आचार्य प्रशांत: प्रेम में आप किसी की ओर इसलिए नहीं जाते कि आपको वो अच्छा लगता है। प्रेम में आप जिसकी ओर जाते हैं, इसलिए जाते हैं क्योंकि आप उसका भला चाहते हैं। दोनों बातों में बहुत अंतर है।
प्रेम अगर सच्चा है तो उसमें आप जिसकी ओर जा रहे हैं, वो आपको अच्छा वगैरह नहीं लग रहा है कि अरे-रे-रे! बड़ा भाता है, बड़ा सुहाता है, कितना सुन्दर है, कितना प्यारा है, आह-ह-ह! यह सब नहीं।
प्रेम में तो आप अच्छी तरह जानते हैं कि दूसरे की थाली में कितने छेद हैं। प्रेम में तो आप भली-भाँति जानते हैं कि दूसरे के चरित्र पर कितने धब्बे हैं। प्रेम में आप भली-भाँति जानते हैं कि दूसरे के मन में, आचरण में, कितनी कमज़ोरियाँ हैं। फिर भी आप उसकी ओर जाते हैं।
क्यों जाते हैं? राम जाने! संसारी दृष्टि से देखें तो प्रेम का कोई कारण नहीं होना चाहिए — सच्चे प्रेम का। झूठे प्रेम का तो कारण है, झूठे प्रेम का कारण यह कि दूसरे की ओर जाओगे तो सुख पाओगे, दूसरे की ओर जाओगे तो दूसरे को भोग लोगे, मज़ा आएगा।
सच्चे प्रेम में तो आप जिसकी ओर जा रहे हो, आप भली-भाँति जानते हो, वो कितने पानी में है। ख़ूब पता है आपको, आप जिसकी ओर जा रहे हो, आप जिससे संबंधित हो उसमें लाख दोष हैं, लाख विकार हैं, फिर भी आप उसकी ओर जा रहे हो।
तो हमारा साधारण संसारी मन झंझट में पड़ जाता है। एकदम सकपका के पूछता है, ‘तो फिर उसकी ओर जा ही काहे को रहे हो, जब पता है उसमें इतने विकार हैं?’ राम जाने! यही तो प्रेम की बात है।







