ, वहाँ पहुँच जाओ; इसको पकड़ लो, उसको छोड़ दो; पृथ्वी का एक कोना से दूसरा नाप लो लेकिन फिर भी तुम्हें चैन नहीं पड़ता। तो इस बात का प्रमाण उपलब्ध है कि तुम कितना भी विस्तार ले लो, उसके अंदर तो वो नहीं है जिसके लिए तुम आकुल रहते हो। तो बस ये कहा जा सकता है कि बड़े से बड़े में भी वो समाता नहीं है क्योंकि जो सबसे बड़ा हो सकता था हमारे अनुभव में, हमारे देखे, हमने उसको भी आज़मा कर देख लिया। और हमने यह भी देख लिया कि जो बड़े से बड़ा है और जो छोटे से छोटा है, है वो कुछ मूल भौतिक-मानसिक तत्वों का विस्तार या संकुचन ही।
चीज़ एक ही है; और वो चीज़ भौतिक है, मानसिक है जिसको विचार में लाया जा सकता है, जिसको अनुभव में पकड़ा जा सकता है। उसको तुम जब बहुत फैला कर के देखते हो तुम कह देते हो ये ब्रह्मांड है। और उन्हीं तत्वों को जब तुम संकुचित करके देखते हो, एकाकी करके देखते हो, तो तुम कह देते हो ये अणु हैं। लेकिन अणु की सूक्ष्मता हो या ब्रह्मांड की विशालता, है तो वो एक ही तत्व का विस्तार न। कौन-सा तत्व? जिसको तुम पदार्थ बोलते हो। जिसको अगर बाहर देखो तो कह दोगे कि ये तत्व भौतिक है। और जिसको जब अनुभव में ले लेते हो तो कह देते हो ये तत्व मानसिक है।




