Navbharat Times
26 Jul '26

प्रिय युवाओं, असली क्रांति कैसी रहेगी?

Acharya Prashant

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प्रिय युवाओं, असली क्रांति कैसी रहेगी?
पेपर लीक केवल व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि उस सोच का परिणाम है जिसने परीक्षा, रैंक और सफलता को जीवन से बड़ा बना दिया है। बाहरी भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष आवश्यक है, लेकिन स्थायी परिवर्तन तभी संभव है जब व्यक्ति अपनी इच्छाओं, मूल्यों और जिम्मेदारियों की भी ईमानदार समीक्षा करे। न्यायपूर्ण व्यवस्था का निर्माण केवल कानून से नहीं, बल्कि जागरूक और उत्तरदायी नागरिकों से होता है। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

Originally published in Navbharat Times on 26 July '26

तुम्हारा घाव असली है। उसे असली निदान चाहिए। तुम्हारे साथ अन्याय हुआ है। प्रश्नपत्र का लीक होना तुम्हारे वर्षों की चोरी है। इस बार इस चोरी ने युवा जानें भी ली हैं। इन बीते हफ्तों के बारे में कोई भी ईमानदार आवाज़ उन मृतकों के सामने पहले सिर झुकाए बिना नहीं बोल सकती। यह बात सबसे पहले कही जानी चाहिए, क्योंकि यह सच है। और एक दूसरी बात भी उतनी ही साफ कही जानी चाहिए, ताकि बाद में कोई इस लेख का अर्थ तोड़-मरोड़ न सके। मैं सड़कों पर विरोध के विरुद्ध नहीं हूं। लोकतंत्र में सड़क की अपनी जगह है। वह दिन भी आ सकता है जब मैं स्वयं कहूं: अब मार्च करो, अब आंदोलन करो।

इस लेख की बस एक शर्त है, वही शर्त जो हर परीक्षा-कक्ष में लागू होती है: पहले सिद्ध करो कि तुम इस परीक्षा में बैठने की पात्रता रखते हो। आगे जो कहा जा रहा है, वह निषेध नहीं है, पात्रता की परीक्षा है। और पात्रता की परीक्षा शुद्धता या पूर्णता की परीक्षा नहीं होती। मैं तुमसे यह नहीं कह रहा कि नारा लगाने से पहले तुम पूर्ण संत बन जाओ। पूर्णता की जरूरत नहीं है, भीतर की ईमानदारी की जरूरत है। यहां मांगी जा रही पात्रता पूर्णता नहीं, दिशा है। और एक तीसरी बात भी कही जानी चाहिए, ताकि यह लेख किसी के बचाव का कवच न बन सके। राज्य कटघरे में खड़ा है।

जिस प्रशासन में प्रश्नपत्र न्याय से अधिक तेज़ी से यात्रा करते हों, वह अपने सबसे प्राथमिक दायित्व में विफल हो चुका है। जो गिरोह बच्चों के भविष्य को नकद में बेचते हैं, वे कानून की सबसे कठोर कार्रवाई के अधिकारी हैं। जिन एजेंसियों ने उन्हें फलने-फूलने दिया, उनकी सबसे गहरी जांच होनी चाहिए। आगे जो भी कहा जाएगा, वह इस निर्णय को एक बूंद भी हल्का नहीं करता। राज्य की विफलता को प्रदर्शनकारी की आलोचना से पहले स्पष्ट कर देना इसलिए जरूरी है, ताकि कोई ये न कह सके कि सरकार को बचाया जा रहा है।

अब एक सरल-सी बात पर ध्यान दीजिए। अन्याय की हर घटना में एक नहीं, दो बातें होती हैं। पहला, वह कर्म जो तुम्हारे साथ किया गया। दूसरा, उस कर्म को तुम कैसे समझते हो और उसके उत्तर में क्या करते हो? वह कर्म तुम्हारे साथ हुआ। लेकिन प्रतिक्रिया तुम कर रहे हो, अभी, इसी क्षण, प्रत्यक्ष रूप से। तुमने विरोध को अपनी प्रतिक्रिया चुना है। बहुत ठीक। तुम शिक्षा मंत्री की कठोरतम जांच करना चाहते हो। अब वही जाँच उस जाँच करने वाले पर भी लागू करो। यदि परीक्षा निष्पक्ष है, तो उससे किसी को छूट क्यों मिले? तुम्हें भी नहीं।

ईमानदारी की एक छोटी परीक्षा

हर दिन हजारों संदेश आते हैं: देश जल रहा है। कुछ कीजिए। प्लीज, कुछ कीजिए। ठीक है। कुछ करने से पहले ईमानदारी की एक छोटी-सी परीक्षा। पेपर लीक हुआ। किसी ने उसे बेचा। तो किसी ने खरीदा भी होगा। अब मुझे उस मार्च में एक ऐसा खरीदार दिखा दो, एक भी युवा, जिसने लीक हुआ पेपर खरीदा, उससे अपना लाभ लिया, और आज सड़क पर खड़े होकर चिल्ला रहा है कि व्यवस्था सड़ी हुई है। क्या तुम उसे खोज सकते हो? नहीं, क्योंकि वह है ही नहीं।

तो क्या यह विरोध वास्तव में पेपर लीक के विरुद्ध है? अपने मन की एकांत जगह में स्वयं से पूछो: अगला लीक पेपर जिन विद्यार्थियों तक समय पर पहुंच जाएगा, वे सड़क पर मार्च कर रहे होंगे या उस लीक पेपर को याद कर रहे होंगे? इसका उत्तर केवल तुम्हारी अपनी ईमानदारी दे सकती है।

और यह बताओ: क्या यह अहंकार की सबसे पुरानी चाल नहीं है कि कर्म के बारे में इतना शोर मचाओ कि कर्ता पर कभी चर्चा ही न हो? “कुछ करो, कुछ करो!” कर्म करने की मांग जितनी ऊंची होती जाती है, कर्ता भीतर उतना ही सुरक्षित बैठा रहता है। अनदेखा, अशुद्ध, अछूता। हमेशा सुनो कि क्या नहीं कहा जा रहा है। किसी मंच पर, किसी तख्ती पर, किसी हैशटैग में कोई नहीं कह रहा: आओ, उस व्यक्ति को देखें जो कर्म कर रहा है। क्योंकि जिस क्षण तुम उधर देखोगे, खेल समाप्त हो जाएगा।

एक सरल बात समझो। यह जगत एक सुव्यवस्थित जगह है। कोई जंगल सुधार की मांग नहीं करता। कोई नदी याचिका दायर नहीं करती। केवल मनुष्य का संसार ही लगातार सुधार की भीख मांगता रहता है। क्यों? क्योंकि मनुष्य एक भ्रष्ट केंद्र से कर्म करता है। और कर्मों की बाहरी व्यवस्था को बदल देने से वह केंद्र कभी स्वच्छ नहीं हुआ।

जब तक भीतर का बिगाड़ने वाला नहीं रुकता, बाहर कुछ नहीं सुधरता। भीतर का वह बिगाड़ने वाला रुकना चाहिए। सुधार कोई नया कर्म नहीं है। सुधार पुराने कर्म के केंद्र की सफ़ाई है। यह लेख तुमसे बस इतना ही माँगता है: सड़क मत छोड़ो, पर उस व्यक्ति को साफ़ करो जो सड़क पर चल रहा है।

दौड़, या केवल रेफरी?

अपनी तख्तियों पर लिखी माँगों को देखो।। निष्पक्ष परीक्षा। जवाबदेह मंत्री। दूसरे शब्दों में, एक अधिक साफ़-सुथरी दौड़। लेकिन पूरी राजधानी में एक भी तख्ती यह मूल प्रश्न नहीं पूछ रही: क्या यह दौड़ इतनी महत्वपूर्ण है कि कोई युवा इसके लिए अपनी जान दे दे? इस वर्ष 22.7 लाख से अधिक अभ्यर्थी देश की मेडिकल प्रवेश परीक्षा में बैठे। लीक की पुष्टि होने के बाद परीक्षा को पूरी तरह रद्द कर दिया गया। अब गहरे आँकड़ों पर ध्यान दो। वे उस प्रश्न का उत्तर देते हैं, जिसे कोई पूछ ही नहीं रहा।

वर्ष 2022 में देश में 13,999 छात्र आत्महत्याएं दर्ज हुईं। यह संख्या 2011 की तुलना में अस्सी प्रतिशत से अधिक बढ़ी हुई थी। वर्ष 2021 में तीस वर्ष से कम आयु के 1,500 से अधिक युवाओं ने अपनी जान ली; कारण दर्ज था, “परीक्षा में असफलता।” केवल एक कोचिंग नगर में, हाल के एक ही वर्ष में, ऐसी 26 मौतें गिनी गईं। अब तारीखों पर ध्यान दो। उन वर्षों में कोई पेपर लीक नहीं हुआ था। परीक्षाएं साफ थीं। फिर भी बच्चे मर गए।

इसलिए पेपर लीक ने उस मशीन को नहीं बनाया जो रैंक को जीवन के बराबर मानती है। लीक ने केवल उसे बेनकाब किया है। वर्षों से पूरी सभ्यता अपने सत्रह वर्ष के बच्चों से कहती आई है कि उनका आत्म-मूल्य उनके स्कोरकार्ड और प्रवेश परीक्षा की रैंक से तय होगा। और बच्चों ने यह बात मान ली, क्योंकि किसी ने उन्हें यह नहीं बताया कि वे वास्तव में कौन हैं। अहंकार अपने पूरे अस्तित्व को एक परिणाम पर टिका देता है।

परिणाम ढहता है तो युवा निष्कर्ष निकालता है कि मैं ही ढह गया हूं। यही निष्कर्ष असली हत्यारा है। जो आंदोलन एक इस्तीफ़ा जीत ले, लेकिन इस मशीन को ज्यों का त्यों छोड़ दे, वह अगले दौर की मौतों की तैयारी कर रहा है। यदि तुम सचमुच मृतकों के लिए शोक करते हो, तो उनकी जड़ पर शोक करो।

बंदर के लिए दरवाजा किसने खोला?

एक बंदर घर में घुस आया। उसने फ्रिज खाली कर दिया, बर्तन तोड़ दिए, कमरा तहस-नहस कर दिया। भयानक बंदर है, इसमें कोई विवाद नहीं। अब मां घर लौटती है। वह किसे थप्पड़ लगाएगी? बंदर को, या उस बच्चे को जिसने दरवाजा खुला छोड़ दिया था?

बंदर पकड़ा जाए, बंद किया जाए और उस पर मुकदमा चले, इसका पूरा समर्थन है। बंदर पर मुकदमा और खुले दरवाज़े की जाँच एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। दोनों साथ चलने चाहिए। मैं केवल पूछ रहा हूँ कि एक के पीछे एक करोड़ जाँचकर्ता क्यों लगे हैं और दूसरे के पीछे कोई भी नहीं? तुम बहुत ऊर्जावान बंदर-विरोधी आंदोलन चला रहे हो।

मैं एक शांत प्रश्न पूछ रहा हूं: दरवाजा किसने खोला? यह लोकतंत्र है। तुम्हारे ऊपर कोई ईश्वर द्वारा नियुक्त शासक नहीं बैठा है। जिन लोगों को तुम आज उनकी कुर्सियों से घसीटकर उतारना चाहते हो, उन्हें उन्हीं कुर्सियों तक तुमने ही पहुँचाया था, दिन के उजाले में, संगीत और उत्सव के साथ। आज तुम किसी व्यक्ति को वोट देते हो। दो वर्ष बाद उसके विरुद्ध मार्च करते हो। पाँच वर्ष बाद उसके विकल्प को माला पहनाते हो, फिर उस विकल्प के विरुद्ध भी मार्च करते हो। सरकार से उत्तर मांगने से पहले स्वयं एक प्रश्न का उत्तर दो: मतदान केंद्र में तुम कर क्या रहे थे?

Originally published in Navbharat Times on 26 July '26

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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