Acharya Prashant is dedicated to building a brighter future for you
Articles
प्रेम का नाम, हवस का काम
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
11 min
364 reads

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, चार साल से एक लड़के के साथ संबंध में हूँ। हम एक-दूसरे से बहुत प्यार करते हैं, पर प्यार के साथ रिलेशनशिप (सम्बंध) में रोमांस और इंटिमेसी (अंतरंगता) भी आते हैं। आज इतने सालों में उसको देखती हूँ तो दिखता है कि उसे तो सिर्फ फिजिकल लव (शारीरिक प्यार) ही चाहिए। शरीर से आगे वो कुछ देखता ही नहीं, मैं थक गई समझा समझाकर। मैं फँस-सी गई हूँ। प्यार तो मुझे भी चाहिए उससे पर सिर्फ देह वाला नहीं। मैं उसे दूर नहीं कर सकती क्योंकि उससे प्रेम है, पर उसकी शर्तें भी नहीं मान सकती। क्या करूँ?

आचार्य प्रशांत: प्रेम ना तुम्हें है, ना उसे है। अगर समझदार हो तुम तो मुझे अपना उत्तर यहीं पर खत्म कर देना चाहिए। पर तुम इतनी समझदार होती तो तुम्हें ये सवाल लिखने की नौबत क्यों आती? तो समझदार तुम हो नहीं इसलिए मुझे आगे अभी दस-पंद्रह मिनट बोलने की तकलीफ उठानी पड़ेगी।

क्या-क्या बातें कही हैं? चार साल से संबंध में हो, "हम दोनों एक-दूसरे से बहुत प्यार करते हैं, पर उसे सिर्फ फिजिकल लव ही चाहिए।"

ये फिजिकल लव होता क्या है? मेरे लिए तो आज ये बिलकुल नई चीज़ खुली है। थोड़ा समझाओ, मेरे भी ज्ञानचक्षु खुलें। ये फिजिकल लव क्या होता है? लस्ट (काम वासना) की बात कर रही हो, उसको फिजिकल लव मत बोलो। सेक्स (यौन-क्रिया) की बात कर रहे हो, उसको फिजिकल लव मत बोलो। पर ये भी वही, भाषा के पैंतरे हैं कि जब सेक्स को नाम ही अंग्रेजी भाषा ने दे दिया है ' मेकिंग-लव ' तो वैसे ही तुमने उसको बोल दिया 'फिजिकल-लव' * । ये * फिजिकल लव होता क्या है? अब ये मैं कह रहा हूँ ये बात तुमको तो थोड़ी-बहुत बुरी लग ही रही होगी, न जाने कितनों का दिल टूट रहा होगा। कितनों ने तो अब तक हेट-मैसेज भी टाइप कर दिए होंगे कि, “ये बाबा, प्यार का दुश्मन, हाय-हाय!”

प्रेम का मतलब समझते हो क्या होता है? प्रेम का मतलब होता है — तुम दूसरे की भलाई चाहते हो। और ये बात क्या इतनी कठिन है समझने में? तुम दूसरे का जिस्म नहीं चाहते, तुम दूसरे की भलाई चाहते हो — इसे प्रेम कहते हैं। दूसरे पर हवस का साँप बन कर लोट जाने को प्रेम नहीं कहते। ये सोचो! एक इंसान लेटा हुआ है और दूसरा उस पर हवसी अजगर बनके कुंडली कसे हुए है और उसको कसता ही जा रहा है, कसता ही जा रहा है और कह रहा है ये फिजिकल लव है। थोड़ी देर में जिसको कस रहा था उसके फिजीकल प्राण-पखेरू उड़ गए। दोहराओ, दस बार दोहराओ — प्रेम का मतलब होता है दूसरे की भलाई चाहना। वो तुम्हारे ऊपर चढ़ा बैठता है, इसमें तुम्हारी कौन सी भलाई हो जाती है भाई? कोई भी किसी पर चढ़ बैठे — चाहे शारीरिक रूप से, चाहे मानसिक रूप से — इसमें भलाई किसकी कहाँ हो जानी है? या हो जानी है? हो जाती हो तो बता दो, मैं शायद जानता नहीं! मालिश-वालिश की बात अलग है कि, "तेल लगा के हईशा, चलो रे पीठ पर चढ़ जाओ और मुक्के-वुक्के मारो एकदम, आज बढ़िया मसाज चाहिए", वो चीज़ दूसरी है। अगर तुम उसका जिक्र कर रही हो तो मैं सवाल समझा नहीं तुम्हारा फिर। पर मुझे लगता नहीं कि बात यहाँ मालिश-वालिश की हो रही है।

कौन सा तुमको फायदा मिलता है अगर कोई आकर तुमपर चढ़ बैठता है? हाँ, ये जरुर हो सकता है कि थोड़ी देर के लिए तुमको भी शारीरिक सुख मिल जाता है, फिर? तुम्हारे जीवन में तरक्की आ गई? तुम्हारी चिंताएँ कम हो गईं? तुम्हारी बेचैनियाँ मिट गईं? तुम बेहतर इंसान बन गईं? तुम्हें कुछ ज्ञान हो गया? तुम्हें दुनिया का अनुभव मिल गया? तुम्हारे भीतर से डर चला गया, लालच चला गया?

तुम किस तरीके से एक बेहतर इंसान बन पाई हो ये चार साल तक जिस्मानी खेल खेलकर? और अगर इससे तुम्हें कोई बेहतरी मिली है तो करे जाओ, खूब करो, यही करो और कुछ करो ही मत। खाना पीना भी छोड़ दो यही करो बस। भाई जिस चीज़ से बेहतरी मिल रही है जिंदगी में, आदमी वही करे, उसके अलावा कुछ और क्यों?

इससे कोई बेहतरी नहीं मिल रही, इससे शरीर तो गंदा होता ही होगा, मन भी गंदा होता होगा। किसी की हवस का खिलौना बन कर किसको चैन मिलना है, या शांति या तरक्की? ऐसा ही लगता होगा जैसे किसी ने इस्तेमाल कर लिया तुम्हारा — यूज़्ड । क्या उससे तुम्हारे जीवन में बेहतरी आ रही है? और उसको प्रेम का नाम क्यों दे रही हो? नाम इसलिए दे रही हो क्योंकि फिल्मों में देख लिया कि इसको ही तो प्रेम कहते हैं। लड़का लड़की मिले और लगे एक दूसरे को चाटने — यही प्रेम है! और पक्का समझ लो तुम इस बात को प्रेम नहीं बोलती अगर तुमने यह सब कुछ फिल्मों में ना देखा होता, दोस्तों से ना सुना होता या इधर-उधर कहीं पढ़ ना लिया होता, वगैरह-वगैरह। यह सब कुछ दिमाग में जो प्रभाव डाल दिए गए हैं, जो बातें रटा दी गई हैं, जो सिद्धांत चटा दिए गए हैं, उनका नतीजा है कि हम प्रेम के नाम पर न जाने क्या-क्या करतूतें कर रहे हैं जिनका प्रेम से कोई दूर-दूर का ताल्लुक नहीं।

फिर दोहराओ, प्रेम क्या है? दूसरे की भलाई, बेहतरी और तरक्की को प्रेम कहते हैं। दूसरे का हित हो सके इसकी खातिर अपना भी नुकसान कर लेने को प्रेम कहते हैं। दूसरे का शोषण प्रेम नहीं कहलाता, दूसरे पर माँगे रखना प्रेम नहीं कहलाता, दूसरे के ऊपर शर्तें थोपना प्रेम नहीं कहलाता। ये आप लोग जिस चीज़ को प्यार बोल रहे हैं ये दूर-दूर तक प्यार नहीं है। प्यार बड़ी महंगी चीज होती है, ऐसे थोड़े ही है कि जवान हो गए तो प्यार आ गया। ऐसे थोड़े ही होता है कि शरीर में कुछ हार्मोंस , रसायन अब उठने लगे तो आप भी प्रेमी हो गए। प्रेम सीखना पड़ता है भाई और आप जिंदगी के चालीस-पचास साल लगाकर भी प्रेम सीख लो तो बड़ी बात है। अब इतने में बहुत लोगों को मज़ाक मिल गया होगा, वो कहेंगे देखो ये क्या बोल रहे हैं, ये कह रहे हैं कि प्रेम सीखने में चालीस साल लगाने पड़ेंगे। अरे चालीस साल सीखने में लगाए, साठ साल के हो गए तो क्या बुढ़ापे में प्यार करेंगे? क्यों भई, बुढ़ापे में क्या आपत्ति है? देखो, तुम्हारी इसके पीछे मान्यता क्या है, तुम कह रहे हो, "बूढ़े हो गए तो सेक्स कैसे करेंगे?" तो तुम जो मजाक भी सोच रहे हो मेरी बात को, उसके पीछे भी तुम्हारी मान्यता यही है कि प्यार का सेक्स से कोई बहुत गहरा ताल्लुक है, वरना तुम इस बात पर हँस नहीं पाते कि साठ साल में प्यार क्या करेंगे। प्यार वो चीज़ है जो उम्र बढ़ने के साथ गहराती है, मीठी होती है। फिर कह रहा हूँ — प्यार सस्ता नहीं होता, प्यार प्राकृतिक नहीं होता, प्यार ऐसा नहीं होता कि कोई भी ऐरा-गैरा है उसको प्यार आ जाएगा। प्यार सीखना पड़ता है, प्यार साधना द्वारा अर्जित किया जाता है। प्यार प्राकृतिक नहीं होता, डकार प्राकृतिक होती है। शारीरिक हरकतें प्राकृतिक होते हैं, प्यार शारीरिक नहीं होता इसलिए प्यार प्राकृतिक नहीं होता। प्यार का मतलब होता है अपने मन को उस हालत पर ले आना — मन को साफ करके, मन को निर्भय करके — जहाँ मन दूसरे का हित अपने हित से ऊपर रख सके। सोचो, इसमें कितनी मेहनत लगेगी, मन को इस हालत में लाने में?

ऐसा थोड़े ही है कि सोलह साल के हो गए तो हमें भी हो गया, क्या हो गया? प्यार हो गया। अभी कल रात को हुआ है, प्यार हुआ है। ऐसे बदहजमी हो सकती है, दस्त हो सकते हैं, प्यार नहीं हो सकता। "मुझे भी हो गया, तुझे हुआ क्या? मुझे भी हो गया।" अरे! वायरस है क्या कि तुझे भी लग गया? मन को ज़बरदस्त शिक्षा देनी पड़ती है, बड़ी सफाई करनी पड़ती है। जीवन को, दुनिया को समझना पड़ता है, और बिलकुल ठीक समझ रहे हो तुम — हजार में से नौ सौ निन्यावे लोग मर जाते हैं बिना प्यार का 'प' भी समझे, आधा 'प' भी समझे, क्योंकि जीवन में उन्होंने और दस चीजों पर ध्यान दे लिया होगा तो दे लिया होगा, मन को प्यार सिखाने पर उन्होंने कभी कोई ध्यान दिया नहीं। तो प्यार के नाम पर ऊल-जलूल हरकतें उन्होंने खूब करी जीवन में। अपने आपको भी खूब धोखा दिया कि साहब हमें इससे प्यार है, उससे प्यार है। ना तुम्हें किसी से प्यार है, ना तुमसे किसी ने कभी प्यार किया।

प्यार करना बिरलों का काम होता है, प्यार करना सूरमाओं का काम होता है, प्यार करना बहुत सुलझे हुए लोगों का काम होता है, प्यार करना बहुत निर्भीक लोगों का काम होता है। ऐसा थोड़े ही है, सब ऐरे-गैरे नत्थू-खैरे कह रहे हैं, "हम भी आशिक, हम भी आशिक!" मुँह धोना आता नहीं, आशिकी चरम पर है। ऐसे नहीं होता है। ये सब तो पुराने पैंतरे हैं हवस मिटाने के — आई लव यू! 'आई लव यू' का और मतलब क्या होता है? आई लव यू बोलो जिस्म का खेल खेलो। आवश्यक नहीं है कि जो आई लव यू बोल रहा है उसने बहुत सोच समझ के ये इरादा करा हो कि आई लव यू बोलकर फ़साऊँगा। कई बार तो सोच समझ कर चाल भी रची जाती है, कई बार चाल नहीं रची जाती लेकिन फिर भी भीतर वृत्ति का इरादा यही होता है, अर्धचेतन तरीके से, सबकॉन्शियस तरीके से आप की योजना यही होती है कि प्यार शुरु हो और जिस्म तक पहुँचे। जल्दी से कहने मत लग जाना कि, "नहीं मेरा तो ऐसा कोई इरादा नहीं है, मेरा प्यार तो सच्ची भावना मात्र है!" जो लोग बोल रहे हैं मेरा प्यार सच्ची भावना मात्र है वो भावना शब्द ही नहीं समझते। भावना कोई हल्की-फुल्की चीज नहीं है। पहले समझो भावना होती क्या है, भाव माने क्या? भावना कहाँ से उठती? उसका विचार और वृत्ति से क्या संबंध है? पहले जानो तो सही कि भावना और देह एक ही बात हैं या अलग अलग हैं? चिल्लाने मत लग जाना कि वीडियो देख रहे हो और चिल्ला रहे हो कि मेरे प्यार की बेइज़्ज़ती करी जा रही है, देखो मेरी पवित्र प्रेम की भावना का अपमान हो रहा है। ना तुम पवित्रता जानते, ना प्रेम जानते, ना भावना जानते। अब तुम्हारा अपमान करने की ज़रूरत ही क्या है, तुम्हारी ज़िंदगी यूँही अपमानित है।

जिन्होंने जाना उन्होंने कहा है, जिस रास्ते पर चलकर के तुम अपने बंधनों से आजाद हो जाओ उसे प्रेम कहते हैं। वो कहते हैं कि बहुत हैं जो बार-बार कहते हैं कि प्रेम-प्रेम-प्रेम लेकिन प्रेम वो समझते नहीं हैं। प्रेम की एक ही परिभाषा है — जिस रास्ते पर चलकर के तुम वो रह ही ना जाओ जो तुम पहले थे, तुम्हारे भरम, भ्रांतियाँ, बंधन सब टूट जाएँ; वो रास्ता प्रेम कहलाता है। तो अब यह जो तुमने मुद्दा लिखा है इस पर तुम्हें क्या करना है, तुम जानो। मैं फिर वही बात दोहरा देता हूँ जोकि मैंने पहले वाक्य में कही — ये जो किस्सा है ये प्रेम का है ही नहीं।

Have you benefited from Acharya Prashant's teachings?
Only through your contribution will this mission move forward.
Donate to spread the light
View All Articles