पेपर लीक केवल व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि उस सोच का परिणाम है जिसने परीक्षा, रैंक और सफलता को जीवन से बड़ा बना दिया है। बाहरी भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष आवश्यक है, लेकिन स्थायी परिवर्तन तभी संभव है जब व्यक्ति अपनी इच्छाओं, मूल्यों और जिम्मेदारियों की भी ईमानदार समीक्षा करे। न्यायपूर्ण व्यवस्था का निर्माण केवल कानून से नहीं, बल्कि जागरूक और उत्तरदायी नागरिकों से होता है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
Originally published in Navbharat Times on 26 July '26
तुम्हारा घाव असली है। उसे असली निदान चाहिए। तुम्हारे साथ अन्याय हुआ है। प्रश्नपत्र का लीक होना तुम्हारे वर्षों की चोरी है। इस बार इस चोरी ने युवा जानें भी ली हैं। इन बीते हफ्तों के बारे में कोई भी ईमानदार आवाज़ उन मृतकों के सामने पहले सिर झुकाए बिना नहीं बोल सकती। यह बात सबसे पहले कही जानी चाहिए, क्योंकि यह सच है। और एक दूसरी बात भी उतनी ही साफ कही जानी चाहिए, ताकि बाद में कोई इस लेख का अर्थ तोड़-मरोड़ न सके। मैं सड़कों पर विरोध के विरुद्ध नहीं हूं। लोकतंत्र में सड़क की अपनी जगह है। वह दिन भी आ सकता है जब मैं स्वयं कहूं: अब मार्च करो, अब आंदोलन करो।
इस लेख की बस एक शर्त है, वही शर्त जो हर परीक्षा-कक्ष में लागू होती है: पहले सिद्ध करो कि तुम इस परीक्षा में बैठने की पात्रता रखते हो। आगे जो कहा जा रहा है, वह निषेध नहीं है, पात्रता की परीक्षा है। और पात्रता की परीक्षा शुद्धता या पूर्णता की परीक्षा नहीं होती। मैं तुमसे यह नहीं कह रहा कि नारा लगाने से पहले तुम पूर्ण संत बन जाओ। पूर्णता की जरूरत नहीं है, भीतर की ईमानदारी की जरूरत है। यहां मांगी जा रही पात्रता पूर्णता नहीं, दिशा है। और एक तीसरी बात भी कही जानी चाहिए, ताकि यह लेख किसी के बचाव का कवच न बन सके। राज्य कटघरे में खड़ा है।




