प्रत्यगात्मा क्या है? परमात्मा क्या है? || सर्वसार उपनिषद् पर (2019)

Acharya Prashant

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प्रत्यगात्मा क्या है? परमात्मा क्या है? || सर्वसार उपनिषद् पर (2019)

आचार्य प्रशांत: आगे पूछा है कि “प्रत्यगात्मा क्या है और परमात्मा क्या है?” प्रत्यग + आत्मन्। प्रत्यग मतलब बाद में, पश्चात।

आत्मा से जो प्रकट होता है, आत्मा से जो उद्भूत है, उद्भासित है, उस जीव को जीवात्मा या प्रत्यगात्मा कहते हैं। तो जहाँ कहीं भी पढ़ो 'प्रत्यगात्मा', उसको मानना जीव या जीवात्मा। आत्मा से जो आया, वो है प्रत्यगात्मा। नहीं, ‘प्रत्येक’ नहीं है वो, 'प्रत्यग' अलग है। स्पष्ट है?

आत्मा शब्द वेदान्त का प्रतिपाद्य विषय है; आत्मा माने सत्य ही होता है, वेदान्त है ही सत्य के प्रतिपादन मात्र के लिए। और आत्मा जैसे पूरे भारत का प्रेम रहा हो। तो आत्मा शब्द भारतीय जनमानस में भी किसी सामान्य शब्द की तरह, किसी प्रचलित घरेलू मुहावरे की तरह व्याप्त हो गया। तो आत्मा का एक व्यावहारिक अर्थ भी निकल आया, वो व्यावहारिक अर्थ ऋषियों ने कदाचित् नहीं दिया था, मैं समझता हूँ, वो जनमानस से आया।

आत्मा का जो जनसामान्य में प्रचलित अर्थ है, वो है मन। लोग कह देते हैं न, “मेरी आत्मा को चोट लगी। मैं आत्मा से बात कर रहा हूँ। मेरी आत्मा बहुत ईमानदार है।” या कि “भगवान उनकी आत्मा को शांति दे।” या “मैं तुम्हें आत्मा से प्रेम करता हूँ।” ये मैंने अभी जितने भी साधारण वाक्य बताए, इन सबमें साझा क्या है? 'आत्मा' का प्रयोग किया जा रहा है 'मन' के लिए; बात की जा रही है मन की, और उसे कहा जा रहा है आत्मा।

ये हुआ मात्र अज्ञान के कारण नहीं है, ये मैं समझता हूँ कि इसलिए हुआ है कि भारत को आत्मा शब्द से ही प्रेम हो गया। आत्मा की बात करनी थी, और ये भी पता था कि शुद्ध मन को भी आत्मा कहते हैं और मन के लक्ष्य को भी आत्मा कहते हैं। तो जैसे लोगों ने कहा कि, “जब विशुद्ध मन आत्मा ही है, जब मन का आधार भी आत्मा है और मन का अंत भी आत्मा है, तो हम मन को मन बोलें ही क्यों? हम मन को आत्मा ही बोल देंगे।”

भाई, लोगों ने कहा, “मन आया कहाँ से? आत्मा से। मन जा कहाँ को रहा है? मन सोच किसको रहा है अंततः? मन को चाह किसकी है? तो मन बोलें ही क्यों?” उन्होंने कहा, “हम आत्मा ही बोलेंगे।” तो फ़िर ये सब हो गया कि “आत्मा को शांति दे, भगवान।” या “आत्मा तड़प रही है।” इत्यादि-इत्यादि।

वहाँ से ही फ़िर ये शब्द आए हैं – प्रत्यगात्मा, जीवात्मा, परमात्मा; नहीं तो 'आत्मा' काफ़ी है।

आत्मा ही एकमात्र और अद्वितीय, बल्कि अद्वैत सत्य है और आत्मा पर कोई उपाधि नहीं लग सकती। उपाधि समझते हो? उपाधि मतलब किसी चीज़ को किसी दूसरी चीज़ से संयुक्त कर देना, तो वो जो दूसरी चीज़ है, वो पहली चीज़ की उपाधि कहलाती है। समझ रहे हो? जैसे ये सफ़ेद रंग का कपड़ा है, इसको लाल रंग के पानी में डाल दें तो इसकी लाल उपाधि हो जाएगी। और आत्मा पर कोई उपाधि लग नहीं सकती, ये आत्मा के बारे में बड़ी मूलभूत बात है।

तो आत्मा को फ़िर परमात्मा कहना, या जीवात्मा कहना या प्रत्यगात्मा कहना वास्तव में श्रुतिसूत्रों के विरुद्ध ही है, क्योंकि श्रुति कहती है, “आत्मा के साथ कोई उपाधि जोड़ मत देना।” तो फ़िर क्यों कहना पड़ा परमात्मा? क्योंकि आत्मा शब्द को तो जनसाधारण ने हथिया लिया, वो 'आत्मा' को ले भागे। इतना सुंदर शब्द है आत्मा, उसको सर्वसाधारण ने अपने कब्ज़े में ले लिया और उसका उपयोग करने लगे किसके लिए? ‘मन’ के लिए।

तो फ़िर ऋषियों ने कहा, “अच्छा, भाई, आत्मा अगर तुमने ही ले लिया तो फ़िर हम अपने लिए दूसरा शब्द लेते हैं।” तो उन्होंने जो आत्मा है, विशुद्ध आत्मा, वास्तविक आत्मा, उसको क्या नाम दिया? परमात्मा। वास्तव में आत्मा और परमात्मा तो एक ही हैं। आत्मा में परम का अलंकरण जोड़ने की ज़रूरत क्या है, आत्मा तो है ही परम।

बात समझ में आ रही है?

जैसे तुम कहो, “सबसे ऊँचा आसमान”, तो कोई नीचा आसमान भी होता है क्या? तो वैसी ही बात है। जैसे तुम कहो कि “सबसे पूर्ण पूर्णता”, तो कोई अधूरी पूर्णता भी होती है क्या? तुम कहो, “सबसे खाली खालीपन।” तो कोई अधूरी शून्यता भी होती है क्या? तो वैसे ही आत्मा अपने आपमें परिपूर्ण एवं अनंत है। आत्मा को किसी उपाधि की, किसी विशेषण की, किसी उपसर्ग-प्रत्यय की कोई ज़रूरत नहीं है। लेकिन पूछना पड़ रहा है, देखो, यहाँ शिष्य को गुरु से, “प्रत्यगात्मा क्या है, परमात्मा क्या है?”

तो गुरु यही समझा रहे हैं, कह रहे हैं कि “आत्मा जब उपाधियुक्त हो जाती है और जीव आत्मा को भूल करके उपाधियों से तादात्म्य करने लगता है तो उसको कहते हैं प्रत्यगात्मा। और विशुद्ध चैतन्य, मुक्त चेतना को कहते हैं परमात्मा।” इस बात को उपनिषद् ने बड़े सुंदर उदाहरण के माध्यम से समझाया है।

उपनिषद् कहते हैं कि “तत्वमसि, जानते हो न शिष्य? ‘तत् त्वम् असि', सुना है न?” तो “मैं देख रहा हूँ”, शिष्य ने हुंकार भरी, “हाँ।” तो ऋषि कह रहे हैं, “तत् है परमात्मा और त्वम् है प्रत्यगात्मा। ‘वह’ परमात्मा है, ‘तुम’ प्रत्यगात्मा हो। लेकिन तुम प्रत्यगात्मा हो करके परमात्मा सिर्फ़ तब हो जब तुम परमात्मा से प्रेम रखो, मुक्ति की आकाँक्षा रखो और अपनी चेतना को अनंत ऊँचाइयों तक ले जाओ, अनंत ऊँचाइयों तक।”

अब इस अनंत शब्द का ही प्रयोग करके गुरु ने आगे एक बात कही, गुरु ने कहा, “परमात्मा वो जो प्रत्यगात्मा को सच्चिदानंद घन अनंत का अनुभव करा दे।” क्योंकि ये जो प्रत्यगात्मा है या जीवात्मा, ये तो अनुभवों में ही रहता है न? परमात्मा को कोई अनुभव नहीं हो सकते क्योंकि सब अनुभव द्वैत में होते हैं और परमात्मा अद्वैत है, तो परमात्मा को तो कोई अनुभव होते नहीं। पर जो प्रत्यगात्मा माने जीव है, वो तो अनुभवों में ही रहता है।

इसको अगर उपनिषद् की भाषा में कहें तो सत्य का, ज्ञान का, आनंद का और अनंतता का कुछ पता लगने लगे तो ये प्रत्यगात्मा परमात्मा के निकट पहुँच रहा है। और पता लगते-लगते, पता लगने की प्रक्रिया में, पता लगने के कारण ही, जिसको पता लग रहा है, वो पता लगने वाली वस्तु में ही युक्त हो जाए, समाहित हो जाए, लीन हो जाए तो फ़िर दोनों बिलकुल एक ही हो गए, तत्वमसि, योग हो गया, मिल गए, लय हो गया।

बात समझ में आ रही है?

साधारणतया प्रत्यगात्मा परमात्मा से बड़ी दूर है, ठीक वैसे जैसे मन आत्मा से दूर ही रहता है, एक हो करके भी दूर रहता है। ईशावास्य कहता है न, “तद्दूरे तद्वंतिके; जो तुम्हारे बिलकुल पास का है, तुम उसी से बहुत दूर हो।” तो वैसे ही मन और आत्मा का रिश्ता है; वो तुम्हारे बहुत पास का है फ़िर भी तुम उससे बहुत दूर हो। लेकिन इतनी सामर्थ्य है और इतना सौंदर्य है उस दूर की चीज़ में कि वो तुमको विवश कर देती है अपने निकट आने में। कैसे विवश कर देती है?

वो तुमको ये अनुभव दिला देती है; ऐसे अनुभव जो बिलकुल तुम्हें भौंचक्का कर देते हैं, तुम्हारे होश उड़ा देते हैं, तुम्हें उस परम लक्ष्य के प्रेम में डाल देते हैं, उसके बंधन में डाल देते हैं। सत्य का अनुभव, आनंद का अनुभव, ज्ञान का अनुभव और अनंतता का अनुभव। ऐसा है वो परमात्मा। मात्र वही है जो तुम्हें झटका दे सकता है, जो तुम्हें बुरी तरह चौंका सकता है; क्योंकि तुम्हारे सारे अनुभव क्षुद्रता के हैं, सीमित संसार के हैं और वो तुमको तुम्हारी सीमाओं से बाहर का कुछ अचानक दिखा देगा। तुम भौंचक्के रह जाओगे, “ये क्या जादू? अचरज, अचरज!”

इसी तरीके से ज्ञान; तुम्हारे सारे अनुभव अज्ञान के हैं, अंधेरे के हैं। 'वो' अकेला है जिसका संसर्ग तुम्हें ज्ञान दिला देता है, और जहाँ ज्ञान है, वहाँ अद्भुत आश्चर्य है, तुम्हें उसकी ओर बढ़ना ही पड़ेगा।

बात समझ में आ रही है?

अध्यात्म और कुछ नहीं है – मन को समझना और मन का जो सबसे गहरा रिश्ता है, उसको उजागर कर देना।

गहरा रिश्ता बनाना नहीं, वो गहरा रिश्ता है; मन अस्तित्वमान हो ही नहीं सकता बिना उस गहरे रिश्ते के। वो गहरा रिश्ता है, पर मन उस गहरे रिश्ते को जैसे किसी अंधेरे तहखाने में दबा-छुपाकर रखता है, उसको प्रकाशित ही नहीं करता, उसको प्रकट ही नहीं करता, उसको स्वीकार ही नहीं करता।

अध्यात्म का काम है तुम्हारा वो जो सबसे गहरा, सबसे पवित्र और जो सबसे केंद्रीय रिश्ता है, जिसको तुम अपनाने से ही इंकार कर रहे हो मूर्खतावश, उसको उद्घाटित कर देना—ये अध्यात्म का काम है।

उपनिषद् के शब्दों में:

“सत्य, ज्ञान, अनंत और आनंद वस्तु बोधक पद जिसके लक्षण हैं तथा देश, काल, वस्तु आदि निमित्तों के रहते भी जिसमें कोई परिवर्तन नहीं होता, उसको ‘तत्' पदार्थ अथवा ‘परमात्मा' कहते हैं।” —सर्वसार उपनिषद्, श्लोक १३

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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