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पीछे छूट जाने का डर लगता है? (फ़ियर ऑफ मिसिंग आउट)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: सर, ये फोमो क्या है, फियर ऑफ मिसिंग आउट (पीछे छूट जाने का डर)? मुझे भी बहुत डर लगता है कि दूसरे लोग जिन चीज़ों का अनुभव ले रहे हैं, आनंद ले रहे हैं कहीं मैं उन चीज़ों से वंचित न रह जाऊँ। मैं कुछ समय से आपको सुन रहा हूँ तो बहुत सारी चीज़ें अब मुझे व्यर्थ, निरर्थक भी दिखाई देने लग गई हैं, फिर भी जब मैं दूसरों को उन चीज़ों का मज़ा लेते देखता हूँ तो मेरे भीतर फोमो जग जाता है, कि दूसरे तो मज़े ले गए, मैं ही कहीं अध्यात्म के चक्कर में चूक न जाऊँ, वंचित न रह जाऊँ।

आचार्य प्रशांत: तो ले लो मज़ा, कौन रोक रहा है। ले लो भई मज़ा। वहाँ इतने मज़े ही होते, पहली बात, तो तुम अध्यात्म की तरफ आते ही क्यों? अध्यात्म किसी अड़ियल हेडमास्टर द्वारा तय किया हुआ पाठ्यक्रम थोड़े ही है।

बहुत सारे अभी भारत में भी शिक्षा बोर्ड ऐसे हैं जिनके पाठ्यक्रम में ऐसी चीज़ें पढ़ाई जा रही हैं जिनकी अब कोई उपयोगिता नहीं। उनकी किताबों में अभी भी उन्नीस सौ पचास-उन्नीस सौ साठ के दशक का विज्ञान पढ़ाया जा रहा है। कुछ मामला उन किताबों में ऐसा है ही नहीं जो आज की ज़िन्दगी में व्यावहारिक रूप से काम आए। बस कुछ बड़े लोग हैं, ऊँचे बैठे हैं और उन्होंने तय कर दिया है कि ये किताबें पढ़नी हैं, इनको पढ़ो नहीं तो परीक्षा में फेल करार दिए जाओगे। तो बेचारे जो छात्र हैं वो डर के मारे धौंस सहे जा रहे हैं और पढ़े जा रहे हैं।

अध्यात्म ऐसा थोड़े ही है, पुरानी तिथि बाह्य किताबों जैसा, कि उनमें जो लिखा है उस बात की कोई प्रासंगिकता नहीं लेकिन फिर भी रटो, और सवाल आ रहे हैं जो पूछ रहे हैं कि ये क्या हुआ था, वो क्या हुआ था।

ऐसी-ऐसी मशीनें प्रयोगशाला में रखी हुई हैं जो आज उद्योग में कहीं इस्तेमाल न हो रही हों और छात्रों को उन पर प्रयोग कराये जा रहे हैं। बहुत सारे ऐसे कॉलेज हैं, खासतौर पर इंजीनियरिंग में, कि जो टेक्नोलॉजी (प्रौद्योगिकी) दुनिया चालीस साल पीछे छोड़ आई, उन टेक्नोलॉजी की मशीनें प्रयोगशालाओं में रखी हुई हैं।

कई साल पहले जब मैं जाया करता था टेक्निकल (तकनीकी) संस्थानों में, कॉलेजों में और उनकी प्रयोगशालाओं के दर्शन करूँ, मैं उनके डायरेक्टर्स वगैरह को बोलता था कि “ये जो आप एक्सपेरिमेंट (प्रयोग) करा रहे हो ये इंडस्ट्री (उद्योग जगत) में कहीं भी काम आने वाला है? ये द्वितीय विश्व युद्ध के समय की मशीन है, आप इसे आज क्यों अपने छात्रों को पढ़ा रहे हो? वो इस पर प्रयोग कर भी लेंगे तो क्या होगा?” बोले “दूसरी है ही नहीं।” मैंने कहा “ये कहाँ से आईं?” बोले, “ये वो अंग्रेज़ जाते-जाते डोनेशन (दान) दे गए, तो तब से पड़ी हुई है और छात्र इसी को चला रहे हैं।” अध्यात्म ऐसा थोड़े ही है।

देखो, धर्म ग्रंथों में जब भी कुछ ऐसा देखना जो आज बिलकुल काम न आ सकता हो, जिसकी आज कोई उपयोगिता, कोई प्रासंगिकता ही नहीं है, तो समझ लेना कि वो बात किसी ज़माने के लिए बोली गई थी, आज के लिए वो काम की नहीं है।

बाहर जो कुछ है वो बदलेगा तो धर्म ग्रंथों ने बाहर की दुनिया के बारे में जो बोला है, बहुत सम्भावना है कि वो बात आज उपयोगी ना हो, लागू ही ना होती हो। उदाहरण के लिए कोई पुरानी किताब है। इसी पर आ जाओ, तकनीक की वो बात करती है कि ऐसा है वैसा है, अब वो चीज़ बदल गई, आदमी बहुत आगे आ गया। तो उस बात पर अटके मत रहो।

फिर अध्यात्म आवश्यक क्यों है? फिर मैं क्यों यहाँ बैठ करके उपनिषदों को आपके साथ बाँटता रहता हूँ? क्योंकि जहाँ तक आदमी के आतंरिक जगत की बात है, वहाँ कुछ नहीं बदला, ना बदल सकता है।

बाहरी दुनिया की बात अगर कर रहा है कोई धर्म ग्रन्थ कि बैलगाड़ी कैसे सजानी चाहिए और एक गाँव से दूसरे गाँव तक कैसे जाना चाहिए, तो उन बातों को अब हटा दो। अब बैलगाड़ी का ज़माना नहीं रहा, और गाँव भी अब वो नहीं रहे जो हज़ार साल पहले हुआ करते थे। न ही यात्रा के जो अब साधन हैं वो वैसे हैं जैसे कभी हुआ करते थे। तो उस तरह की बातें अगर हो रही हों, कपड़ों के बारे में कुछ बोल रहा है धर्म ग्रन्थ, तो छोड़ो। वो बात या तो उपयोगिता की नहीं है या सीमित उपयोगिता की है।

लेकिन अगर लालच के बारे में कुछ बोल रहा है, माया के बारे में कुछ बोल रहा है, मन के बारे में कुछ बोल रहा है, क्रोध के बारे में कुछ बोल रहा है, स्त्री-पुरुष संबंधों के बारे में कुछ बोल रहा है, भक्ति के बारे में कुछ बोल रहा है, बोध के बारे में कुछ बोल रहा है, भय के बारे में कुछ बोल रहा है, तो वो बात कभी पुरानी पड़ सकती है क्या? क्यों नहीं पुरानी पड़ सकती? क्योंकि चार-हज़ार साल पहले भी आदमी के मन में डर था और आज भी आदमी के मन में डर है। चार-हज़ार साल पहले भी ईर्ष्या थी और आज भी ईर्ष्या है। चार-हज़ार साल पहले भी स्त्री-पुरुष संबंधों में बड़ा टकराव था, कलह थी, दुःख था, आज भी है।

आदमी चार-हज़ार साल पहले भी अज्ञान में जी रहा था अपने प्रति, आदमी आज भी नहीं जानता कि वो कौन है। तो वहाँ पर अनिवार्य हो जाता है धर्म ग्रंथों को पढ़ना। अनिवार्य इसलिए क्योंकि उपयोगी हैं, इसलिए नहीं कि हेडमास्टर साहब नाराज़ हो जाएँगे। अनिवार्य इसलिए क्योंकि उपयोगी है, व्यावहारिक है।

याद रखो धर्म ग्रंथों को आप इसलिए नहीं पढ़ रहे हो कि ऊपर बैठा कोई भगवान है वो नाराज़ हो कर श्राप दे देगा। बहुत लोगों की ऐसी ही दृष्टि रहती है, वो कहते हैं “देखो देखो गीता ठीक से रख दो नहीं तो कृष्ण भगवान् नाराज़ हो जाएँगे।” नाराज़ होने की कोई बात ही नहीं। उन्हें क्या करना है तुम पर नाराज़ हो कर? कृष्ण कोई ईश्वर थोड़े ही हैं, पार ब्रह्म हैं। ये सब बातें तुम देवी देवताओं के साथ जोड़ के रख लेना कि खुश हो गए, नाराज़ हो गए, वरदान दे दिया, श्राप दे दिया। ब्रह्म को ना तुम्हें वरदान देना है, ना तुम्हें श्राप देना है। हाँ, सत्य ज़रूर बाँट सकता है, जैसे उन्होंने गीता बाँट दी है। तुम उसका लाभ लेना चाहो तो लो, लाभ ना लेना चाहो ना लो।

तो गीता पढ़ने का या गीता को समादृत करने का ये कारण तो बिलकुल भी नहीं हो सकता कि ऊपर बैठी कोई ताकत तुम से नाराज़ हो जाएगी या तुम पर प्रसन्न हो जाएगी। कारण बस एक है: पढ़ोगे तो लाभ होगा, तुरंत लाभ होगा, बस ये फायदा है। इसीलिए उसको सम्मान दिया जाता है, इसीलिए उसे आसन पर बैठाया जाता है, इसीलिए उसको एक विशेष दर्ज़ा प्राप्त है।

अब आओ तुम्हारे फोमो पर। तुम जिन चीज़ों की बात कर रहे हो कि अध्यात्म वर्जित कर रहा है लेकिन दुनिया कर रही है, और तुमको लग रहा है कि मैं भी कर लूँ, कहीं मैं ही चूक ना जाऊँ। अध्यात्म उनको अगर वर्जित कर रहा होगा तो कोई वजह होगी न?

अगर वाकई कोई अच्छी किताब है इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की, और वो तुमको बता रही है कि वो जो लाल तार है उसको छू मत देना, तो कोई वजह होगी न? या तो वो किताब रद्दी हो, तो तुम कहो, “इसमें जो कुछ भी लिखा है मुझे उसका पालन करना ही नहीं। ये किताब दो-सौ साल पहले की है जब डीसी करंट (दिष्ट धारा) चला करता था, तो इसमें जो बातें लिखी हैं आज लागू ही नहीं होतीं। या ये किताब उस ज़माने की है जब एसी करंट (प्रत्यावर्ती धारा) की वो फ्रीक्वेंसी (आवृत्ति) ही नहीं हुआ करती थी जो आज है। तो इसमें फिर इलेक्ट्रिकल इक्विपमेंट्स (विद्युत उपकरणों) को लेकर के जो निर्देश गए हैं मैं क्यों उनका पालन करूँ?” बिलकुल पालन मत करो।

क्योंकि उसमें जो कुछ लिखा है—ये कई बार दोहरा रहा हूँ ताकि बात दिमाग में बैठ जाए— क्योंकि उसमें जो कुछ लिखा है वो आज व्यावहारिक नहीं है, लागू नहीं होता। तो फिर मैं बिलकुल नहीं कहूँगा कि तुम्हारे लिए कुछ भी वर्जित है। पर अगर वो किताब आज पूरी तरह लागू होती है और वो किताब तुमसे कह रही है कि, :देखो, इस तरह के दो तारों को आपस में छुआ मत देना", तो मत छुआओ भाई, भले ही तुम सौ मूर्खों को ये हरकत करते देखो कि वो यही काम कर रहे हैं। हो सकता है कि तारों को आपस में छुआने का दुष्परिणाम अभी ना मिलना हो, कल मिलना हो। ये भी हो सकता है कि दुष्परिणाम अभी ही मिल रहा हो किन्तु सूक्ष्म हो, उसका असर हो रहा है पर दिखाई नहीं दे रहा, ये भी तो हो सकता है।

तो डर की वजह से हमको कोई वर्जना स्वीकार नहीं करनी है। अगर तुमसे कहा जा रहा है कि लालच के वशीभूत होकर कोई निर्णय ले रहे हो तो पछताओगे, अगर तुमसे कहा जा रहा है कि बाहरी चमक-धमक में बहक करके कोई निर्णय ले रहे हो तो पछताओगे, तो इसलिए नहीं कहा जा रहा कि ये बातें नैतिक दृष्टि से बुरी हैं। ये बात इसलिए नहीं कहा जा रही, कि इन बातों को अगर नहीं करोगे तो कोई बूढ़े बाबाजी हैं वो नाराज़ हो जाएँगे। इन बातों को अगर नहीं मानोगे तो तुम्हारी ही ज़िन्दगी नर्क जैसी हो जाएगी, इसलिए वर्जित किया गया है।

तो मिसिंग आउट नहीं हो रही है कि, "अरे, दुनिया मजे ले रही है मैं ही चूक गया।" वो दुनिया मज़े नहीं ले रही है, वो दुनिया अपनी कब्र खोद रही है, वो दुनिया अपनी मौत का सामान तैयार कर रही है। और तुम कह रहे हो ‘आई एम मिसिंग आउट ऑल द फन’ (मैं सभी मज़े करने से चूक रहा हूँ)। वो फन हैं?

अब उसमें भी बात सीधी है। या तो कोई समझाने से समझ जाए और जो समझाने से नहीं समझते उनके लिए तो फिर एक ही तरीका रहता है कि जाओ और अनुभव लेकर के आओ। तुम भी उन्हीं जैसे हो जाओ और फिर अनुभव लेकर आ जाना।

लेकिन ये अनुभव लेने वाले रास्ते में दो-तीन तकलीफें हैं। पहली, ज़रूरी नहीं है कि अनुभव लेकर भी सब सीख ही जाएँ। दूसरी बात, अनुभव तुम्हें तोड़ भी सकता है और तोड़ने के बाद तुम ऐसे भी हो सकते हो कि तुम कुछ नया सीखने के काबिल ही ना बचो, बल्कि जो तुम गलत सीखे बैठे हो उसी को जायज़ ठहराने लग जाओ। और एक तीसरी चीज़ भी हो सकती है कि तुम अनुभव लेने गए और कभी लौटकर नहीं आए क्योंकि ज़िन्दगी तो छोटी सी ही है। जब तक तुम सीख पाते, इससे पहले कि तुम सीख पाते कुछ, मौत आ गई।

तो जो लोग कहते हैं न कि हम तो जीवन से सीखेंगे, अपने अनुभवों से सीखेंगे, सीखा जा सकता है पर ये दो-तीन दिक्कतें हैं। तुम्हारा जीवन है इतना बड़ा कि तुम अनुभवों से सीखते रह जाओ, सीखते रह जाओ? दूसरी बात, तुम भीतर से हो इतने ठोस कि अनुभवों के सामने टूट ही नहीं जाओगे, घुटने ही नहीं टेक दोगे? और तीसरी चीज़, आवश्यक कहाँ है कि तुम अनुभवों से कुछ सीखो ही? लोग ऐसे भी हैं जो गलत ज़िन्दगी जिए जा रहे हैं, जिए जा रहे हैं और उनको पता भी नहीं है वो गलत जी रहे हैं, तो वो सीखेंगे कैसे?

कुछ भी अगर करना है तो इसलिए मत करो कि सब कर रहे हैं। इसलिए मत करो वो सब कुछ, कि सब लोग कर रहे हैं। तुम्हारे पास एक आत्मिक नज़र होनी चाहिए, आत्मिक नज़र से मेरा मतलब है साफ़ देख पाने वाली दृष्टि। तुम्हारे पास एक आत्मिक दृष्टि होनी चाहिए। देखो, बात सही ही लगे, समझ में आए, तो करो।

इसी तरीके से किसी चीज़ को वर्जित मत मान लो सिर्फ इसलिए क्योंकि धर्म में वो पारम्परिक रूप से वर्जित मानी गई है। वर्जित भी वो तुम्हारे लिए सिर्फ़ तब ही है, जब धर्म ग्रंथों ने जो केंद्रीय सीख दी है और अगर उस केंद्रीय सीख को तुम समझे हो तो वो केंद्रीय सीख तुम्हारी आत्मा के साथ एक अनुगूंज करेगी। वो धर्म ग्रंथ की जो बात होगी और तुम्हारे हृदय की जो बात होगी उनमें आपस में एक जुगलबंदी हो जाएगी, तारतम्य बैठ जाएगा। जब ये हो जाए तब ही धर्म ग्रंथों की बात मानना, अन्यथा दुनिया के धर्म ग्रंथों में, मैं बिलकुल स्वीकार करता हूँ, ऐसा बहुत कुछ है जिसकी आज उपयोगिता नहीं है। उस चीज़ के पीछे मत चलते रह जाओ।

धर्म को लेकर के ये जितने फसाद हैं, जितनी लड़ाइयाँ हैं और जितने संघर्ष हैं वो अधिकांशतः हैं ही इसीलिए क्योंकि लोग धर्म के केंद्र पर नहीं पहुँच रहे। और धर्म के जो बाहर-बाहर की बातें हैं, जो कभी किसी ज़माने में बोल दी गईं थीं, उस ज़माने के लिए वो उपयुक्त थीं। आज हो सकता है कि वो काम की ना हों। लोग उन बाहरी चीज़ों से चिपक करके बैठे हुए हैं। और जो केंद्रीय तत्त्व है धर्म का उसकी तरफ नहीं आ रहे। उसकी तरफ क्यों नहीं आ रहे? क्योंकि उसकी तरफ आने की कीमत चुकानी पड़ती है, उसकी तरफ आओ तो अहंकार टूटता है।

तो उसको तो देख नहीं रहे और बाहरी चीज़ों से चिपक कर बैठ गए हैं। बाहरी चीज़ें क्या होती हैं? "परम्पराएँ हमारी ऐसी हैं जी, हमारे रिवाज़ ऐसे हैं जी, हमारा पहनावा ऐसा है जी, ये हमारी बोली है जी, हम तो जी ऐसे ही खाएँगे-पीएँगे क्योंकि हम फलाने धर्म के हैं। नहीं हम तो फलाना त्यौहार इसी तरीके से मनाते हैं, और हमारी प्रथाएँ, हमारे विश्वास", ये सब बाहर-बाहर की चीज़ें हैं धर्म में।

धर्म में केंद्र पर क्या होता है? धर्म में केंद्र पर होता है ‘मैं’ का विसर्जन। धर्म में केंद्र पर क्या होता है? अहम् से मुक्ति। वो केंद्रीय, वो असली चीज़ है, बाकी सब बाहरी-बाहरी चीज़ें हैं। बाकी चीज़ों का निर्माण इसलिए हुआ था ताकि केंद्रीय चीज़ में सहायता मिल सके। वो जो बाहरी चीज़ें थीं न, वो फैसिलिटेटर (सहायक) थीं। वो इसलिए थीं ताकि वो केंद्रीय चीज़ की उपलब्धि में सहयोगी हो सकें। पर वो बाहरी चीज़ें थीं और वो समय सापेक्ष थीं। वो काल निर्भर थीं। तो काल बदला वो बाहरी चीज़ें अब उपयोगी नहीं रह गई हैं।

पर केंद्रीय चीज़ तो आज भी उपयोगी है। उसी तक पहुँचना है। वो सदा उपयोगी रहेंगी, वो कालातीत हैं। उस केंद्रीय चीज़ तक पहुँचने के लिए आज अगर कोई दूसरी बाहरी चीज़ निर्मित करना हो तो करो, बेशक करो। लेकिन वो दूसरी बाहरी चीज़ ऐसी निर्मित करो जो तुम्हें केंद्र तक पहुँचाती हो। वो दूसरी बाहरी चीज़ ऐसी मत निर्मित कर लेना जो तुम्हें समाज का गुलाम बना देती हो।

अब क्या हो रहा है दुनिया में? ऐसे भी लोग निकल रहे हैं दुनिया में जो कहते हैं, “साहब हम तो आधुनिक हैं, हम लिबरल (उदार) हैं, ये हम रस्मों-रिवाज़ वगैरा नहीं मानते।” बहुत सारे रस्मों-रिवाज़ हैं जो मैं भी नहीं मानता। आपको मिल जाएगा कोई, जा रहा है वो अपने-आपको कह रहा है “मैं तो इंटेलेक्चुअल लिबरल (बुद्धिजीवी और उदारवादी) हूँ, मैं ये सब प्रथाएँ-परम्पराएँ नहीं मानता।” मानता मैं भी नहीं हूँ बहुत सारी प्रथाएँ-परम्पराएँ धर्म की, लेकिन उसमें और मुझमें एक अंतर है।

वो धार्मिक प्रथाएँ-परम्पराएँ नहीं मानता बाहर की पर वो जो कुछ अब मानने लग गया है, वो इसलिए मानने लग गया है क्योंकि आज के समय का वो चलन है। या आज की कोई विचारधारा निकली है पिछले सौ दो-सौ साल की उसका वो चलन है, तो वो उसको मानने लग गया है। उसने धर्म के बाहरी अंगों का त्याग इसलिए नहीं करा है क्योंकि उसे धर्म के केंद्र तक पहुँचना है, उसने धर्म के बाहरी अंगों का त्याग इसलिए करा है क्योंकि उसे बाहर समाज के बहाव में साथ-साथ बहना है। मैंने धर्म के बाहरी अंग का त्याग इसलिए किया है क्योंकि अब वो ऑउटडेटेड (अप्रासंगिक) हो गया और मुझे धर्म के केंद्र तक पहुँचना है जिसमें अब वो ऑउटडेटेड चीज़ मेरी सहायता नहीं कर सकती, तो मैंने उसका त्याग इसलिए किया है। अंतर समझ में आ रहा है?

तो त्याग करने के पीछे अगर बोध है और साफ़ दृष्टि है तो तुमको फोमो नहीं होगा कि "अरे! मैं ही रह गया, बाकी सब मज़े लूट गए।" क्योंकि तुमको पता है सबसे ज़्यादा मज़ा कहाँ है? केंद्र में। अब अगर तुम कोई चीज़ छोड़ रहे हो ताकि तुमको आनंद की उपलब्धि हो, तो क्या तुम ये शिकायत करोगे कि, "दुनिया मज़े मार गई, मैं रह गया"? अरे दुनिया मज़े ले रही है तुम्हें क्या मिल रहा है? आनंद। मज़े से बहुत ऊपर की बात है वो। फिर तुम ये शिकायत नहीं करोगे।

लेकिन अगर तुम ऐसे हो कि तुम्हें कुछ समझ में तो आया नहीं है कि क्या छोड़ना है, क्या नहीं छोड़ना है। तुमसे किसी धर्म गुरु ने बोल दिया, मान लो (खुद की ओर संकेत करते हुए) इन्हीं महाराज ने बोल दिया कि फलानि चीज़ ठीक नहीं है और बिना समझे तुमने वो चीज़ छोड़ दी। तो तुम्हारे भीतर कोई अपनी आत्मिक आश्वस्ति तो होगी नहीं कि छोड़ी काहे को है। अब तुम छोड़ तो दोगे और यहाँ से बाहर निकलोगे फिर उन्हीं ढर्रों पर वापस। बहुत लोगों का है।

मैं एक अवस्था पर आकर, कुछ समझ करके, किसी बोध से दूध का, दूध से निर्मित सारे पदार्थों का और जानवरों से आ रहे सब वस्तुओं का, पदार्थों का और चीज़ों का सबका मैंने त्याग किया। अब बहुत सारे लोग हैं मेरे आस-पास के वो कहते हैं, "अच्छा, ये छोड़े बैठे हैं चलो हम भी छोड़ देते हैं।" वो छोड़ तो देते हैं और उसके बाद फिर उनको बड़ी तकलीफ होने लग जाती है।

तो फिर कोई आएगा, धीरे से मुझसे बोलेगा, "वो न वो मेरा बी ट्वेल्व (विटामिन) कम हो रहा है।" तो मुझे क्यों बता रहा है? तुझे दूध पीना है, पी ले। मैं बताने आता हूँ क्या कि मेरा बी ट्वेल्व बढ़ रहा है कि कम हो रहा है? मेरा तो आज तक कम हुआ भी नहीं। इतने सालों से सब छोड़े बैठा हूँ मेरा तो कम नहीं हुआ, वो आ कर मुझे बता रहा है। मुझे क्यों बता रहा?

पता है वो मुझे क्यों बता रहा है? क्योंकि उसने अपनी आत्मा के कारण नहीं छोड़ा है, उसने मेरे कारण छोड़ा है तो इसलिए वो दलील देने भी किसको आ रहा है? मुझे। उसने अगर अपने बोध से छोड़ा होता, उसने अगर अपने कलेजे की आवाज़ से छोड़ा होता तो वो मुझसे थोड़ी बताने आता। वो तो अभी वास्तव में मुझे बता नहीं रहा है, मेरी अनुमति माँग रहा है कि चलो थोड़ा दो-चार गिलास लस्सी हो जाए। तो भाई तू पी लस्सी, ना पी, मेरा क्या जाता है?

वैसे ही और भी हैं। वो यहाँ जब तक अंदर-अंदर रहेंगे, तो अब यहाँ पर तो मेरी ही गुंडागर्दी चलती है तो वर्जित है कि दूध वाला समान नहीं आएगा। पर बाहर निकलेंगे नहीं कि तुरंत ‘*बर्गर विथ एक्स्ट्रा चीज़*’ (ज़्यादा चीज़ के साथ बर्गर)। अरे तुम क्यों अपने-आपको इतनी तकलीफ दे रहे हो कि मुझे दिखाने भर के लिए त्याग करे बैठे हो? जब तुम्हारे भीतर अभी करुणा जगी ही नहीं, जब तुम्हारा बल्ब अभी फ्यूज़ का फ्यूज़ ही है, तो तुम क्यों आडम्बर कर रहे हो?

फिर तुमको यही लग रहा है, " फोमो हो गया मेरे साथ। दुनिया चीज़ (पनीर) के मज़े ले गई मैं तो रह ही गया।" यही तो फोमो है। "दुनिया चीज़ (पनीर) के मज़े ले गई और मैं रह गया", ये फोमो है।

बात को समझो, बात को जानो उसके बाद जो छोड़ोगे वो वैसे ही छोड़ोगे जैसा केला खा कर आदमी छिलका छोड़ देता है। उसमें फोमो होता है क्या? कि " ओह, आय मिस्ड आउट। आय मिस्ड आउट ऑन छिलका " (ओह कुछ छूट गया, छिलका छूट गया)। होता है?

बिना जाने छोड़ोगे तो तुम्हे पता ही नहीं चलेगा कि गूदा क्या है, छिलका क्या है। छिलका चाट रहे हो, चबा रहे हो, गूदा किनारे रख दिया उसको बन्दर ले गए। ये फिर तुम्हारी गति रहेगी।

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